आर्ति प्रबंधं – ३०

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर २९

 

उपक्षेप

इस पासुरम में श्री रामानुज के चरण कमलों से प्रारंभित, उनके सिर तक उन्के श्रेय की मंगळम गाते हैं मणवाळ मामुनि ।  . मणवाळ मामुनि को लगता है कि अन्य धर्मों के जनों के सात बहुत वाद करने से श्री रामानुज थक चुके होंगें। श्री रामानुज को मामुनि ,हाथों में श्री भाष्य और तिरुवाय्मोळि के संग विराजमान चित्रित करतें हैं। यह अति विशेष मुद्रा मणवाळ मामुनि के कल्पना की उत्साह बढ़ाती है, अतः वें श्री रामानुज के हर अंग के श्रेय की मंगळम गाते हैं और चाहतें हैं कि वें सारे नित्य रहें।     

पासुरम ३०

सीरारुम एतिरासर तिरुवडिगळ वाळी
तिरूवरैयिल साट्रीय सेंतुवराडै वाळी
ऐरारुम सेय्यवडिवु एप्पोळूदुम वाळी
इलंगीय मुन्नूल वाळी इणयतोळगळ वाळी
सोराद तुयय सेय्य मुगच्चोदि वाळी
तूमुरुवल वाळी तुणयमलरकणगळ वाळी
इरारु तिरुनामम अणिन्द एळील वाळी
इनितिरुपोडु येळील ज्ञान मुत्तिरै वाळिये!!

शब्दार्थ

वाळी – नित्य जिए !!
ऐतिरासर – श्री रामानुज के
तिरुवडिगळ – चरण कमल जो हमारे सिर की भूषण और भोग की वस्तु
सीर आरुम – शुभ लक्षणों से भरपूर है
वाळी – नित्य जिए !!!
सेंतुवराडै – काषाय वस्त्र( जो सन्यासियाँ पहनतें हैं), जो प्रज्वलित सूर्य के रंग का है
साट्रीय – जो श्री रामानुज पहनतें हैं
तिरूवरैयिल – उन्के कटि/ कमर
वाळी – नित्य जिए !!!
एप्पोळूदुम – हर समय
सेय्यवडिवु – दिव्य शरीर (दिव्य मंगळ विग्रहं) जो तेजोमय है
येरारुम – सौन्दर्यता से भरपूर
वाळी – नित्य जिए !!!
इलंगीय मुन्नूल – पवित्र धागा/सूत्र जो स्थापित करता है कि वें वेदों के सर्व श्रेष्ट विद्यार्थी थे
वाळी – नित्य जिए !!!
इणयतोळगळ – कँधे जो १) सुनहरे करपग वृक्ष के जैसे २) मोक्ष दायी ३) बंधनों से विमुक्त करने वाले ४) बेसहारे को सहारा देनेवाला तथा मोक्ष देने वाला और इस कारण स्वस्थ दिखने वाले ५ ) सुगन्धित “तुळसी” माला को अलंकृत करते हैं।
वाळी – नित्य जिए !!!
सोराद तुयय सेय्य मुगच्चोदि – श्री रामानुज की तेजस असीमित हैं, पवित्र और तेजोमय है।  इसके कारण है १) श्रीमन नारायण और उन्के भक्तों को देखने पर ख़ुशी २) अभक्तों के वादों को नाश करना
वाळी – नित्य जिए !!!
तूमुरुवल – खिलते फूल के तरह मंद स्मित, हल्की मुस्कराहट। इस मुस्कराहट का कारण है १) आश्रित रक्षण २) एम्पेरुमान के संगत का भोग
वाळी – नित्य जिए !!!
तुणयमलरकणगळ – सुन्दर नेत्र जिन्को दृश्य है १) श्रीरंगश्री (पेरिय पेरुमाळ) २) श्री रामानुज से सुधारे गए श्री वैष्णवश्री (श्री रामानुज के चरण कमलों में शरणागत किये सँसार के सर्वत्र ). अपने आश्रितों के प्रति अत्यंत कृपा से देखने वाले नेत्र, जिसके झलक से शरणागत पवित्र हो जाते हैं।
वाळी – नित्य जिए !!!
इरारु तिरुनामम अणिन्द एळील – तेजस्वी गुलाबी शरीर में ,बारह दिव्य “तिरुमण काप्पु” या “ऊर्ध्व पुण्ड्र” . यह सोने पर्वत (श्री रामानुज के शरीर) में सफ़ेद कमल (तिरुमण काप्पु ) के जैसे है। ये तिरुमण काप्पु श्री रामानुज के उल्लेखित गुणों की आविर्भाव है और निश्चित करता है कि “श्रीवैष्णवश्री” फैले।
वाळी – नित्य जिए !!!
ज्ञान मुत्तिरै – “पर तत्व” के विषय में उपदेश देते हुए श्री रामानुज की मुद्र
इनितिरुप्पोडु – सौम्य रूप में विराजमान (संसारियों को ज्ञान अनुग्रह करने से तृप्त और संतुष्ट हैं )
एळील – अति सुन्दर ( यह मुद्र संस्कृत और तमिळ वेदों के साराँश है)

