आर्ति प्रबंधं – ४२
श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमद्वरवरमुनये नम: आर्ति प्रबंधं << पासुर ४१ उपक्षेप श्री रामानुज सोचने लगे, “हमारी कितनि सौभाग्य है जो मामुनि जैसे “आकिंचन्यम” (उपहार के रूप में देने केलिए कुछ न हो) और “अनन्यगतित्वं” (कोई भी किस्म कि आश्रय न होना ) में अटल व्यक्ति को हम पाये। अति प्रसन्नता के सात … Read more