आऴ्वार्/आचार्य वाऴि तिरुनामम् – सरल व्याख्या

श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नमः

किसी भी प्रबंधम् के अध्ययन करते समय, हमें उसके ३ मुख्य लक्षणों को देखना चाहिए – 

  1. वक्तृ वैलक्षण्यम् – रचयिता का वैभव
  2. प्रबंध वैलक्षण्यम् – निर्माण किए गए प्रबंध का वैभव 
  3. विषय वैलक्षण्यम् – समझाए ग‌ए विषय का‌ वैभव

वक्तृ वैलक्षण्यम् प्रबंध रचयिता की महानता, विशेष कौशल और गुणों को दर्शाता है। प्रबंध वैलक्षण्यम् उस साहित्यिक कार्य की महानता को दर्शाता है। विषय वैलक्षण्यम् विषय-वस्तु की महानता को दर्शाता है। 

वाऴि तिरुनामम् वे कविताएँ हैं जो किसी आऴ्वार् या आचार्य को गौरवान्वित करती हैं और सरल तमिऴ् भाषा में लिखी गई हैं जिसके कारण वे समझने में सुलभ हैं। अधिकतर वाऴि तिरुनामम् अप्पिळ्ळै (प्रणतार्तिहराचार्य) नामक आचार्य द्वारा लिखे गए हैं। 

अप्पिळ्ळै का वैभव (महानता) – वक्तृ वैलक्षण्यम्:

अप्पिळ्ळै स्वामी का‌ जन्म नाम प्रणतार्तिहर है। वे‌ श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के आठ प्रधान‌ शिष्यों (जो अष्ट दिग्गज कहलाते हैं) में से एक हैं। उन आठ प्रधान‌ शिष्यों ने अनेक मठ अथवा तिरुमाळिगै की स्थापना कर श्रीवैष्णव संप्रदाय को दूर-दूर तक प्रचार करने का महान उत्तरदायित्व संभाला। अप्पिळ्ळार्‌ नामक दूसरे आचार्य से अप्पिळ्ळै अपृथक रहे। अप्पिळ्ळै किस प्रकार श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के श्रीचरणों में शरणागत होकर उनकी नेतृत्व में सेवा करते हैं, इस वैभव का यतीन्द्र प्रवण प्रभावम् में बड़ी रोचक भाव से वर्णित है। इनके अतीत पर अधिक जानकारी प्राप्त नहीं है। 

वह संप्रदाय का सुवर्ण काल (नल्लडिक् कालम्) था। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी श्रीरङ्गम् में अपने शिष्यों सहित विराजमान थे और उनकी गौरवशाली महिमा‌ सुनकर बड़ी संख्याओं में श्रीवैष्णव आचार्य उनके श्रीचरणों में शरणागति करने श्रीरङ्गम् आया करते थे। इसी समय में अप्पिळ्ळार् एवं अप्पिळ्ळै क‌ई वादों में अन्य सिद्धांतों के अनेक पण्डितों पर विजय पाकर श्रीवैष्णव सिद्धांत को सुस्थापित कर श्रीरङ्गम् आ पहुँचे। 

अप्पिळ्ळार् एवं अप्पिळ्ळै श्री देवराज गुरू (एऱुम्बि अप्पा) के निकट संबंधी थे,‌ जो श्रीवरवरमुनि के अष्ट दिग्गजों में से एक और घटिकाचल (शोळिंगर्) के समीप ऎऱुम्बि नामक‌ गाँव से थे। देवराज गुरू ने श्री वरवरमुनि दिनचर्या, विलक्षण मोक्ष अधिकार निर्णयम्, श्री वरवरमुनि शतकम् आदि ग्रंथों की रचना की। उन दोनों को देवराज गुरू से वरवरमुनि स्वामी की महानता के विषय में बोध होता है और वरवरमुनि स्वामी के शिष्य बनने की इच्छा होती है। तदुपरान्त श्री तोताद्री जीयर् (प्रथम) (पॊन्नडिक्काल् जीयर) से भी उनकी भेंट होती है, जो श्रीवरवरमुनि स्वामी के प्रधान शिष्य हैं। तोताद्रि जीयर् ने श्री वरवरमुनि स्वामी की महानता से अवगत कराया और बताया कि अप्पिळ्ळार् व अप्पिळ्ळै स्वयं महान पण्डित होने के कारण वे श्रीवरवरमुनि स्वामी की इस महानता को सहज समझ जाएँगे कि वे स्वयं आदिशेष का अवतार और रामानुजाचार्य का पुनरवतार हैं। इसके पश्चात, तोताद्रि जीयर् उन्हें वरदगुरु (कोयिलण्णन्), जो श्री वरवरमुनि स्वामी के निष्ठावान शिष्य हैं, उनके निवास स्थान पर ले जाकर उन दोनों को आगे समझाते हैं कि श्री वरवरमुनि स्वामी और उनकी रचनाओं का महत्त्व क्या है! अप्पिळ्ळार् व अप्पिळ्ळै श्रीवरवरमुनि स्वामी के श्रीचरणों का आश्रय लेकर शरणागत होकर उनके शिष्य बन जाते हैं, और आगे चलकर वे दोनों उनके प्रधान आठ शिष्यों (अष्ट दिग्गज) में सम्मिलित हो जाते हैं।

