तिरुवायमोऴि — सरल व्याख्या — ५.७ – नोट्र
श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः कोयिल तिरुवायमोऴि << ५.५ यद्यपि साक्षात् सर्वेश्वर ‘एम्पॆरुमान्’ (भगवान) इतने कृपालु हैं कि वे उन जीवों की भी सहर्ष् रक्षा करते हैं जिनके भीतर उनके प्रति तनिक भी (लेशमात्र) अनुराग या जुड़ाव होता है; परंतु यहाँ आऴ्वार् (नम्माऴ्वार्) अत्यंत विरह और व्याकुलता में विस्मित हो रहे … Read more