nAchchiyAr thirumozhi – maRRoru [another] thaniyan

SrI: SrImathE SatakOpAya nama: SrImathE rAmAnujAya nama: SrImadh varavara munayE nama: Full series << Previous Note: This thaniyan was composed by ponnadikkAl jIyar (vAnamAmalai/thOthAdhri mutt 1st jIyar) and is recited in pANdiya nAdu regularly. avathArikai (Introduction) – this thaniyan, which begins with the verse kOlach churisangai speaks about (1) enquiring pAnchajanyAzhwAn [divine conch pAnchajanyam] who … Read more

nAchchiyAr thirumozhi – thaniyan (Invocation)

SrI: SrImathE SatakOpAya nama: SrImathE rAmAnujAya nama: SrImadh varavara munayE nama: Full series avathArikai (Introduction) – This thaniyan [special hymn] has been mercifully composed by thirukkaNNamangai AndAn, a disciple of SrIman nAthamunigal. In this thaniyan, ANdAL’s purushakArathvam(quality of playing recommendatory role), aiSwaryam (opulence), saundharyam (beauty), AnurUpyam (fitting well) with emperumAn’s divine form and naRkudip piRappu … Read more

nAchchiyAr thirumozhi

SrI: SrImathE SatakOpAya nama: SrImathE rAmAnujAya nama: SrImadh varavara munayE nama: nAchchiyAr thirumozhi was composed by ANdAL, the divine daughter of periyAzhwAr. It is said that she had composed this dhivya prabandham (divine composition) when she was just five years old. ANdAL was brought up by periyAzhwAr by listening to the divine deeds of kaNNan … Read more

नाच्चियार् तिरुमोऴि – सरल व्याख्या – छठवां तिरुमोऴि – वारणम् आयिरम्

 श्रीः श्रीमतेशठकोपाय नमः श्रीमतेरामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः नाच्चियार् तिरुमोऴि <<मन्नु पेरुम् पुगऴ् आण्डाळ् ने कोयल से विनती की थी कि वह उसे भगवान से मिला दे। ऐसा न होने से वह बहुत व्यथित थी। दूसरी ओर, एम्पेरुमान् उसके प्रति अपना प्यार बढ़ाने और बाद में आने का प्रतीक्षा कर रहा था। भले ही उन्होंने आरंभ … Read more

नाच्चियार् तिरुमोऴि – सरल् व्याख्या पाँचवा तिरुमोऴि – मन्नु पेरुम् पुगऴ्

श्रीः श्रीमतेशठकोपाय नमः श्रीमतेरामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः नाच्चियार् तिरुमोऴि <<चौथा तिरुमोऴि आण्डाळ् कूडल् में संलग्न होने के बाद भी एम्पेरुमान् के साथ एकजुट नहीं हो पाई, तो वह उस कोयल पक्षी को देखती है जो पहले उसके साथ थी जब वह एम्पेरुमान् के साथ एकजुट हुई थी। वह कोयल‌ उसकी बातों का उत्तर दे सकता … Read more

नाच्चियार् तिरुमोऴि – सरल व्याख्या​ – चौथा तिरुमोऴि – तेळ्ळियार् पलर्

श्रीः श्रीमतेशठकोपाय नमः श्रीमतेरामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः नाच्चियार् तिरुमोऴि <<तीसरा तिरुमोऴि  एम्पेरुमान् गोपकुमारियों के वस्त्रों को लेकर कुरुंधम् पेड़ पर चढ़ गए। गोपकुमारियों ने उससे प्रार्थना की और उसकी निन्दा की, और किसी तरह अपने वस्त्रों को वापस पा लिया। एम्पेरुमान् और गोपकुमारियाँ का मिलन हुआ और आनंद लिया। लेकिन इस संसार में कोई भी … Read more

नाच्चियार तिरुमोऴि – सरल व्याख्या – तीसरा तिरुमोऴि – कोऴि अऴैप्पदन्

श्रीः श्रीमतेशठकोपाय नमः श्रीमतेरामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः नाच्चियार् तिरुमोऴि <<दूसरा तिरुमोऴि पिछले दशक में, कण्णन्, आण्डाळ और अन्य गोपकुमारियाँ एक साथ थे [प्रसन्नचित्त]। इसे देखते हुए, लड़कियों के माता-पिता ने सोचा “अगर हम इन्हें इसी प्रकार जारी रखने की अनुमति दें, तो वे अपने मिलन के आनंद में डूब जाएँगी और मर भी सकती हैं”। … Read more

नाच्चियार तिरुमोऴि – सरल व्याख्या – दूसरा तिरुमोऴि – नामम् आयिरम्

श्रीः श्रीमतेशठकोपाय नमः श्रीमतेरामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः नाच्चियार् तिरुमोऴि << पहला तिरुमोऴि एम्पेरुमान् दुखी थे कि उन्होंने हमें दूसरे देवता कामदेव के चरणों में प्रार्थना करने के लिए छोड़ दिया था। जब वे तिरुवायर्पाडि (श्री गोकुलम) में श्रीकृष्ण के रूप में थे वहाँ के चरवाहों ने इन्द्र को भोग दिया। यह देखकर कि उनके होते … Read more

नाच्चियार तिरुमोऴि – सरल व्याख्या​ – पहला तिरुमोऴि – तैयोरु तिङ्गळ्

श्रीः श्रीमतेशठकोपाय नमः श्रीमतेरामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः नाच्चियार् तिरुमोऴि << तनियन् आण्डाळ् ने तिरुप्पावै में  एम्पेरुमान् को उपाय माना और घोषित किया कि जो भगवान् के प्रति निःस्वार्थ कैंङ्कर्य ही उपेय है। यदि सदा यह विचार स्मरण में रहे तो एम्पेरुमान् स्वयं उसका फल देता है। परंतु एम्पेरुमान् तो न आण्डाळ् के समीप आया, न … Read more

नाच्चियार् तिरुमोऴि – सरल व्याख्या – तनियन्

श्रीः श्रीमतेशठकोपाय नमः श्रीमतेरामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः नाच्चियार् तिरुमोऴि अल्लिनाळ् तामरै मेल् आरणंङ्गिन् इन्तुणैविमल्लि नाडाण्ड मडमयिल्- मेल्लियलाळ्आयर्कुल वेन्दन् आगत्ताळ् तेन्पुदुवैवेयर् पयन्द विळक्कु श्री गोदा मृदु स्वभाव की है; वह नव खिले कमल पुष्प में नित्य वास करने वाली, देवी पेरिय पिराट्टि की प्रिय सखी है, वह एक मोरनी की तरह तिरुमल्लि प्रदेश में राज्य करती … Read more