तिरुप्पावै – सरल व्यख्या – पाशुर १ से ५

श्रीः  श्रीमते शठकोपाय  नमः   श्रीमते रामानुजाय  नमः   श्रीमत् वरवरमुनये नमः

तिरुप्पावै

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पहला पाशुर:

एम्पेरुमान और ग्वालिनों के गुणानुगान का समय :

एम्पेरुमान उपाय और उपेय दोनों ही है, आण्डाळ् ने निश्चय कर लिया कि कृष्णानुभव के लिये, वह मार्गळि नोन्बु (( जो तमिल माह मार्गळि में रखे जाने वाली धार्मिक व्रतानुष्ठान)  (उत्तर भारतीय माह मार्गशीर्ष ) रखेगी।

      मार्गळित् तिङ्गळ् मदि निऱैन्द नन्नाळाल्
       नीराडप् पोदुवीर् पोदुमिनो नेरिळैयीर्
      सीर् मल्गुम् आय्प्पाडिच् चेल्वच् चिऱुमीर्गाळ्
       कूर्वेल् कोडुम् तोळिलन् नन्दगोपन् कुमरन्
      एर् आर्न्द कण्णि यसोदै  इळम् सिन्गम्
      कार् मेनिच् चेन्गण् कदिर् मदियम् पोल् मुगत्तान्
     नारायणने नमक्के पऱै तरुवान्
     पारोर् पुगळप् पडिन्दु एलोर् एम्बावाय्

ओ ! तिरुवाय्प्पाडि (श्री गोकुल) की युवा लड़कियों तुम्हारे पास तो कृष्ण कैंकर्य की संपत्ति है।

ओ ! सुन्दर बड़े आभूषण धारण करने वाली, आज शुभ दिवस है, देखो आज मार्गळि माह की पूर्णिमा है।

श्री कृष्ण (कण्णन्) नन्दगोप के आज्ञाकारी पुत्र है।

नन्दगोप के पास एक भाला है, जिससे वह कन्नन को हानि पहुँचाने वाले को ख़त्म कर देते है।

कन्नन यशोदाप्पिराट्टि के शेर के शावक की तरह है जिनके नेत्र अति सुन्दर है।

कन्नन का वर्ण घने काले बादलों सा है उनकी आँखें थोड़ी लालिमा लिये है, उनका मुख सूर्य चंद्र की भांति है।

वह स्वयं नारायण एम्पेरुमान है, वह हमें अपना कैंकर्य प्रदान कर सेवा का अवसर देंगे।

दूसरा पाशुर:

इस पाशुर में देवी अपनी सखियों को कृष्णानुभव के लिये क्या करना चाहिये क्या नहीं करना चाहिये का  नियम पालन बतला रही है।

देवी यहाँ यह कहती है की एम्पेरुमान (भगवान) की शरणागत हुयी हम सबको हमारे पूर्वाचार्यों के उपदेश ही मार्गदर्शक है।

वैयत्तु वाळ्वीर्गाळ् नामुम् नम् पावैक्कुच्
  चेय्युम् किरिसैगळ् केळीरो पार्कडलुळ्
पैयत् तुयिन्ऱ परमन् अडिपाडि
  नेय्युण्णोम् पालुण्णोम् नाट्काले नीराडि
मै इट्टु एळुदोम् मलर् इट्टु नाम् मुडियोम्
  सेय्यादन सेय्योम् तीक्कुऱळै चेन्ऱु ओदोम्
ऐयमुम् पिच्चैयुम् आन्दनैयुम् कैकाट्टि
  उय्युमाऱेण्णि उगन्दु एलोर् एम्बावाय्

हे सखियों ! हमें इस संसार में रहकर जीने के लिये जीवन मिला है। हम अपने उद्धार के लिये, भगवत प्राप्ति के लिये किये जाने वाले व्रत में हमें क्या करना चाहिये, क्या न करना चाहिये इसे समझते है।

हम सब तिरुप्पाऱ्कडल्  (क्षीर सागर) में शेष शैया पर शयन कर रहे, भगवान के दिव्य श्रीचरणों में प्रार्थना करेंगी।

हम घृत (घी) और दूध का सेवन नहीं करेंगी।

हम सुबह जल्दी उठकर स्नान करेंगी। 

हम अपनी आंखों में काजल नहीं लगायेंगी और न ही हम अपने बालों में फूल लगायेंगी।

हम ऐसा कोई कार्य नहीं करेंगी जो हमारे बड़ों ने निषिद्ध किया है।

हम किसी की चुगली नहीं करेंगी, हम अपनी सक्षमतानुसार जरूरतमंद को दान करेंगी। 

आण्डाळ् प्रार्थना करती है की, कृष्णानुभव की अनुमति देने वाले सभी बृन्दावन वासियों को लाभ मिले, यहाँ इसका अर्थ सभी को लाभ मिले ऐसा लिया है।

ओन्गि उलगु अळन्द उत्तमन् पेर् पाडि
  नान्गळ् नम् पावैक्कुच् चाऱ्ऱि नीराडिनाल्
तीन्गिन्ऱि नाडु एल्लाम् तिन्गळ् मुम्मारि पेय्दु
  ओन्गु पेरुम् सेन्नेल् ऊडु कयल् उगळ
पून्गुवलैप् पोदिल् पोऱि वण्डु कण् पडुप्प
  तेन्गादे पुक्कु इरुन्दु सीर्त्त मुलै पऱ्ऱि
वान्गक् कुडम् निऱैक्कुम् वळ्ळल् पेरुम् पसुक्कळ्
  नीन्गाद सेल्वम् निऱैन्दु एलोर् एम्बावाय्

