स्तोत्र रत्नम – श्लोक 41 से 50 – सरल व्याख्या

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः पूरी श्रृंखला << 31 – 40 श्लोक 41 – इस श्लोक में स्वामी आळवन्दार् एम्पेरुमान् और पेरिय तिरुवडी (गरुडाऴ्वार्) की समक्षता का आनंद ले रहें हैं; गरुडाऴ्वार् जो कई प्रकार के कैंङ्कर्य में लगे रहते हैं जैसे भगवान् का ध्वज इत्यादि और जो एक परिपक्व फल … Read more

उपदेश रत्तिनमालै – सरल व्याख्या – पासुरम् ३६ और ३७

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः उपदेश रत्तिनमालै << पासुरम् ३४ और ३५  पासुरम् ३६ छत्तीसवां पासुरम्। वे अपने हृदय से कहते हैं कि हमारे आचार्यों के अलावा और कोई नहीं है जो आऴ्वारों और उनके अरुळिच्चॆयल् की श्रेष्ठता को पूर्णतः जानते हों।  तॆरुळुट्र आऴ्वार्गळ् सीर्मै अऱिवार् आर्अरुळिच्चॆयलै अऱिवार् आर् – अरुळ् पॆट्र नादमुनि … Read more

उपदेश रत्तिनमालै – सरल व्याख्या – पासुरम् ३४ और ३५ 

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः उपदेश रत्तिनमालै << पासुरम् ३१ – ३३ पासुरम् ३४  चौंतीसवां पासुरम्। मामुनिगळ् अब तक दयालुता पूर्वक उन नक्षत्रों और स्थलों के बारे में बताते रहे जहाँ आऴ्वार् अवतरित हुए। तीसरे पासुरम् में उन्होंने “ताऴ्वादुमिल् कुरवर् ताम् वाऴि- एऴ्पारुम्  उय्य अवर्गळ् उरैत्तवैगळ् ताम वाऴि” कहकर हमारे आचार्यों के … Read more

amalanAdhipirAn

SrI:  SrImathE SatakOpAya nama:  SrImathE rAmAnujAya nama:  SrImath varavaramunayE nama: Audio e-book: thiruppANAzhwAr’s vaibhavam thiruppANAzhwAr’s avathAram took place at uRaiyUr as an incarnation of SrIvathsam- the divine mole on the chest of SrIman nArAyana, in the star of rOhiNi in the month of kArthikai. The ARAyirappadi guruparamparA prabhAvam records this as below: SrI lOkasAranga mahAmunIndhra skandhAdhirUdam … Read more

स्तोत्र रत्नम – श्लोक 31 से 40 – सरल व्याख्या

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः पूरी श्रृंखला << 21 -30 श्लोक 31 – इस श्लोक में श्री आळवन्दार् कहते हैं , ” आपके चरण कमलों को सिर्फ देखना ही पर्याप्त नहीं है , मेरे सिर पर आपके चरणों को रखके मेरे सिर को सुशोभित करना चाहिए ” जैसे तिरुवाइमोळि ९.२.२ में … Read more

तिरुवाय्मोळि नूट्रन्दाधि (नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या – पाशुरम ११ – २०

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमत् वरवरमुनये नमः श्रुंखला << १ – १० ग्यारहवां पाशुर – (वायुम तिरुमाल….) इस पाशुर में, श्रीवरवरमुनी स्वामीजी आळ्वार के पाशुरों काअनुसरण कर रहे हैं, जिसमें सभी प्राणियों को स्वयं के तरह पीड़ित मानते हैं और दयापूर्वक समझा रहे हैं। वायुम् तिरुमाल् मऱैय निर्क आऱ्ऱामैपोय् विन्जि मिक्क पुलम्बुदलाय् … Read more

उपदेश रत्तिनमालै – सरल व्याख्या – पासुरम् ३१ – ३३

। ।श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत् वरवरमुनये नमः। । उपदेश रत्तिनमालै << पासुर २९ – ३० पासुरम् ३१ इक्कीसवां पासुरम्। वह दयालुतापूर्वक उन स्थानों का उल्लेख करते हैं जहाँ तोंडरडिप्पोडि आऴ्वार् और कुलशेखर आऴ्वार् अवतरित हुए।  तोंडरडिप्पोडि आऴ्वार् तोंऱिय ऊर् तोल् पुगऴ् सेर्मंडङ्गउडइ एन्बर् मण्णुलगिल्- एण् दिसैयुम्एत्तुम् कुलसेकरन् ऊर् एन उरैप्पर्वाय्त्त तिरुवञ्जिक्कळम् … Read more

सप्त गाथा – पासुरम् ७

श्री: श्रीमते शठकोप नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमद् वरवर मुनये नम: शृंखला <<सप्त गाथा – पासुरम् ६ परिचय विळाञ्जोलैप् पिळ्ळै से पूछा गया, “आपने कई प्रकार से कहा कि जिन लोगों में अपने आचार्य के प्रति श्रद्धा की कमी है, वे बहुत नीचे गिर जाएंगे और उनके पास मुक्ति की कोई संभावना नहीं होगी। अब हमें … Read more

सप्त गाथा – पासुरम् ६

श्री: श्रीमते शठकोप नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमद् वरवर मुनये नम: शृंखला <<सप्त गाथा – पासुरम् ५ परिचय विळाञ्जोलैप् पिळ्ळै अवलोकन कर रहे हैं  कि पेरिय पेरुमाळ् दयापूर्वक कह ​​रहे हैं, “यद्यपि संसारियों (सांसारिक जन) के बीच विद्यमान हैं जो पूर्णत: इन चार दृष्टिकोण में व्यस्त हैं (आचार्य के प्रति प्रेम नहीं रखते, स्वयं से … Read more

सप्त गाथा – पासुरम् ५

श्री: श्रीमते शठकोप नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमद् वरवर मुनये नम: शृंखला <<सप्त गाथा – पासुरम् ४ परिचय विळाञ्जोलैप् पिळ्ळै कह रहे हैं “जिस प्रकार निर्देश प्राप्त करने वाले शिष्य में अपने आचार्य के प्रति आस्था की कमी होने पर उसका स्वभाव नष्ट हो जाता है, उसी तरह निर्देश देने वाले आचार्य का भी स्वभाव … Read more