आर्ति प्रबंधं ३६

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम: आर्ति प्रबंधं << पासुर ३५  उपक्षेप पिछले पासुरम में, मामुनि कहते हैं कि, “मरुळाले पुलन पोग वांजै सेय्युं एनदन”, जिस्से वें श्री रामानुज से, क्रूर पापों से प्रभावित इन्द्रियों के निमंत्रण से अपने बुद्धि को बहलाने केलिए  विनति करतें हैं। परंतु इसके पश्चात भी पापों का असर रहती … Read more

आर्ति प्रबंधं ३५

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम: आर्ति प्रबंधं << पासुर ३४   उपक्षेप मामुनि श्री रामानुज से कहतें हैं , “स्वामी! बाधाओं को निकाल कर मेरी रक्षा करने में ही आपकी चिंता हैं।  आपके अत्यंत कृपा के कारण, आपके प्रति कैंकर्य करने  कि अवसर दिलाने की इच्छा रखते हैं।  किन्तु साँसारिक रुचियाँ ऐसे कैंकर्य … Read more

आर्ति प्रबंधं ३४

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम: आर्ति प्रबंधं << पासुर ३३ उपक्षेप मणवाळ मामुनि के कल्पना में श्री रामानुज के एक प्रश्न, इस पासुरम का मुखबंध के रूप में है।  इस काल्पनिक प्रश्न का उत्तर ही यह पासुरम है।  वह प्रश्न है, “ ऐसा मान लें कि मेरी अत्यंत कृपा हैं , परन्तु आपके … Read more

आर्ति प्रबंधं ३३

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम: आर्ति प्रबंधं << पासुर ३२ पासुरम ३३ इन्नम एत्तनै कालम इंद उडम्बुडन यान इरुप्पन   इन्नपोळूदु उडम्बु  विडुम इन्नपडि अदुतान   इन्नविडत्ते  अदुवुम एन्नुम इवैयेल्लाम ऐतिरासा नी अरिदी यान इवै ओन्ररियेन एन्नै इनि इव्वुडैमबै विडुवित्तु उन अरुळै ऐरारुम वैकुंठत्तेट्र निनैवु उणडेल पिन्नै विरैयामल मरन्दु इरुक्कीरदेन ? पेसाय पेदैमै तीरन्दु … Read more

आर्ति प्रबंधं ३२

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम: आर्ति प्रबंधं << पासुर ३१ उपक्षेप पिछले पासुरम के “अऱमिगु नरपेरुमबूदूर अवदरित्तान वाळिये” का अर्थ यह हैं कि श्री रामानुज “श्रीपेरुमबूदूर” नामक क्षेत्र में अवतार किये। उससे, इस पासुरम में मणवाळ मामुनि उस श्रेष्ट दिवस को मनाते हैं, जो हैं हम संसारियों के प्रति श्री रामानुज के इस … Read more

आर्ति प्रबंधं ३१

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम: आर्ति प्रबंधं << पासुर ३० उपक्षेप पिछले पासुरं में मणवाळ मामुनि, एक से अधिक बार श्री रामानुज के मँगळं (श्रेय) गायें। हर एक को  इस आदत की तरस/आर्ति होनी चाहिए।  इस पासुरं में मणवाळ मामुनि , १) वेदों से भिन्न कई सिद्दांतों को रचने वालों और २) … Read more

आर्ति प्रबंधं – ३०

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम: आर्ति प्रबंधं << पासुर २९   उपक्षेप इस पासुरम में श्री रामानुज के चरण कमलों से प्रारंभित, उनके सिर तक उन्के श्रेय की मंगळम गाते हैं मणवाळ मामुनि ।  . मणवाळ मामुनि को लगता है कि अन्य धर्मों के जनों के सात बहुत वाद करने से श्री … Read more

आर्ति प्रबंधं – २९

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम: आर्ति प्रबंधं << पासुर २८ उपक्षेप परमपद के पथ में आनेवाली बाधाओँ से रक्षण जिन्की आशीर्वाद से साध्य है उन श्री रामानुज के जयों के श्रेय, मणवाळ मामुनि इस पासुरम में गाते हैं। वेदों को तिरस्कार करने वाले तथा वेदों की अर्थों को अनर्थ प्रकट करने वालों … Read more

आर्ति प्रबंधं – २८

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम: आर्ति प्रबंधं << पासुर २७ उपक्षेप नेक और ज्ञान संबन्धित कार्यो में व्यस्त रहने पर भी परमपद की रुचि या इच्छा मणवाळ मामुनि के मन में श्री रामानुज के अनुग्रह से ही उत्पन्न हुई।  श्री रामानुज के इस अत्यंत कृपा को मणवाळ मामुनि इस पासुरम में प्रशंसा … Read more

आर्ति प्रबंधं – २७

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम: आर्ति प्रबंधं << पासुर २६ उपक्षेप पिछले पासुरम में मणवाळ मामुनि, श्री रामानुज से प्रार्थना करते हैं , “ ओळि विसुम्बिल अड़ियेनै ओरुप्पडुत्तु विरैन्दे” अर्थात, परमपद पहुँचने की व्यवहार को शीघ्र ही पूर्ण करें। “वाने तरुवान एनक्काइ”(तिरुवाय्मोळि १०. ८. ५ ) के अनुसार श्री रामानुज मणवाळ मामुनि … Read more