श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः

तीन पुरुषार्थों (लक्ष्यों)—अर्थात ऐश्वर्य (सांसारिक सुख), कैवल्य (आत्मा का शाश्वत आनंद), और भगवद् कैंकर्य (भगवान की शाश्वत सेवा) में से, आऴ्वार् इस विषय पर प्रकाश डालते हैं कि ऐश्वर्य और कैवल्य जीवात्मा के वास्तविक स्वरूप के अनुकूल नहीं हैं और निकृष्ट (तुच्छ) भी हैं। अपनी असीम कृपा के कारण, वे संसारियों (सांसारिक बंधनों में बंधे जीवों) को श्रियःपति (श्री महालक्ष्मी के दिव्य पति, श्रीमन्नारायण), जो कि सर्वेश्वर हैं, के चरण कमलों में कैंकर्य (सेवा) प्राप्त करने का उपदेश देते हैं। एम्पेरुमानार् (श्री रामानुजाचार्य) ने यह दशक (10 पासुरों) तिरुनारायणपुरम् (मेलुकोटे, कर्नाटक) के तिरुनारायण भगवान (एम्पेरुमान्) को समर्पित किया था।
पहले पशुरम् में आऴ्वार् कहते हैं, “बड़े-बड़े सम्राट भी [एक न एक दिन] अपना राज्य खो बैठेंगे और भीख माँगकर अत्यंत दयनीय जीवन व्यतीत करेंगे। ऐसी स्थिति में, तिरुनारायण (श्रीमन नारायण) के दिव्य चरणों में शरण लो, जो शाश्वत रूप से समृद्ध हैं, और अपना उद्धार करो |”
पहला पाशुरम –
ऒरु नायकमाय् ओड उलगुडन् आण्डवर्
करु नाय् कवर्न्द कालर् सिदैगिय पानैयर्
पॆरु नाडु काण इम्मैयिले पिच्चै ताम् कॊळ्वर्
तिरुनारणन् ताळ् कालम् पॆऱच् चिन्दित्तुय्म्मिनो।
जो सम्राट इस संसार में सुदृढ़ता से स्थापित होकर, अपने राज्य की रक्षा करते हुए एक परम स्वतंत्र साम्राज्य का संचालन कर रहे हैं, वही सम्राट, जब उनका सारा वैभव नष्ट हो जाता है, तब रात के अंधेरे में भीख मांगते हैं। उनके स्थिति यह हो जाती है कि उनके पैरों को काले कुत्ते काट रहे होते हैं, भीख माँगने के लिए उनके हाथ में एक टूटा बर्तन (कपाल) होता है जो व्यर्थ मानकर फेंका गया हो, और वे इस महान पृथ्वी के लोगों (जिन पर कभी उन्होंने स्वयं राज किया था) के सामने स्वयं भीख स्वीकार करते हैं। (चूंकि ऐश्वर्य यानी सांसारिक धन अस्थाई है) इसलिए बिना कोई समय व्यर्थ किए, तुरंत उन शाश्वत रूप से समृद्ध भगवान नारायण के दिव्य चरणों का ध्यान करें और अपना उद्धार करें।
द्वितीय पाशुरम् में आऴ्वार् कहते हैं, “चूंकि धन-सम्पत्ति खोने के साथ-साथ आप अपनी पत्नी (और प्रियजनों) को भी खो सकते हैं, इसलिए आप उस एम्पेरुमान (भगवान) की शरण लें, जो श्री महालक्ष्मी के स्वामी हैं और जो सभी के परमेश्वर (सर्वोच्च भगवान) हैं।”
द्वितीय पाशुरम –
उय्म्मिन् तिऱै कॊणर्न्दु ऎन्ऱुलगाण्डवर् इम्मैये
तम्मिन् सुवै मडवारैप् पिऱर् कॊळ्ळत् ताम् विट्टु
वॆम्मिन् ऒळि वॆयिल् कानगम् पोय्क् कुमै तिन्बर्गळ्
चॆम्मिन् मुडित् तिरुमालै विरैन्दडि चेर्मिनो।
