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परकाल सूरी (तिरुमङ्गै आऴ्वार्) की महिमा
परकाल सूरी का जन्म तिरुक्कुऱैयलूर् दिव्य देश (पावन स्थल) में हुआ था। उन्हें नीलन्, कलियन्, और परकालन् के नाम से भी जाना जाता है। वह एक महान योद्धा थे और उनमें असाधारण पराक्रम था। इसलिए, उन्हें उचित रूप से कलियन् (योद्धा) कहा जाता था। अन्य दर्शनों के उपदेश देने वालों के लिए वे साक्षात् काल (मृत्यु के देवता) के समान थे, इसलिए उन्हें परकालन् भी कहा जाता था। वे अन्य दर्शनों के लोगों के साथ कई शास्त्रार्थ (विवाद) जीते हैं। ऐसा भी कहा जा सकता है कि उन्हें ‘परकालन्’ नाम इसलिए मिला क्योंकि उनके तर्कों को देखकर स्वयं पेरुमान् (भगवान) भी भयभीत हो जाते थे। उनका जन्म कार्तीक महीने के कृत्तिका नक्षत्र में हुआ था। उन्होंने कृपापूर्वक छः (६) प्रबन्ध (दिव्य ग्रंथ) प्रदान किए हैं। क्रमशः पेरिय तिरुमोऴि, तिरुकुरुन्ताण्डगम्, तिरुवॆऴुकूट्रिरुक्कै, सिऱिय तिरुमडल्, पेरिय तिरुमडल्, और तिरुनॆडुन्ताण्डगम् उनकी रचनाएँ हैं। वे तिरुनऱैयूर् नम्बी भगवान और तिरुक्कण्णापुरम् सौरिराज भगवान (पॆरुमाऴ्) के परम भक्त थे। इन दोनों भगवद् स्थलों में साक्षात अर्चारूपी भगवान् परकाल सूरी के लिए साक्षात आचार्य हैं। उन्होंने अपने ‘आडल्मा’ नामक घोड़े पर सवार होकर कई दिव्यदेशों (पवित्र मंदिरों) की यात्रा की है और वहाँ भगवान की स्तुति पूर्वक मंगलाशासन किये हैं। परकाल सूरी अकेले ने चालीस से अधिक दिव्य देशों के लिए मंगलाशासन किया है। अगर उनकी कृपा न होती, तो हम उन दिव्य देशों के बारे में कदापि नहीं जान पाते। इतना ही नहीं, उन्होंने श्रीरङ्गम् सहित कई दिव्य देशों में कई कैंकर्य (सेवाएँ) भी किए हैं। वह आऴ्वारों के क्रम में अंतिम आऴ्वार् है। वह शठकोप स्वामी (नम्माऴ्वार्) के परम भक्त थे। शठकोप स्वामी के चार प्रबंध को चारों वेदों के समान माना जाता है। जिस प्रकार चारों वेदों के छह अंग होते हैं, उसी प्रकार परकाल सूरी के छह प्रबंध, शठकोप स्वामी के चार प्रबन्धों के छह अंग हैं।
परकाल सूरी का वाऴि तिरुनामम् :
कलन्द तिरुक्कार्त्तिकैयिल् कार्त्तिकै वन्दोन् वाऴिये
कासिनियिल् ऒण् कुऱैयलूर् कावलोन् वाऴिये
नलम् तिगऴ् आयिरत्तॆन्पत्तु नालुरैत्तान् वाऴिये
नालैन्दुम् आऱैन्दुम् नमक्कुरैत्तान् वाऴिये
इलङ्गेऴुकूट्रिरुक्कै इरुमडल् ईन्दान् वाऴिये
इम्मून्ऱिल् इरुनूर्तिरुपत्तेऴीन्दान् वाऴिये
वलम् तिगऴुम् कुमुदवल्लि मणवाळन् वाऴिये
वाट्कलियन् परकालन् मङ्गैयर् कोन् वाऴिये
परकाल सूरी वाऴि तिरुनामम् — सरल व्याख्या
- कलन्द तिरुक्कार्त्तिकैयिल् कार्त्तिकै वन्दोन् वाऴिये – कार्तिक महीने के कार्त्तिक (कृत्तिका) नक्षत्र में अवतरित हुए परकाल सूरी चिरंजीवी हो (पल्लाण्डु)।!
