श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः

यद्यपि सर्वेश्वर, जो स्वयं श्रियःपति (श्री महालक्ष्मी के दिव्य स्वामी) हैं, जीवात्माओं के प्रति अपनी परम करुणावश इस संसार में अर्चावतार् (विग्रह रूप) में अवतरित हुए और उन जीवात्माओं की प्रतीक्षा कर रहे हैं, तथापि ये जीवात्मा उनके द्वारा ही नियुक्त अन्य देवों की प्रति जा रहे हैं। यह देखकर, आऴ्वार् ने उन्हें भगवान की सर्वोपरिता का विस्तार से बोध किया, उनका उद्धार किया और इस कारण परम आनंदित हुए। आऴ्वार् इस दशक में अर्चावतार में एम्पेरुमान् (भगवान) की इसी सर्वोच्चता को प्रकट करते हैं। चूंकि यह दिव्यदेश स्वयं आऴ्वार् की जन्मस्थली है, इसलिए यहाँ विराजमान एम्पेरुमान् के प्रति उनका जो विशेष अनुराग (लगाव) था, वह भी इसमें प्रस्फुटित होता है।
प्रथम पासुरम में,आऴ्वार् एम्पेरुमान् के ‘सर्वकारणत्व्’ (सबके आदि कारण होना ) को स्थापित करने वाले कथनों के अनुरूप, भौतिकवादी संसार से प्रश्न करते हैं— “जब सब कुछ के मूल कारण स्वयं सर्वेश्वर यहाँ साक्षात् विराजमान हैं, तुम किस अन्य देवता की खोज में भटक रहे हो?”
प्रथम पासुरम –
ऒन्ऱुम् देवुम् उलगुम् उयिरुम् मट्रुम् यादुम् इल्ला
अन्ऱु नान्मुगन् तन्नॊडु देवर् उलगोडु उयिर् पडैत्तान्
कुन्ऱम् पोल् मणि माड नीडु तिरुक्कुरुगूर् अदनुळ्
निन्ऱ आदिप् पिरान् निऱ्-क मट्रैत् तॆय्वम् नाडुदिऱे।
जब देव-जाति (स्वर्गिक सत्ताएँ), उनके लोक, अन्य समस्त योनियाँ और चराचर जगत के सभी तत्व पूर्णतः विलीन होकर भगवान में ही समाहित हो चुके थे (और उनका कोई नाम या, रूप शेष न था), तब भगवान ने समष्टि पुरुष ब्रह्मा, अन्य देवताओं, उनके लोकों और विभिन्न जीव-योनियों की पुनः सृष्टि की है । जब ऐसे सर्वकारण और परम उपकारी भगवान स्वयं पर्वतों के समान उत्तुंग मणियों से जड़े महलों वाली आऴ्वार्तिरुनगरी (तिरुक्कुरुगूर) में साक्षात् विराजमान हैं, तुम उन अन्य देवताओं की शरण में जा रहे हो जो स्वयं भी इस सृष्टि और प्रलय के चक्र से बंधे हुए हैं !
द्वितीय पासुरम में, आऴ्वार् भगवान द्वारा सृजित जीवों से कहते हैं कि — “उत्पत्ति के दृष्टिकोण से (अर्थात भगवान द्वारा रचे जाने के परिस्थिति में) तुम और तुम्हारे द्वारा पूजे जाने वाले ये अन्य देवता दोनों एक समान ही हैं। इसलिए, तुम सब त्यागकर उस पावन आऴ्वार् तिरुनगरी की शरण लो, जहाँ सर्वेश्वर जो अनंत ऐश्वर्य हैं, अत्यंत कृपालु होकर साक्षात् विराजमान हैं।”
द्वितीय पासुरम –
नाडि नीर् वणङ्गुम् दॆय्वमुम् उम्मैयुम् मुन् पडैत्तान्
वीडिल् सीर्प् पुगऴ् आदिप्पिरान् अवन् मेवि उऱै कोयिल्
माड माळिगै सूऴ्न्दऴगाय तिरुक्कुरुगूरदनैप्
पाडि आडिप् परविच् चॆन्मिंगळ् पल्लुलगीर् परन्दे ।
हे भिन्न-भिन्न लोकों के निवासियों! जिस सृष्टि के आदि काल में, तुम्हारे द्वारा आराध्य माने गए उन देवताओं की और स्वयं तुम्हारी भी रचना हुई थी, उसे रचने वाले वे प्रथम उपकारी सर्वेश्वर ही हैं। वे ज्ञान, शक्ति आदि अनंत कल्याणकारी गुणों और असीम महिमा से संपन्न हैं। वे भगवान आज महलों और अट्टालिकाओं से घिरे इस परम सुंदर और दिव्य धाम—आऴ्वार् तिरुनगरी में दृढ़तापूर्वक विराजमान हैं। इसलिए, तुम सब चारों दिशाओं में प्रचारित केवल उन्हीं के गुणगान, कीर्तन, नृत्य और वंदना में नीमग्न हो जाओ!