जो राजा [क्षेत्रीय राजाओं और अन्य लोगों से] यह कहते हुए जगत पर राज करते हैं कि “तुम हमें कर देकर ही जीवित रह सकते हो”, वे इसी जीवन में अपनी उन प्रिय और आनंद देने वाली पत्नियों को दूसरों के द्वारा छीने जाने के लिए छोड़ देते हैं; अपने राज्य में रहने में असमर्थ होकर, वे उस जंगल में चले जाते हैं जहाँ बहुत तेज़ धूप होती है, केवल (वहाँ भी अन्य राजाओं द्वारा) प्रताड़ित होने के लिए। इसलिए, आप सभी शीघ्र ही पूरी श्रद्धा के साथ, अदम्य और चमकते हुए मुकुट को धारण करने वाले, श्री महालक्ष्मी के दिव्य पति (भगवान श्रीमन नारायण) के दिव्य चरणों में आत्मसमर्पण कर दें।
तीसरे पाशुराम् में आऴ्वार् कहते हैं कि, वे सम्राट जो उन अन्य राजाओं के बारे में निश्चिन्त रहे जिन्होंने उनके सामने हार मान लिया था, वे अपना सारा धन-वैभव खो देंगे और दूसरों के द्वारा अनादर का जीवन जिएँगे। इसलिए, आप सभी परम आनंदमयी कृष्ण के दिव्य चरणों में आत्मसमर्पण कर दें।
तीसरा पाशुरम –
अडि सेर् मुडियिनरागि अरसर्गळ् ताम् तॊऴ
इडि सेर् मुरसङ्गळ् मुट्रत्तियम्ब इरुन्दवर्
पॊडि सेर् तुगळाय्प् पोवर्गळ् आदलिल् नॊक्कॆनक्
कडि सेर् तुऴाय् मुडिक् कण्णन् कऴल्गळ् निनैमिनो।
वे (सम्राट) जिनके चरणों में अन्य राजा स्वयं आकर पूजा (वंदना) करते थे, और जो बाहर बजने वाले नगाड़ों (नगाड़ों की गर्जना) की ध्वनि सुनते हुए (अपनी शरण में आए राजाओं की चिंता किए बिना) निश्चिंत रहते थे, ऐसे सम्राट एक छोटी सी वस्तु के धूल के कण के समान मूल्यहीन हो जाएँगे। इसलिए, आप सभी सुगंधित तुलसी से सजे मुकुट को धारण करने वाले कृष्ण के दिव्य चरणों का ध्यान करें।
चौथे पाशुरम में आऴ्वार् कहते हैं कि “चूँकि जीवन काल भी बहुत छोटा (अस्थायी) है, इसलिए आप सभी बाधाओं को दूर करने वाले कृष्ण के दिव्य चरणों की पूजा करें”।
चौथा पाशुरम –
निनैप्पान् पुगिल् कडल् ऎक्कलिन् नुण् मणलिन् पलर्
ऎनैत्तोरुगङ्गळुम् इव्वुलगाण्डु कऴिन्दवर्
मनैप्पाल् मरुङ्गऱ माय्दल् अल्लाल् मट्रुक् कण्डिलम्
पनैत्ताळ् मद कळिऱट्टवन् पादम् पणिमिनो
यदि हम उन (अहंकारी) राजाओं के बारे में बात करने बैठें जो भगवद्-अनुभव (भगवान की भक्ति) को छोड़कर मृत्यु को प्राप्त हुए, तो उनकी संख्या समुद्र के तटों पर स्थित रेत के अनगिनत बारीक कणों से भी अधिक है, जिन्होंने कई युगों तक इस संसार पर राज किया और अंततः मिट गए। वे इस प्रकार नष्ट हो जाते हैं कि उनके महलों और उनके आस-पास के परिवेश में कोई अंतर नहीं रह जाता [सब कुछ समतल और मिट्टी में मिल जाता है] और हमने उनका कोई नामो-निशान बाकी बचा नहीं देखा है। इसलिए, आप सभी ताड़ के पेड़ जैसे मोटे और गोल पैरों वाले उस मतवाले हाथी [कुवलयापीड़] के वधकर्ता कृष्ण के दिव्य चरणों की वंदना करें।
पाँचवे पाशुरम में आऴ्वार् कहते हैं कि “धन-वैभव की तरह, स्त्रियों के साथ मिलने वाले सुख (सांसारिक सुख) में भी अनेक कमियाँ और दोष हैं, जैसे कि वे क्षणभंगुर (अस्थायी) हैं”।
पाँचवाँ पाशुरम –
पणिमिन् तिरुवरुळ् ऎन्नुम् अम् सीदप् पैम् पूम् पळ्ळि
अणि मॆन् कुऴलार् इन्बक् कलवि अमुदुण्डार्
तुणि मुन्बु नालप् पल् एऴैयर् तामिऴिप्पच् चॆल्वर्
