आऴ्वार्/आचार्य वाऴि तिरुनामम् – मुदल्‌ आऴ्वार् – सरल व्याख्या

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमत्‌ वरवरमुनये नमः

पूरी श्रृंखला

सारो योगी (पॊय्गै आऴ्वार्) का वैभव 

सारो योगी का जन्म स्थान काँचीपुरम के निकट तिरुवेक्का दिव्य देशम् है। वे एक पोखर (पोय्गै) में एक पुष्प से अयोनिज (माँ के गर्भ से जन्म न हुए) के रूप में प्रकट हुए थे। प्रथम ३ आऴ्वार् सभी अयोनिज हैं और पुष्पों से प्रकट हुए। सारो योगी का जन्म महीना आश्विन (तमिऴ् में ऐप्पसी) है और जन्म नक्षत्र श्रवण (तिरुवोणम्) है। उन्होंने मुदल तिरुवंधादि नामक प्रबंध की रचना की | अंतादि के रूप में १०० पाशुरम् रचे गए हैं (एक पाशुर का आखिरी शब्द अगले पाशुर का पहला शब्द बन जाता है)। वे भगवान की सर्वोच्चता (परवासुदेव रूप) और महानता में संलग्न हुए थे। आइए उनके वाऴि तिरुनामम् का अर्थ जानें।

सारो योगी वाऴि तिरुनामम – सरल अर्थ

सॆय्यत्तुला ओणत्तिऱ्‌ सॆगत्तुदितान्‌ वाऴिये
तिरुक्कच्चि मानगरम्‌ सॆऴिक्क् वन्दोन्‌ वाऴिये
वय्यन्तगळि नूरुम्‌ वगुत्तुरैतान्‌ वाऴिये
वनस मलर्क्‌ करुवदनिल्‌ वन्दमैन्दान्‌ वाऴिये
वैय्य कदिरोन्‌ तन्नै विळिक्किट्टान्‌ वाऴिये
वेङ्कटवर्‌ तिरुमलैयै विरुम्बुमवन्‌ वाऴिये
पॊय्गैमुनि वडिवऴगुम्‌ पॊऱ्‌-पदमुम्‌ वाऴिये
पॊन्मुडियुम्‌ तिरुमुगमुम्‌ भूदलत्तिल्‌ वाऴिये

सॆय्यत्तुला ओणत्तिऱ्‌ सॆगत्तुदितान्‌ वाऴिये

सारो योगी इस पृथ्वी पर ऐप्पसी (तमिऴ् वर्ष का अश्विन माह) महीने में, जिसे तुला माह भी कहा जाता है, तिरुवोणम् (श्रवण) नक्षत्र में प्रकट हुए। वे चिरायु रहे (पल्लाण्डु)! उन्हें मंगलाशासन! उनका जय हो, मंगल हो! वाऴिये शब्द का अर्थ है मंगलाशासन (मंगल हो/जय हो) करना।

तिरुक्कच्चि मानगरम्‌ सॆऴिक्क् वन्दोन्‌ वाऴिये

उनका जन्म स्थान त्तिरुवेक्का है, जो काँचीपुरम के दिव्य क्षेत्र में विद्यमान है। कॉंचीपुरम एक विशाल नगर है, तिरुवेक्का उस विशाल नगरी का एक लघु भाग है। उनके जन्म के कारण कांचीपुरी ने बहुत महिमा/उत्कर्ष प्राप्त किया! भगवत विषय (भगवान की महिमा) इस जगत में प्रसारित होने लगी! वे  प्रथम आऴ्वार् हैं और उन्हीं के माध्यम से भगवान ने हमें सर्वप्रथम प्रबंध दिया। कांचीपुरी श्रीवैष्णव सम्प्रदाय की बढ़ोतरी के मुख्य कारणों/केंद्रों में से एक है। इसी कारण से कांचीपुरम की महिमा हुई! कांचीपुरम में प्रकट हुए सारो योगी का मंगल हो (दीर्घायु/चिरायु रहें) (पल्लाण्डु) !  

