आर्ति प्रबंधं – २४

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम: आर्ति प्रबंधं << पासुर २३ उपक्षेप साँसारिक संबंध के हटने से, अत्यंत सौभाग्य स्तिथि जो हैं ,परम श्रेयसी आचार्यो के मध्य पहुँचने तक के घटनाओँ की विवरण इस पासुरम में मणवाळ मामुनि प्रस्तुत करते हैं।    पासुरम इंद उडल विटटु इरविमंडलत्तूडु येगी इव्वणडम कळित्तु इडैयिल आवरणमेळ पोय अन्दमिल … Read more

आर्ति प्रबंधं – २३

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम: आर्ति प्रबंधं << पासुर २२ उपक्षेप पिछले दो पासुरों में, मणवाळ मामुनि, अपने आचार्य तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै और परमाचार्य एम्बेरुमानार के आशीर्वाद के विवरण किये। मणवाळ मामुनि के अभिप्राय हैं कि इन्के आशीर्वाद के बल पर वे निश्चित परमपद प्राप्त करेंगें और भगवान की अनुभव करेंगें।  शीघ्र “दिव्यस्थान मण्डप” … Read more

आर्ति प्रबंधं – २२

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम: आर्ति प्रबंधं << पासुर २१ उपक्षेप पिछले पासुरम में मणवाळ मामुनि “एन्न भयं नमक्के”, कहते हैं , अर्थात उन्को अब कोई भय नहीं हैं। अब कहते हैं कि अपने आचार्य तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै के निर्हेतुक आशीर्वाद के कारण श्री रामानुज उन पर गर्व करेंगें। यह इस सँसार के सागर … Read more

आर्ति प्रबंधं – २१

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम: आर्ति प्रबंधं << पासुर १० उपक्षेप यह पासुरम मणवाळ मामुनि और उनके मन के बीच की संभाषण है। उनकी मन का प्रश्न है “हे मणवाळ मामुनि ! पिछले पासुरम में आप परमपद के मार्ग की और श्रीमन नारायण से जीवात्मा की मिलन का भी विवरण दिए। अत्यंत … Read more

आर्ति प्रबंधं – २०

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम: आर्ति प्रबंधं << पासुर १९ उपक्षेप पिछले पासुरम में मणवाळ मामुनिगळ श्री रामानुज से पूँछते हैं कि क्या ज्ञानी अपने पुत्रों के पथभ्रष्ट होना सह पायेंगें।  (इरामानुस नूट्रन्दादि ४४ ) “नल्लार परवुम इरामानुसन” अनुसार श्री रामानुज , जो नेक लोगों के मान्यवर हैं, मणवाळ मामुनि के शोक … Read more

आर्ति प्रबंधं – १९

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम: आर्ति प्रबंधं << पासुर १७ उपक्षेप पिछले पासुरम में मणवाळ मामुनि श्री रामानुज से, इस साँसारिक लोक के नित्य अंधकार और अज्ञान में फॅसे , खुद केलिए रोशनी दिखाने की प्रार्थना करते हैं। इस पासुरम में वे बताते हैं कि वे अपने शरीर के वश में हैं … Read more

आर्ति प्रबंधं – १७

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम: आर्ति प्रबंधं << पासुर १८ उपक्षेप पिछले पासुरम में मणवाळ मामुनि श्री रामानुज से, उन्के चरण कमल प्राप्त होने  की समय की विवरण प्रार्थना किये।  अब मामुनि के अभिप्राय है कि ,इस प्रश्न से  श्री रामानुज के मन में एक सोच पैदा हुआ हैं। वह है , … Read more

शरणागति गद्य – चूर्णिका 5 – भाग 4

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नम: शरणागति गद्य << चूर्णिका 5 – भाग 3 आईये अब हम उन अष्ट गुणों और अन्य कल्याण गुणों के विषय में जानने का प्रयास करेंगे है, जिनका वर्णन भगवद श्रीरामानुज स्वामीजी, भगवान की शरणागति करने के पूर्व करते है। सत्यकाम !सत्यसंकल्प ! परब्रह्मभूत ! पुरुषोत्तम ! महाविभूते ! श्रीमन् ! नारायण … Read more

आर्ति प्रबंधं – १८

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम: आर्ति प्रबंधं << पासुर १६ उपक्षेप श्री रामानुज ने आश्वासन दिया था कि मणवाळ मामुनि के परमपद प्राप्ति के इच्छा वे पूर्ती करेंगें।  किन्तु (तिरुवाय्मोळि ९.९.६ ) के “अवन अरुळ पेरुम अळवाविनिल्लादु” के जैसे मामुनि उचित काल तक प्रतीक्षा करने केलिए तैयार नहीं हैं। तिरुवाय्मोळि ५.३ में … Read more

आर्ति प्रबंधं – १६

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम: आर्ति प्रबंधं << पासुर १५ गूँगे को अपने चरण कमलों को दिखा कर, श्री रामानुज आशीर्वाद करते हैं उपक्षेप पिछले पासुरम में मणवाळ मामुनि निश्चय करतें हैं कि श्री रामानुज के प्रति उनके ह्रदय में एक बिन्दुमात्र भी प्रेम या भक्ति नहीं हैं। इस पासुरम में उनके … Read more