रामानुस नूट्रन्ददि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या – पाशुर 51 से 60

श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत्  वरवरमुनये नम:

रामानुस नूट्रन्दादि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या

<< पाशुर 41 से 50 

पाशूर ५१: श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कि श्रीरामानुज स्वामीजी का इस संसार में अवतार लेने का एक मात्र उद्देश उन्हें (श्रीरंगामृत स्वामीजी) श्रीरामानुज स्वामीजी का दास बनाना हैं।

अडियैत् तोडर्न्दु एळुम् ऐवर्गट्काय् अन्ऱु बारतप् पोर्
मुडियप् परि नेडुम् तेर् विडुम् कोनै मुळुदुणर्न्द
अडियर्क्कु अमुदम् इरामानुसन् एन्नै आळ वन्दु इप्
पडियिल् पिऱन्ददु मऱ्ऱिल्लै कारणम् पार्त्तिडिले

पूर्वकाल में अपने पादारविन्दों का आश्रयण कर धन्य बनने वाले पंचपांडवों के लिए (अर्जुन का सारथी बनकर) घोड़े जुड़ा हुआ बडा रथ हांक कर दुर्योधनादियों का संहार करनेवाले, भगवान को (अर्थात् भगवान के स्वरूप रूप गुण विभूति इत्यादियों, अथवा सौशिल्य आश्रित पारतंत्र्य इत्यादि शुभगुणों को) पूर्णरूप से समझनेवाले भक्तों के अमृतवत् परमभोग्य रहनेवाले श्रीरामानुज स्वामीजी ने मुझ पर अनुग्रह करने के लिए ही इस भूतल पर अवतार लिया; विचार करने पर दूसरा कोई कारण नहीं दिखता।

पाशूर ५२: जब पूछा गया कि क्या श्रीरामानुज स्वामीजी में उन्हें नियंत्रण करने में क्षमता हैं तब वें श्रीरामानुज स्वामीजी के अनगिनत क्षमताओं को समझाते हैं।

पार्त्तान् अऱु समयन्गळ् पदैप्प इप्पार् मुळुदुम्
पोर्त्तान् पुगळ्कोण्डु पुन्मैयिनेन् इडैत् तान् पुगुन्दु
तीर्त्तान् इरु विनै तीर्त्तु अरन्गन् सेय्य ताळ् इणैयोडु
आर्त्तण् इवै एम् इरामानुसन् सेय्युम् अऱ्पुदमे

हमारे गुरु श्री रामानुज स्वामीजी के ये सभी अद्भुत चेष्टित हैं कि उन्होंने अपनी दृष्टि डालने मात्र से (दुष्ट) षड्दर्शनों को शिथिल बना दिया; अपने यश से समग्र भूमंडल ढांक दिया; अपनी निर्हेतुक कृपा से मुझ नीच के हृदय में प्रवेश कर मेरे प्रबल पाप मिटा दिये; और मिटाने के बाद मेरे सिर को श्रीरंगनाथ भगवान के सुंदर पादारविन्दों के साथ मिला दिया ।

पाशूर ५३:  जब पूछा गया कि अन्य तत्वों का नाश कर श्रीरामानुज स्वामीजी ने क्या स्थापित किया तब श्रीरंगामृत स्वामीजी ने कहा कि श्रीरामानुज स्वामीजी ने महान सत्य को स्थापित किया कि सभी चेतन और अचेतन भगवान पर हीं निर्भर हैं।  

अऱ्पुदन् सेम्मै इरामानुसन् एन्नै आळ वन्द
कऱ्पगम् कऱ्ऱवर् कामुऱु सीलन् करुदरिय
पऱ्पल्लुयिर्गळुम् पल्लुलगु यावुम् परनदु एन्नुम्
नऱ्पोरुळ् तन्नै इन्नानिलत्ते वन्दु नाट्टिनने

