शरणागति गद्य- चूर्णिका 1

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

शरणागति गद्य

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अवतारिका (भूमिका)

इस चूर्णिका को द्वयमंत्र के वर्णन के रूप में जाना जाता है। यह सर्वविदित है कि एकमात्र भगवान श्रीमन्नारायण ही सभी फल प्रदान करने वाले हैं, (“सकल फलप्रदो ही विष्णु” – विष्णु धर्म), तब सर्वप्रथम पिराट्टी (श्रीमहालक्ष्मीजी) के श्रीचरणों में शरणागति क्यों? जिस प्रकार बहुत वर्षों से बिछड़ा हुआ पुत्र घर लौटकर सर्वप्रथम माता के पास जाता है और उनसे भेंट करने के पश्चाद ही पिता से भेंट करता है, उसी प्रकार श्रीरामानुज स्वामीजी अनुभव करते हैं कि उन्हें पहले श्री जी के समक्ष जाकर अपनी व्यथा सुनानी चाहिए। और श्रीजी “सुहृदम् सर्वभूतानाम” (वह जो सभी प्राणियों के कल्याण के विषय में सोचती है- भगवत गीता ) भी है। उनके दोनों नेत्रों में, “चन्द्र” है (अर्थात वे केवल करुणापूर्ण/ दयालु है) यद्यपि भगवान के एक नेत्र में तेज/ ताप (“सूर्य”) और दुसरे में स्नेह/ करुणा (“चन्द्र”) है। श्रीरामानुज स्वामीजी विचार करते हैं कि भगवान नारायण के समक्ष जाने पर उनके पिछले कर्मों की ओर देखकर यदि भगवान उनकी ओर क्रोध से देखेंगे तब क्या? इसलिए वे विचार करते हैं कि सर्वप्रथम श्रीमहालक्ष्मीजी के चरण कमलों में शरणागत होना ही उपयुक्त और सुरक्षित है। श्रीमहालक्ष्मीजी की कृपा और आशीष से ही, उनमें भगवान श्रीमन्नारायण से स्वयं को क्षमा करने की प्रार्थना करने का साहस प्राप्त होगा।

चूर्णिका

ॐ भगवाननारायणाभीमतानुरुप स्वरुपगुणविभवैश्वर्य शीलाद्यनवधिकातिशय असंख्येय कल्याण गुणगणां, पद्मवनालयं, भगवतीम्, श्रियं देवीम्, नित्यानपायिनीम, निरवद्याम्, देवदेवदिव्यमहिषिम्, अखिल जगन्मातरम् अस्मन्मातरम् अशरण्य शरण्याम्,अनन्य शरण: शरणमहं प्रपध्ये ।

शब्दार्थ

भगवान – जिनमें आवश्यक छः गुण निहित है (ज्ञान, बल, ऐश्वर्य, वीर्य, शक्ति, तेजस, जिन्हें आगे विस्तार में समझाया जायेगा)

नारायण – सभी प्राणी, चेतन और अचेतन दोनों के लिए आश्रय/ निवास

अभिमत – भगवान श्रीमन्नारायण को प्रिय

अनुरूप – भगवान श्रीमन्नारायण के समान ही रूप सौंदर्य

स्वरुप – प्राकृतिक विशेषताएं (जिन्हें बाद में समझाया गया है)

रूप – सौंदर्य

गुण – बहुत से विशिष्ट लक्षण

विभव – अकल्पनीय संपत्ति से युक्त

ऐश्वर्य – प्राणियों को नियंत्रित करने या निर्देशित करने का सामर्थ्य

शील – ऐसे गुण जिनके धारक अपने अनुयायियों के दोषों को नहीं देखते

आदि – और भी बहुत से गुणों से पूर्ण

अनवधिका – कभी कम न होने वाला/ अक्षय

अतिशय – अद्भुत

असंख्य – अगणित, जिनकी गिनती न की जा सके

कल्याण गुण गणं – अत्यंत दिव्य कल्याण गुणों की सेना से युक्त

पद्म वनालयाम – पद्म/ कमलों के वन का आसन, विराजने हेतु

भगवतीम् – भगवान के विषय में बताये गए, सभी 6 गुणों को धारण करनेवाली (अर्थात ज्ञान, बल, ऐश्वर्य, वीर्य, शक्ति, तेज)

श्रियं – “श्री” (श्रीमहालक्ष्मीजी, आगे समझाया गया है)

