आर्ति प्रबंधं – ३

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम: आर्ति प्रबंधं << पासुर २ उपक्षेप पहले दो पासुरों में, मणवाळ मामुनि श्री रामानुज के महानता का विवरण किये। इस पासुर से मामुनि अपने आर्ति को प्रकट करना प्रारंभ करते हैं। विशेषरूप से इस पासुरम में वे श्री रामानुज को अपने एकमात्र , सर्व सम्बंधी मानते हैं। परंतु … Read more

आर्ति प्रबंधं – २

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम: आर्ति प्रबंधं << पासुरम १ इरामानुसाय नम एन्रु सिंदित्तिरा मनुसरोडु इरैप्पोळुदु – ईरामारु सिन्दिप्पार ताळिनैयिल सेर्न्दिरुप्पार ताळिनैयिल वन्दिप्पार विन्नोरगळ वाळ्वु शब्दार्थ : वाळ्वु – (का) नित्य धन विण्णोर्गळ –  नित्यसूरीयाँ हैं ताळिनैयै – उनके उभय चरण कमल वन्दिप्पार – जो दण्डवत प्रणाम करते हैं सेर्न्दिरुप्पार – … Read more

शरणागति गद्य – चूर्णिका 5 – भाग 1

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नम: शरणागति गद्य << चूर्णिका 2,3 और 4 अवतारिका (भूमिका) 5 चूर्णिका में श्रीरामानुज स्वामीजी उन परमात्मा को स्थापित करते है, जिनकी शरणागति सभी को करनी चाहिए। श्रीरामानुज स्वामीजी प्रभावी रूप से यह बताते है कि “नारायण” ही परमात्मा है। हम पहले देख चुके है कि “नारायण” शब्द दो खण्डों से … Read more

आर्ति प्रबंधं – १

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम: आर्ति प्रबंधं << अवतारिका (उपक्षेप) वाळि एतिरासन वाळि एतिरासन वाळि एतिरासानेन वाळ्तुवार वाळियेन वाळ्तुवार वाळि एन वाळ्तुवार ताळिनैयिल ताळ्तुवार विण्णोर तलै शब्दार्थ विण्णोर – नित्यसूरीया (श्रीमन नारायण के नित्य निवास परमपद में उनके नित्य सेवक) तलै – कोई जनों को अपने स्वामी मानते हैं। ताळ्तुवार – … Read more

आर्ति प्रबंधं – अवतारिका (उपक्षेप)

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम: आर्ति प्रबंध << तनियन (आवाहन) उनके भक्त उन तक पहुँचे, यह श्री:पति श्रीमन नारायण निश्चित करते हैं। यह सफल होने केलिए वे अपने भक्तों में अपने तक पहुँचने कि इच्छा जागृत करते हैं। यह इच्छा क्रमशः परभक्ति, परज्ञान , परम भक्ति के रूप में खिल्ती हैं। … Read more

शरणागति गद्य – चूर्णिका 2 , 3 और 4

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नम: शरणागति गद्य << चूर्णिका 1 श्रीरंगनाच्चियार (पेरिय पिराट्टीयार) – श्रीरंगम श्रीरामानुज स्वामीजी – श्रीरंगम चूर्णिका 2: अवतारिका (भूमिका) प्रथम चूर्णिका में, श्रीरामानुज स्वामीजी ने सर्वप्रथम श्रीजी द्वारा आश्रय प्रदान करने के सामर्थ्य और कही और आश्रय न पाने की स्वयं की असमर्थता को दर्शाया; तदन्तर वे … Read more

उत्तरदिनचर्या – निष्कर्ष

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवर मुनये नमः परिचय श्लोक १४ निष्कर्ष दिनचर्या शब्द नित्यानुष्ठान को सूचित करती हैं। आराधनीय भगवान , आराधना करनेवाले मनवालाममुनि के प्रति ,  आराधन-रूप  इन  अनुष्ठानो  के   प्रति    अतीत    भक्ति के सात इस ग्रन्थ को हमेशा अनुसंधान करनी हैं। परमपद –  नित्य विभूति जो  ऊंची  स्थान  हैं। अण्डों और … Read more

उत्तरदिनचर्या – श्लोक – १४

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवर मुनये नमः परिचय श्लोक १३                                                                                        … Read more

उत्तरदिनचर्या – श्लोक – १३

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवर मुनये नमः परिचय श्लोक १२                                                                                       … Read more

उत्तरदिनचर्या – श्लोक – १२

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवर मुनये नमः परिचय श्लोक ११                                                                                     … Read more