श्रीरामानुज स्वामीजी अपने शरण में मुझे लेने के लिये अवतार लिए , वें बहुत उदार हैं, उनमें बहुत साधारण गुण हैं जो ज्ञानियों को अभिलषित हैं, |उनके अद्भुत कार्य, उनमें सच्चाई हैं  अपने शिष्यों के लिये स्वयं को उचित बताने के लिये। मेरे उज्जीवन के लिए ही अवतीर्ण, परमोदार, ज्ञानियों के वांछनीयशीलगुणवाले, अत्याश्चर्य मय दिव्य चेष्टितवाले और आर्जव (सीधापन) गुणवाले श्री रामानुज स्वामीजी ने इस भूतल पर अवतार लेकर इस महार्थ की स्थापना की कि ये असंख्य आत्मवर्ग और (इनके निवासस्थान) ये सभी लोक भगवान की मिल्कियत हैं। (इससे अद्वैत मत का निरास सूचित किया जाता है।)

पाशूर ५४:  श्रीरामानुज स्वामीजी भगवान के श्रेष्ठता को स्थापित करते हैं जिसके परिणाम स्वरूप आगे श्रीरंगामृत स्वामीजी भाह्य तत्त्वों, वेदों और श्रीसहस्त्रगीति के स्थान को बताते हैं।

नाट्टिय नीसच् चमयन्गळ् माण्डन नारणनैक्
काट्टिय वेदम् कळिप्पुऱ्ऱदु तेन् कुरुगै वळ्ळल्
वाट्टमिला वण्डमिज़्ह् मऱै वाळ्न्ददु मण्णुलगिल्
ईट्टिय सीलत्तु इरामानुसन् तन् इयल्वु कण्डे

श्रीरामानुज स्वामीजी के स्वभाव को देखते हुए जो इस संसार में अपने गुणों को और  आगे बढ़ाते हैं, भाह्य अधम तत्त्व, जो अधम जनों द्वारा उनके स्वयं के परिश्रम से स्थापित किया गया हैं, ऐसे देह को त्याग दिया जैसे अंधेरा सूर्य के उगम से लुप्त हो जाता हैं। श्रीमन्नारायण का प्रतिपादन करनेवाले वेद आनंदित हुए; और सुंदर कुरुकापुरी में अवतीर्ण परमोदार श्रीशठकोपसूरी से अनुगृहीत, दोषरहित, द्राविड़वेद संजीवित हुआ । श्री रामानुज स्वामीजी ने श्रेष्ठ प्रमाण व युक्तियों के आधार से संस्कृत व द्राविड वेदों के सदर्थों का वर्णन किया; इससे उन वेदोंका दुःख दूर हुआ और दूसरे कुमत नष्ट हो गये ।

 पाशूर ५५:  वेदों को लाभ देनेवाले श्रीरामानुज स्वामीजी के गुणोंको  स्मरण कराते हुए श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कि, वह कुल जो श्रीरामानुज स्वामीजी के उदारता में निरत हैं और उनके शरण हुए हैं, वें उन पर शासन करना उचित हैं।

कण्डवर् सिन्दै कवरुम् कडि पोळिल् तेन्नरन्गन्
तोण्डर् कुलावुम् इरामानुसनै तोगै इऱन्द
पण् तरु वेदन्गळ् पार् मेल् निलविडप् पार्त्तरुळुम्
कोण्डलै मेवित् तोळुम् कुडियाम् एन्गळ् कोक्कुडिये

स्वरप्रधान अनंत वेदों को इस धरातल पर सुप्रतिष्ठित कराने वाले, परमोदार और सर्वजनमनोहर सुगंधि उपवनों से परिवृत एवं दक्षिणदिशा के अलंकारभूत श्रीरंगम दिव्यधाम के स्वामी श्रीरंगनाथ भगवान के परमभक्तों की प्रशंसा के पात्र श्री रामानुज स्वामीजी का सादर आश्रयण करनेवालों का कुल ही हमारे प्रणाम करने योग्य महात्माओं का कुल है। अर्थात् श्रीरामानुजभक्तों का कुल ही सत्कुल कहलाता है और उस कुलमें अवतीर्ण महात्माओं को हम अपने स्वामी मानते हैं।