वय्यन्तगळि नूरुम्‌ वगुत्तुरैतान्‌ वाऴिये

उन्होंने “वय्यम् तगळिया वाऱ्-कडले नॆय्याग” से आरंभ होने वाले श्लोक (पाशुर) से अंतादि क्रम में १०० पाशुर बनाए (एक पाशुर का अंतिम शब्द अंतादि क्रम में अगले पाशुर का पहला शब्द बन जाता है)। भगवान की कृपा से आऴ्वार् का मंगल हो (दीर्घायु/चिरायु रहें) (पल्लाण्डु) !  

वनस मलर्क्‌ करुवदनिल्‌ वन्दमैन्दान्‌ वाऴिये

आऴ्वार् कमल के पुष्प से प्रकट हुए। पुष्प स्वयं एक गर्भ बन गया और उन्होंने उस गर्भ से जन्म लिया! जो आऴ्वार् इस प्रकार प्रकट हुए, वे दीर्घायु हों (पल्लाण्डु)! आज भी, वह पुष्कर जिससे आऴ्वार् प्रकट हुए थे, देखा जा सकता है। हमें ज्ञात हुआ है कि आऴ्वार् इसी पोखर के एक पुष्प में प्रकट हुए थे। आऴ्वार् का मंगल हो (दीर्घायु/चिरायु रहें) (पल्लाण्डु) ! 

वैय्य कदिरोन्‌ तन्नै विळिक्किट्टान्‌ वाऴिये

आऴ्वार् ने सूर्य के प्रकाश से एक दीपक प्रज्ज्वलित किया जिसे “कदिरवन्” कहा जाता है। आऴ्वार् ने क्रम को “वय्यम् तगळिया वार्कडले नॆय्यागा वेय्य  कदिरोन् विळक्काग” के रूप में दर्शाया और इस प्रकार से आऴवार् ने सूर्य को दीये के रूप में प्रयोग  किया! ऐसे सारो योगी का मंगल हो (दीर्घायु/चिरायु रहें) (पल्लाण्डु)! 

वेङ्कटवर्‌ तिरुमलैयै विरुम्बुमवन्‌ वाऴिये

सारो योगी का तिरुवेङ्गमुडैयान् (तिरुपति बालाजी) से बहुत लगाव था। उन्होंने अपने प्रबंध, मुदल् तिरुवंतादि में तिरुवेङ्गमुडैयान् पर कई पाशुरम् लिखे हैं। ऐसे सारो योगी का मंगल हो (दीर्घायु/चिरायु रहें) (पल्लाण्डु)! 

पॊय्गैमुनि वडिवऴगुम्‌ पॊऱ्‌-पदमुम्‌ वाऴिये

सारो योगी को ऋषि कहा जाता है। ऋषि (मुनि) का अर्थ है वह जो निरंतर अपने मन में भगवान की महानता के बारे में सोचता है और ध्यान में रहता है। उनके सुंदर रूप और सोने जैसे मनभावन चरणों के लिए पल्लाण्डु (ऐसे वह कई वर्षों तक जियें) ऐसी कामना करता हूँ।

पॊन्मुडियुम् तिरुमुगमुम् भूदलत्तिल् वाऴिये

सारो योगी के सुंदर मस्तक को सुशोभित करने वाला मुकुट इस पृथ्वी पर चिरायु रहे! उनका उज्ज्वल  मुखमण्डल इस पृथ्वी पर भविष्य के कई वर्ष तक दीप्तिमान रहे!

भूत योगी (भूत्ताऴ्वार्) की महानता

भूत योगी का जन्मस्थान तिरुक्कडल्मल्लै है, जिसे वर्तमान में महाबलिपुरम् के नाम से जाना जाता है। वह इस दिव्य देश के पवित्र सरोवर में विद्यमान एक पुष्प से प्रकट हुए थे। उनका अवतार ऐप्पसी (अश्विन) में आश्लेषा (अविट्टम्) नक्षत्र में हुआ। उन्होंने इरण्डाम् तिरुवन्तादि प्रबंध की रचना की। इसमें अंतादि के क्रम में १०० पाशुर हैं (अंतादि रीति में एक पाशुर का अंतिम शब्द अगले पाशुर का पहला शब्द बन जाता है)। वे भगवान (एम्पेरुमान्) की सर्वोच्चता में निमग्न थे (सारो योगी के जैसे)। प्रथम तीन आऴ्वारों को भगवान के त्रिविक्रम अवतार के प्रति बहुत स्नेह था। भगवान ने त्रिविक्रम के रूप में, एक विशाल स्वरूप धारण किया और दिखाया कि पूरा विश्व उनकी संपत्ति है।