अप्पिळ्ळै ने आऴ्वारों के लिए और सम्प्रदाय प्रवर्तक आचार्यों के लिए वाऴि तिरुनामम् की रचना की। उन्होंने सारे तिरुवन्दादि का टीकाकरण किया है। उन्होंने और भी कई सारे प्रबन्धम् और ग्रंथ लिखे हैं। वाऴि तिरुनामम् उनकी सुप्रतिष्ठित कृति है। वे प्रेम और भक्तिपूर्वक अपने आचार्य के निकट रहकर सम्प्रदाय के वैभव के लिए सेवारत रहे। 

यद्यपि क‌ई सारे वाऴि तिरुनामम् अप्पिळ्ळै की कृतियाँ हैं, परंतु कुछ वाऴि तिरुनामम्, उदाहरण के लिए “सीरारुम् यतिरासर्…” रामानुजाचार्य के लिए श्री वरवरमुनि स्वामी ने रचाई है। इसलिए, हम देख सकते हैं कि कुछ आचार्यों के वाऴि तिरुनामम् किसी और ने रची हो, परंतु अधिकांश अप्पिळ्ळै द्वारा ही ही रचाए ग‌ए हैं। इस प्रकार, हमने वक्तृ वैलक्षण्यम् (लेखक की महानता) देखा।

प्रबंध-काव्य की महानता – प्रबंध वैलक्षण्यम्

यह जानना आवश्यक है कि वाऴि तिरुनामम् क्या हैं और उनका क्या महत्व है। “वाऴि” एक ऐसा शब्द है जो मंगलाशासन को दर्शाता है। वाऴि, नमः, पोट्रि, जय शब्द यह दर्शाते हैं कि हम किसी पूजनीय व्यक्ति के प्रति मंगलाशासन कर रहे हैं। मंगलाशासन किसी व्यक्ति के लिए हृदय से शुभकामनाएँ व्यक्त करता है, यह कामना करता है कि वह व्यक्ति स्वस्थ रहे। यह उन पर सभी श्रेष्ठताओं को वर्षाव करने की कामना है। हमारे पूर्वाचार्य, विशेष रूप से पिळ्ळै लोकाचार्य ने अपने ग्रंथ श्री वचन भूषणम में इसके बारे में बताया है।

मंगलाशासनम् कौन कर सकता है?

क्या आयु, पद और गुणों में बड़े व्यक्तियों का मंगलाशासन किया जा सकता है? कोई यह प्रश्न कर सकता है कि क्या हम जैसे सामान्य लोगों के पास “सीरारुम् एतिरासर् तिरुवडिगळ् वाऴि” जैसे शब्दों के साथ रामानुजाचार्य का मंगलाशासन करने की योग्यता और पात्रता है! पिळ्ळै लोकाचार्य ने अपने श्री वचन भूषणम दिव्य शास्त्र में ऐसे सवालों का जवाब दिया है।

यह कार्य अनुराग  से किया जाता है। उदाहरण के लिए, पॆरियाऴ्वार् ने एम्पेरुमान के लिए “पल्लाण्डु , पल्लाण्डु ” गाया है। वह सवाल उठाते हैं और खुद ही उसका उत्त्तर  देते हैं – “क्या एम्पेरुमान के लिए पल्लाण्डु, पल्लाण्डु गाना और उनकी भलाई की कामना करना स्वीकार्य है?” जब हम सच्चे ज्ञान में स्थापित होते हैं, तो उस समय हमें ज्ञान दशा में कहा जाता है। उन क्षणों में, हम पूर्णतः जानते हैं कि वह हमारे रक्षक हैं और हम सभी उनके द्वारा संरक्षित हैं और हम उनसे प्रार्थना करते हैं। हम उनकी सेवा (कैंकर्यम) करने की इच्छा रखते हैं।