पाशूर ५६:  जब श्रीरंगामृत स्वामीजी को यह स्मरण कराया गया कि वों यही वे सांसारिक विषयोंमें कहते थे, तब श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कि, श्रीरामानुज स्वामीजी के शरण होने के पश्चात उनके शब्द और मन और किसी को पहचान नहीं सकते हैं।

 कोक्कुल मन्नरै मूवेळुगाल् ओरु कूर् मळुवाल्
पोक्किय द्Eवनैप् पोऱ्ऱुम् पुनिदन् बुवनमेन्गुम्
आक्किय कीर्त्ति इरामानुसनै अडैन्दपिन् एन्
वाक्कुरैयादु एन् मनम् निनैयादु इनि मऱ्ऱोन्ऱैये

क्षत्रियकुलोत्पन्न दुष्टराजाओं का तीक्ष्णकुठार से इक्कीस वार विनाश करनेवाले परशुराम भगवान की स्तुति करनेवाले, परमपवित्र एवं भूतलव्यापी यशवाले श्री रामानुजस्वामीजी का आश्रय लेनेपर, अब से मेरी वाणी दूसरे किसीका नाम नहीं लेगी; मेरा मन चिंतन नहीं करेगा। आचार्यों का सिद्धांत है कि परशुराम हमें उपासना करने योग्य नहीं; क्योंकि वह तो दुष्टक्षत्रिय निरासरूप विशेष कार्य सिद्धि के लिए अहंकारयुत किसी जीव में भगवान की शक्ति का आवेशमात्र है। अत एव उसे आवेशावतार कहते हैं; नतु श्रीरामकृष्णादिवत् पूर्णावतार। प्रकृतगाथा में इतना ही कहा गया है कि श्री रामानुजस्वामीजी उनकी स्तुति करते हैं, नतु उपासना। विरोधिनिरासरूप महोपकार का स्मरण करते हुए उनकी स्तुति करने में कोई आपत्ति नहीं हैं; क्योंकि यह उपासना नहीं हो सकती।

पाशूर ५७:  श्रीरंगामृत स्वामीजी से पूछा गया कि “आप कैसे कह सकते हैं कि आपके शब्द गुण नहीं गायेंगे और आपका मन किसी के बारें सोचेगा नहीं क्योंकि यह संसार हैं?” वें कहते हैं कि श्रीरामानुज स्वामीजी को प्राप्त करने के पश्चात उनमे कोई नादानी नहीं हैं कुछ प्राप्त करने कि, सही और गलत में भेद करने की।  

 मऱ्ऱु ओरु पेऱु मदियादु अरन्गन् मलर् अडिक्कु आळ्
उऱ्ऱवरे तनक्कु उऱ्ऱवराय्क् कोळ्ळुम् उत्तमनै
नल् तवर् पोऱ्ऱुम् इरामानुसनै इन् नानिलत्ते
पेऱ्ऱनन् पेऱ्ऱपिन् मऱ्ऱु अऱियेन् ओरु पेदमैये

प्रयोजनान्तरों से विमुख होकर, श्रीरंगनाथ भगवान के पादारविन्दों में प्रवण महात्माओं को ही अपने आत्मबन्धु मानने वाले, अत्युत्तम कल्याण गुणवाले, और महातपस्वियों से संस्तुत श्रीरामानुजस्वामीजी को मैंने इस भूतल पर ही पाया; ऐसे पाने के बाद मैं विषयान्तर की इच्छा इत्यादि के हेतु किसी प्रकार का अज्ञान नहीं पाऊंगा।