तृतीय पासुरम में, आऴ्वार् उद्घोष करते हैं— “इस संपूर्ण ब्रह्मांड की सुरक्षा आदि जो एक प्रभाव [कारण से] है, वह साक्षात् उस जगदीश्वर की सर्वोपरिता और सर्वोच्च सत्ता को पूर्णतः प्रकट करता है।”
तृतीय पासुरम –
परन्द दॆय्वमुम् पल्लुलगुम् पडैत्तु अन्ऱुडने विऴुङ्गिक्
करन्दुमिऴ्न्दु कडन्दिडन्ददु कण्डुम् तॆळियगिल्लीर्
सिरङ्गळाल् अमरर् वणङ्गुम् तिरुक्कुरुगूर् अदनुळ्
परन् तिऱम् अन्ऱिप् पल्लुलगीर्! दॆय्वम् मट्रिल्लै पेसुमिने
हे भिन्न लोकों के निवासियों ! तुम अपनी आँखों से साक्षात् देख रहे हो कि कैसे आदि काल में भगवान ने ही इन विविध देवताओं और उनके अनंत विस्तृत लोकों की रचना की; फिर प्रलय के समय उन समस्त लोकों को तुरंत अपने भीतर समाहित कर (निगलकर) विनाश से सुरक्षित रखा; और प्रलय के पश्चात उन्हें पुनः बाहर प्रकट किया (उगाला), उन पर अपना पूर्ण अधिकार जताया और उनका उद्धार किया। यह सब देखकर भी तुम स्पष्टता को प्राप्त नहीं रख पा रहे हो ! सत्य तो यह है कि उस परमेश्वर के अतिरिक्त कोई अन्य स्वतंत्र देवता अस्तित्व में ही नहीं है। इस चराचर जगत के समस्त देव जिस परमेश्वर की वंदना और आराधना करते हैं, वे परमेश्वर स्वयं इस आऴ्वार् तिरुनगरी में विराजमान हैं और अन्य सभी देवता उन्हीं का एक प्रकार (दिव्य रूप या अंश) मात्र हैं। यदि ऐसा कोई स्वतंत्र देवता तुम्हारी दृष्टि में हो, तो मुझे भी बताओ!
चतुर्थ पासुरम में, आऴ्वार् प्रश्न करते हैं— “उन नैयायिकों (जो अनुमान से ईश्वर का निर्धारण करने का प्रयास करते हैं) आदि को भला क्या लाभ प्राप्त होने वाला है? वे उस दोषरहित वेद द्वारा प्रकट किए गए सर्वेश्वर की सर्वोच्च सत्ता को अस्वीकार कर रहे हैं, जो स्वयं उन अन्य देवताओं के भी स्वामी हैं, जिन्हें लोग भ्रमवश सर्वोच्च मान बैठते हैं।”
चतुर्थ पासुरम –
पेस निन्ऱ सिवनुक्कुम् पिरमन् तनक्कुम् पिऱर्क्कुम्
नायगन् अवने कबाल नन् मोक्कतुक् कण्डु कॊण्मिन्
तेसमामदिळ् सूऴ्न्दऴगाय तिरुक्कुरुगूर् अदनुळ्
ईसन् पाल् ओर् अवम् परै़दल् ऎन्नावदु इलिंगियर्क्के ।
शिव (रुद्र)—जिनका कुछ कथनों में ईश्वर के रूप में वर्णन किया जाता है, रुद्र के पिता ब्रह्मा और अन्य सभी देवताओं के एकमात्र स्वामी स्वयं सर्वेश्वर (श्रीमन् नारायण) ही हैं। पांचवें वेद, महाभारत में यह कहानी तुम स्वयं पढ़ें कि ब्रह्मा के श्राप के कारण रुद्र के हाथ से, फंसी कपाल (खोपड़ी) को कैसे सफलतापूर्वक मुक्त किया गया था। भला उन नैयायिकों और तार्किकों (अनुमानिकों) को क्या लाभ मिलने वाला है, जो लिंग पुराण आदि को ही अपना परम प्रमाण मानते हैं और उस नैसर्गिक जगदीश्वर के प्रति तुच्छ वमिथ्या बातें करते हैं कि वे सर्वोच्च भगवान नहीं हैं? जबकि वे परमेश्वर स्वयं दीप्तिमान और विशाल प्राचीरों (किलों) से घिरे इस परम सुंदर धाम – आऴ्वार् तिरुनगरी में साक्षात् विराजमान हैं !
