आऴ्वार्/आचार्यों के वाऴि तिरुनामम् – विष्णुचित्त स्वामी – सरल व्याख्या

श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नमः

पूरी श्रृंखला

<<पूर्व

विष्णुचित्त स्वामी (“पॆरियाऴ्वार्”) का जन्मस्थान श्रीविल्लिपुत्तूर् है। उन्होंने श्रीमन् नारायण के परत्व को स्थापित किया। मदुरै की राजसभा में, विष्णुचित्त स्वामी ने वेदों के अनेक वाक्यों को प्रस्तुत करके भगवान (ऎम्पॆरुमान्) श्रीमन् नारायण की परम श्रेष्ठता को सिद्ध किया। विष्णुचित्त स्वामी का जन्म नक्षत्र स्वाति है, जो तमिऴ् मास आनि में आता है। उनके प्रबन्धों में तिरुप्पल्लाण्डु तथा ‘पॆरियाऴ्वार् तिरुमॊऴि’ सम्मिलित हैं। वे सदा कृष्णावतार में पूर्ण रूप से निमग्न थे। ‘पॆरियाऴ्वार् तिरुमॊऴि’ में, उन्होंने माता यशोदा की भावना में कृष्ण पर अनेक पाशुर गाए हैं। उन्होंने हमें भगवान् के लिये मङ्गळाशासन करने का महत्व प्रकट किया। भगवान को देखकर, उन्होंने मातृस्नेह तथा वात्सल्य के साथ अपने आशीर्वचन अर्पित किये। विष्णुचित्त स्वामी तथा अन्य आऴ्वारों के बीच एक मुख्य भेद यह है कि, जब अन्य आऴ्वार् भगवान का दर्शन करते हैं, तब वे उनसे संसार से मुक्त करने की प्रार्थना करते हैं, क्योंकि संसार में रहना उनके लिये अत्यन्त कष्टकर है। किन्तु विष्णुचित्त स्वामी, भगवान का दर्शन करते ही, यह सोचकर चिन्तित हो गए कि भगवान इस संकटपूर्ण संसार में पधारे हैं, और उन्होंने उनकी रक्षार्थ अपने मङ्गळाशासन अर्पित किये। यद्यपि विष्णुचित्त स्वामी ने भगवान के परत्व को स्थापित किया, तथापि जब भगवान प्रत्यक्ष रूप में पधारे, तब भगवान केवल उनकी कोमलता, यौवन, सौम्य गुणों और उनकी सुकुमार शोभा का ही चिन्तन कर सके, जिसे हमारे नेत्र पूर्ण रूप से ग्रहण नहीं कर सकता। वे इस बात से अत्यन्त चिन्तित हो गए कि कहीं इस लोक के संकटों से भगवान को कोई कष्ट न पहुँचे, और इसी कारण वे माता के समान उनके कल्याण तथा कुशलता के लिये आशीर्वचन करने लगे।

पॆरियाऴ्वार् वाऴि तिरुनामम्

नल्ल तिरुप्पल्लाण्डु नान्मून्ऱोन् वाऴिये
नानूट्रु अऱुपत्तॊन्ऱुम् नमक्कुरैत्तान् वाऴिये
सॊल्लरिय आनि तनिल् सोदि वन्दान् वाऴिये
तॊडै सूडिक् कॊडुत्ताळ् तान् तॊऴुन्म् तमप्पन् वाऴिये
सॆल्वनम्बि तन्नैप्पोल् सिरप्पुट्रान् वाऴिये
सॆन्ऱु किऴि अऱुत्तु माल् दॆय्वम् ऎन्ऱान् वाऴिये
विल्लिपुत्तूर् नगरत्तै विळङ्ग वैत्तान् वाऴिये
वेदियर्कोन् पट्टर्पिरान् मेदिनियिल् वाऴिये