हालाँकि, पॆरियाऴ्वार् सच्चे प्रेम – प्रेम दशा में स्थापित थे। भगवान के प्रति उनकी भावनाएँ यशोदा पिराट्टी की कृष्ण भगवान के प्रति भावनाओं जैसी थीं। उस अवस्था से भगवान का भला चाहना और उनके लिए पल्लाण्डु गाना उचित है। जब हमें किसी से प्यार होता है और हम उनका भला चाहते हैं, तो हम मंगलाशासन कर सकते हैं कि वे अच्छे रहें। यह उचित है और इसका मतलब यह नहीं है कि हम खुद को उनसे बड़ा मान रहे हैं और वे हमसे छोटे हो गए हैं! हम उनकी सेवा में रहते हैं, लेकिन अपने उमड़ते हुए स्नेह (पॊङ्गुम् परिवु) के कारण, हम उनके लिए पल्लाण्डु गाते हैं! पॆरियाऴ्वार् अपने उमड़ते हुए स्नेह (पॊङ्गुम् परिवु) के कारण भगवान के लिए पल्लाण्डु गाते हैं और इसलिए यह स्वीकार्य और उचित है।

किसी विद्वान व्यक्ति का मंगलाशासन करना, यह कहते हुए कि “स्वामी महाराज सौ वर्ष तक जीवित रहें! जय हो, जय हो (पोट्रि, वाऴि)” आदि, यह किसी के सच्चे स्वभाव (स्वरूपम) के अनुसार होगा। जब ऐसा विद्वान व्यक्ति अच्छे से और दीर्घायु रहता है, तो ऐसे व्यक्ति के कारण संसार के सभी लोगों को समृद्धि मिलती है। इसलिए, हर कोई बिना किसी झिझक के मंगलाशासन कर सकता है। अप्पिळ्ळै द्वारा रचित वाऴि तिरुनामम् के सहायता से, हम भी उचित अवसरों/दिनों पर मंगलाशासन कर सकते हैं। हमारे बड़ों की यही व्यवस्था है।

अगर हम वाऴि तिरुनामम् की रचनाओं को देखें, तो उन आऴ्वार्/आचार्य के दिव्य सौन्दर्य, उनके कार्य, उनके द्वारा किये गए उत्कृष्ट कैंकर्य आदि समाविष्ट हैं। वाऴि तिरुनामम् का अध्ययन करते समय, हम उनकी श्रेष्ठता, हमारे कल्याण के लिए उनके योगदान का स्मरण कर पाते हैं और इससे उनके प्रति कृतज्ञता की भावना विकसित होती है। उनकी निःस्वार्थ सेवाओं, योगदानों, उनके कैंकर्य का स्मरण करते हुए, हम ऐसे श्रेष्ठ आचार्यों और आऴ्वारों के संबंध प्राप्त करने की कृतज्ञता प्रकट करते हैं। यह हमारे संप्रदाय के लिए उनके द्वारा किये गए उत्कृष्ट कैंकर्य का स्मरण भी करवाता है और उन्हें उचित सम्मान देता है। इन सभी कारणों से वाऴि तिरुनामम् का अध्ययन करना महत्त्वपूर्ण हो जाता है।

कोई वाऴि तिरुनामम् का अध्ययन कब कर सकता है?

कोई भी व्यक्ति उस दिन के नक्षत्र के आधार पर प्रति दिन वाऴि तिरुनामम् का अध्ययन कर सकता है और उनके‌ वार्षिक जन्म नक्षत्र के अनुसार आऴ्वार्/आचार्य वाऴि तिरुनामम् का अध्ययन कर सकता है। उदाहरण के लिए, हम आर्द्रा के दिन रामानुजाचार्य के वाऴि तिरुनामम् का जाप कर सकते हैं। पुनर्वसु के दिन, कोई कुलशेखर आऴ्वार्, मुदलियाण्डान् (दाशरथि स्वामी), पॊन्नडिक्काल् जीयर् (प्रथम तोताद्री जीयर्) आदि के वाऴि तिरुनामम् का जाप कर सकता है। हम हर महीने सभी आऴ्वार्‌ और आचार्यों के लिए उनके संबंधित तिरुनक्षत्र के दिनों में ऐसा कर सकते हैं। यह प्रथा आज भी कई सन्निधियों (मंदिरों) में प्रचलित है। वार्षिक तिरुनक्षत्रम् के दिन, संबंधित आऴ्वार् और आचार्य के लिए सभी सन्निधियों में वाऴि तिरुनामम् का दो बार जाप किया जाएगा। हम अपने घरों में भी इसी क्रम (प्रथा) का पालन कर सकते हैं। हम अपने गृह भगवान की आराधना (तिरुवाराधनम्) और समापन (साट्रुमुऱै) करने के पश्चात, किसी आऴ्वार् या आचार्य के अवतार नक्षत्र के उस विशेष दिन उनके वाऴि तिरुनामम् का पाठ कर सकते हैं। हम उनके वार्षिक तिरुनक्षत्रम् के दिन उनका दो बार पाठ कर सकते हैं। यह प्रथा हमें उनके महत्त्व को अपने हृदय में स्थापित करने में सहायता करेगी। इस प्रकार, हमने वाऴि तिरुनामम् के प्रबंध वैलक्षण्य को देखा है।