देवीम् – दैदीप्यमान शक्ति से युक्त

नित्यानपायिनीम् – भगवान श्रीमन्नारायण से एक क्षण भी पृथक न होने वाली

निरवद्याम् – बिना किसी दोष के, इन गुणों को धारण करने वाली, स्वयं की प्रतिष्ठा के लिए नहीं, अपितु प्राणियों के कल्याण के लिए

देवदेव दिव्य महिषिम् – सभी देवों के स्वामी, भगवान नारायण की महारानी

अखिल जगन मातरम् – जगत के सभी प्राणियों की माता

अस्मन मातरम् – मेरी भी माता (विशेष गुण)

अशरण्य शरण्य: – जिनका और कोई आश्रय नहीं है, उनके लिए आश्रय

शरणं अहं प्रपद्ये – ऐसे ही दास आपके चरणों में आश्रय लेता है

विस्तृत व्याख्यान

भगवान नारायण– भगवान का अर्थ है वह जिनमें बिना किसी दोष के सभी विशिष्ट गुण निहित है। उन असंख्य गुणों में से, 6 महत्वपूर्ण गुणों को प्रदर्शित किया गया है – ज्ञान, बल, ऐश्वर्य, वीर्य/ वीरता, शक्ति, तेज/ कांति। भगवान श्रीमन्नारायण तीन मुख्य भूमिकाएं निभाते हैं – सृष्टि-कर्ता, रक्षक और संहारक। इन तीनों भूमिकाओं में, दो-दो गुण अत्यधिक महत्वपूर्ण है। संहारक की भूमिका में, उन्हें ज्ञान और बल की आवश्यकता होती है। ज्ञान की आवश्यकता यह सुनिश्चित करने के लिए है कि जब भी आत्मा पृथ्वी पर रहने वाली अपनी देह छोड़े तब वह अपने सभी कर्म और सूक्ष्म भूत (पञ्च इन्द्रियाँ) अपने साथ ले जाये और यह सुनिश्चित करने के लिए कि आत्माओं और उनके कर्मों में आपस में कोई उलझन न हो। प्रलय के समय समस्त सृष्टि को पुनः वापस लेने के लिए बल की आवश्यकता है (ब्रह्मा के एक दिन के अंत में सम्पूर्ण संहार)।

सृष्टि-कर्ता की भूमिका में, उन्हें ऐश्वर्य (नियंत्रण) और वीर्य (शक्ति) की आवश्यकता है –यहाँ ऐश्वर्य का बोध संपत्ति से नहीं है, अपितु मुख्यतः आत्मा की यात्रा में उसे नियुक्त, निर्देशित और संचालन करने की क्षमता से है। वीरता – भगवान द्वारा सृष्टि रचना के पश्चाद भी दुर्बल नहीं होने के सामर्थ्य को दर्शाता है। इतने विशाल परिश्रम के पश्चाद भी वे स्वेद से प्रभावित नहीं होते। यही वीरता है।

रक्षक की भूमिका में, उन्हें शक्ति और तेजस की आवश्यकता है – शक्ति, अपने भक्तों की शत्रुओं से रक्षा करने हेतु और तेज (कांति) यह सुनिश्चित करने के लिए कि भक्तों की रक्षा करते हुए, कोई भी शत्रु उनके समीप आकर उन्हें नुक्सान नहीं पहुंचाए।

“नारायण”, संबोधन सभी चेतन और अचेतन प्राणियों के आश्रय रूप में उनकी भूमिका को दर्शाता है। भगवान शब्द का उल्लेख कुछ अन्य लोगों को सम्मान प्रदान करने के लिए भी किया जाता है (उदाहरण के लिए व्यास भगवान, नारद भगवान आदी), परंतु “नारायण” शब्द सिर्फ उस परमात्मा को संबोधित करता है, दोनों ही रूपों से – शब्द के नैसर्गिक अर्थ के अनुसार और शब्द के अक्षरों के संयोजन के अर्थानुसार भी। नारा: शब्द का संदर्भ सभी चेतन (पशुओं, पौधे, मनुष्यों आदि की बहुत सी प्रजातियों से) प्राणियों के समूह से है और अयन अर्थात आश्रय। जब दोनों शब्दों की संधि की जाती है तब पाणिनि व्याकरण के अनुसार, संधि को “नारायण” अभिव्यक्त किया जाता है, जो सिर्फ श्रीमन्नारायण को ही संबोधित करता है। इस प्रकार शब्द “भगवान नारायण”, श्रेष्ठ गुणों को धारण करने वाले और लीला विभूति (संसार) और नित्य विभूति (श्रीवैकुंठ), दोनों विभूतियों के स्वामी के लिए संबोधित किया गया है।

