यतिराज विंशति

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमद् वरवरमुनये नम:

ramanujar-alwaiश्री रामानुजाचार्य – भविष्यदाचार्य पवित्र स्थान – आळ्वार् तिरुनगरि

mamunigal-srirangam

श्री वरवरमुनि स्वामिजि – श्री रंगम

e-book – https://1drv.ms/b/s!AiNzc-LF3uwygxBRX_jwTgbDzknD

परिचय

मन्नुयिर्गाळिङे मणवाळ मामुनिवन्
पोन्नडियाम् चेण्गमलप् पोदुगलै – उन्नि
चिरत्ताले तीण्डिल् अमानुवनुम् नम्मै
करत्ताले तीण्डल् कडन्.

बहुत् सारे महाचार्यों के अवतार से पवित्र हुए इस् भूमि में पूर्वाचार्यों के नाम से आज तक बुलाये गए धर्मसत्ता, श्री वरवरमुनि स्वामीजी से पूर्ण होता है | उन्के बाद् भी कई महाचार्यों का अवतार् हुआ | लेकिन स्वयं श्री रंगनाथजी एक शिष्य का स्थिति लेकर वरवरमुनि से ईदू का व्याख्यान सुन लिए | इसी  कारण से, महानों मानते हैं  कि  पूर्वाचार्य गुरु परम्परा श्री वरवरमुनि  से  पूर्ण  हो  जाता है |

आलवार तिरुनगरी में तिरु नावीरुडय दासर नामक एक महाचार्या के पुत्र होकर श्री वरवरमुनि अवतार किये | उनका नाम था अलगिय मणवाल पेरुमाळ नायनार |  उनका जनम साधारण वर्ष, आश्वयुज मास, मूल नक्षत्र में हुआ | उनका आचार्य  तिरुवाय्मोऴि पिळ्ळै थे |

एक दिन तिरुवाय्मोऴि पिळ्ळै श्री रामानुजाचार्य के गुणानुभव करते रहे | उन्होंने “मारन (श्री शठगोपजी) के चरण दण्डवत करके सुगति प्राप्त किये रामानुजन” जैसे बहुत सारे श्लोकों ध्यान किये और श्री शठगोपजी से रामानुजाचार्य के अनुराग को अनुभव किये | इससे उत्प्रेरित होकर श्री रामानुजाचार्य को आलवार तिरुनगरी में एक अलग मंदिर बनाने के लिए अपने शिष्योंको नियमित किये |

श्री वरवरमुनि जी भी उस रामानुजाचार्य के चरणों में बहुत सारे सेवा करते रहे | अपने आचार्य के नियमन से उस रामानुजाचार्य के चरणों में यतिराज विंशति नामक स्तोत्र समर्पित किये | कोइल अण्णन् स्वामीजी अपने वरवरमुनि शतकम में इस यतिराज विंशति का माधुर्यम् जैसे बहुत सारे गुणों को प्रकाशित किये |

भूमिका – पेरुमाळ कोइल श्री उभय वेदांत प्र.भ. अण्णण्गराचार्य स्वामी (श्री रामानुज पत्रिका – ३-११-१९७० – http://acharya.org/d.html )

मूल तमिल व्याख्यान: श्री उ. वे. T. A. कृष्णाचार्य स्वामी, तिरुपति

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