आर्ति प्रबंधं – ५२

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम: आर्ति प्रबंधं << पाशुर ५१   उपक्षेप मामुनि कहतें हैं कि, श्री रामानुज के असीमित कृपा के कारण उन्हें (मामुनि को) अपने व्यर्थ हुए काल कि अफ़सोस करने का मौका मिला।  आगे इस पासुरम में वें ,श्री रामानुज के कृपा की फल के रूप में ,पेरिय … Read more

आर्ति प्रबंधं – ४९

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम: आर्ति प्रबंधं << पासुर ४८ उपक्षेप पिछले पासुरम में, “ऐतिरासन अडि नँणादवरै एँणादु” कहकर वें साँसारिक व्यवहारों में ही ढूबे लोगों के प्रति अपने विरक्ति  प्रकट करतें हैं। किंतु उन्कि हृदय नरम  होने कि कारण उन्से धर्ति वासियों की पीड़ा कि सहन न होती हैं। अपने अत्यंत कृपा … Read more

आर्ति प्रबंधं – ४७

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम: आर्ति प्रबंधं << पाशुर ४६ उपक्षेप “ऐतिरासर्काळानोम याम” कहते हुए, संतुष्ट होकर, मामुनि “रामानुज” दिव्य नाम कि महान्ता  को प्रकट करने का इच्छा करतें हैं। मामुनि का मानना है कि पूर्व पासुरम में “ माकान्त नारणनार” और “नारायणन तिरुमाल” से कहें  गए “नारायणा” दिव्य नाम से … Read more

आर्ति प्रबंधं – ४६

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम: आर्ति प्रबंधं << पासुर ४५ उपक्षेप पिछले पासुरम में मामुनि ,आचार्य के महत्त्व कि श्रेय जो गाते हुए उन्हीं के कृपा को अपनी उन्नति की कारण बतातें हैं।  इसी विषय कि इस पासुरम में और विवरण देतें हैं। पासुरम ४६ तिरुवाय्मोळि पिळ्ळै तीविनैयोंदम्मै गुरुवागि वंदु उय्यक्कोंडु – … Read more

आर्ति प्रबंधं – ४५

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम: आर्ति प्रबंधं << पासुर ४४ उपक्षेप पिछले पासुरम में, मामुनि सर्वव्यापी श्रीमन नारायण की  “माकांत नारणनार वैगुम वगै” से श्रेय गाए। वें उस पासुरम के “मोहान्तक” से चित्रित किये गए सबसे नीच जीव खुद को मान्ते हैं। यहीं इस पासुरम का सारांश हैं जहाँ वें खुद को,, … Read more

आर्ति प्रबंधं – ४४

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम: आर्ति प्रबंधं << पासुर ४३ उपक्षेप पिछले पासुरम में मामुनि ने कहा, “इंद उलगिल पोरुंदामै एदुमिल्लै अंद उलगिल पोग आसयिल्लै” . इस्का अर्थ है कि मामुनि को इस साँसारिक लोक में रहने कि दिलचस्पी में कोई कमी नहीं और परमपद पहुँचने में ख़ास दिलचस्पी नहीं हैं। यह … Read more

आर्ति प्रबंधं – ४३

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम: आर्ति प्रबंधं << पासुर ४१ उपक्षेप पिछले पासुरम में मामुनि कहतें हैं : “इरंगाय एतिरासा” . इससे ये माना जा सकता है कि मामुनि अपनि निराशा प्रकट कर रहें हैं।  परमपद पहुँचने कि इच्छा करने वाले को दो विषयाँ आवश्यक हैं १) वहाँ जाने कि इच्छा २) … Read more

आर्ति प्रबंधं – ४२

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम: आर्ति प्रबंधं << पासुर ४१ उपक्षेप श्री रामानुज सोचने लगे, “हमारी  कितनि सौभाग्य है जो मामुनि जैसे “आकिंचन्यम” (उपहार के रूप में देने केलिए कुछ न हो) और “अनन्यगतित्वं” (कोई भी किस्म कि आश्रय न होना ) में अटल व्यक्ति को हम पाये। अति प्रसन्नता के सात … Read more

आर्ति प्रबंधं – ४०

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम: आर्ति प्रबंधं << पासुर ३९ पासुरम ४० अवत्ते पोळुदाई अडियेन कळित्तु इप्पवत्ते इरुक्कुम अदु पणबो ? तिवत्ते यान सेरुम वगै अरुळाय सीरार ऐतिरासा पोरुम इनि इव्वुडंबै पोक्कु शब्दार्थ अडियेन  – मैं, श्री रामानुज के नित्य दास अवत्ते  कळित्तु  –  ऐसे ही व्यर्थ  किए पोळुदाई  – वे सुनहरे … Read more

आर्ति प्रबंधं – ३९

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम: आर्ति प्रबंधं << पासुर ३८ उपक्षेप यह पासुरम कुछ लोगों के प्रश्न कि मामुनि के उत्तर के रूप में है। लोग मामुनि से प्रश्न करतें हैं, “ हे मामुनि! पिछले पासुरम में आपने कहाँ कि, आपका मन श्री रामानुज के चरण कमलों से अन्य सारे विषयों के … Read more