इस संबंध में यह प्रश्न उत्पन्न हो सकता है कि श्रीजी के चरणों में शरणागति निवेदन करते हुए, श्रीरामानुज स्वामीजी ने भगवान नारायण के विषय में चर्चा क्यों की? जिस प्रकार खेत की सिंचाई के लिए जल की और झील के लिए बाँध की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार श्रीजी के अनंत दिव्य गुणों और उनकी दिव्य संपत्ति का वर्णन भी आवश्यक है। जिस प्रकार भगवान नारायण के लिए “श्रीमन” संबोधन किया जाता है, उसी प्रकार श्रीमहालक्ष्मीजी के लिए “विष्णु-पत्नी” संबोधन किया जाता है। श्रीजी के महात्म्य को समझने के लिए, हमें श्रीमन्नारायण के प्रभुत्व को जानना आवश्यक है।

अभिमत अनुरूप – श्रीलक्ष्मीजी सदा भगवान की प्रिया है और उनका सौंदर्य सदा ही भगवान के सौंदर्य के अनुरूप है। अपने सामान्य जीवन में हम उन दंपत्तिओं को देखते हैं, जहाँ दोनों ही सुंदर हो या दोनों ही सदगुणी हो। मात्र दिव्य दंपत्ति में ही हमें दोनों प्रकार के गुण दोनों में देखने को मिलते हैं, अर्थात अभिमत और अनुरूप। दोनों को परस्पर एक दुसरे में क्या प्रिय है और दोनों में परस्पर क्या अनुरूप, इसे आगे समझाया गया है।

स्वरुप रूप गुण विभव ऐश्वर्य शीलादी – अर्थात, श्रीजी का स्वरुप भगवान को प्रिय है और भगवान का स्वरुप श्रीजी को प्रिय है। ऐसा ही उनके सभी गुण विशेषताओं के साथ है। जब रावण सीताजी को श्रीराम का विक्षत शीश दिखाता है और उसी प्रकार जब इंद्रजीत सीताजी का विक्षत शीश श्रीराम को दिखाता है, सर्वप्रथम वे दोनों अचंभित होते हैं परंतु वे जानते थे की यह सत्य नहीं है। यह उस स्वरुप के कारण है, जो उन दोनों को एक दुसरे से प्रिय है। रूप के संदर्भ में भी, वे दोनों एक दूसरे के लिए उपयुक्त है। उनका दिव्य रूप सौंदर्य एक दूसरे को पूर्ण करता है।

यहाँ गुण का संदर्भ दिव्य विग्रह के सौन्दर्य से है– सौंदर्य (दिव्य विग्रह/ तिरुमेनी के संदर्भ में सुंदरता, लावण्य (रूप के सभी तत्वों में सुंदरता)) आदि गुण। इन गुणों के द्वारा श्रीजी भगवान से हमारी ओर दयादृष्टि करने और हमारे अपराधों को क्षमा करने की सिफारिश करती है और इसलिए उनके यह गुण भगवान को बहुत प्रिय है।

विभव अर्थात संपत्ति। यदि श्रीजी वचन हैं, तो भगवान उस वचन का अर्थ हैं। वे दोनों अवियोज्य है। वह सब जो पौरुष है, उस पर भगवान की मोहर है और वह सभी जो स्त्री-लिंग है उन पर श्रीजी की मोहर है। श्रीजी की संपत्ति भगवान को अति प्रिय है और वह संपत्ति उस प्रकार नहीं है जैसी भगवान धारण करते है (पुष्प की माला, चन्दन का लेप, तोता आदि)।

