श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः

यद्यपि साक्षात् सर्वेश्वर ‘एम्पॆरुमान्’ (भगवान) इतने कृपालु हैं कि वे उन जीवों की भी सहर्ष् रक्षा करते हैं जिनके भीतर उनके प्रति तनिक भी (लेशमात्र) अनुराग या जुड़ाव होता है; परंतु यहाँ आऴ्वार् (नम्माऴ्वार्) अत्यंत विरह और व्याकुलता में विस्मित हो रहे थे कि प्रभु अब तक आकर उनकी रक्षा क्यों नहीं कर रहे हैं! आऴ्वार् के मन में यह विचार आया कि प्रभु संभवतः यह सोच रहे होंगे कि आऴ्वार् अपने उद्धार के लिए स्वयं के स्तर पर किसी अन्य साधन (उपाय) का आश्रय ले रहे हैं। अतः प्रभु के इस संशय को समूल नष्ट करने के लिए, आऴ्वार् ने इस संपूर्ण दशक में अपनी अत्यंत विनीत स्थिति और स्वयं के पास किसी भी अन्य साधन के सर्वथा अभाव (आकिंचनत्व्) की ऊंचे स्वर में घोषणा की। अपने पास किसी भी उपाय का न होना ही सबसे बड़ा उपाय मानकर, इस दशक में उन्होंने साक्षात् ‘वानमामलै एम्पॆरुमान्’ (श्री तोताद्रिनाथ् स्वामी) के श्रीचरणों में स्वयं को पूर्णतः समर्पित् करते हुए परम ‘शरणागति’ (प्रपत्ति) की।
प्रथम पाशुरम् में आऴ्वार् कहते हैं कि ‘हे प्रभु! आपको प्राप्त करने के लिए शास्त्रों में वर्णित समस्त उपायों (साधनों) से मैं सर्वथा विहीन हूँ, और आपके बिना मेरा जीवित रहना सर्वथा असंभव है; आप तो अपने भक्तों के साथ सदैव जुड़े रहने का आनंद लेने वाले तथा दूसरों की सहायता के लिए तत्पर रहने वाले कृपालु हैं, तो क्या मैं आपकी इस दिव्य कृपा-दृष्टि के क्षेत्र से बाहर हूँ?
प्रथम पाशुरम् :
नोट्र नोन्बिलेन् नुण्णऱिविलेन् आगिलुम् इनि उन्नै विट्टॊन्ऱुम्
आट्रगिर्किन्ऱिलेन् अरविन् अणै अम्माने!
सेट्रुत् तामरै सॆन्नॆल् ऊडु मलर् सिरीवरमङ्गल नगर
वीट्रिरुन्द ऎन्ताय्! उनक्कु मिगै अल्लेन् अंगे ।
हे प्रभु! आपको पाने के फल-स्वरूप, मैंने न तो किसी प्रकार के ‘कर्म योग’ (नियमों व व्रतों) का अनुष्ठान किया है; और ना ही मैंने उस परम सूक्ष्म ‘ज्ञान योग’ का अभ्यास किया है जो आत्मा और परमात्मा के दिव्य स्वरूप के ज्ञान पर केंद्रित होता है। इन दोनों (कर्म और ज्ञान योग) के सिद्ध होने पर ही जो ‘भक्ति योग’ संभव हो पाता है, मैं उस भक्ति से भी सर्वथा शून्य हूँ। किंतु इन सब योग्यताओं के न होने पर भी, आपके कल्याणकारी दिव्य गुणों का निरंतर ध्यान करने के पश्चात, मैं आपके बिना एक क्षण के लिए भी जीवित रहने में असमर्थ हूँ! हे शेषशायी स्वामी! आप उस परम समृद्ध ‘सिरीवरमङ्गल नगर’ [वानमामलै / तोताद्रि धाम, जिसे नाङ्गुनेरी भी कहा जाता है] वह अत्यंत दिव्य और विशिष्ट रूप से विराजमान हैं, जहाँ कीचड़ से भरे उपजाऊ खेतों में धान की फसलों के बीच अत्यंत आकर्षक कमल के फूल प्रफुल्लित होकर खिलते हैं। वहाँ साक्षात प्रतिष्ठित रहकर आप अपने भक्तों की पूर्ण रक्षा के लिए अपनी परम कृपालु तत्परता को प्रदर्शित कर रहे हैं। हे मेरे परम उपकारी पिता! उस पावन धाम में आपकी इस दिव्य उपस्थिति के सम्मुख-आपके द्वारा उद्धार किए जाने योग्य शरणारर्थियों (मुमुक्षुओं) के समूह में, मैं कोई बाहरी व्यक्ति नहीं हूँ।
द्वितीय पाशुरम् में आऴ्वार् कहते हैं कि ‘हे प्रभु! यदि आपके पावन श्रीचरणों को प्राप्त करने के मार्ग में किसी भी प्रकार की बाधाएँ अथवा विघ्न हैं, तो उन बाधाओं को स्वयं आपके द्वारा ही दूर किया जाना चाहिए और आपको अपनी करुणा से मेरी रक्षा करनी होगी।
द्वितीय पासुरम :
अंगुट्रेन अल्लेन् इँगुट्रेन अल्लेन् उन्नैक् काणुम् अवाविल् वीऴ्न्दु नान्
एँगुट्रेनुम् अल्लेन् इलँगै सॆट्र अम्माने
तिङ्गळ् सेर् मणि माड नीडु सिरीवरमङ्गल नगर् उरै
सङ्गु चक्करत्ताय् तमियेनुक् करुळाये
हे प्रभु! आपको ही एकमात्र प्रत्यक्ष साधन (सिद्धोपाय) मानकर, मैं अभी तक आपके उस परम उपयुक्त दिव्य धाम (परमपद्) में प्रवेश नहीं कर पाया हूँ; और दूसरी ओर से स्थिति यह है कि जहाँ मैं इस समय (इस भौतिक संसार में) हूँ, वहाँ भी मुझसे अब सहनशीलता से एक क्षण भी ठहरा नहीं जा रहा है। आपके दिव्य स्वरूप का आनंद लेने के परम अनुराग और प्रेम में इस प्रकार वशीभूत हो चुका हूँ कि अब मैं इस संसार के साधारण मनुष्यों की स्थिति में भी उपस्थित नहीं हूँ! हे मेरे विशिष्ट स्वामी! आपने, अपने परम भक्त (साक्षात श्री सीता जी) के मार्ग की बाधा बने लंका साम्राज्य का समूल विनाश कर दिया और उन्हें पुनः प्राप्त किया! हे शंख-चक्रधारी! आपके पास जो ये दिव्य और विशेष आयुध हैं, वे एक ओर जहाँ आपके भक्तों के शत्रुओं का विनाश करने वाले हैं, वही दूसरी ओर आपके प्रेमियों के नेत्रों को परम आनंद प्रदान करने वाले हैं। आप उस परम वैभवशाली ‘सिरीवरमङ्गल नगर’ (वानमामलै) में शाश्वत रूप से निवास कर रहे हैं, जहाँ पन्नों और मणियों से सुसज्जित गगनचुंबी अट्टालिकाएँ ऊपर उठकर साक्षात चंद्रमा को स्पर्श करती प्रतीत होती हैं। हे कृपानिधान! आपके अतिरिक्त जिसका इस ब्रह्मांड में अन्य कोई संगी-साथी या रक्षक नहीं है । मुझे ऐसे एकाकी (अकिंचन) जीव पर अपनी अहैतुकी दया की वर्षा कीजिए और मुझे अपने श्रीचरणों का आश्रय प्रदान कीजिए।