भूत योगी वाऴी तिरुनामम्

अन्बे तगऴि नूरुम अरुऴिणान् वाऴिये
ऐप्पसियिल् अविट्टत्तिल् अवदरित्तान् वाऴिये
नन्पुगऴ्सेर् कुरुक्कत्ति नाण्मलरोण् वाऴिये
नल्ल तिरुकडल्मल्लै नदनार् वाऴिये
इन्बुरुगु सिन्दै तिरियिट्ट पिरान् वाऴिये
ऎऴिल् ज्ञानच् चुडर् विळक्कै एट्रिनान् वाऴिये
पॊन्पुरैयुन् तिरुवरङ्गर् पुगऴुरैपोन् वाऴिये
भूतत्तार् ताळिणै इप्पूतलत्तिल् वाऴिये

भूत योगी वाऴी तिरुनामम्–सरल अर्थ

अन्बे तगऴि नूरुम अरुऴिणान् वाऴिये

इरण्डाम् तिरुवन्तादी में भूत योगी के लिखे १०० पासुर हैं, जिनका आरंभ “अन्बे तगळिया आर्वमे नॆय्याग” से होती है। ऐसे भूत योगी का मंगल हो (दीर्घायु/चिरायु रहें) (पल्लाण्डु) !

ऐप्पसियिल् अविट्टत्तिल् अवदरित्तान् वाऴिये

भूत योगी ऐप्पसी (तमिऴ् वर्ष का अश्विन माह) महीने के, त्तिरुवोणम् (श्रवण) (ऐप्पसियिल् अविट्टम्) दिवस पर प्रकट हुए। वे दीर्घायु हों (पल्लाण्डु)!

नन्पुगऴ्सेर् कुरुक्कत्ति नाण्मलरोण् वाऴिये 

कुरुक्कत्ति एक लता है जो माधवीलता के नाम से प्रसिद्ध है। और आऴ्वार् इसी लता के एक पुष्प में प्रकट हुए। सारो योगी के जैसे, वह भी किसी माता  के गर्भ से नहीं जन्मे और इसलिए अयोनिजा हैं। ऐसे भूत योगी दीर्घायु हों (पल्लाण्डु)!

नल्ल तिरुकडल्मल्लै नदनार् वाऴिये

वह तिरुकडल्मल्लै नगर के मार्गदर्शक हैं, वह दीर्घायु हों (पल्लाण्डु)! उन्हें भगवान के कई उपासकों का मार्गदर्शन करने के लिए जाना जाता है!

इन्बुरुगु सिन्दै तिरियिट्ट पिरान् वाऴिये

उन्होंने दीपक के लिए भगवान के प्रति भक्ति रूपी बाती का प्रयोग किया। ऐसे भूत योगी दीर्घायु हों (पल्लाण्डु)!

ऎऴिल् ज्ञानच् चुडर् विळक्कै एट्रिनान् वाऴिये

उन्होंने भगवान के विषय में सच्चे ज्ञान को प्रयोग कर दीपक को प्रज्वलित किया। ऐसे आऴ्वार् दीर्घायु हों (पल्लाण्डु)!

पॊन्पुरैयुन् तिरुवरङ्गर् पुगऴुरैपोन् वाऴिये 

श्रीरङ्गनाथ भगवान उत्कृष्ट स्वर्णिम श्रीरंङ्गम् में नित्य वास करते हैं। भूत योगी का श्रीरङ्गनाथ भगवान पर असीम प्रेम रहा है और उन्होंने अनेक पासुर् द्वारा उनकी स्तुति की है। ऐसे भूत योगी दीर्घायु हों (पल्लाण्डु)!