सरल अनुवाद

इस पासुरम में, मणवाळ मामुनि श्री रामानुज की मंगळासासनम करते हैं। उन्के दिव्य चरण कलमों से प्रारंभित काषाय वस्त्र, उन्की शरीर, उन्की ब्रह्म सूत्र, शक्तिमान कंधे, सौंदर्य मुस्कान, कारुण्य नेत्र, उन्की “तिरुमण काप्पु” और अंत में ज्ञान मुद्र जिसमें वें अपने भक्तों के मध्य विराजमान हैं।

स्पष्टीकरण

इस पासुरम में मणवाळ मामुनि श्री रामानुज के श्रेय( मंगळासासनम) गाते हैं।  श्री रामानुज के दिव्य चरण कमलों की श्रेय से शुरू करतें हैं और चाहते हैं कि वें नित्य रहें। स्वरूप, रूप और उन्के भक्तों को उद्देश्य और अत्यंत प्रीय गुणों से भरपूर श्री रामानुज यतियों के नेता हैं।  (तिरुक्कुरुंधानडगम ६) के “अमरर सेंनिप्पू” और (रामानुस नूट्रन्दादि१ ) के “ईरामानुसन अडि पू” के अनुसार श्री रामानुज के चरण कमल हमारें सिर के भूषण के रूप में भोग्य हैं। ऐसे चरण कमल नित्य रहें। अब श्री रामानुज के दिव्य मंगळ शरीर को अलंकृत करने वाले काषाय वस्त्र के श्रेय गाते हैं। इस विशेष वस्त्र की भी नित्य रहन चाहतें हैं। काषाय वस्त्र की २ विवरण यहाँ दी गयी है। (१) श्री वचन भूषणम के २४० चूर्णिकै “आरु प्रकारत्ताले परिसुद्धात्मा स्वरूपत्तुक्कु तत्साम्यं उनडायिरुक्कुम” के अनुसार सारे जीवात्मा अपने सच्चे स्वरूप की ज्ञान होने पर पेरिय पिराट्टी के समान हैं।  जीवात्मा के ६  गुण विशेषण हैं  १) अननयार्ह शेषत्व: श्रीमन नारायण से अन्य किसी का दास न रहना।  (२) “अनन्य शरणत्वं”: श्रीमन नारायण  से अन्य किसी के आश्रय न लेना (३) “अनन्य भोगत्वं” : श्रीमन नारायण से अन्य किसी की भोग्य -पात्र न बनना।  (४) संस्लेषत्तिल दरिक्कै: श्रीमन नारायण के मिलन में ही जीवित रहना (५) विस्लेशत्तील दरियामै: श्रीमन नारायण से अलग जीवन को न सहना (६) तदेक निर्वाह्यत्वं: श्रीमन नारायण से ही नियंत्रण किए जाना। उल्लेखित ६ गुण विशेषणों की परिचय होनें पर, जीवात्मा  श्रीमन नारायण के कृपा से, नायकी लक्षण के प्रतीक पेरिय पिराट्टी के समान है। काषाय वस्त्र का दूसरा विवरण “सीताकाषायवासिनी” वचन से है। इन दो सूचनाओँ से तुल्य है कि काषाय “पारतंत्र्य” (आचार्य पर निर्भर रहना और प्रश्न किये बिना आज्ञा  मानना) और “अनन्यारहत्वं” (जीवात्मा केवल श्रीमन नारायण का होना )  को प्रकट करता है। रँग में सूर्य के समान, श्री रामानुज के देह को अलंकृत करने वाले इस सुँदर काषाय वस्त्र को मामुनि यहाँ विवरित करतें हैं।  इसके बाद, श्री रामानुज के दिव्य मंगळ विग्रह (दिव्य शरीर) के श्रेय गाते हैं। मामुनि कहतें हैं कि श्री रामानुज की दिव्य शरीर आश्रुतों को प्रीय है। उन्के हर अंग अत्यंत सौंदर्य प्रकट करती हैं। उन्के मुखाकृति निर्मल फूल के जैसे कोमल और मृदुल है।  “रूपमेवास्यै तन महिमान मासशटे” के अनुसार श्री रामानुज के दिव्य शरीर प्रकाशमान हैं, परमात्मा श्रीमन नारायण, अंदर अन्तर्यामी के रूप में तेजोमय होने के कारण। “नित्यं नित्या कृतितरम” शास्त्र वचन के अनुसार यह दिव्य मंगळ रूप सदा रहें, ऐसे मंगळासासनं करते हैं मामुनि। अब मामुनि श्री रामानुज के पवित्र धागें/ जनेयू (तीन धागे) की श्रेय गाते हैं ,जो स्थापित करती है कि वें वेदिक ग्रंथों की अनुयायी हैं और उस्की सतर्क पालन करतें हैं।  श्री रामानुज की पवित्र धागा शाम के आसमान में चाँदी म्यान के जैसे है।  नित्य काल तक जिए ऐसे पवित्र धागें। आगे , श्री रामानुज के सुँदर कंधों की मंगळासासन करतें हैं। “भाहुच्छायमव अष्टबधोस्यपलको माहातमन:” वचनानुसार श्री रामानुज के कंधे सुनहरें करपग वृक्ष के शाखाओँ के तरह अपने नीचे उपस्थित लोगों को छाँव, आश्रय और आश्वासन देता है।  ये कंधे किसी को भी मोक्ष दिला सकतें हैं। ये  सँसार के नीच को भी मुक्ति दिला सकते हैं।  जनों की रक्षा करने वालें यह कंधे इस कारण चौड़े हैं। ज्ञान सारम के पासुरम ७ के “तोळार चुडरत्तिगिरी संगुडय सुंदरनुक्खु” के अनुसार, श्री रामानुज के कंधे शक्तिमान हैं।  तुळसी, वगळा और नळीनाक्ष पुष्पों के हार से ये कंधे अलंकृत हैं।ऐसे अद्वितीय कंधे नित्य जिए, यह मामुनि की मंगळासासन हैं। अब श्री रामानुज के दिव्य मुख-मंडल की मंगळासासनम करने लगते हैं।  “ब्रह्मविद इव सौम्यते मुखम पादि” और (तिरुवाय्मोळी ३.१.१) “मुगच्चोदि मलर्नददुवो” के अनुसार श्री रामानुज की तेजस असीमित, पवित्र और दीप्तिमान  है। श्रीमन नारायण और उन्के भक्तों को देखने से आने वाली सुख और अभक्तों के वाद को नाश करना ही तेजस की कारण है।   