तृतीय पाशुरम् में आऴ्वार् कहते हैं कि ‘हे प्रभु! आपके पास वे विशिष्ट और दिव्य प्रतीक (जैसे शंख-चक्र) हैं जो आपकी परम सर्वोच्चता (परत्व) को स्वतः प्रकट करते हैं। ऐसे सर्वशक्तिमान होकर भी आपने जो मुझ पर असीम कृपा की-मुझे सहर्ष स्वीकार किया और अपनी अनन्य सेवा (कैंकर्य) में नियुक्त किया – आपके इस परम उपकार के बदले में, मैं प्रत्युपकार के रूप में आपको लेशमात्र भी कुछ देने में असमर्थ रहा हूँ |
तृतीय पाशुरम् :
करुळप् पुट्कॊडि चक्क्रप् पडै वान नाड ऎम् कार् मुगिल् वण्णा
पॊरुळ् अल्लाद ऎन्नैप् पॊरुळ् आक्कि अडिमै कॊण्डाय्
तॆरुळ् कॊळ् नान् मरै वल्लवर् पलर् वाऴ् सिरीवरमङ्गल नगर्क्कु
अरुळ् सॆय्दङ्गिरुन्दाय्! अऱियेन् ऒरु कैम्माऱे
हे प्रभु! गरुड़ पक्षी आपके ध्वज का पावन प्रतीक है, दिव्य सुदर्शन चक्र आपका परम आयुध है और साक्षात ‘परमपद्’ (श्रीवैकुंठ) आपका अविनाशी साम्राज्य है| आपका यह अलौकिक घनश्याम (सजल श्याम मेघ के समान) दिव्य स्वरूप है, जिसे आपने कृपापूर्वक मेरे नेत्रों और हृदय को प्रदान किया है। मैं जो पहले अज्ञानवश ‘असन्नेव’ (संसार की जड़ वस्तुओं या अचित् के समान) था, मुझे आपने चेतना देकर मेरे वास्तविक नित्य दासत्व के स्वरूप का बोध कराया; और मेरी इस वाणी द्वारा की गई सेवा (वाचिक कैंकर्य) को भी सहर्ष स्वीकार और अंगीकार कर लिया! हे दीनदयालु ! आप उस परम पवित्र ‘सिरीवरमङ्गल नगर’ (वानमामलै) में निवास कर रहे हैं और वहाँ अपनी असीम करुणा बरसा रहे हैं, जहाँ चारों वेदों के परम ज्ञाता, सूक्ष्म तत्त्वों को आत्मसात करने वाले महान ज्ञानी और परम भागवत वास करते हैं। आपने मुझ पर जो यह अहैतुकी (बिना किसी कारण के) कृपा की है, उसके बदले में कृतज्ञता स्वरूप अर्पित करने के लिए मुझे कोई भी प्रत्युपकार या साधन सूझ नहीं रहा है।
चतुर्थ पाशुरम् में आऴ्वार् कहते हैं कि ‘हे प्रभु! आप तो अपने अनन्य भक्तों की रक्षा करने वाले एकमात्र् परम रक्षक (रक्षकत्व गुण से संपन्न) हैं। ऐसी स्थिति में, भला मैं अपनी इच्छा (मिलने की तीव्र उत्कंठा) को ही आपको प्राप्त करने का साधन (उपाय) मानने की भूल कैसे कर सकता हूँ? ’
चतुर्थ पाशुरम् :
माऱु सेर् पडै नूट्रुवर् मङ्ग ओर् ऐवर्क्काय् अन्ऱु मायप् पोर् पण्णि
नीऱु सॆय्द एन्ताय् निलम् कीण्ड अम्माने!
तेऱु ज्ञानत्तर् वेद वेळ्वि अऱाच् चिरीवरमङ्गल नगर्
एऱि वीट्रिरुन्दाय् उन्नै ऎंगेय्दक् कूवुवने?
