आर्ति प्रबंधं – ६

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर ५

ramanuja

उपक्षेप

पिछले पासुर और इस पासुर के संबंध को “उन भोगं नन्रो एनै ओळिन्द नाळ” से स्थापित किया गया हैं।  पिछले पासुर में मणवाळ मामुनि (वरवरमुनि), श्री रामानुज से प्रश्न करते हैं कि, उनके (मणवाळ मामुनि के) सांसारिक बंधनों में रहते हुए, वे (श्री रामानुज) परमपद के भोग कैसे कर पाएंगे। मणवाळ मामुनि (वरवरमुनि) के कल्पना में श्री रामानुज उसका ऐसा उत्तर देते हैं, “ हे मणवाळ मामुनि (वरवरमुनि), अपनी बौद्धिक परिपक्वता और आत्मिक (आध्यात्मिक) यात्रा को विकसित कीजिये, उचित समय पर अवश्य आपको परमपद ले जाएंगे। ऐसा आरोप क्यों लगा रहे हैं कि आपके अनुपस्थिति में हम परमपद का भोग कर रहे हैं ?” श्री रामानुज के इस प्रश्न का उत्तर देते हुए मणवाळ मामुनि (वरवरमुनि) इस पासुर में कहते हैं कि “हे स्वामी, यह आपका विचार “अनुकूलर्” (परमपद प्राप्ति के विधि तथा नियमानुसार रहने वाले एवं उस मार्ग पर चलने वाले अनुकूलरों को प्रोत्साहित करने वाले जन “अनुकूलर” कहलाते हैं) अनुकूल जनों के लिये है . परंतु अड़ियेन् (यह दास) “प्रतिकूल” है ।  (परमपद प्राप्ति के स्थापित नियमो के विरुद्ध जन जो अन्य “अनुकूलरों” के विरुद्ध हैं, यह “प्रतिकूलर” कहलाते हैं।  ) और मुझ जैसे प्रतिकूल के, एक क्षण में भी प्रतिकूल (विचार और आचरण) बढ़ सकती हैं। इसीलिए आपसे विनती है कि, यह शरीर जो दुष्ट गुणोत्पत्ति का क्षेत्र हैं, इसको मिटाए।”

पासुरम ६

वेम्बु मुट्र कैप्पु मिगुवदुपोल वेव्विनैयेन
तीम्बु मुट्रुम देगमुट्रि  चेल्लुङ्गाळ – आमपरिसाल
एर्कवे सिन्दित्तु एतिरासा इव्वुडलै
तिर्कवेयान वळि सै

शब्दार्थ

एतिरासा – (हे! यतिराजा !!!)
वेम्बु –  एक नीम का पेड़ ऐसा है जब वह
मुट्र – परिपक्व होता है (समय बीतने पर )
कैप्पु मिगुवदु – कड़वापन बढ़ता है
पोल – ऐसे
वेव्विनैयेन – अड़ियेन का शरीर जो अत्यंत क्रूर पापो का निवास है
देगमुट्रि – ऐसा शरीर उम्र में बढ़ने से और
चेल्लुङ्गाळ – और इसी तरह परिपक्व होगा तो
तीम्बु – (केवल) बुरे कर्म
मुट्रुम – उसमे भरपूर रहेगा
आमपरिसाल – (अतः ) मेरे जीवात्मा के सच्चे स्वभाव को पुनर्निर्माण करने केलिए
एर्कवे सिन्दित्तु – (आपसे अड़ियेन कि विनती है ) कि अधिक समय बीतने से पहले विचार करे और यह कार्य समाप्त करे
सै – और करे, सबसे उचित
वळि – तरीखा
तिर्कवेयान – और नाश करे
इव्वुडलै – यह शरीर जो सारे बुराइयों का निवास है

सरल अनुवाद :

इस पासुर में, संसार के क्रूर पापो के उद्भव जो यह शरीर है, मणवाळ मामुनि (वरवरमुनि) श्री रामानुज से उसको नाश करने की प्रार्थना करते हैं।  यहाँ वे नीम पेड़ का उदाहरण देते हैं।  नीम पेड़ का कड़वापन समय के सात अधिक होता है। मणवाळ मामुनि (वरवरमुनि) कहते है कि इसी प्रकार उनके शरीर के द्वारा किये जाने वाले पाप भी बढ़ते रहते है। अतः वे श्री रामानुज को अपने शरीर को (शीघ्रता से) उचित प्रकारेण नाश करने की प्रार्थना करते हैं।  

स्पष्टीकरण :

श्री रामानुज से मणवाळ मामुनि (वरवरमुनि) कहते हैं , “हे! यतिराजा! सन्यासियों के नेता ! स्वभाव से ही मीठा गन्ना, बढ़ते समय के साथ और मीठा बनता है।  इस प्रकार स्वभाव से ही कड़वा नीम पेड़, बढ़ते समय के साथ और कड़वा बनता है।  वैसे ही, संसार में सबसे क्रूर पापो का निवास, मेरा यह शरीर, बढ़ते समय में और अधिक पाप जमाने लगता है। नये पापों के उद्भव तुच्छ गुणों का प्रतीक हूँ।  केवल तुच्छ गुणों के निवास इस शरीर को तुरंत नष्ट करने की विनती अडियेन् आपसे करता है।

अडियेन् प्रीती रामानुज दासी

आधार :  http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2016/06/arththi-prabandham-6/

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