विष्णुचित्त स्वामी वाऴि तिरुनामम् -सरल व्याख्या

नल्ल तिरुप्पल्लाण्डु नान्मून्ऱोन् वाऴिये

“नल्ल” का अर्थ है श्रेष्ठ या विशिष्ट। “तिरुप्पल्लाण्डु” विष्णुचित्त स्वामी द्वारा रचित तिरुप्पल्लाण्डु पाशुरों का समूह है। “नान्मून्ऱोन्” का अर्थ है “नान् (चार) × मून्ऱु (तीन)” अर्थात बारह दिव्य पाशुरों को प्रदान करने वाले। “वाऴिये” का अर्थ है “दीर्घायु हो” या “विजयी रहें”। विष्णुचित्त स्वामी ने भगवान पर बारह उत्कृष्ट तिरुप्पल्लाण्डु पाशुरों की रचना की। यह रचना इस बात को दर्शाती है कि विष्णुचित्त स्वामी ने सभी भक्तों को एकत्र करके पॆरुमाळ् के लिये मङ्गळाशासन करने का उपदेश दिया। मणवाळ माऴमुनिगळ् ने अपने “उपदेश रत्नमालै” में तिरुप्पल्लाण्डु की अत्यन्त महिमा का वर्णन किया है। वे कहते हैं क “वेदत्तुक्कु ओम् ऎन्नुम् अदु पोल् उळ्ळदुक्कॆल्लाम् सुरुक्काय्” — अर्थात् जैसे वेदों का सार प्रणव (ॐ) है, वैसे ही समस्त दिव्यप्रबन्धों का सार तिरुप्पल्लाण्डु है। वे आगे कहते हैं: “उण्डो तिरुप्पल्लाण्डुक्कु ऒप्पदोर् कलैदान्” — अर्थात् तिरुप्पल्लाण्डु के समान कोई अन्य रचना नहीं है। आज भी सभी सेवाकाल गोष्ठियों (जहाँ श्रीवैष्णव मिलकर दिव्यप्रबन्ध का पारायण करते हैं) का आरम्भ और समाप्ति तिरुप्पल्लाण्डु से ही होता है। ऐसी इसकी महिमा है। अतः विष्णुचित्त स्वामी की जय हो, जिन्होंने हमें यह दिव्य रचना प्रदान की है।

नानूट्रु अऱुपत्तॊन्ऱुम् नमक्कुरैत्तान् वाऴिये

“नानूट्रु” का अर्थ है चार सौ (४००), “अऱुपत्तॊन्ऱुम्” का अर्थ है इकसठ (६१), और “नमक्कुरैत्तान्” का अर्थ है “हमारे लिये उन्होंने बताया” (नमक्कु = हमारे लिये, उरैत्तान् = उन्होंने कहा/उपदेश दिया)। 

विष्णुचित्त स्वामी द्वारा हमें प्रदान किया गया एक अन्य दिव्य प्रबन्ध “पॆरियाऴ्वार् तिरुमॊऴि” है। इसमें ४६१ पाशुर हैं। ये पाशुर विष्णुचित्त स्वामी के कृष्णानुभव का दिव्य प्रवाह हैं। जैसे माता यशोदा ने कृष्ण के बाल्यकाल में उनके प्रत्येक छोटे-छोटे कार्य और लीलाओं का अनुभव किया, वैसे ही विष्णुचित्त स्वामी ने भी कृष्ण को उसी भाव से अनुभव किया और उसे इन पाशुरों के माध्यम से व्यक्त किया। ऐसे महान विष्णुचित्त स्वामी की जय हो।

सॊल्लरिय आनि दनिल् सोदि वन्दान् वाऴिये

“सॊल्लरिय” का अर्थ है जो शब्दों से वर्णन नहीं किया जा सकता (अर्थात् अवर्णनीय)। “आनि तनिल्” का अर्थ है तमिऴ् मास आनि (ज्येष्ठ मास) में। “सोदि”– यहाँ स्वाति नक्षत्र को सूचित करता है, जो विष्णुचित्त स्वामी का जन्म नक्षत्र है। “वन्दान्” का अर्थ है “आए” या “अवतार लिये”।