- कासिनियिल् ऒण् कुऱैयलूर् कावलोन् वाऴिये – परकाल सूरी का जन्म तिरुक्कुऱैयलूर् नामक स्थान पर हुआ था, जो पृथ्वी पर एक तेजस्वी स्थान है। उन्होंने इसके रक्षक के रूप में कार्य किया और शहर की रक्षा की, जो बाद में ‘तिरुमंगै देशम’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। वह इस भूमि के एक प्रतिष्ठित राजा थे। उन्हें पेरुमाऴ् (भगवान) द्वारा सच्चा ज्ञान प्रदान किया गया और आशीर्वाद दिया गया। ऐसे महान परकाल सूरी दीर्घायु हों (पल्लाण्डु)।!
- नलम् तिगऴ् आयिरत्तॆन्पत्तु नालुरैत्तान् वाऴिये – परकाल सूरी ने कृपा करके हमें 1084 पासुरमों (भक्ति पदों) के ‘पेरिय तिरुमोऴि’ प्रबंधम प्रदान किया है। इस पासुरों में, वे ऎम्पॆरुमान (भगवान) के सामने “वाडिनेन् वाडि वरुन्दिनेन्” (वाडिनेन् – मैंने कष्ट झेला, वाडि – कष्ट झेलने के बाद, वरुन्दिनेन्- मैंने दुःख का अनुभव किया) कहकर इस भौतिक संसार में अपनी दुस्स्थिति को प्रकट करते हैं। तिरुवायमॊऴि की तरह, जिसे वेदों का सार माना जाता है, पेरिय तिरुमोऴि में भी कई गहरे और गूढ़ अर्थ समाहित हैं। एक हजार चौरासी पासुरमों से युक्त पेरिय तिरुमोऴि को कृपापूर्वक प्रदान करने वाले परकाल सूरी दीर्घायु हों (पल्लाण्डु)।
- नालैन्दुम् आऱैन्दुम् नमक्कुरैत्तान् वाऴिये – चारों(4) और पांच (5) – का गुना यानि 20 (इन दो कारकों का गुणनफल)। छह (6) और (5) – का गुना यानि 30 (इन दो कारकों का गुणनफल)। परकाल सूरी ने कृपा करके हमें दो महान ग्रंथ प्रदान किए – तिरुकुरुन्ताण्डगम् (२० पाशुरों के साथ) और तिरुनॆदुन्ताण्डगम (३० पाशुरों के साथ)। वे दीर्घायु हों।पराशर भट्टर परकाल सूरी के अंतिम ग्रंथ, तिरुनॆदुन्ताण्डगम् में बहुत लीन रहते थे। तिरुनॆदुन्ताण्डगम् के पाशुरों को उद्धृत करके ही, पराशर भट्टर ने माधवाचार्य के साथ अपना शास्त्रार्थ जीता; पराशर भट्टर ने उनका उद्धार किया और उन्हें श्रीवैष्णव सम्प्रदाय में दीक्षित किया। इसके बाद, माधवाचार्य अत्यधिक सम्मानित हुए और उन्हें ‘नञ्जीयर’ के नाम से जाना गया। तिरुमंगै आळवार्, जिन्होंने हमें यह महान ग्रंथ—तिरुनॆदुन्ताण्डगम् जो शास्त्र के रूप में अत्यधिक महिमामंडित है—प्रदान किया, वे सदा चिरंजीवी रहें (पल्लाण्डु)।
- इलङ्गेऴुकूट्रिरुक्कै इरुमडल् ईन्दान् वाऴिये – इस प्रबन्ध (तिरुवेऴुकूट्रिरुक्कै) में, परकाल सूरी ने तिरुक्कुडन्दै ऎम्पॆरुमान, आरावमुदन के चरणों में शरणागति की । इस प्रबन्ध के पाशुरों (पदों) की रचना इतनी सुंदर है कि उनकी काव्य-संरचना से एक रथ का आकार बनाया जा सकता है। इसमें एक पंक्ति में संख्याओं (1 2 3) का प्रयोग होता है, फिर अगली पंक्ति में (1 2 3 2 1) का, फिर उससे अगली में (1 2 3 4 5 4 3 2 1), और इसी तरह (1 2 3 4 5 6 5 4 3 2 1) का, इस प्रकार से कि वे एक रथ का आकार ले लेते।
