आर्ति प्रबंधं – २१

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर १०

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उपक्षेप

यह पासुरम मणवाळ मामुनि और उनके मन के बीच की संभाषण है। उनकी मन का प्रश्न है “हे मणवाळ मामुनि ! पिछले पासुरम में आप परमपद के मार्ग की और श्रीमन नारायण से जीवात्मा की मिलन का भी विवरण दिए। अत्यंत ज्ञानियों केलिए भी यह अपूर्व अवसर है। किन्तु आप के बातों से लगता हैं कि आप ने यह अनुभव किया है।  आप अचानक इतने विश्वासपूर्ण और साहसी कैसे बन गए ?”  इसकी उत्तर देते हुए मणवाळ मामुनि अपने ह्रदय से कहते हैं , “हे मेरे प्रिय ह्रदय! निर्भय रहो ! मेरी ज्ञान मेरे आचार्य तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै के निर्हेतुक कृपा से हैं।  उस्से मैं इस निश्चय पर आया हूँ कि आचार्य के कृपा ही मुक्ति दायित्व हैं। मेरी इस स्तिथि देख एम्पेरुमानार अपने कार्य खुद करेंगें।  अतः मैं निर्भय और वैसे ही तुम भी रहना।

पासुरम

तिरुमलै आळ्वार तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै सीररुळै
तरुम मदि कोण्डवर तम्मै उत्तारकराग एण्णि
इरु मनमे ! अवरकाई एतिरासर एमै कडुग
परमपदम तनिल येटरुवार एन्न बयम नमक्के

शब्दार्थ

तिरुमलै आळ्वार – जिनका नाम है “श्रीशैलेशर”
तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै – तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै के अलावा कोई नहीं
सीररूळै – अपने निर्हेतुक कृपा से
तरुम – मुझे आशीर्वाद किये
मदि – उन्की दिव्य ज्ञान
मनमे – हे मेरी प्यारी ह्रदय
कोणडु –  उस ज्ञान को उपाय बना कर
इरु – रहिये
एण्णि – इस दृढ़ विश्वास के सात कि
अवर तम्मै – तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै, महान जिन्हों ने इतना मदद किये
उत्तारकराग – साँसारिक बंधनों से विमुक्त करने वाले हैं
एतिरासर – एम्पेरुमानार
अवरकाई – मेरे आचार्य तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै के लिए
येट्रूवार – भेजेँगे
एमै – मैं, जो “स्वाचार्य अभिमानमे उत्तारकम” (शिष्यों के प्रति आचार्य की अभिमान ही शिष्यों की एकमात्र रक्षण है )
कडुग – शीघ्र ही
परमपदम तनिल – परमपदम तक
एन्न बयम नमक्के ! – हे मेरे ह्रदय ! अतः क्यों डरे ! कोई भय नहीं है (सीने में हाथ रख कर निश्चिन्त सो सकते हैं )

सरल अनुवाद

मणवाळ मामुनि अपने ह्रदय से निर्भय रहने को कहते हैं, क्योंकि एम्पेरुमानार उनकी रक्षा करेंगें।  मणवाळ मामुनि के आचार्य तिरुवाइम्ळिप्पिळ्ळै के, मामुनि के प्रति जो प्रेम और कारुण्य हैं, वही इसका कारण हैं। मणवाळ मामुनि को ज्ञान हैं कि आचार्य के आशीर्वाद और कृपा से ही एम्पेरुमानार शीघ्र राहत दिलाएँगे।

स्पष्टीकरण 

तिरुमलै आळ्वार ही तिरुनाम था।  तिरुवाय्मोळि में अत्यंत प्रभाव और ज्ञान के कारण वें तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै नाम से पहचानें गए।  वही उन्की पहचान बन गयी।  मणवाळ मामुनि के कहना हैं की ऐसे महान आचार्य अपने निर्हेतुक कृपा से आशीर्वाद किये और सर्वश्रेष्ठ विषय की ज्ञान भी दिए।  इस ज्ञान के प्रापक हैं मणवाळ मामुनि।  इस ज्ञान को उपाय बना कर, अपने ह्रदय से कहते हैं , “हे ह्रदय ! स्मरण रखो के महान तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै ने हमें यह ज्ञान उपहार किया हैं।  इसका प्रयोग यह हैं कि हमें एहसास होना हैं कि इस साँसारिक बंधन से वे ही हमें विमुक्त करेंगें।  इस पर दृढ़ विश्वास रखो।  इस दृढ़ विश्वास को देख श्री रामानुज हमारी स्तिथि की प्रोत्साहन करेंगें।  इसके पश्चात हमारे आचार्य पर विचार करेंगें और उन्के हेतु (तिरुवाय्मोळि ७.६. १० ) के “येट्रारुम वैकुन्दम” वचनानुसार, हमें शीघ्र परमपग भेजेँगे।  (इरामानुस नूट्रन्दादि ९८) के “मनमे नैयल मेवुदर्क्के” के  अनुसार मणवाळ मामुनि अपने ह्रदय से कहते हैं , “तुम निर्भय रहो” श्री रामानुज परमपद तक पहुँचायेंगे, इसलिए सीने में हाथ रख निश्चिन्त सो सकते हैं।

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

आधार :  http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2016/08/arththi-prabandham-21/

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