आनि मास (तमिऴ् पंचाङ्ग का आनि मास, जो जून मध्य से जुलाई मध्य तक होता है) तथा स्वाति नक्षत्र की महिमा, जिसमें विष्णुचित्त स्वामी इस पृथ्वी पर अवतरित हुए, साधारण शब्दों में व्यक्त नहीं की जा सकती। आनि–स्वाति के शुभ योग में अवतरित हुए ऐसे महिमामय विष्णुचित्त स्वामी की जय हो।

तॊडै सूडिक् कॊडुत्ताळ् तान् तॊऴुन्म् तमप्पन् वाऴिये

“तॊडै” का अर्थ है पुष्पों की माला। “सूडिक् कॊडुत्ताळ्” का अर्थ है जिसने माला को पहले स्वयं धारण करके फिर भगवान को अर्पित किया- यह गोदाम्बा (श्री गोदाम्बा) का विशेष स्वरूप है। “तान्” यहाँ स्वयम् के अर्थ में है। “तॊऴुम्” का अर्थ है वन्दना करना या आराधना करना। “तमप्पन्” का अर्थ है पिता, अर्थात् विष्णुचित्त स्वामी।

गोदादेवी (गोदाम्बा) को “सूडिक् कॊडुत्तवळ्” कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने पहले स्वयं धारण की हुई माला को ही भगवान को समर्पित किया। ऐसे दिव्य स्वरूप वाली गोदाम्बा अपने पिता विष्णुचित्त स्वामी की उपासना करती हैं। विष्णुचित्त स्वामी केवल उनके पिता ही नहीं, अपितु उनके आचार्य भी हैं। बाल्यकाल से ही विष्णुचित्त स्वामी ने उन्हें कृष्णलीला की कथाओं द्वारा भक्ति का उपदेश दिया और भगवान के विषय में सब कुछ सिखाया। इसलिए गोदाम्बा उन्हें अपने पिता तथा आचार्य दोनों रूपों में वन्दना करती हैं। कुछ स्थानों पर यह पंक्ति इस प्रकार भी कही जाती है- “तॊडै सूडिक् कॊडुत्ताळै तॊऴुम् तमप्पन् वाऴिये”– जिसमें वन्दना का सम्बन्ध उल्टा दर्शाया जाता है, अर्थात् विष्णुचित्त स्वामी उस गोदाम्बा की वन्दना करते हैं जिन्होंने माला स्वयं पहनकर भगवान को अर्पित की। क्योंकि गोदा देवी भगवान की दिव्य भार्या हैं, उन्हें सभी के लिये मातृस्वरूपा माना जाता है। इसी दृष्टि से विष्णुचित्त स्वामी को वह पिता कहा जाता है जो उस दिव्य मातृस्वरूपा गोदाम्बा की वन्दना करते हैं। ऐसे विष्णुचित्त स्वामी की जय हो।

सॆल्वनम्बि तन्नैप्पोल् सिरप्पुट्रान् वाऴिये

सॆल्वनम्बि मदुरै के राजा की सभा में मंत्री थे। वे एक महान श्रीवैष्णव थे। उनकी महिमा विष्णुचित्त स्वामी तिरुमॊऴि में तिरुक्कोट्टियूर् पॆरुमाळ् पर गाए गए एक दशक/पदिगम् (दस पाशुरों के समूह) में वर्णित है।

विष्णुचित्त स्वामी उन्हें “नळिर्न्द सीलन्, नयासलन्” कहकर स्तुति करते हैं, जिसका अर्थ है- जो सदा शान्त और करुणामय स्वभाव वाले हैं तथा जो सदैव धर्म और न्याय के मार्ग का पालन करते हैं। सॆल्वनम्बि और उनकी पत्नी दोनों ही महान श्रीवैष्णव थे, जो भगवान के भक्तों के प्रति अत्यन्त स्नेहपूर्ण थे। यदि विष्णुचित्त स्वामी किसी की महिमा का गान करते हैं, तो उनकी महानता का अनुमान भी अकल्पनीय ही है। ऐसी है सॆल्वनम्बि की महिमा, और विष्णुचित्त स्वामी स्वयं भी उतने ही महिमामय हैं। ऐसे विष्णुचित्त स्वामी की जय हो।