हम व्रतधारिणी है इसलिये स्नान कर, हम सब उन भगवान् जो विशाल त्रिविक्रम स्वरुप धारण कर सारे ब्रह्माण्ड को नाप लिये,उनके दिव्य नामो का गुणानुवाद करेंगे।

ऐसा करने से बिना कोई हानि पहुंचाये सारे देश में, माह में तीन बार वर्षा होगी, जिससे धान के खेत लहलहा उठेंगे, उन खेतों में, मछीलियाँ कूदती दिखेंगी, चित्तीदार भृंग नीलकमल पर मंडराएंगे , लोग बेहिचक अपनी गायें के पास जाकर उन्हें दुहेंगे, वह इतना दूध देंगे की, दूध पात्रों से बाहर  बहेगा, देश अमिट ऐश्वयों से भरपूर होगा।

ब्राह्मण , राजा और सतियों के लिये, आण्डाळ् पर्जन्यदेव को माह में तीन बार बरसने की आज्ञा देती है, जिससे बृन्दावन निवासी सम्पन्नता से रहते हुए, कृष्णानुभव करते रहे।

आळि मळैक् कण्णा ओन्ऱु नी कै करवेल्
  आळियुळ् पुक्कु मुगन्दु कोडु आर्त्तु एऱि
ऊळि मुदल्वन् उरुवम् पोल् मेय् कऱुत्तु
   पाळियम् तोळुडैप् पऱ्पनाभन् कैयिल्
आळि पोल् मिन्नि वलम्पुरि पोल् निन्ऱु अदिर्न्दु
  ताळादे सार्न्गम् उदैत्त सरमळैपोल्
वाळ उलगिनिल् पेय्दिडाय् नान्गळुम्
  मार्गळि नीर् आड मगिळ्न्दु एलोर् एम्बावाय्

ओ वरुण देव, आप में समुद्र सी गहराइयाँ है, आप समुद्र से पानी लेकर भारी गर्जना करते हुये,  भगवान, जो समय के स्वामी है, जिनकी नाभि,  कमल के समान है, उनके वर्ण की तरह नीलमेघ वाले बन, अपने में कुछ न छिपाते हुये, भगवान के एक दिव्य हाथ में धारण किये हुये, चक्र की भव्यता से, उनके दूसरे हाथ में धारण किये शंख की तरह, तेजीसे गूंजते हुये, उनके सार्ङ्ग  धनुष से होती बाणों की वर्षा की तरह बरसो।

जिससे इस संसार के लोग कृष्णानुभव करते प्रसन्नता से रहे, और हम व्रत धारिणी भी इस मार्गळि माह में स्नान करें।

इस पाशुर में आण्डाळ् कहती है की नित्य भगवान के नाम स्मरण से हमारे कर्मानुसार किये हुये पाप और पुण्य कर्म धूमिल हो जाते है।

पाप कर्म अग्नि में जलती हुयी रुई की तरह जल कर भस्म हो जाते है, भविष्य में अनजाने में किये दुष्कर्म, कमल के पत्तों पर पानी की तरह,  बिना किसी निशान के मिट जाते है।

विशेष बात यह है की भगवान आप के सारे गत कर्म मिटा देते है, और भविष्य में भी अनजाने में हुये गलत कर्मो को मिटा देते है, पर साथ ही जानकारी रख कर किये हुये दुष्कर्मों के दुष्फल भी देते है।

मायनै मन्नु वड मदुरै मैन्दनैत्
  तूय पेरुनीर् यमुनैत् तुऱैवनै
आयर् कुलत्तिनिल् तोन्ऱुम् अणिविळक्कै
  तायैक् कुडल् विळक्कम् सेय्द दामोदरनै
तूयोमाय् वन्दु नाम् तूमलर्त् तूवित् तोळुदु
  वायिनाल् पाडि मनत्तिनाल् सिन्दिक्क
पोय पिळैयुम् पुगु तरुवान् निन्ऱनवुम्
  तीयिनिल् तूसागुम् सेप्पु एलोर् एम्बावाय्

उत्तर में मथुरा के देदीप्यमान राजा है दामोदर, उनकी अद्भुत लीलायें है, वह गहरी बहती हुयी यमुना किनारे खेलते है,  ग्वालकुल में अवतीर्ण माँ यशोदा को धन्य करने वाले कुलदीपक है।

हम पवित्रता से उन्ही का ध्यान धरते हुये, मुख से उन्ही के नामो का उच्चारण करते हुये, पुष्पों से उनकी आराधना सेवा करेंगे, (याने हम मन बुद्धि कर्म से उनकी आराधना करेंगे) ।

भविष्य में हमसे अनजाने में हुये दुष्कर्मों को भगवान मिटा देते है, ऐसे ही जैसे अग्नि रुई को भस्म कर देती है, इसलिये सदा उन्ही के नामों का गुणगान करते रहो।   

ऐसे आण्डाळ् ने इन पांच पासुरों में भगवान के विभिन्न व्यूहों को सम्बोधित करते हुये प्रार्थना की।

भगवान का पर स्वरुप (श्रीवैकुंठम में भगवान श्रीमन्नारायण) ।

व्यूह स्वरुप (क्षीरसागर में शयन कर रहे भगवान) ।

विभव स्वरुप (भगवान त्रिविक्रम) ।

अंतर्यामी स्वरुप (वरुणदेव में वसित भगवान श्रीमन्नारायण) ।

और अर्चा स्वरुप (मथुरा  में विराजित भगवान)।

अडियेन श्याम सुन्दर रामानुज दास

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