परकाल सूरी ने और दो सुंदर प्रबंधम – ‘सिरिय तिरुमडल्’ और ‘पेरिय तिरुमडल्’ – की भी रचना की है। इन दोनों प्रबंधमों में, आऴ्वार् ‘पिराट्टि’ (दिव्य माता/नायिका) का स्थान ग्रहण करते हैं, और विरह की पीड़ा के कारण, ‘मडल्’ (माधुर्य भाव या प्रियतम को पाने के लिए सार्वजनिक रूप से प्रणय निवेदन) करने की अपनी इच्छा का वर्णन करते हुए इन पाशुरों (पदों) की रचना करते हैं।उन्होंने परकाल नायकी के रूप में ,एक स्त्री भाव धारण करके इन दो प्रबंधमों की रचना की है। मडल् माने प्रेमिकों (पुरुष/स्त्री) के बीच की जाने वाली एक गतिविधि है। ये तब की जाती है कि ,जब कोई एक दूसरे के प्रेम को स्वीकार करने से इनकार कर देता है।ऐसी स्थिति में, एक दूसरे पर सार्वजनिक स्थानों पर आरोप लगाए।
यह इसलिए किया जाता है ताकि बदनामी हो और दूसरा व्यक्ति जनता से डरकर से प्रेम को स्वीकार कर ले और मिलन हो सके। लेकिन मडल् करने का यह कार्य स्वरूप-विरोध (जीवात्मा की प्रकृति के विपरीत) है। लेकिन हम अपने पूर्वाचार्यों की व्याख्याओं के माध्यम से यह समझ पाते हैं कि ऎम्पॆरुमान् के प्रति अत्यधिक प्रेम और ऎम्पॆरुमान् के वियोग में न रह पाने के कारण, ऎम्पॆरुमान् को पाने की तीव्र इच्छा से विवश होकर, आऴ्वार् ने अपने पाशुरों में ऐसे कठोर कार्यों को प्रकट किया है। परकाल सूरी जिन्होंने तिरुवॆऴुकूट्रिरुक्कै, सिरिय तिरुमडल्, और पेरिय तिरुमडल् जैसे महान प्रबंधों की रचना की है, वे दीर्घायु हों पल्लाण्डु। - इम्मून्ऱिल् इरुनूर्तिरुपत्तेऴीन्दान् वाऴिये – इन तीन प्रबंधमों—तिरुवॆऴुकूट्रिरुक्कै , सिरिय तिरुमडल , और पेरिय तिरुमडल — में कुल पासुरमों की संख्या दो सौ सत्ताईस (227) है। परकाल सूरी, जिन्होंने इन तीन प्रबंधमों के माध्यम से हमें दो सौ सत्ताईस पासुरों को कृपापूर्वक प्रदान किए, वे चिरकाल तक जीवित रहें (पल्लाण्डु)।!
टिप्पणी – यद्यपि इन प्रबंधमों को एकल पासुर प्रबंधम माना जाता है, पर इसका एक वैकल्पिक मत भी है। - वलम् तिगऴुम् कुमुदवल्लि मणवाळन् वाऴिये – कुमुदवल्ली नाच्चियार (देवी) कभी भी परकाल सूरी से अलग नहीं होती हैं; वह हमेशा परकाल सूरी के दाहिनी ओर उपस्थित रहती हैं।यह कुमुदवल्ली नच्चियार् की प्रेरणा के माध्यम से ही , परकाल सूरी ऎम्पॆरुमान के प्रति में अत्यंत लीन होकर और समर्पित हो गए।नीलन् (जिन्हें बाद में परकाल सूरी के नाम से जाना गया) सुंदर सी कुमुदवल्ली नाचियार से आकर्षित हुए और उनसे विवाह करना चाहते थे। परन्तु कुमुदवल्ली नच्चियार् ने एक शर्त रखी कि,वह केवल उसी श्रीविष्णव से विवाह करूंगी , जिसे किसी आचार्य से पांच संस्कार प्राप्त हुआ हो और हर रोज 1008 भागवतों का तदीयाराधन करेगा, तभी उन्हें अपना पति के रूप में स्वीकार करूंगी। जब आऴ्वार् तिरुनऱैयूर् नंबि पेरुमाऴ् से पञ्च संस्कार प्राप्त कर और तुरन्त 1008 श्रीविष्णवों वा भागवतो का तदीयाराधना प्रबंध किया तब जाकर कुमुदवल्ली नच्चियार् का शर्त पूरा हुआ।तब नच्चियार् ने उनसे विवाह किया।अपनी दाहिनी ओर कुमुदवल्ली नच्चियार् को धारण करने वाले परकाल सूरी को पल्लाण्डु !
- वाट्कलियन् परकालन् मङ्गैयर् कोन् वाऴिये – जिन परकाल सूरी को कलियन् और परकालन् के नाम से भी जाना जाता है, जिनके हाथों में तलवार सुशोभित है और जो तिरुमङ्गै क्षेत्र के राजा हैं, वे चिरकाल तक जीवित रहें (पल्लाण्डु)!
अडियेन् श्री तेजा रामानुज दासी।
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