महाभारत् के उस पुरातन काल में, जब दुर्योधन् आदि (कौरव), पाण्डवों के प्रति घोर शत्रुता और द्वेष का भाव रखे थे, तब आपने उन एकाकी एवं असहाय् पाँचों पाण्डवों की रक्षा की दृढ़ संकल्प के साथ, रणभूमि में अपनी अलौकिक एवं विस्मयकारी लीलाओं से महाभारत के युद्ध का संचालन किया; और दुर्योधन् सहित समस्त अधर्मियों का समूल नाश करके उन्हें धूल में मिला दिया ! हे जगत के पालनहार! महाप्रळय् के भयंकर संकट के समय जब यह पृथ्वी अगाध् जल में डूब गई थी, तब वराह रूप धारण कर इसे अपनी दाढ़ों पर उठाकर विपत्ति से बाहर निकालने वाले स्वामी भी आप ही हैं! हे सर्वेश्वर! आप उस परम पावन ‘श्रीवरमंगल नगर’ (वानमामलै) में अत्यंत दिव्य और विशिष्ट रूप से विराजमान् हैं, जहाँ निर्मल् एवं संशयरहित दिव्य ज्ञान से संपन्न परम भागवतों द्वारा वेदों के अनुसार भगवान की आराधना और यज्ञ निरंतर (बिना किसी बाधा के) किए जाते हैं। हे कृपानिधान! आपकी अहैतुकी कृपा और सहायता के बिना, केवल मेरी इस इच्छा या पुकार के बल पर, मैं आपको कैसे पुकार सकता हूँ और आपको कैसे प्राप्त कर सकता हूँ?
पंचम पाशुरम् में आऴ्वार् एम्पॆरुमान् से कहते हैं कि ‘हे प्रभु! मैंने साक्षात आपके दर्शन् किए हैं, जो अपने परम भक्तों के शत्रुओं का समूल विनाश करने के स्वभाव वाले हैं, और जो अपने प्रेमियों द्वारा आनंदपूर्वक् अनुभव किए जाने के लिए ही विशेष रूप से इस पावन धरा पर अवतरित हुए हैं। जब आपका ऐसा परम सुलभ् और रक्षक स्वभाव है, तो क्या ऐसे सर्वसमर्थ आपके श्रीचरणों को प्राप्त करने के लिए भला मेरा किसी भी प्रकार के आत्म-प्रयासों (ज्ञान, कर्म आदि उपायों) में संलग्न होना तनिक भी उचित् या तर्कसंगत् है?
पंचम पाशुरम् :
ऐदक् कूवुदल् आवदे ऎनक्कु? ऎव्वदॆव्वत् तुळायुमाय् निन्ऱु
कैतवङ्गळ् सॆय्युम् करुमेनि अम्माने!
सॆय्द वेळ्वियर् वैयत् तेवर् अऱाच् चिरीवरमङ्गल नगर्
कै तॊऴ इरुन्दाय् अदु नानुम् कण्डेने
हे प्रभु! क्या यह मेरे स्वरूप के अनुकूल् है कि मैं आपको प्राप्त करने के लिए अपनी ही इच्छा को साधन (उपाय) मानने की भूल करूँ? (अर्थात मेरी तड़प या पुकार कभी साधन नहीं हो सकती)। हे नीलमेघ श्याम् वर्ण वाले लीलाधर्! असुरों और अधर्मियों के विनाश के लिए समय-समय पर बुद्ध आदि जैसे (मोहात्मक) रूपों को धारण कर, उनके बीच घुल-मिलकर और उनके विनाश के लिए अद्भुत एवं भ्रामक लीलाएँ रचने वाले चतुर स्वामी आप ही हैं! हे सर्वेश्वर! आप उस परम पावन ‘श्रीवरमङ्गल नगर्’ (वानमामलै) दिव्य देश में साक्षात विराजमान् हैं, जहाँ ‘कृतकृत्य्’ महापुरुष (जिन्होंने वेदों के आज्ञानुसार अपने समस्त कर्तव्यों को पूर्ण कर लिया है और जो इस भूलोक पर साक्षात ‘नित्यसूरियों’ के समान पूज्य हैं) निरंतर बिना किसी व्यवधान के आपकी सेवा में रत रहते हैं। आप वहाँ उन सभी संतों द्वारा पूजे जाने और उन्हें आनंद प्रदान करने के लिए ही स्थित हैं; और आपकी उस परम कृपालु अर्चामूर्ति उपस्थिति के साक्षात दर्शन आज मुझ जैसे अधम ने भी कर लिए हैं! (अतः हे प्रभु! जब मैं आपकी इस रक्षक और सुलभ उपस्थिति को देख चुका हूँ, तो अब मेरे विघ्नों को दूर करना और मुझे अपना परमानंद प्रदान करना केवल आपका ही परम उत्तरदायित्व है!)