भूतत्तार् ताळिणै इप्पूतलत्तिल् वाऴिये 

अप्पिळ्ळै कहते हैं ऐसे भूत योगी (भूत्ताऴ्वार्) के कमल चरण इस धरा में दीर्घायु हों (पल्लाण्डु)!

पेयाऴ्वार् (महताह्वय योगी) की महानता 

महताह्वय योगी (पेयाऴ्वार्) तिरुमयिलै (मयिलापूर, चेन्नई) में प्रकट हुए। उनका अवतार दिवस तमिऴ् वर्ष के ७वाँ मास, ऐप्पसी (अश्विन) में शतभिषा (सदयं) नक्षत्र है। उन्होंने मून्ऱाम् तिरुवंतादि (१०० पासुरम् के) की रचना की, जो अन्तादी शैली में ही है। सारो योगी (पॊय्गै आऴ्वार्)और भूत योगी (भूत्ताऴ्वार्) के समान पेयाऴ्वार् भी भगवान की परत्वं/सर्वोच्चता में ही निमग्न रहे। 

महताह्वय योगी का वाऴी तिरुनामम् 

तिरुक्कण्डेन्‌ एन नूरुम्‌ सेप्पिनान्‌ वाऴिये
सिरन्द ऐप्पसियिल्‌ सदयम सेनित्त वळ्ळल्‌ वाऴिये
मरुक्कमऴुम्‌ मयिलै नगर्‌ वाऴ वन्दोन्‌ वाऴिये
मलर्क्करिय नेइदल्‌ तनिल्‌ वन्दुदितान्‌ वाऴिये
नेरुक्किदवे इडैकऴियिल्‌ निन्र सेल्वन्‌ वाऴिये
नेमिसन्गन्‌ वडिवऴगै नेन्जिल्‌ वैप्पोन्‌ वाऴिये
पेरुक्कमुडन तिरुमऴिसैप्‌ पिरान्‌ तोऴुवोन्‌ वाऴिये
पेयाऴ्वार्‌ ताळिनै इप्पेरुनिलतिल वाऴिये

महताह्वय योगी वाऴी तिरुनामम् – सरल अर्थ

तिरुक्कण्डेन्‌ एन नूरुम्‌ सॆप्पिनान्‌ वाऴिये

सारो योगी और भूत योगी द्वारा प्रज्ज्वलित दीपों की सहायता से सर्वप्रथम महताह्वय योगी श्रीमहालक्ष्मी समेत श्रीमन्नारायण के दिव्य मंगल रूप का दर्शन पाए। इसी उत्फुल्लता में उन्होंने १०० पासुरम् गाईं जो “तिरुक् कण्डेन् पॊन्मेनी कण्डेन्” शब्दों से आरंभ होती हैं। ऐसे पेयाऴ्वार् का मंगल हो (दीर्घायु/चिरायु रहें) (पल्लाण्डु) ! 

सिरन्द ऐप्पसियिल्‌ सदयम सॆनित्त वळ्ळल्‌ वाऴिये

उन उदारतम की जय हो, जो मंगलमय ऐप्पसि मास के शतभिषा नक्षत्र में प्रकट हुए, वे चिरंजीवी हों (पल्लाण्डु)! महताह्वय योगी की उदारता का जय-जयकार करने का कारण उनकी दयालुता है। जब उन्हें महालक्ष्मी समेत भगवान का दर्शन प्राप्त हुआ, उन्होंने स्वयं के अनुभव तक सीमित न रखकर उस अनुभव को पासुरम् में रूपांतरित कर सभी के साथ बाँट लिया! ऐसे महताह्वय योगी का मंगल हो (दीर्घायु/चिरायु रहें) (पल्लाण्डु) ! 

मरुक्कमऴुम्‌ मयिलै नगर्‌ वाऴ वन्दोन्‌ वाऴिये

वे मयिलै नामक नगर में प्रकट हुए, जो वकुल पुष्प की सुंगध से घिरा हुआ है। ऐसे महताह्वय योगी का मंगल हो (दीर्घायु/चिरायु रहें) (पल्लाण्डु) ! 