ऐश्वर्य – प्राणियों को नियंत्रित करने या निर्देशित करने का सामर्थ्य। वे तीन प्रकार के चेतनों, जैसे बद्धात्मा (हमारे समान), मुक्तात्मा (जो मोक्ष प्राप्त कर श्रीवैकुंठ में कैंकर्य कर रहे हैं) और नित्यात्मा (जो नित्य अनंत से श्रीवैकुंठ में हैं और हमारे समान संसार में जन्म नहीं लेते) को नियंत्रित करती है, बद्धात्मा को उनके कर्मों के माध्यम से और स्वरुपानुरूप (शेषभूत और पारतंत्रिय के द्वारा, मुक्तात्मा और नित्यात्मा को) नियंत्रित करती है। वे भगवान श्रीमन्नारायण को भी अपने प्रेम और स्नेह के द्वारा उनके पालक/ रक्षक स्वरुप का स्मरण कराती है और यह सुनिश्चित करती है कि वे बद्धात्मा द्वारा शरणागति करने पर उन्हें मोक्ष प्रदान करे। भगवान उनकी इस भूमिका को देखकर बहुत प्रसन्न होते हैं, क्यूंकि उत्तम पुरुष के विषय में ऐसा कहा गया है कि उत्तम पुरुष अपनी पत्नी के विचारों का सम्मान करते हैं। ऐश्वर्य के विषय में बताई गयी सभी विशेषताएं अन्य गुणों जैसे ज्ञान, बल, वीर्य, शक्ति और तेज के लिए भी उपयुक्त है।

शील – ऐसा गुण जिसके धारक अपने अनुयायियों के दोषों को नहीं देखते; उच्च स्तर के चेतन अपने से नीचे वाले प्राणियों के साथ चलते हैं, उन्हें समान जानते हुए; श्रीजी अपने आचरण और व्यवहार से भगवान के सदृश ही है। श्रीराम अवतार में भगवान ने साधारण सामान्य जनों से प्रेम पूर्वक व्यवहार किया जैसे गुह (केवट), सुग्रीव (वानर राज) और विभीषण (एक राक्षस)। उसीप्रकार श्रीजी ने भी सीताजी के अवतार में उन राक्षसनियों से प्रेम पूर्वक व्यवहार किया जिन्होंने राक्षस रावण की बात मनवाने के लिए उनसे दुर्व्यवहार किया। उन्होंने रावण को भी सचेत किया कि जीवित रहने के लिए उसे श्रीराम से मित्रता कर लेना चाहिए। उन्होंने उसे परामर्श देने में संकोच नहीं किया यद्यपि वह अत्यंत नीच प्रवृत्ति का था। यह गुण भगवान को बहुत प्रिय है क्यूंकि यह भूमिका (पालनहार) भगवान भी प्रायः धारण करते हैं।

आदि – इसका अर्थ है की उपरोक्त वर्णित गुणों से प्रारंभ करते हुए, श्रीजी में ऐसे और भी बहुत से गुण निहित हैं। भगवान के गुणों की व्याख्या करना यद्यपि संभव है परंतु श्रीजी के गुणों के विषय में चर्चा करना असंभव है,- ऐसा व्याख्यानकर्ता श्रीपेरियवाच्चान पिल्लै का कहना है।

अनवधिकातिशय – उपरोक्त वर्णित सभी गुण, विस्तार के संदर्भ में असीमित है और अद्भुत है।

असंख्य – अगणित गुण

कल्याण गुण गणाम् – यह सभी गुण भी दिव्य है। यह गुण जो भगवान में भी विद्यमान है, परस्पर एक दुसरे के पूरक है। यद्यपि कभी भगवान में दोष देखा जा सकता है– क्यूंकि वे पुर्णतः स्वतंत्र है, परंतु श्रीजी के गुणों में कोई भी दोष नहीं खोज सकता। भगवान का स्वातंत्रियम गुण, उन्हें हमारे द्वारा अपराध करने पर क्रोधित कर सकता है, परंतु श्रीजी हमारे अपराधों को भी सत्कर्मों में परिवर्तित कर देती है। और उनके सभी गुण अत्यंत प्रचुर मात्रा में है।

पद्मवनालयाम् –  इसका संदर्भ दिव्य कल्याण गुणों से है। वे स्वयं श्रीभगवान को दिव्य सुगंध प्रदान करती है, जिन्हें “सर्व गंध:” (सभी सुगंधों का प्रतीक) संबोधित किया जाता है। इसका संदर्भ इससे भी है कि वे भगवान से अत्यंत प्रेमपूर्वक व्यवहार करती है और उनके आनंद/ प्रसन्नता का स्त्रोत है।

भगवतिम् – इस व्याख्यान में उल्लेखित 6 गुण जिन्हें भगवान ने धारण किया है, उन्हें श्रीजी भी धारण करती है। उनकी पूजा करने में भगवान को भी प्रसन्नता होगी। पद्मवनालयां भगवतिम् एक साथ इन दोनों शब्दों का अर्थ है कि यदि शरणागत श्रीजी के द्वारा भगवान तक पहुँचता है, तब वह अपनी मधुरता से सुनिश्चित करती है कि भगवान उस शरणागत के समस्त दोषों पर ध्यान न दे और उन्हें इच्छानुसार मोक्ष प्रदान करेंगे।.