पंचम पासुरम में, आऴ्वार् बाह्य (जो वेदों को पूर्णतः अस्वीकार करते हैं) और कुदृष्टियों (जो वेदों की कुव्याख्या या गलत अर्थ निकालते हैं) दोनों का खंडन करते हुए उद्घोष करते हैं— “इस पावन आऴ्वार् तिरुनगरी में विराजमान भगवान ही ब्रह्मांड की प्रत्येक सत्ता से सर्वोपरि और सर्वश्रेष्ठ हैं।”
पंचम पासुरम –
इलिंगत्तिट्ट पुराणत्तीरुम् समणरुम् साक्कियरुम्
वलिन्दु वादु सॆय्वीर्गळुम् मट्रु नुम् दॆय्वमुम् आगि निन्ऱान्
मलिन्दु सॆन् नॆल् कवरि वीसुम् तिरुक्कुरुगूर् अदनुळ्
पॊलिन्दु निन्ऱ पिरान् कण्डीर् ऒन्ऱुम् पॊय् इल्लै पोट्रुमिने ।
हे तामसिक पुराणों के प्रति निष्ठा रखने वाले कुदृष्टियों! हे जैनियों! हे बौद्धों! और हे कोरे शुष्क तर्कों से व्यर्थ विवाद करने वाले वैशेषिकों! तुम जिन अलग-अलग देवताओं को अपना परम लक्ष्य मान बैठे हो, भगवान ने उन सभी देवों को अपने अधीन (अपने नियंत्रण में) कर रखा है और वे स्वयं सर्वेश्वर के रूप में इस पावन आऴ्वार् तिरुनगरी में साक्षात् विराजमान हैं। यह वह दिव्य धाम है जहाँ धान की लहलहाती फसलें प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं और वे हवा में इस प्रकार डोल रहे हैं मानो पूर्ण वैभव के साथ चामर (श्वेत पंखा) डुला रही हों। मेरे इस परम सिद्धांत में रत्ती भर भी मिथ्या (असत्य) नहीं है; इसलिए तुम सब अपने हठ को त्यागकर केवल उन्हीं का गुणगान और वंदना करो!
छठे पासुरम में,आऴ्वार् कहते हैं कि — “यह साक्षात् सर्वेश्वर की ही अद्भुत और अचिंत्य लीला (चातुर्य) है, जिसके कारण तुम यह समझ ही नहीं पाते कि वे प्रत्येक जीव के कर्मों के आधार पर इस संपूर्ण भौतिक जगत का संचालन कितनी कुशलता से करते हैं।”
छठे पासुरम –
पोट्रि मट्रोर् दॆय्वम् पेणप् पुऱत्तिट्टु उम्मै इन्ने
तेट्रि वैत्तदु ऎल्लीरुम् वीडु पॆट्राल् उलगिल्लै ऎन्ऱे
सेट्रिल् सॆन्नॆल् कमलम् ओङ्गु तिरुक्कुरुगूर् अदनुळ्
आट्र वल्लवन् मायम् कण्डीर् अदऱिन्दऱिन्दु ओडुमिने ।
तुम्हें इस प्रकार स्वयं से दूर रखकर अन्य देवताओं की स्तुति और सेवा में लगाए रखने तथा उनके प्रति निष्ठावान बनाए रखने का मूल कारण यह है कि यदि प्रत्येक जीव भगवान की अनन्य सेवा को प्राप्त कर, मोक्ष की ओर अग्रसर हो जाएगा, तो इस लौकिक संसार की मर्यादा और उसकी व्यवस्था ही लुप्त हो जाएगी। इसका रहस्य यह है—कि जो भगवान स्वयं इस पावन आऴ्वार् तिरुनगरी में विराजमान हैं—जहाँ के जलाशयों और कीचड़ में भी उत्तम धान की फसलें और सुंदर कमल प्रचुरता से खिलते हैं—वे परम सामर्थ्यशाली प्रभु ही सबको उनके कर्मों के अनुरूप फलों का भोग कराते हैं। प्रकृति (भौतिक जगत) के साथ भगवान के इसी अद्भुत संबंध को ‘माया’ कहा गया है। इस परम सत्य का पूर्ण बोध प्राप्त करो और इस ज्ञान के सहारे इस अनित्य भौतिक संसार के बंधनों को पार करने (भवसागर से तरने) का दृढ़ प्रयास करो।