इस्के पश्चात श्री रामानुज के सुंदर मुस्कान की श्रेय गाते हैं।  “सा विलासस स्मिताधारम भिप्राणम मुख पंकजम” के अनुसार श्री रामानुज के मुख एक सुंदर कमल से तुल्ना की जाती है। इस कमल मुख में एक सुन्दर मंदस्मित आती है, आळ्वार के “निन  पाल निला मुत्तम तवळ कदिर मुरुवल सैदु” (तिरुवाय्मोळि ९.२.५ ) के अनुसार। चंद्र के शीतल हॅसी के समान खिलते पुष्प जैसे यह सुँदर मुस्कान और उल्लेखित ख़ुशी सदा रहें।  श्री रामानुज के दिव्य नेत्र, श्री रंगनाथ और श्री वैष्णवश्री से मिलकर सुधरकर अपनाए गए सर्वों  को सदा दर्शन करतें हैं।  ये नेत्र सदा संगी जनों के प्रति कृपा प्रकट करती हैं। “अमलंगळाग विळीक्कुम” (तिरुवाईमोळी १. ९. ९ ) के अनुसार इन नेत्रों के अनुग्रह से  अश्रुतो के अज्ञान नाश होती है। ये अध्बुध नेत्र सदा रहें, यह मामुनि की चाहत है और उन्के  मंगळासासनं करतें हैं। अब मामुनि, श्री रामानुज के  “तिरुमण काप्पु” (द्वादश ऊर्ध्व पूर्णं) धारण के सौंदर्यता की श्रेय गाते हैं। पासुरम के पूर्व वाक्यों में उल्लेखित गुणों के प्रतिबिम्ब ये “तिरुमण काप्पु”,सुनहरें पहाड़ पर खिले सफ़ेद कमल के समान है। श्री रामानुज की देह लाल-पीली तेजस के संग दृश्य होती हैं, और उस पर “तिरुमण काप्पु” प्रकाशित है। मामुनि चाहते हैं कि यह सौंदर्यता सदा रहें। अंत मे, श्री रामानुज के उंगलियों के मुद्र की श्रेय गातें हैं और मंगळासासन करते है कि ये सदा जिए। श्रीमन नारायण के इच्छा पूर्ती के हेतु श्री रामानुज इस सँसार में आये और भक्तों और प्रतिद्वंदियों को एक समान श्रीमन नारायण के निर्हेतुक कृपा के कारण अपनाएँ।  ये सर्वत्र करने के पश्चात (तिरुवाय्मोळि ४. ३. ११) के “वैयम मन्नी वीट्रीरुंदु” के अनुसार वें राज हँस के जैसे घंभीरता से विराजें हैं। आचार्य सामान्य रूप में, विषयों में अंतर कर पाने से हँस से समानित किए जातें हैं। (पेरिय तिरुमोळि ११. ४.८ ) “अन्नमदाय इरुन्दगु अर नूल उरैत्त” से तिरुमँगै आळ्वार यही विषय प्रकट करतें हैं। (परांकुशाषट्कम) “पद्मासनोपविष्टं पादद्वोपोदमुद्रम” वर्णनानुसार, आचार्यों के नेता श्री रामानुज ज्ञान मुद्र में, पद्मासन में विराजमान, अपने भक्तों के मध्य, गंभीर दृश्य हैं। “श्रीमत तदंगरीयुगळं” में “श्री” के उपयोग के समान, इस पासुरम में “सीरारुम”, चरण कमलो (तिरुवडिगळ) की विशेषण के रूप में है।

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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