आऴ्वार्/आचार्यों के वाऴि तिरुनामम् – गोदाम्बा (आण्डाळ्) – सरल व्याख्या

श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नमः

पूरी श्रृंखला

<< पूर्व

गोदाम्बा (आण्डाळ्) की महिमाएँ

श्री आण्डाळ् नाच्चियार् को कोदै नाच्चियार् (गोदाम्बा) के रूप में सम्मानित किया जाता है। वे श्रीविल्लिपुत्तूर् में विष्णुचित्त (पॆरियाऴ्वार्) की पुत्री के रूप में अवतीर्ण हुईं। वे भूमि देवी का अवतार हैं। उनका स्नेह भगवान (एम्पेरुमान्) के प्रति स्वाभाविक है। वे भगवान की दिव्य पत्नी का स्थान धारण करती हैं। गोदाम्बा का जन्म-नक्षत्र आषाढ़ मास (आडि मास तमिऴ् में) के पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र (पूरम् नक्षत्र तमिऴ् में) (तिरुवाडिप्पूरम्) अत्यन्त प्रसिद्ध है। गोदाम्बा द्वारा रचित दो प्रबन्ध हैं- तिरुप्पावै और नाच्चियार् तिरुमॊऴि। गोदाम्बा कृष्णावतार में पूर्णतः निमग्न थीं। वे समस्त आत्माओं के उत्थान के लिए इस पृथ्वी पर अवतीर्ण हुईं और हम सबका कल्याण किया। उन्होंने हमें तिरुप्पावै का उपहार प्रदान किया, जिसके माध्यम से उन्होंने भगवान के दिव्य नामों का गान करके हमारे आध्यात्मिक उत्थान का मार्ग दिखाया। श्री वरवरमुनि (मणवाळ मामुनिगळ्) अपने उपदेस रत्तिनमालै ग्रंथ में उनकी स्तुति इस प्रकार करते हैं- “पिञ्जाय्प् पऴुत्ताळै, आण्डाळै नाळुम् वऴुत्ताय् मनमे! मगिऴ्न्दु”| वे आगे उनका गुणगान इस प्रकार करते हैं- “इन्ऱो तिरुवाडिप्पूरम्, ऎमक्काग अन्ऱो इङ्गु आण्डाळ् अवतरित्ताळ् ,वैकुण्ठ वान् भोगम् तन्नै इगऴ्न्दु आऴ्वार् तिरुमगळराय्”| “पिञ्जाय्प् पऴुत्ताळै” का अर्थ है कि उन्होंने केवल ५ वर्ष की कोमल आयु में तिरुप्पावै की रचना की। उनका भगवान के प्रति अत्यन्त गहरा भक्तिभाव था। विष्णुचित्त द्वारा भगवान के लिए बनाई गई पुष्पमाला को वे पहले स्वयं धारण करतीं और उसके पश्चात् उसे भगवान को अर्पित करतीं। इसी कारण वे “सूडिक् कॊडुत्त सुडर्क्कॊडि” के नाम से प्रसिद्ध हुईं।

गोदाम्बा वाऴि तिरुनामम्

तिरुवाडिप् पूरत्तिल् सॆगत्तुदित्ताळ् वाऴिये
तिरुप्पावै मुप्पदुम् सॆप्पिनाळ् वाऴिये
पॆरियाऴ्वार् पॆट्रॆडुत्त पॆण्पिळ्ळै वाऴिये
पॆरुम्पूदूर् मामुनिक्कुप् पिन्नानाळ् वाऴिये
ऒरु नूट्रु नाऱ्-पत्तु मून्ऱुरैत्ताळ् वाऴिये
उयर् अरङ्गर्क्के कण्णि उगन्दळित्ताळ् वाऴिये
मरुवारुन् तिरुमल्लि वळनाडि वाऴिये
वण्पुदुवै नगर्क् कोदै मलर्प् पदङ्गळ् वाऴिये

तिरुवाडिप् पूरत्तिल् सॆगत्तुदित्ताळ् वाऴिये – 

आषाढ़ (आडि) मास के शुभ पूर्वाफाल्गुनी (पूरम्) नक्षत्र के दिन इस पृथ्वी पर अवतीर्ण होने वाली वे दिव्य माता लंबे समय तक जीवित रहें!

तिरुप्पावै मुप्पदुम् सॆप्पिनाळ् वाऴिये – 

उन्होंने तिरुप्पावै नामक एक प्रबन्ध की रचना की, जिसमें ३० पाशुर हैं। इन पाशुरों का अध्ययन प्रत्येक मनुष्य के लिए अवश्य करना चाहिए। ऐसा कहा जाता है कि जिन्होंने तिरुप्पावै का श्रवण नहीं किया, वे पृथ्वी पर भार के समान माने जाते हैं। हमें ऐसा गौरवशाली तिरुप्पावै प्रदान करने वाली गोदाम्बा लंबे समय तक जीवित रहें!

पॆरियाऴ्वार् पॆट्रॆडुत्त पॆण्पिळ्ळै वाऴिये – 

पॆरियाऴ्वार् की पुत्री के रूप में अवतीर्ण होने वाली गोदाम्बा लंबे समय तक जीवित रहें!