मणि मिन्नु मेनि नम् मायवन् पेर् चॊल्लि वाऴ्मिनो।
वे [राजा और धनी लोग] जो कभी सुंदर, ठंडी और फूलों की बड़ी शय्या पर लेटकर, सुंदर और सजे हुए केशों वाली स्त्रियों के साथ आनंदमयी मिलन के रस (अमृत) का भोग करते थे, वही लोग बाद में अपनी फटी-पुरानी धोती (कपड़े) को आगे लटकाए हुए, उन्हीं स्त्रियों के पास वापस गिड़गिड़ाते हुए जाएँगे जो पहले उन्हें चाहती थीं, भले ही वे स्त्रियाँ अब उनका घोर अपमान और तिरस्कार क्यों न करें। इसलिए, आप, नील रत्न के समान चमकते हुए दिव्य स्वरूप वाले और अपने भक्तों को परम आनंद देने वाले उस अद्भुत भगवान (कृष्ण) के दिव्य नामों का संकीर्तन (जाप) करके अपना जीवन धन्य और सुखी बनाएँ।
छठवे पाशुरम में आऴ्वार् कहते हैं कि “सृष्टि (संसार के निर्माण) के समय से लेकर आज तक, मैंने किसी भी ऐसे व्यक्ति को नहीं देखा जो सदैव एक धनी व्यक्ति के रूप में जीवित रहा हो (अर्थात धन सदा किसी के पास नहीं रहता)। इसलिए, आप सभी क्षीरसागर के स्वामी (भगवान विष्णु) के सेवक (दास) बन जाएँ।”
छठा पाशुरम –
वाऴ्न्दार्गळ् वाऴ्न्ददु मा मऴै मॊक्कुळिन् माय्न्दु माय्न्दु
आऴ्न्दार् ऎन्ऱल्लाल् अन्ऱु मुदल् इन्ऱऱुदिया
वाऴ्न्दार्गळ् वाऴ्न्दे निऱ्-पर् ऎन्बदिल्लै निऱ्-कुऱिल्
आऴ्न्दाऱ कडल् पळ्ळि अण्णल् अडियवरामिनो।
जो लोग यह सोचते हैं कि वे (ऐश्वर्य का) जीवन जी रहे हैं, वे भारी वर्षा में पानी के उस बुलबुले के समान हैं जो बार-बार बनता है और तुरंत नष्ट हो जाता है; इतना ही नहीं, सृष्टि के आदि काल से लेकर आज तक ऐसा कोई नियम या उदाहरण नहीं है कि जिसने जैसा ठाठ-बाट का जीवन जिया हो, वह सदा वैसा ही जीता रहा हो। इसलिए, यदि आप एक शाश्वत (अमर) जीवन पाना चाहते हैं, तो उस स्वामी (भगवान श्रीमन नारायण्) के अनन्य भक्त और सेवक बन जाएँ, जिसका गहरा और विशाल महासागर शय्या है।
सातवे पाशुरम में आऴ्वार् भोजन, पेय पदार्थों और इसी प्रकार के अन्य (सांसारिक) सुखों की क्षणभंगुर (अस्थायी) प्रकृति के बारे में बताते हैं।
सातवाँ पाशुरम –
आमिन् सुवै अवै आऱोडु अडिसिल् उण्डार्न्द पिन्
तू मॆन् मॊऴि मडवार् इरक्कप् पिन्नुम् तुट्रुवार्
ईमिन् ऎमक्कॊरु तुट्रॆन्ऱु इडऱुवर् आदलिन्
कोमिन् तुऴाय् मुडि आदि अम् चोदि गुणङ्गळे।
वे [धनी लोग] जो अपनी रुचि के अनुकूल, अत्यंत स्वादिष्ट, जगप्रसिद्ध और छः प्रकार के रसों (षडरस) से युक्त उत्तम भोजन को पेट भरकर खाने के पश्चात भी, उन शुद्ध (स्नेही दृष्टिकोण के कारण) और मृदुभाषी युवतियों की इच्छा को अस्वीकार करने में असमर्थ, पुन: बड़ी कठिनाई से खाते थे; वही लोग बाद में अपना सारा धन खो देने पर, उन्हीं स्त्रियों के द्वारों पर जाकर गिड़गिड़ाएँगे कि “हमें भी एक मुट्ठी भोजन दे दो” और उनके दरवाजों पर ठोकरे खाकर, भोजन न मिलने पर इधर-उधर भटकते हैं। इसलिए, आप सभी मिलकर, तुलसी (तिरुत्तुऴाय) से सजे दिव्य मुकुट को धारण करने वाले, असीम आनंद के सागर और संपूर्ण सृष्टि के आदि-कारण, अनंत आनंददायक दिव्य स्वरूप वाले सुंदर सर्वेश्वर (भगवान) के कल्याणकारी गुणों का आनंद लें ।