विषय की महानता – विषय वैलक्षण्यम

यह परम्परा है कि हम आऴ्वारों और सम्प्रदाय प्रवर्तक आचार्यों के वाऴि तिरुनामम् का पाठ करते हैं। सम्प्रदाय प्रवर्तक (ओराण् वऴि) आचार्य पेरिय पेरुमाळ् (श्रीरंगनाथ भगवान मूल विग्रह) से आरंभ होकर मणवाळ मामुनिगळ् (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) पर इतिश्री होते हैं। इसी प्रकार, हम १२ आऴ्वारों के वाऴि तिरुनामम् का पाठ कर सकते हैं।

आऴ्वार् और सम्प्रदाय प्रवर्तक आचार्य (ओराण् वऴि आचार्य)

यह संप्रदाय बहुत प्राचीन काल से एक आचार्य और एक शिष्य के बीच उच्चतम शिक्षाओं और प्रथाओं को सम्बन्धित बनाए रखा जा रहा है। इसी को ओराण् वऴि (एक शिष्य द्वारा परंपरा जीवित रखना) कहा जाता है। पहले आचार्य पेरिय पेरुमाळ् (श्रीरंगनाथ भगवान) हैं। प्रथम तीन आचार्य, अर्थात पेरिय पेरुमाळ्, पेरिय पिरट्टी (श्री महालक्ष्मी), सेनै मुदल्वर् (विष्वक्सेन) श्री वैकुण्ठ में रहते हैं। इतर आचार्य इस विश्व के हैं और वे संख्या में बहुत हैं।

सम्प्रदाय प्रवर्तक आचार्य (ओराण् वऴि आचार्य):

  1. परिचय 
  2. श्रीरंगनाथ भगवान (पेरिय पेरुमाळ्)
  3. माता श्री महालक्ष्मी (पेरिय पिराट्टी)
  4. विष्वक्सेन (सेनै मुदल्वर्)
  5. श्री शठकोप स्वामी (नम्माऴ्वार्) 
  6. श्रीमन्नाथमुनि 
  7. पुण्डरीकाक्ष (उय्यक्कॊण्डार्)
  8. श्री राम मिश्र (मणक्काल् नम्बि)
  9. श्री यामुनाचार्य (आळवन्दार्)
  10. महापूर्ण स्वामी (पॆरिय नम्बि)
  11. श्री रामानुजाचार्य (एम्पॆरुमानार्)
  12. गोविन्दप् पॆरुमाळ् (एम्बार्)
  13. पराशर भट्ट
  14. वेदान्ती जीयर् (नन्जीयर्)
  15. लोकाचार्य/कलिवैरिदास स्वामी (नम्पिळ्ळै)
  16. श्रीकृष्ण पाद (वडक्कुत् तिरुवीधिप्पिळ्ळै)
  17. पिळ्ळै लोकाचार्य 
  18. श्री शैलेश स्वामी (तिरुवाय्मोऴिप्पिळ्ळै)
  19. रम्यजामातृ मुनि/श्री वरवरमुनि (मणवाळ मामुनिगळ्)