पॆरुम्पूदूर् मामुनिक्कुप् पिन्नानाळ् वाऴिये – 

ऎम्पॆरुमानार् श्री रामानुजाचार्य को श्रीपॆरुम्पूदूर् मामुनिवर् (भूतपुरी क्षेत्र के महान मुनि) के रूप में सम्मानित किया जाता है। एक अत्यन्त रोचक घटना के कारण श्री गोदाम्बा को उनकी छोटी बहन के रूप में भी सम्मानित किया जाता है। नाच्चियार् तिरुमॊऴि के अपने “नाऱु नऱुम्पॊऴिल्” पाशुर में, गोदाम्बा ने तिरुमालिरुञ्चोलै स्थित श्री कळ्ळऴगर् (सुंदरबाहु) भगवान को १०० पात्र (तडा) मक्खन तथा अन्य १०० पात्र अक्कार अडिसिल् नामक मधुर पॊङ्गल् अर्पित करने की इच्छा व्यक्त की थी। जब रामानुजाचार्य तिरुमालिरुञ्चोलै अऴगर् भगवान के मङ्गळाशासन के लिए गए, तब उन्हें गोदाम्बा की यह इच्छा स्मरण हुई और उन्होंने १०० पात्रों में मक्खन तथा १०० पात्रों में मधुर पॊङ्गल् अर्पित करके उनकी प्रतिज्ञा पूर्ण की। इसके पश्चात् वे वटपत्रशायि, रङ्गमन्नार् तथा श्री गोदाम्बा के मङ्गळाशासन के लिए श्रीविल्लिपुत्तूर् पहुँचे। उस समय श्री गोदाम्बा ने, अर्चावतार के स्वभाव के विपरीत, भाष्यकार (रामानुजाचार्य) को “वारुम् कोयिल् अण्णरे!” (“कोयिल् से पधारे हुए प्रिय बड़े भाई, आपका स्वागत है!”) कहकर संबोधित किया। यहाँ “कोयिल्” से अभिप्राय श्रीरङ्गम् है। क्योंकि रामानुजाचार्य ने उनकी इच्छा उसी प्रकार पूर्ण की, जैसे कोई बड़ा भाई अपनी छोटी बहन की इच्छा पूर्ण करता है, इसलिए उन्होंने उन्हें “बड़े भाई” का सम्मान प्रदान किया। पॆरुम्पूदूर् मामुनि (ऎम्पॆरुमानार्/रामानुजाचार्य) की छोटी बहन के रूप में स्वयं को मानने वाली गोदाम्बा चिरकाल तक जीवित रहें!

ऒरु नूट्रु नाऱ्-पत्तु मून्ऱुरैत्ताळ् वाऴिये – 

गोदाम्बा ने नाच्चियार् तिरुमॊऴि नामक १४३ पाशुरों के संग्रह की रचना की। उन्होंने भगवान से वियोग के कारण अपने दुःख को तथा तिरुप्पावै पाशुरों के माध्यम से भगवान को शरण ग्रहण करने की अपनी इच्छा प्रकट करने के पश्चात् भी भगवान ने उन्हें स्वीकार नहीं किया, इस निराशा को अत्यन्त सुंदर रूप से व्यक्त किया। हमें नाच्चियार् तिरुमॊऴि के १४३ पाशुर प्रदान करने वाली गोदाम्बा सदा जीवित रहें!

उयर् अरङ्गर्क्के कण्णि उगन्दळित्ताळ् वाऴिये – 

उन्होंने पॆरिय पॆरुमाळ् श्री रङ्गनाथ के प्रति अत्यन्त भक्ति के कारण सुंदर पुष्पमालाएँ अर्पित कीं, जिन्हें उन्होंने पहले स्वयं धारण किया था। श्री रङ्गनाथ को अर्पित करने से पहले वे उस माला को पहनती थीं। उन्होंने प्रेमपूर्वक उस माला को धारण किया, क्योंकि उन्होंने अनुभव किया कि उनसे धारण की हुई माला को भगवान द्वारा उत्सुकता से स्वीकार किया गया। ऐसी गोदाम्बा सदा जीवित रहें!

मरुवारुम् तिरुमल्लि वळनाडि वाऴिये – 

श्रीविल्लिपुत्तूर् के आसपास के क्षेत्रों को “तिरुमल्लि वळनाडि” कहा जाता है, जैसे आऴ्वार् तिरुनगरि के आसपास के क्षेत्रों को पहले “तिरुवऴुदि वळनाडि” कहा जाता था। ऐसी सुवासित तिरुमल्लि वळनाडि से संबंधित गोदाम्बा सदा जीवित रहें!

वण्पुदुवै नगर् कोदै मलर्प् पदङ्गळ् वाऴिये – 

उत्तम उदारता से युक्त और श्रीविल्लिपुत्तूर् नगर से संबंधित गोदाम्बा के दिव्य कमल समान श्रीचरण सदा जीवित रहें!

इस प्रकार गोदाम्बा के वाऴि तिरुनामम् का समापन होता है।

अडियेन् जानकी रामानुज दासी

आधार – https://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2025/12/vazhi-thirunamams-andal-simple/

संगृहीत- https://divyaprabandham.koyil.org

प्रमेय (लक्ष्य) – https://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – https://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – https://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

Leave a Comment