 पाशूर ५८:  श्रीरंगामृत स्वामीजी प्रसन्न होते हैं कि श्रीरामानुज स्वामीजी ने ऐसे जनों के तत्त्वों को नष्ट किया जिन्होने वेदों को गलत तरीके से प्रस्तुत किया हैं।

पेदैयर् वेदप् पोरुळ् इदु एन्ऱु उन्नि पिरमम् नन्ऱु एन्ऱु
ओदि मऱ्ऱु एल्ला उयिरुम् अह्दु एन्ऱु उयिर्गळ् मेय् विट्टु
आदिप् परनोडु ओन्ऱु आम् एन्ऱु सोल्लुम् अव्वल्लल् एल्लाम्
वादिल् वेन्ऱान् एम् इरामानुसन् मेय्म् मदिक् कडले

कितने अविवेकी जन यों कहते थे कि, ” ब्रह्म एक ही सत्य है; दूसरे सभी जीव उससे अभिन्न हैं, और शरीर छूटने के बाद ब्रह्म के साथ उनका ऐक्य पाना ही मोक्ष है; यही सकल वेदों का तात्पर्य है।” यथार्थज्ञाननिधि हमारे आचार्य श्रीरामानुजस्वामीजी ने इन सभी कोलाहलों को वाद में जीत लिया।

पाशूर ५९:  उनमें प्रसन्नता देखकर कुछ लोगों नें कहा कि आत्मा को शास्त्र के जरिये जाना जा सकता हैं कि भगवान श्रीमन्नारायण हीं श्रेष्ठ हैं। वें उत्तर देते हैं कि अगर श्रीरामानुज स्वामीजी कलियुग का अज्ञानता को नष्ट नहीं करते तो किसी को भी यह ज्ञान नहीं प्राप्त होता कि आत्मा के भगवान श्रीमन्नारायण हैं।

कडल् अळवाय तिसै एट्टिनुळ्ळुम् कलि इरुळे
मिडै तरु कालत्तु इरामानुसन् मिक्क नान्मऱैयिन्
सुडर् ओळियाल् अव्विरुळैत् तुरन्दिलनेल् उयिरै
उडैयवन् नारणन् एन्ऱु अऱीवार् इल्लै उऱ्ऱु उणर्न्दे

चतुस्सागर्पर्यंत आठों दिशाओं में जब कलि-अंधकार ही व्याप्त हुआ था, तब श्रीरामानुज स्वामीजी ने अवतार लेकर,चारों वेदों के उज्वल ज्योति से उस अंधकार को यदि नहीं मिटा दिया होता, तो कोई भी मानव यह अर्थ नहीं समझ सकता कि श्रीमन्नारायण समस्त जीवों के प्रभु हैं।

 पाशूर ६०: जब उन्हें श्रीरामानुज स्वामीजी के भक्ति के विषय में पूछा गया तो उन्होंने इसमे समझाया।

उणर्न्द मेइग्यानिअर् योगम् तोऱुम् तिरुवाइमोळियिन्
मणम् तरुम् इन्निसै मन्नुम् इडम् तोऱुम् मामलराळ्
पुणर्न्द पोन् मार्बन् पोरुन्दुम् पदि तोऱुम् पुक्कु निऱ्कुम्
गुणम् तिगळ् कोण्डल् इरामानुसन् एम् कुलक् कोळुन्दे

आत्मगुणों से परिपूर्ण व उज्वल, कालमेघ के समान परमोदार, हमारे कुलकूटस्थ श्रीरामानुज स्वामीजी तत्वज्ञानियों की प्रत्येक गोष्ठी में, सहस्रगीति (प्रभुति दिव्यप्रबंधों) की दिव्य सूक्ति की सुगंध से वासित प्रत्येक स्थल में एवं लक्ष्मीजी से आलिंगित श्रीवक्षवाले भगवान के एकैक दिव्यदेशमें विराजते हैं।

आधार : http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2020/05/ramanusa-nurrandhadhi-pasurams-51-60-simple/

अडियेन् केशव् रामानुज दास्

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