सप्तम पासुरम में, आऴ्वार् चेतावनी देते हुए कहते हैं— “तुम जिन अन्य देवताओं की शरण में जा रहे हो, उनसे तुम्हें वही फल प्राप्त होगा जो वे पहले भी तुम्हें दे चुके हैं। अतः, तुम उन सर्वेश्वर भगवान के अनन्य सेवक बन जाओ, जो समस्त चराचर जगत के आदि कारण हैं और जो गरुड़ ध्वज (गरुड़ के प्रतीक वाली पताका) को धारण करते हैं।”
सप्तम पासुरम –
ओडि ओडिप् पल पिऱप्पुम् पिऱन्दु मट्रोर् दॆय्वम्
पाडि आडिप् पणिन्दु पल् पडिगाल् वऴि एऱिक् कण्डीर्
कूडि वानवर् एत्त निन्ऱ तिरुक्कुरुगूर् अदनुळ्
आडु पुट्कॊडि आदि मूर्त्तिक्कु अडिमै पुगुवदुवे ।
उन अन्य अल्प देवताओं (जिनका नाम लेना भी उचित नहीं) की वंदनाव कीर्तन करने में निमग्न होना, अनेक प्रकार से उनकी आराधना करना, शास्त्रों के माध्यम से बार-बार केवल उन्हीं की शरण लेना—इस प्रकार तुम सब युगों-युगों से भटक रहे हो और न जाने कितनी योनियों में जन्म ले-लेकर अंतहीन दुखों का भोग कर रहे हो। यह सब अपनी आँखों के सामने साक्षात् देख और अनुभव कर भी तुम सत्य को नहीं पहचान पा रहे हो ! अब समय है कि तुम सब मिलकर उस आदि कारण सर्वेश्वर के अनन्य शरणागत (सेवक) बन जाओ, जिनकी ध्वज-पताका पर साक्षात् महाबली गरुड़ देव् सदा शोभायमान् रहते हैं। वे ही परमेश्वर आज इस आऴवार् तिरुनगरी में साक्षात् विराजमान हैं, जहाँ ब्रह्मांड के समस्त देवता एक साथ एकत्रित होकर परम आनंद से उनकी स्तुति करते हैं और उनके श्रीचरणों में आत्मसमर्पण करते हैं।
अष्टम पासुरम में,आऴ्वार् स्पष्ट करते हैं कि — “यहाँ तक कि अन्य देवताओं में भी उनके भक्तों की मनोकामनाओं को पूर्ण करने का जो सामर्थ्य (योग्यता) दिखाई देता है, वह भी वास्तव में स्वयं भगवान की ही कृपा का प्रतिफल है। वे ही उन देवताओं को वह शक्ति प्रदान करते हैं। आऴ्वार् इस परम सत्य को महर्षि मार्कण्डेय के उदाहरण से समझाते हैं, जिनकी रक्षा और अभिलाषा की पूर्ति रुद्र ने स्वयं सर्वेश्वर (भगवान) की असीम अनुकंपा से ही की थी।”
अष्टम पासुरम –
पुक्कडिमैयिनाल् तन्नैक् कण्ड मार्कण्डेयन् अवनै
नक्क पिरानुम् अन्ऱुय्यक् कॊण्डदु नारायणन् अरुळे
कॊक्कलर् तडम् ताऴै वेलित् तिरुक्कुरुगूर् अदनुळ्
मिक्क आदिप्पिरान् निऱ्-क मट्रैत् तॆय्वम् विळम्बुदिरे ।
पुराणों में सुविख्यात महर्षि मार्कंडेय्, जिन्होंने अपनी अनन्य सेवा और दासत्व भाव से रुद्र को साक्षात् प्रसन्न कर उनके दर्शन प्राप्त किए थे, उन्हें प्रळय काल के समय, उस ‘नग्न’ (दिगंबर रूपधारी) रुद्र देव ने ही मृत्यु के पाश से मुक्त कराया था। किंतु, रुद्र देव का कर्तव्य यह है कि मार्कंडेय ऋषि की रक्षा करना और उनका उद्धार करके उन्हें भगवान का परम भक्त बना देना—यह सब भी वास्तव में परमपिता श्रीमन् नारायण की असीम अनुकंपा का ही प्रतिफल था। अतः, जब समस्त ब्रह्मांड से सर्वोपरि, सृष्टि के नैसर्गिक मूल कारण और परम उपकारी भगवान स्वयं इस पावन आऴ्वार् तिरुनगरी में साक्षात् विराजमान हैं—जहाँ बगुले के पंखों के समान श्वेत वर्ण के खिले हुए पुष्प और विशाल पत्तों की प्राकृतिक प्राचीर (सुरक्षा कवच) सुशोभित है—तब तुम किस अन्य पराधीन और अपेक्षाओं से घिरे अल्प देवता की व्यर्थ चर्चा कर रहे हो?