सॆन्ऱु किऴि अऱुत्तु माल् दॆय्वम् ऎन्ऱान् वाऴिये

“किऴि” यहाँ उस पुरस्कार-थैली को सूचित करता है। “अऱुत्तु” का अर्थ है काटना या खोलना (यहाँ प्रतीकात्मक रूप से प्राप्ति का संकेत)। “माल्” श्रीमन् नारायण (श्री महालक्ष्मी के पति)। “दॆय्वम्” का अर्थ है भगवान्। “ऎन्ऱान्” का अर्थ है जिसने यह घोषित किया कि वे ही परम देव हैं। 

जब विष्णुचित्त स्वामी राजा की सभा में श्रीमन् नारायण के परत्व को स्थापित करने के लिये गए, तब ऊँचाई पर लटकाया गया स्वर्ण-मुद्राओं से भरा थैली (पुरस्कार) स्वतः ही नीचे आकर विष्णुचित्त स्वामी के हाथों में आ गया। ऐसे विष्णुचित्त स्वामी की जय हो जिन्होंने यह सिद्ध किया कि श्रीमन् नारायण ही समस्त जगत् के परम देव हैं।

विल्लिपुत्तूर् नगरत्तै विळङ्ग वैत्तान् वाऴिये

“विल्लिपुत्तूर्” का अर्थ है श्रीविल्लिपुत्तूर्। “नगरत्तै” का अर्थ है नगर को। “विळङ्ग” का अर्थ है महिमामय या प्रकाशमान होना। “वैत्तान्” का अर्थ है जिन्होंने ऐसा बनाया। 

विष्णुचित्त स्वामी के अवतार लेने के कारण श्रीविल्लिपुत्तूर् दिव्यदेश को महान महिमा प्राप्त हुई। जब गोदाम्बा भी विष्णुचित्त स्वामी की पुत्री के रूप में श्रीविल्लिपुत्तूर् में अवतरित हुईं, तब उस दिव्यदेश की महिमा और भी बढ़ गई। जिस प्रकार देवकी ने कृष्ण को जन्म दिया, किन्तु माता यशोदा ने उनका पालन-पोषण करके समस्त महिमा प्राप्त की, उसी प्रकार विष्णुचित्त स्वामी ने श्रीविल्लिपुत्तूर् में गोदाम्बा का पालन-पोषण करके महान महिमा प्राप्त की तथा श्रीविल्लिपुत्तूर् को भी गौरवान्वित किया। ऐसे विष्णुचित्त स्वामी की जय हो।

वेदियर्कोन् पट्टर्पिरान् मेदिनियिल् वाऴिये

“वेदियर्कोन्” का अर्थ है ब्राह्मणों (वेदियर) के नेता (कोन्)। “पट्टर्पिरान्” विष्णुचित्त स्वामी का एक सम्मानसूचक नाम है, जिसका अर्थ है कि वे सभी विद्वान् पण्डितों में श्रेष्ठ हैं। “मेदिनियिल्” का अर्थ है इस संसार में। 

“वेदियर् कोन्” का अर्थ है वे जो समस्त ब्राह्मणों के नेता हैं। विष्णुचित्त स्वामी समस्त शास्त्रों के महान् आचार्य और विद्वान् हैं। वे सभी विद्वान् पण्डितों के श्रेष्ठ व्यक्ति हैं, इसी कारण उन्हें “पट्टर्पिरान्” कहा जाता है। ऐसे विष्णुचित्त स्वामी की इस संसार में जय हो। इस प्रकार विष्णुचित्त स्वामी का वाऴि तिरुनामम् समाप्त होता है।

अडियेन् जानकी रामानुज दासी

आधार – https://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2025/07/vazhi-thirunamams-periyazhwar-simple/

संगृहीत- https://divyaprabandham.koyil.org

प्रमेय (लक्ष्य) – https://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – https://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – https://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org