छठे पाशुरम् में आऴ्वार् एम्पॆरुमान् से परम विनयपूर्वक् कहते हैं कि ‘हे प्रभु! आप अपने शरणागत् भक्तों की रक्षा करने और उन पर अकारण कृपा बरसाने के कारण परम दैदीप्यमान् (अत्यंत दीप्तिमान् और महिमामयी) प्रतीत हो रहे हैं। हे कृपानिधान्! अब आप मुझ पर भी अपनी परम दया कीजिए और कृपापूर्वक् साक्षात मेरे सम्मुख इस प्रकार प्रकट होइए ताकि मैं आपके अलौकिक सौंदर्य् का रसपान कर सकूँ और सर्वदा के लिए आपकी दिव्य सेवा (कैनकूर्य्) में लीन हो सकूँ।
छठे पाशुरम् :
एनमाय् निलम् कीण्ड ऎन् अप्पने कण्णा ! ऎन्ऱुम् ऎन्नै आळुडै
वान नायगने मणि माणिक्कच् चुडरे!
तेनमाम् पॊऴिल् तण् सिरीवरमङ्गलत्तवर् कै तॊऴ उऱै
वानमामलैये अडियेन् तॊऴ वन्दरुळे
हे सर्वेश्वर! महाप्रळय् के भयंकर संकट में जब यह धरा अगाध् सागर में डूब गई थी, तब आपने परम कल्याणकारी आदि-वराह रूप धारण कर पाताल से पृथ्वी को बाहर निकाला था! हे मेरे परम उपकारी कृष्ण! आपने ही मेरी रक्षा करके, और मेरे अस्तित्व को बनाए रखने के लिए मेरी इस रसपूर्ण वाणी (जो साक्षात परमपद् के ब्रह्मानंद् के समान मधुर है) द्वारा की जाने वाली सेवा को सहर्ष स्वीकार करके मुझ पर असीम कृपा की है। हे दिव्य मणियों (माणिक्य) के समान परम जाज्वल्यमान् और अलौकिक कांति से युक्त प्रभु! आप उस शीतल और सुगंधित, मधु से लदे आम के बगीचों से घिरे परम पावन ‘श्रीवरमङ्गल नगर्’ (वानमामलै) दिव्य देश में वहाँ के भाग्यशाली निवासियों द्वारा पूजे जाने के लिए नित्य वास करते हैं। हे नीलमेघ श्याम्! साक्षात ‘परमव्योम’ (परमपदम्) के नित्यमुक्तों और नित्यसूरियों द्वारा सदा आनंदपूर्वक् अनुभव किए जाने वाले, अनंत एवं विशाल पर्वत के समान अचल और सुदृढ़ विग्रह् वाले स्वामी! कृपा करके अपने उस परमव्योम के एकांत आसन को त्याग कर, साक्षात मेरे सम्मुख गतिमान होकर पधारिए, ताकि मुझ जैसा अत्यंत दीन दास (अडियेन) भी आपके साक्षात दर्शन कर आपके श्रीचरणों की नित्य सेवा (कैंकर्य) में लीन हो सकूँ |
सप्तम पाशुरम् में आऴ्वार् एम्पॆरुमान् से याचना करते हुए कहते हैं कि ‘हे मेरे सर्वेश्वर्! आप ही मेरे जीवन, प्राण और अस्तित्व के एकमात्र आधार एवं सम्पूर्ण् कारण हैं। हे कृपानिधान्! अब आप मुझसे तनिक भी विमुख या पृथक न हों; क्योंकि आपका क्षण भर का वियोग भी मेरे स्वरूप और अस्तित्व को समूल नष्ट कर देगा।
सप्तम पाशुरम् :
वन्दरुळि ऎन् नॆञ्जिडम् कॊण्ड वानवर् कॊऴुन्दे! उलगुक्कोर्
मुन्दैत् ताय् तन्दैये! मुऴु एऴ् उलगुम् उण्डाय्
सॆन्दॊऴिलवर् वेद वेळ्वि अऱाच् चिरीवरमङ्गल नगर्
अन्दमिल् पुगऴाय्! अडियेनै अगट्रेले