नवम पासुरम में, आऴ्वार् जीवों का आह्वान करते हुए कहते हैं कि — “यदि तुम वास्तव में इस भवसागर के कष्टों से मुक्त होना चाहते हो और अपना परम कल्याण (उद्धार) चाहते हो, तो अविलंब उस पावन आऴ्वार् तिरुनगरि कि शरण ग्रहण करो, जहाँ स्वयं भगवान अत्यंत कृपालु होकर विराजमान हैं। यह वह परम पूज्य धाम है, जिसके दिव्य ऐश्वर्य को, वेदों को अस्वीकार करने वाले ‘बाह्य’ और वेदों की कुव्याख्या करने वाले ‘कुदृष्टि’ लोग अपने कुतर्कों और मिथ्या वादों से, कभी नष्ट नहीं कर सकते।”
नवम पासुरम –
विळम्बुम् आरु समयमुम् अवै आगियुम् मट्रुम् तन् पाल्
अळन्दु काण्डऱ्-करियनागिय आदिप् पिरान् अमरुम्
वळम् कॊळ् तण् पणै सूऴ्न्दऴगाय तिरुक्कुरुगूर् अदनै
उळम् कॊळ् ज्ञानत्तु वैम्मिन् उम्मै उय्यक् कॊण्डु पोगुऱिले ।
समस्त चराचर जगत के आदि कारण और परम उपकारी भगवान, एक ऐसे दिव्य स्वरूप के स्वामी हैं, जिनकी लीलाओं और तत्त्वों को समझ पाना उन छह नास्तिक दर्शनों (चार्वाक, बौद्ध धर्म, जैन धर्म, वैशेषिक, सांख्य और पाशुपत धर्म – जो वेदों को अस्वीकार करते हैं और केवल कोरे शब्दों के आडंबर मात्र हैं, जिनमें कोई वास्तविक सार नहीं) तथा अन्य कुदृष्टि संप्रदायों के सामूहिक तर्कों के लिए अत्यंत दुष्कर और सर्वथा असंभव है। अतः, यदि तुम सचमुच संसार के बंधनों से मुक्त होकर अपना आत्म-कल्याण (उद्धार) चाहते हो, तो भगवान के इस परम आनंदमयी और दिव्य धाम—आऴ्वार् तिरुनगरी को—जो सुंदर, प्राणदायक और शीतल जलाशयों से घिरा हुआ है, सदा के लिए अपने अंतःकरण के ज्ञान में स्थापित कर लो।
दशम पासुरम में,आऴ्वार् परम रहस्य प्रकट करते हुए कहते हैं— “उन भगवान की अनन्य सेवा और दासत्व करना ही हमारा वास्तविक सौभाग्य (प्रारब्ध) है और यही जीव के लिए सर्वथा सर्वोचितव श्रेयस्कर भी है, जो इस चराचर जगत की प्रत्येक सत्ता के ‘शरीरी’ (परमात्मा या मूल आत्मा) हैं, जो अपने भक्तों से मिलने के लिए सदा सुलभव सहज हैं, और जिनकी दिव्य लीलाएँ एवं मधुर चेष्टाएँ किसी के भी हृदय को बरबस ही आकर्षित व मुग्ध कर लेती हैं।”
दशम पासुरम –
उऱुवदावदु एत्तेवुम् ऎव्वुलगङ्गळुम् मट्रुम् तन्पाल्
मऱुविल् मूर्त्तियोडु ऒत्तु इत्तनैयुम् निन्ऱ वण्णम् निऱ्-कवे
सॆऱुविल् सॆन्नॆल् करुम्बॊडोङ्गु तिरुक्कुरुगूर् अदनुळ्
कुऱिय माणुरुवागिय नीळ् कुडक् कूत्तनुक्काट्चॆय्वदे