आठवे पाशुरम में आऴ्वार् कहते हैं कि “चूँकि भगवान की कृपा के बिना ये अर्जित किए हुए राज्य लंबे समय तक टिकने वाले नहीं हैं, आप सभी अनंतशायी (शेषनाग की शय्या पर विराजमान भगवान श्रीमन् नारायण) के दिव्य नामों का संकीर्तन (जप) करें।”
आठवाँ पाशुरम –
गुणम् कॊळ् निऱै पुगऴ् मन्नर् कॊडैक् कडन् पूण्डिरुन्दु
इणङ्गि उलगुडन् आक्किलुम् आङ्गवनै इल्लार्
मणम् कॊण्ड बोगत्तु मन्नियुम् मीळ्वर्गळ् मीळ्विल्लै
पणम् कॊळ् अरवणैयान् तिरुनामम् पडिमिनो।
वे राजा जो शील (सरलता) आदि श्रेष्ठ गुणों के निवास स्थान हैं, जो पूर्ण कीर्ति से संपन्न हैं, जो मुकुटधारी राजकुमार हैं, और जो उदारता के स्वभाव को अपनाकर (अपनी संपत्ति को सभी के कल्याण के लिए उपलब्ध कराकर) अच्छी तरह स्थापित हैं; भले ही वे संसार के साथ तालमेल बिठाकर बहुत ही सामंजस्यपूर्ण रूप से प्रजा का पालन कर रहे हों, किंतु यदि वे इस ऐश्वर्य के विषय में सर्वेश्वर (भगवान) के अधीन नहीं हैं, हालाँकि इस तरह से दैनिक उत्सवों की नयापन और धन-वैभव के सुख में दृढ़ता से टिके रहने पर भी, वे एक दिन पूरी तरह से दरिद्र (कंगाल) हो जाएँगे। इसके विपरीत, यदि आप फैले हुए फणों वाले आदिशेष की शय्या पर विराजमान और अपने भक्तों से मिलन के लिए सदैव आतुर रहने वाले भगवान के दिव्य नामों का संकीर्तन और अभ्यास करेंगे, तो आप उस परमपद (मोक्ष) को प्राप्त करेंगे जहाँ से फिर कभी (इस संसार में) लौटना नहीं पड़ता।
नौवे पाशुरम में आऴ्वार् कहते हैं कि “चूँकि स्वर्ग आदि का पारलौकिक सुख भी अस्थायी (क्षणभंगुर) है, इसलिए आप सभी उस ईश्वर (सर्वेश्वर) की शरण लें जो आपको उस लक्ष्य (कैङ्कर्यं) को स्थापित करेंगे जो सदैव स्थिर है।”
नौंवाँ पाशुरम –
पडि मन्नु पल्कलन् पट्रोडऱुत्तु ऐम्पुलन् वॆन्ऱु
चॆडि मन्नु कायम् चॆट्रार्गळुम् आङ्गवनै इल्लार्
कुडि मन्नुम् इन् सुवर्गम् ऎय्दियुम् मीळ्वर्गळ् मीळ्विल्लै
कॊडि मन्नु पुळ्ळुडै अण्णल् कऴल्गळ् कुऱुगुमिनो।
भले ही किसी ने सदा पहने आभूषणों, भू और संपत्तियों के मोह को पूरी तरह से त्याग दिया हो, अपनी पाँचों इंद्रियों को जीत लिया हो, और घोर तपस्या में अपने शरीर को सुखाकर उस पर झाड़-झंखाड़ (झाड़ियाँ) तक उगने दी हों; ऐसे लोग यदि इन कठिन साधनों के बल पर बहुत ही आनंदमयी और (लंबे समय तक टिकने के कारण) स्थायी से प्रतीत होने वाले स्वर्ग लोक को पा भी लें, किंतु वहाँ रहते हुए भी यदि वे भगवान का आश्रय नहीं लेते, तो वे उस स्वर्ग के सुख को भी खो देंगे और उन्हें वापस नीचे गिरना पड़ेगा। इसलिए, एक कभी न नष्ट होने वाले शाश्वत फल (मोक्ष) को पाने के लिए, आप सभी, अपने ध्वज (झंडे) पर नित्य विराजमान रहने वाले पॆरिय् तिरुवडी (गरुड़ जी) को धारण करने वाले, सुंदर सर्वेश्वर के दिव्य चरणों के समीप पहुँचने का प्रयास करें। “पडि मन्नु” का अर्थ यह भी है कि “वे [आभूषण] जो शरीर के अंग पर बिल्कुल सही आकार में बैठता हो” |