हे परम कृपालु सर्वेश्वर्! आप स्वयं साक्षात पधार कर मेरे इस क्षुद्र हृदय को अपना शाश्वत् निवास स्थान बना चुके हैं। आप न केवल मेरे अस्तित्व और पोषण की रक्षा करते हैं, बल्कि ‘परमपद्’ (श्रीवैकुंठ) के नित्यमुक्त् निवासियों (नित्यसूरियों) के आनंद और धारकत्व् को भी निरंतर बढ़ाने वाले उनके परम् नायक् हैं! आप ही इस सम्पूर्ण चराचर जगत के एकमात्र् परम सनातन माता और पिता हैं; महाप्रळय् के भयंकर संकट के समय समस्त लोकों को अपने उदर (पेट) में सुरक्षित रखकर उनकी रक्षा करने वाले जगद्रक्षक् भी आप ही हैं! हे अनंत कल्याण् गुणों के स्वामी! आप उस परम महिमामयी ‘श्रीवरमङ्गल नगर’ (वानमामलै) दिव्य देश में परम आदर के साथ विराजमान् हैं, जहाँ वेदों के आज्ञानुसार भगवान की सतत आराधना उन परम भागवतों द्वारा की जाती है जिनकी आत्मा में यह निष्कपट सत्य पूर्णतः जाग्रत है कि उनका अस्तित्व केवल आपकी सेवा (कैंकर्य्) के लिए ही है। हे मेरे रक्षक! ऐसे परम दयालु होकर भी, कृपा करके मुझ जैसे सर्वथा असहाय दास (अडियेन) को अपने श्रीचरणों से कभी विमुख न करना, मुझे स्वयं से कभी दूर न धकेलना !
अष्टम पाशुरम् में आऴ्वार् और प्रभु के मध्य एक अत्यंत विस्मयकारी संवाद् होता है। जब आऴ्वार् पिछले पाशुरम् में कहते हैं कि ‘मुझे दूर मत धकेलो’, तब एम्पॆरुमान् उनसे पूछते हैं कि ‘हे आऴ्वार्! क्या मैंने तुम्हें कभी अपने से दूर किया है या निकाला है?’ इस पर आऴ्वार् परम आर्त भाव से उत्तर देते हैं कि ‘हे प्रभु! आपने मुझे इस भयानक् संसार (भौतिक जगत) के बीच डाला है, जहाँ शब्द् (ध्वनि) जैसे सांसारिक आकर्षण सक्रिय हैं । क्या यह मुझे निष्कासित करने जैसा नहीं है?’
अष्टम पाशुरम् :
अगट्र नी वैत्त माय वल् ऐम् पुलंगळ् आम् अवै नन्गरिन्दनन्
अगट्रि ऎन्नैयुम् नी अरुञ्चेट्रिल् वीऴ्त्ति कण्डाय्
पगर्क् कदिर् मणि माड नीडु सिरीवरमङ्गै वाणने! ऎन्ऱुम्
पुगऱ्करिय ऎन्ताय् पुळ्ळिन् वाय् पिळन्दाने।
हे प्रभु! आपकी माया से रचित इन इंद्रियों के अद्भुत और अजेय स्वभाव को मैं वास्तव में भली-भाँति समझ गया हूँ। ये इंद्रियाँ परस्पर सर्वथा भिन्न रहकर (एक-दूसरे में मिश्रित न होकर) इतनी अदम्य् हैं कि जो जीव आपसे विमुख होते हैं, उन्हें यह संसार की ओर खींचकर आपसे दूर निर्वासित कर देती हैं। मुझे यही घोर भय निरंतर सता रहा है कि आप मुझे भी अपने से दूर धकेल रहे हैं और इस संसार रूपी अत्यंत दुर्गम एवं दलदली कीचड़ में गिरा रहे हैं।हे देदीप्यमान् प्रकाश् से युक्त दिव्य मणियों (माणिक्यों) के गगनचुंबी प्रसादों (महलों) से सुशोभित ‘श्रीवरमङ्गै’ दिव्य देश के स्वामी! जो दुष्ट बकासुर की चोंच को अपने हाथों से चीर डाला था और जो (अहंकारियों के लिए) सर्वथा अगम्य हैं! (इसका गहरा भावार्थ यह है कि आऴ्वार् यहाँ आर्त् भाव से कह रहे हैं: यद्यपि एम्पॆरुमान् इस प्रकार से सर्वशक्तिमान और सर्वसमर्थ हैं, फिर भी उन्होंने मेरी रक्षा नहीं की और मुझे अपने से दूर इस कठिन संसार में धकेल रहे हैं।)
