आर्ति प्रबंधं – १५

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

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उपक्षेप

मणवाळ मामुनि के अभिप्राय हैं कि वे अपने  बुरे स्थिति के लिए श्री रामानुज को दोषित मानते हैं और इस स्थिति से मुक्ति केलिए प्रार्थना उन्ही से करते हैं। मणवाळ मामुनि विचार करते हैं कि ,(रामानुस नूट्रन्दादि ९१ ) के “इरामानुसन मिक्क पुण्णियने” के अनुसार , श्री रामानुज कल्याण गुणों से भरे हैं , तो हमारे बुरे स्थिति केलिए उन्हें (श्री रामानुज को ) दोषी ठहराने से ,उनके चरण कमलों में शरणागति करने से ,क्या वें स्वयं हमारी रक्षण न करेंगें ? मणवाळ मामुनि अब आत्म चिंतन करते हैं कि श्री रामानुज के प्रति अपने मन में प्रेम या भक्ति हैं? और यह निश्चय करते हैं कि ऐसा उनके मन में श्री रामानुज के प्रति कुछ भी नहीं है।

पासुरम

एम्पेरुमानार तिरुवडिगळे शरणम
एन्बदुवे नावुरैक्कुम इत्ताल एन ?
अन्बवर पाल इप्पोदळवुम यान ओन्रुम काण्गिन्रिलेन
एप्पोदु उंडावदु इनि

शब्दार्थ

नावुरैक्कुम  – मेरा जीभ , बिना प्रेम/भाव
एन्बदुवे  – प्रसिद्द वचन का उच्चारण करता है
एम्पेरुमानार तिरुवडिगळे शरणम – “ श्री रामानुज जो मेरे स्वामी हैं , उनके चरण कमलों में शरणागति करता हूँ”
इत्ताल एन ? – यह कहने का उपयोग क्या है ( बिन प्रेम भाव के बोलना )
यान ओन्रुम काण्गिन्रिलेन – मेरे समझ में कुछ नहीं आ रहा है
अन्बु – भक्ति
अवर पाल – उनके प्रति
इप्पोदळवुम – इस क्षण तक
एप्पोदु उंडावदु इनि ? – अगर अब नहीं तो कब यह भक्ति खिलेगा ?

सरल अनुवाद

मणवाळ मामुनि कहतें हैं कि वें  बिना कोई प्रतिफल के, लगातार “एम्पेरुमानार तिरुवडिगळे शरणम” दिव्य मंत्र जप्ते रहें।  उसके अर्थ के एहसास के बिना वें मंत्र को जप कर रहे थे। उनका मानना हैं कि ऐसे जप की कोई उपयोग नहीं हैं।    समय के बीतने पर वें, अपने ह्रदय में , श्री रामानुज के प्रति उपस्थित भक्ति की ख़ोज करते हैं। और भक्ति के अनुपस्थिति से हैरान होतें हैं।  

स्पष्टीकरण

“एम्पेरुमानार तिरुवडिगळे शरणं” पिळ्ळै कोल्लिक्कावल दासर केलिए प्रेरणाप्रद वचन है। वही वचन सोमासियाण्डान केलिए नित्य भोग्य का सहारा है। पर यह वचन जो इन्हें इनके जीवन से भी मान्य है , इसको मणवाळ मामुनि भी इसके गहरी अर्थ पर ध्यान न देते हुए, उच्चारण किये। श्री रामानुज के प्रति बिंदुमात्र  प्रेम या भक्ति के बिना, मामुनि इसकी लगातार जप किये। “सारन्ददेन सिन्दैयुन तालिणैकीळ अंबुदान मिगवुम कुर्नददु”(रामानुस नूट्रन्दादि ७१ ) में प्रकटित, श्री रामानुज के प्रति प्रेम को अपने ह्रदय में खोजते हैं  और अपने अंतिम काल तक श्री रामानुज के प्रति बिंदुमात्र प्रेम या भक्ति न मिलने पर निराश होते हैं।  वे खुद को प्रश्न करतें हैं , “अगर प्रेम खिलना साध्य है , अब नहीं तो कब ?”. वे निस्चय करते हैं कि उस वचन के प्रेम के अनुपस्तिथि में उच्चारण करने में उपयोग नहीं हैं।  इस समय हमें यह ध्यान में रखना हैं कि, मणवाळ मामुनि २ पासुरम में “इरामानुसाय नमः” और यहाँ “एम्पेरुमानार तिरुवडिगळे शरणं” कहते हैं।    द्वय महामंत्र के समान एक श्री रामानुज मन्त्र भी हैं। उसमे “एम्पेरुमानार तिरुवडिगळे शरणं” पूर्व भाग और “इरामानुसाय नमः” उत्तर भाग हैं।

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

आधार :  http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2016/07/arththi-prabandham-15/

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