दसवे पाशुरम् में आऴ्वार् कहते हैं कि ‘यद्यपि कैवल्य अस्थायी नहीं है [जैसे कि सांसारिक सुख अस्थायी होते हैं], फिर भी यह परम पुरुषार्थ (भगवान की शाश्वत सेवा करने का अंतिम लक्ष्य) जितना समृद्ध और आनंदमयी न होने के कारण, उस भगवान को प्राप्त करना ही सबसे अद्भुत पुरुषार्थ (लक्ष्य) है, जो सर्वनियंत्रक सर्वोच्च स्वामी हैं।
दसवाँ पाशुरम –
कुऱुग मिग उणर्वत्तॊडु नोक्कि ऎल्लाम् विट्ट
इरुगल् इऱप्पॆन्नुम् ज्ञानिक्कुम् अप्पयन् इल्लैयेल्
सिऱुग निनैवदोर् पासम् उण्डाम् पिन्नुम् वीडिल्लै
मऱुगलिल् ईसनैप् पट्रि विडा विडिल् वीडह्दे।
वह ज्ञानी (बुद्धिमान) जिसने आत्मा के अतिरिक्त अन्य सभी लक्ष्यों को त्याग दिया है, और जो अपने ज्ञान द्वारा पहचाने जाने वाले स्वरूप के अत्यंत निकट रहकर गहनता से आत्मा का ध्यान कर रहा है, वह केवल आत्मा में ही समाप्त होने वाले मोक्ष को ही अपना लक्ष्य मान रहा है; ऐसे ज्ञानी के लिए, यदि भगवान को माध्यम (उपाय) के रूप में स्वीकार करने का भाव उपस्थित न हो, तो तुच्छ लक्ष्यों के बारे में सोचने की आसक्ति (लगाव) बनी रहेगी; इसके अतिरिक्त, उसे मोक्ष (आत्म-आनंद प्राप्त करने के रूप में) भी प्राप्त नहीं होगा। ऐसी स्थिति में, समस्त दोषों से रहित, सबके नियंता और समस्त कल्याणकारी गुणों के निवास स्थान होने वाले भगवान की शरण में जाना और उन्हें कभी न छोड़ना ही अपने आप में परम पुरुषार्थ (अंतिम लक्ष्य) है।
ग्यारहवें पाशुरम् में आऴ्वार् समझाते हैं कि समस्त दुखों के निवारण के पश्चात आत्मा का उद्धार होना ही इस दशक (दशक के श्लोकों) का प्रतिफल (परिणाम) है।
ग्यारहवाँ पाशुरम् –
अह्दे उय्यप् पुगुमाऱॆन्ऱु कण्णन् कऴल्गळ् मेल्
कॊय् पूम् पॊऴिल् सूऴ् कुरुगूर्च् चटकोपन् कुट्रेवल्
सॆय् कोलत्तु आयिरम् सीर्त् तॊडैप् पाडल् इवै पत्तुम्
अह्कामल् कऱ्-पवर् आऴ् तुयर् पोय् उय्यऱ्-पालरे।
आऴ्वार् तिरुनगरी (कुरुगापूरी) – जहाँ अवचयन करने योग्य पुष्पों से लदे बगीचों की प्रचुरता है, उस नगरी के नायक श्री शठकोप सूरी (नम्माऴ्वार्) ने, कृष्ण के दिव्य चरणों में किये जाने वाले गुप्त (अंतरंग) सेवाओं के रूप में, ‘सीर्’ और ‘तोडै’ (छंद और तुकबंदी) से युक्त एक सहस्त्र पाशुरम् गाए। उन्होंने दृढ़ता से यह कहा कि ये पाशुरम् ही आत्मा के उद्धार का एकमात्र साधन हैं। जो लोग उन एक सहस्त्र पाशुरम् में से इस दशक (दस श्लोकों के समूह) को बिना किसी अंश को खोए (पूर्ण श्रद्धा से) सीखते हैं, उनके सांसारिक ऐश्वर्य और आत्म-आनंद (केवल स्वयं के सुख) में डूबे रहने का दुःख पूरी तरह से नष्ट हो जाएगा, और वे आत्म-उद्धार (भगवान की अनन्य भक्ति) के मार्ग पर अग्रसर होंगे।
अडियेन् श्रीतेजा रामानुज दासी
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