उपदेश रत्तिनमालै – सरल व्याख्या – पासुरम् २९ – ३०

। ।श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत् वरवरमुनये नमः। । उपदेश रत्तिनमालै <<पासुर २७ – २८ पासुरम् २९ उनतीसवां पासुरम्। वे अपने हृदय से चित्तिरै तिरुवादिरै के इस महान दिवस की महिमा को निरंतर चिंतन करने को कहते हैं। ऎन्दै ऎतिरासर् इव्वुलगिल् ऎन्दमक्कावन्दुदित्त नाळ् ऎन्नुम् वासिनियाल् – इन्दत्तिरुवादिरै तन्निन् सीर्मै तनै नॆञ्जेऒरुवामल् ऎप्पोऴुदुम् … Read more

सप्त कादै – पासुरम् १ – भाग ५

श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमते वरवरमुनये नम: शृंखला <<सप्त कादै – पासुरम् १ – भाग ४ तडै काट्टि–  निम्नलिखित तथ्यों में बाधाओं को प्रकट करना १) संबंध के बारे में जो पहले प्रस्तुत किया गया था, २) ईश्वर, जो ऐसे संबंध का प्रतिरूप है, उनके प्रभुत्व का बोध ३) चेतन की अनन्य … Read more

उपदेश रत्तिनमालै – सरल व्याख्या – पासुरम् २७ – २८

। ।श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत् वरवरमुनये नमः। । उपदेश रत्तिनमालै <<पासुरम् २५ -२६ पासुरम् २७ सत्ताईसवां पासुरम्। अगले तीन पासुरों में मामुनिगळ् एम्पेरुमानार् (रामानुजाचार्य), जिनकी महानता आऴ्वारों की महानता के समान है और जो आऴ्वारों के सेवक और अन्य सभी के लिए स्वामी हैं, उनके दिव्य नक्षत्र की महिमा का आनंद … Read more

सप्त कादै – पासुरम् १ – भाग ४

श्री: श्रीमते शठकोप नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमद् वरवर मुनये नम: शृंखला <<सप्त कादै – पासुरम् १ – भाग ३ जिस प्रकार से आचार्य इन नौ प्रकार संबंधों का निर्देश देते हैं जैसे कि तिरुवाय्मोऴि २.३.२ में वर्णित है “अऱियाधन अऱिवित्त” (ऐसे अनुभवों को बताया गया है जिसके बारे में प्रत्येक नहीं जानते), यह चेतना … Read more

उपदेश रत्तिनमालै – सरल व्याख्या – पासुरम् २५ -२६

। ।श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत् वरवरमुनये नमः। । उपदेश रत्तिनमालै <<पासुर २३ – २४ पासुरम् २५ पच्चीसवां पासुरम्। मामुनिगळ् मधुरकवि की महिमा को दो पासुरों में प्रकट करते हैं। इस पासुर में वे अपने हृदय से कहते हैं कि, चित्तिरै (चैत्र) महीने के चित्तिरै (चित्रा) नक्षत्र‌ के दिन, मधुरकवि आऴ्वार् का … Read more

सप्त कादै – पासुरम् १ – भाग ३

श्री: श्रीमते शठकोप नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमद् वरवर मुनये नम: शृंखला <<सप्त कादै – पासुरम् १ – भाग २ तत्पश्चात, जैसे “अवदारणमन्ये तु मध्यमान्तम् वदन्तिहि” और “अस्वातन्तर्यंतु जीवानाम् आधिक्यम् परमात्मन:। नमसाप्रोच्यते तस्मिन् नहन्ताममतोज्जिता” ।। [नम: जीवात्मा के पारतन्त्र्यम् (दासता) और परमात्मा के स्वातन्त्र्यम् (मुक्ति) की व्याख्या करता है। इस प्रकार नम: में अहंकार (शरीर … Read more

नाच्चियार तिरुमोऴि – सरल व्याख्या – दूसरा तिरुमोऴि – नामम् आयिरम्

श्रीः श्रीमतेशठकोपाय नमः श्रीमतेरामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः नाच्चियार् तिरुमोऴि << पहला तिरुमोऴि एम्पेरुमान् दुखी थे कि उन्होंने हमें दूसरे देवता कामदेव के चरणों में प्रार्थना करने के लिए छोड़ दिया था। जब वे तिरुवायर्पाडि (श्री गोकुलम) में श्रीकृष्ण के रूप में थे वहाँ के चरवाहों ने इन्द्र को भोग दिया। यह देखकर कि उनके होते … Read more

सप्त कादै – पासुरम् १ – भाग २

श्री: श्रीमते शठकोप नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमद् वरवर मुनये नम: शृंखला << सप्त कादै – पासुरम् १ – भाग १ अम् पोन् अरङ्गर्क्कुम् -मुक्तात्मा, जैसे तिरुमालै २ में कहा गया है “पोय् इन्दिरा लोगम् आळुम्” (परमपद जाना और वहाँ आनन्द लेना), अर्चिरादि मार्गम् से यात्रा करना (परमपद की ओर जाने वाला मार्ग) विरजा नदी … Read more

सप्त कादै – पासुरम् १ – भाग १

श्री: श्रीमते शठकोप नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमद् वरवर मुनये नम: शृंखला <<सप्त गाथा (सप्त कादै) – अवतारिका (परिचय) – भाग २ अवतारिका(परिचय) जैसे कि हरीत स्मृति ८-१४१ में कहा गया है “प्राप्यस्य ब्रह्मनो रूपम् प्राप्तुश्च प्रत्यगात्मन:। प्राप्त्युपायम् पलम् प्राप्तेस्तथा प्राप्ति विरोधी च। वदन्ति सकला वेदा:सेतिहास पुराणका:। मुनयश्च महात्मानो वेद वेदार्थ वेदिन:।।” (इतिहास और पुराण … Read more

तिरुवाय्मोळि – सरल व्याख्या – २. १० – किळरोळि

श्री: श्रीमते शटकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत् वरवरमुनये नम: कोयिल तिरुवाय्मोळि << १.२ – वीडुमिन आळ्वार एम्पेरुमान के ओर सारे प्रियतम कैंकर्य करना चाहे। एम्पेरुमान “तेर्क्कु तिरुमलै” (दक्षिण दिव्यदेश ) नाम से पहचाने जाने वाले तिरुमालिरुन्चोलै में आळ्वार को दर्शन देकर कहे, “मैं तुम्हारे लिए यहाँ आया हूँ, तुम यहीं मेरे प्रति सर्वत्र कैंकर्य … Read more