कोयिल् तिरुवाय्मॊऴि – सरल व्याख्या – ४.१० – ऒन्ऱुम्
श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः कोयिल तिरुवायमोऴि << ४.१ यद्यपि सर्वेश्वर, जो स्वयं श्रियःपति (श्री महालक्ष्मी के दिव्य स्वामी) हैं, जीवात्माओं के प्रति अपनी परम करुणावश इस संसार में अर्चावतार् (विग्रह रूप) में अवतरित हुए और उन जीवात्माओं की प्रतीक्षा कर रहे हैं, तथापि ये जीवात्मा उनके द्वारा ही नियुक्त … Read more