श्रियम् – यद्यपि इस संसार में सभी उनके श्रीचरणों में आश्रय प्राप्त करते हैं, और वे भगवान का आश्रय धारण करती है। वे सभी को नियंत्रित करती है और वे भगवान द्वारा नियंत्रित होती है। यद्यपि वे परस्पर एक दूसरे से अवियोज्य है, जिस प्रकार मणि और उसकी चमक अथवा पुष्प और उसकी सुगंध। श्रियं, “श्री:” शब्द से उत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ है सभी में अग्रणी, जिनके नायक भगवान है; वे हमारे रुदन को सुनकर, उस विनती को भगवान के समक्ष पहुँचाती है; वे हमारे सभी पूर्व दुराचारों और अपराधों को क्षमा कर हमें भगवान तक पहुँचाती है।

देविम – संपूर्णतः कांतिमय/ आभायमान।

नित्यानपायिनीम् – सदा सर्वदा भगवान के साथ निवास करती है, और उनसे अविभाज्य है जैसे की विष्णु पुराण में कहा गया है “विष्णोर श्रीरनपायनिम”

निरवद्याम् –किसी दोष/ त्रुटी के बिना, अन्य शब्दों में यदि उपरोक्त उल्लेख किये सभी विशेष गुण उनके साथ स्वयं के आनंद के लिए होते, तब वह दोषयुक्त समझा जाता। परंतु यह सभी गुण उनके आश्रितों को राहत प्रदान करने के लिए है, इसलिए यह संपूर्णतः दोष रहित है।

देवदेव दिव्य महिषिम् –सभी देवताओं के स्वामी की महारानी अर्थात श्रीभगवान की महिषी।

अखिलजगन्मातरम् – सभी प्राणियों की माता (सभी तीन प्रकार की जीवात्माएं)। वे सभी प्राणियों के कल्याण के लिए सदा चिंतित रहती है।

असमान मातरम् – श्रीरामानुज स्वामीजी स्वयं को ऐसे ही प्राणी के रूप में बोध करते हैं, परंतु किंचित विशेष टिपण्णी में श्रीजी को अपनी माता के रूप में भी पृथक उल्लेख करते हैं।

अशरण्य शरण्याम् – उनके लिए अंतिम आश्रय, जिनका और कोई आश्रय नहीं है। यदि हम किंचित मात्र भी अच्छे गुण प्रदर्शित करते हैं, तो वे हमारे सभी दोषों और अपराधों को क्षमा करती है। और यद्यपि हममें किंचित मात्र भी अच्छे गुण नहीं है, तब भी वे हमारे दोषों की उपेक्षा करती है। साधारणतय भगवान श्रीमन्नारायण ही निराश्रितों के अंतिम आश्रय हैं। परंतु उन प्राणियों के लिए जिनके लिए भगवान को प्राप्त करना दुर्लभ है, श्रीजी ही अंतिम आश्रय है।

अनन्यशरण: अहं – श्रीजी पूछती है – क्या ऐसा कोई है जिसका और कोई आश्रय नहीं है? श्रीरामानुज स्वामीजी निवेदन करते हैं “अहं” (अर्थात मैं) ही वो किंचित व्यक्ति हूँ।

शरणं प्रपध्ये – “ऐसा मनुष्य जिसके पास कोई और आश्रय नहीं है और जो आपकी शरण में आया है, अब उपाय स्वरुप आपके श्रीचरण कमलों में शरणागति निवेदन करता है,” प्रथम चूर्णिका के इस अंतिम पद में श्रीरामानुज स्वामीजी यही अनुरोध करते हैं।

अब हम द्वितीय चूर्णिका की ओर अग्रसर होंगे।

– अडियेन भगवती रामानुजदासी

आधार – http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2015/11/saranagathi-gadhyam-1/

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