वह भगवान इस प्रकार साक्षात् विराजमान हैं कि समस्त श्रेणियों के देवता, सभी लोक, अन्य चेतन (जीव) और अचेतन (जगत) तत्त्व—ये सब उनके ही दिव्य स्वरूप (स्वरूपम) के अंतर्गत समाहित हैं। वे अपने स्वयं के दिव्य गुणों और विशिष्ट पहचान को रत्ती भर भी खोए बिना, इन समस्त सत्ताओं को अपने ही विशिष्ट रूपों के समान (अत्यंत प्रिय) मानकर धारण करते हैं। वे ही सर्वेश्वर आज इस पावन आऴ्वार् तिरुनगरि (तिरुक्कुरुगूर्) में विराजमान हैं, जहाँ की उपजाऊ और उर्वर भूमि पर उत्तम धान और गन्ने की फसलें प्रचुरता से लहलहा रही हैं। अतः, उस परमेश्वर की अनन्य सेवा करना ही जीव का एकमात्र ‘पुरुषार्थ’ (परम लक्ष्य) है, जो सदा के लिए परम आनंदस्वरूप हैं, जिन्होंने वामन रूप में एक वटु ब्रह्मचारी का रूप धारण किया था, और कृष्ण रूप में ‘कुडक् कूत्तू’ (घड़े के साथ अद्भुत नृत्य) जैसी दिव्य लीलाएँ की थीं। ऐसी उत्कृष्ट सेवा ही हमारा वास्तविक भाग्य है और यही जीव के लिए सर्वथा सर्वोचित है।
ग्यारहवें पासुरम में, आऴ्वार इस दशक की महिमा (फल-श्रुति) प्रकट करते हुए कहते हैं कि — “जो भी भाग्यशाली जीव इस दिव्य दशक (दस पासुरमों के समूह) का निष्ठापूर्वक अध्ययन करते हैं और इसे सीखते हैं, उनके लिए भगवान का परम पूज्य और अविनाशी धाम—’परमपदम्’ (मोक्ष) अत्यंत सुलभ व सहजता से प्राप्त हो जाता है।”
ग्यारहवें पासुरम –
आट्चॆय्दु आऴिप् पिरानैच् चेर्न्दवन् वण् कुरुगूर् नगरान्
नाट्कमऴ् मगिऴ् मालै मार्बिनन् माऱन् सटकोपन्
वेट्कैयाल् सॊन्न पाडल् आयिरत्तुळ् इप्पत्तुम् वल्लार्
मीट्चि इन्ऱि वैकुन्द मानगर् मट्रदु कै अदुवे
वे आऴ्वार—जिन्हें ‘शठकोप’ (शठकोपन) के दिव्य नाम से और ‘माऱन’ के कुल नाम से जाना जाता है—उन्होंने अपने वचनों और वाणी की अनन्य सेवा द्वारा उस परम उपकारी भगवान को प्राप्त कर लिया है जिनके हाथों में सुदर्शन चक्र सदा सुशोभित रहता है। आऴ्वार् इस वैभवशाली आऴ्वार् तिरुनगरी (वण कुरुगूर) के परम नायक हैं और उनके वक्षस्थल पर अत्यंत स्वच्छ, दिव्य और सुगन्धित ‘मगिऴ्’ (मौलसिरी) के पुष्पों की माला शोभायमान है। उन्होंने भगवान के प्रति अपने अगाध और तीव्र अनुराग (प्रेम) के वशीभूत होकर, अपनी अनुपम सहस्रगीति (हज़ार पासुरमों के महासंग्रह – तिरुवाय्मोऴि) में से इन दस पासुरमों की रचना गाकर की है। जो भी भाग्यशाली वैष्णव इन दस पासुरमों का शुद्ध गान या पाठ, अर्थ के साथ करने में समर्थ हैं, उन्हें इस पाठ के पुण्य-फलस्वरूप वह परम दिव्य और अविनाशी धाम ‘श्रीमन् वैकुंठ’ साक्षात् उनकी मुट्ठी में (हस्तगत) प्राप्त हो जाएगा, जहाँ पहुँचने के बाद इस दुखों से भरे संसार में फिर कभी कोई पुनरावृत्ति (लौटना) नहीं होती।
अडियेन् श्री तेजा रामानुज दासी ।
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