नवम पाशुरम् में आऴ्वार् एम्पॆरुमान् से परम व्याकुलता के साथ याचना करते हैं कि ‘अपने परम शत्रुओं का समूल संहार् करने के कारण अद्भुत और अत्यंत दिव्य तेज से जाज्वल्यमान होने वाले सर्वेश्वर! कृपा करके मुझ पर दया कीजिए और इस अगाध संसार-सागर से मेरा उद्धार कीजिए ।’
नवम् पाशुरम् :
पुळ्ळिन् वाय् पिळन्दाय्! मरुदिडै पोयिनाय्! ऎरुदेऴ् अडर्त्त ऎन्
कळ्ळ मायवने! करु माणिक्कच् चुडरे!
तॆळ्ळियार् तिरुनान्मऱैगळ् वल्लार् मलि तण् सिरीवरमङ्गै
उळ् इरुन्द ऎन्ताय्! अरुळाय् उय्युमाऱॆनक्के
हे अद्भुत लीलाएं करने वाले परम विस्मयकारी श्री कृष्ण! आपने बकासुर् का वध करके, यमळ और अर्जुन वृक्षों (यमळार्जुन्) को धराशायी करके और सात मतवाले बैलों को एक साथ वश में करके, अपने आश्रितों की रक्षा के गुप्त रहस्यों को प्रकट किया है। हे नीलमणि (काले माणिक्य्) के समान परम जाज्वल्यमान्, अलौकिक् और सुंदर विग्रह वाले प्रभु! आप उस शीतल एवं दिव्य ‘श्रीवरमङ्गै’ दिव्य देश के भीतर साक्षात विराजमान हैं, जो उन परम ज्ञानियों और आचार्यों से परिपूर्ण है जिन्हें चारों वेदों के परम मर्म का पूर्ण ज्ञान है तथा जिनके पास ऐसी आध्यात्मिक संपदा है जो साक्षात आपके दिव्य स्वरूप का साक्षात्कार कराती है। हे मेरे परम उपकारी स्वामी! मुझ जैसे सर्वथा असहाय और अनन्य शरणागत जीव पर, जिसका आपके अतिरिक्त इस संसार में कोई दूसरा आश्रय नहीं है, कृपा करके दया कीजिए ! मुझे वह परम साधन (अपनी अहैतुकी कृपा) प्रदान कीजिए जिससे मैं आपके इन दिव्य श्रीचरणों को प्राप्त कर सकूँ और मेरा सदा के लिए उद्धार (मङ्गलमय उत्तान) हो सके।
दशम पाशुरम् में, सर्वेश्वर भगवान आऴ्वार् को (उनके आर्त् भाव को देखकर) साक्षात् यह प्रदर्शित करते हैं कि ‘मेरे यह परम पावन दिव्य श्रीचरण ही मुझे प्राप्त करने का एकमात्र परम साधन (उपाय) है।’ भगवान के इस परम अनुग्रह को जानकर आऴ्वार् कृतज्ञता प्रकट करते हुए कहते हैं, ‘हे प्रभु! आपके द्वारा मुझ दीन पर किए गए इस अहैतुक् उपकार और असीम कृपा के प्रतिफल में, मैं प्रत्युपकार स्वरूप कुछ भी करने में सर्वथा असमर्थ हूँ।
दशम पाशुरम् :
आऱॆनक्कु निन् पादमे शरणागत् तन्दॊऴिदाय् उनक्कोर्
कैम्माऱु नान् ओन्ऱिलेन् ऎनदावियुम् उनदे
सेऱु कॊळ् करुम्बुम् पॆरुञ्चेन्नॆलुम् मलि तण् सिरीवरमङ्गै