यह सम्प्रदाय प्रवर्तक आचार्यों की सूची है। इसके अतिरिक्त, हमारी गुरू-परम्परा हमारे निजी आचार्य के तिरुमाळिगै/मठ और वंश के आधार पर विस्तार होती है। उदाहरणार्थ, यदि को महापूर्ण स्वामी (पेरिय नम्बि) का शिष्य हैं, तो उन्हें महापूर्ण स्वामी से लेकर उनकी वंश में आनेवाले सारे आचार्यों के वाऴि तिरुनामम् का पाठ करेंगे। इसी प्रकार एम्बार्, कूरेश स्वामी आदि आचार्यों की वंशावली। जबकि कोई शिष्य निर्धारित वंशावली के वाऴि तिरुनामम् का पाठ करता है, परंतु आऴ्वार् और सम्प्रदाय प्रवर्तक आचार्यों के वाऴि तिरुनामम् सभी द्वारा समान रूप से पाठ किए जाते हैं। 

आऴ्वार् हमारे जैसे ही जीवात्माएँ हैं, परंतु वे भगवान द्वारा हम संसारियों को प्रभावित कर मार्गदर्शन करने हेतु चुने गए और भगवान ने उन्हें इसके लिए निष्कलंक, निर्मल ज्ञान और भक्ति (मयर्वऱ मदिनलम्) प्रदान किया। यह उसी प्रकार है जब एक शिकारी किसी मृग को पकड़ने के लिए पहले एक मृगछौने को पकड़कर उसे वश में करने के पश्चात उसी को प्रलोभन के रूप में उपयोग करके अन्य हिरणों को पकड़ लेता है। भगवान ने भी आऴ्वारों को निर्मल ज्ञान से प्रदान किया जो निष्कलंक भक्ति में रूपांतरित होता है और, प्रेम, भक्ति और उच्चतम सत्य की धारा रूपी पद्यों (पासुरम्) में फलीभूत होती है। ये सारे पद्य अर्थात पासुरम् नालायिर (४०००) दिव्यप्रबंधम् कहलाते हैं। इन प्रबंधों के माध्यम से आऴ्वारों ने वेद के गहन अर्थों को सरल और सुलभ तमिऴ् भाषा में दर्शाया। इन्हीं प्रबंधों के लिए कालांतर में आचार्यों ने टीकाकरण किया, व्याख्याएँ लिखीं। विशेषतः, रामानुजाचार्य दिव्यदर्शी नेता थे जिनकी एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है इस सम्प्रदाय के मतों को एक मार्ग पर लाने में और ७४ सिंहानधिपति आचार्यों को स्थापित करने में, जो आधुनिक काल में भी हमारे सम्प्रदायिक ज्ञान और अनुष्ठानों को चारों दिशाओं में जो भी इसे सीखने इच्छुक हैं उनके लिए प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। 

रामानुजाचार्य ने श्रीवैष्णव सम्प्रदाय के माध्यम से अथक प्रयास लेकर उन मार्गों को स्थापित किया जिनसे कोई भी इच्छुक व्यक्ति भगवान श्रीमन्नारायण की सेवा करना सीख पाए और अनुष्ठान में लाकर उनकी सेवा कर सके। यही भगवान की भी इच्छा है। भगवान की हम सब पर अनुकंपा के कारण ही आज आऴ्वार आचार्यों के शब्दों से हमारे वास्तविक स्वरूप का ज्ञान पाने, उनके द्वारा प्रदत्त अनुष्ठानों को सीखने के लिए हमारे पास एक निर्धारित मार्ग है। हमारे पूर्वाचार्यों के निरंतर अभ्यास (या अनुशीलन) के फलस्वरूप ही हम प्राचीन काल से ही निर्बाध रूप से इस मार्ग की शिक्षा ग्रहण करने और उस पर चलने में सक्षम हैं। यह इस विषय की महानता है – विषय वैलक्षण्यम्। 

चलिए अब हम आनेवाले प्रत्येक वाऴि तिरुनामम् के अर्थों का सुखद अनुभव करेंगे। 

  1. मुदलाऴ्वार् (प्रथम तीन आऴ्वार्)
  2. भक्तिसार मुनि (तिरुमऴिसै आऴ्वार्) 
  3. श्री शठकोप स्वामी (नम्माऴ्वार्) 
  4. मधुरकवि आऴ्वार् 
  5. कुलशेखर आऴ्वार् 
  6. विष्णुचित्त स्वामी (पेरियाऴ्वार्) 
  7. गोदाम्बा (आण्डाळ्) 
  8. भक्ताङ्घ्रिरेणु स्वामी (तोण्डरडिप्पोडि आऴ्वार्) 
  9. योगीवाहन स्वामी (तिरुप्पाणाऴ्वार्) 
  10. परकाल स्वामी (तिरुमङ्गै आऴ्वार्) 

अडियेन् दीपिका रामानुज दासी
अडियेन् वैष्णवी रामानुज दासी

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