मलर्क्करिय नॆय्दल्‌ तनिल्‌ वन्दुदितान्‌ वाऴिये

वे श्यामवर्णी नीलोत्पल पुष्प में प्रकट हुए। वे भी किसी माँ के गर्भ से जन्म न हुए (अयोनिज)। ऐसे महताह्वय योगी का मंगल हो (दीर्घायु/चिरायु रहें) (पल्लाण्डु) ! 

नॆरुक्किडवे इडैकऴियिल्‌ निन्ऱ सॆल्वन्‌ वाऴिये

तिरुक्कोवलूर नामक दिव्य क्षेत्र में एक अंधड़ युक्त रात्री जब तीनों आऴ्वार् एक संकरे स्थान में खड़े थे, उन्हें ऐसे अनुभव हुआ जैसे कोई उन्हें दबा रहा हो। वे श्रीमहालक्ष्मी समेत भगवान ही थे जो वहाँ उपस्थित हो ग‌ए अपने भक्तों के संग रहने! वहाँ अंधकार होने के कारण, सारो योगी और भूत योगी ने अपने गीतों से दीपक प्रज्ज्वलित किए जिनके प्रकाश में सर्वप्रथम महताह्वय योगी ने श्रीमहालक्ष्मी और भगवान का दर्शन पाया।‌ उस संकीर्ण मार्ग में खड़े रहे महताह्वय योगी जो भगवान की कृपा कटाक्ष और अन्य २ आऴ्वारों के संग भगवान और श्रीमहालक्ष्मी के दर्शन की संपत्ति से प्रतिपादित रहे, ऐसे महताह्वय योगी का मंगल हो (दीर्घायु/चिरायु रहें) (पल्लाण्डु) ! 

नेमिसङ्गन्‌ वडिवऴगै नॆन्जिल्‌ वैप्पोन्‌ वाऴिये

एक भुजा में सुदर्शन चक्र और दूसरे भुजा में पाञ्चजन्य शंख धरे भगवान के अत्यंत तेजोमय स्वरूप के साक्षीभूत महताह्वय योगी थे! ऐसे महताह्वय योगी का मंगल हो (दीर्घायु/चिरायु रहें) (पल्लाण्डु) ! 

पॆरुक्कमुडन् तिरुमऴिसैप्‌ पिरान्‌ तॊऴुवोन्‌ वाऴिये

महताह्वय योगी अत्यंत भक्तिपूर्ण भाव से भक्तिसार योगी (तिरुमऴिसै आऴ्वार्) द्वारा पूछे गए थे। भक्तिसार योगी पूर्व अन्य मतों में पाण्डित्य पाकर क‌ई आध्यात्मिक मार्गों का गहन विश्लेषण करने के पश्चात ही निर्णय किया कि श्रीमन्नारायण ही परब्रह्म परमात्मा हैं। भक्तिसार योगी के सुधार में महताह्वय योगी का बड़ा योगदान रहा है। इससे यह समझा जा सकता है कि महताह्वय योगी और भक्तिसार योगी दोनों समकालीन आऴ्वार् रहे हैं! इतिहास साक्षी है

कि भक्तिसार योगी अपने योगशक्ति से इस भू मंडल में ४७०० वर्षों तक रहे। महताह्वय योगी ने पहचान लिया था कि भक्तिसार योगी में भगवान के प्रति ज्ञान और भक्ति में अपूर्णता थी, अतः उन्होंने तार्किक मार्ग प्रयोग कर उनका विवेक को जागृत किया, उत्तम उपदेश (ज्ञान) देकर उन्हें भगवान श्रीमन्नारायण के महान भक्त के रूप में परिवर्तित कर दिया। भक्तिसार योगी उस क्षण से महताह्वय योगी के प्रति निष्ठावान रहे! ऐसे महताह्वय योगी का मंगल हो (दीर्घायु/चिरायु रहें) (पल्लाण्डु) ! 

पेयाऴ्वार्‌ ताळिनै इप्पॆरुनिलतिल वाऴिये

ऐसे महताह्वय योगी के चरण कमल इस धरा में चिरंजीवी रहे (पल्लाण्डु)!

अडियेन् दीपिका रामानुज दासी
अडियेन् वैष्णवी रामानुज दासी

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