नाऱु पून्दण्डुऴाय् मुडियाय्! दॆय्व नायगने
हे नित्यसूरियों (नित्यमुक्त् आत्माओं) के परम नायक! हे शीतल एवं कल्याणकारी ‘श्रीवरमङ्गै’ दिव्य देश् में साक्षात विराजमान् प्रभु , जहाँ के जल-पूरित् और उपजाऊ कीचड़ वाले खेतों में मधुर गन्ने और धान की ऊँची फसलें लहलहा रही हैं! हे नवीन, प्रफुल्लित और अत्यंत सुगंधित तुलसी की दिव्य मालाओं से सुशोभित मुकुट धारण करने वाले सर्वेश्वर्! आपने मुझ दीन पर असीम अनुग्रह करके अपने ही पावन श्रीचरणों को, जो साध्य (परम लक्ष्य) को प्राप्त करने का एकमात्र मार्ग हैं , मुझे एकमात्र रक्षक और उपाय (साधन) के रूप में प्रदान कर दिया है। हे दयानिधे! इस परम उपकार के बदले प्रत्युपकार स्वरूप आपको अर्पित करने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है, क्योंकि मेरा यह आत्मा (अस्तित्व) भी पूर्णतः आपका ही है (आपके ही स्वामित्व में है)।
एकादश पाशुरम् में, श्री नम्माऴ्वार् इस प्रपत्ति-स्तोत्र की महिमा गाते हुए फलश्रुति प्रकट करते हैं । ‘जो भी भाग्यशाली भक्त पूर्ण एकाग्रता, शुद्ध अंतःकरण और परम आनंद के साथ इस दिव्य दशक का गान अथवा पाठ करेंगे, वे वैकुंठ धाम में परम पूजनीय नित्यसूरियों (नित्यमुक्त आत्माओं) द्वारा सदैव अत्यंत चाव से सराहे जाएंगे और उनके परम आनंद का पात्र बनेंगे।’
एकादश पाशुरम् :
दॆय्व नायगन् नारणन् तिरिविक्किरमन् अडि इणै मिसै
कॊय् कॊळ् पूम् पॊऴिल् सूऴ् कुरुगूर्च् चटगोपन्
सॆय्द आयिरत्तुळ् इवै तण् सिरीवरमङ्गै मेय पत्तुडन्
वैगल् पाड वल्लार् वानोर्क्कारावमुदे !
वे सर्वेश्वर, जो नित्यसूरियों के परम अधिपति हैं, जो अनादि और अहैतुक संबंध के कारण जीवों के प्रति वात्सल्यमयी माता के समान क्षमाशीलता धारण करते हैं, और जो अपने अधीनस्थ जीवों को अपनी छत्रछाया में इस प्रकार स्वीकार करते हैं (त्रिविक्रम रूप में मापते हैं) जिससे उन जीवों में स्वयं के प्रति झूठा स्वामित्व (अहंकार) उत्पन्न न हो सके; ऐसे परम कृपालु एम्पॆरुमान् के दिव्य श्रीचरणों की महिमा में, चयन करने योग्य प्रफुल्लित पुष्पों के उद्यानों से घिरे श्री आऴ्वार् तिरुनगरि के स्वामी, श्री नम्माऴ्वार् ने परम कल्याणकारी ‘श्रीवरमङ्गै’ दिव्य देश को समर्पित करके, अपने सहस्र पाशुरों (तिरुवायमॊळि) में से इन दस पाशुरों की रचना की है। जो भी भाग्यशाली भक्त इस दशक के गूढ़ अर्थों से पूर्णतः सहमत होकर एकाकार भाव से इसका नित्य गान करेंगे, वह परमपद (वैकुंठ धाम) के नित्य-निवासियों के लिए कभी न तृप्त करने वाले परम दिव्य अमृत (आरवमुदु) के समान रहेगा ।”
अडियेन् श्री तेजा रामानुज दासी
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