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मधुरकवि आऴ्वार् का वैभव

मधुरकवि आऴ्वार् का जन्म तिरुक्कोलूर दिव्य देशम् में हुआ, जो आऴ्वार् तिरुनगरी के निकट स्थित है। उनका जन्म चैत्र (चित्तिरै) मास में चित्रा (चित्तिरै) नक्षत्र के दिन हुआ था। उन्होंने ११ पासुरों का एक अद्भुत प्रबन्ध “कण्णिनुञ् चिऱुत्ताम्बु” रचा। वे पूर्णतः अपने आचार्य श्री शठकोप स्वामी (नम्माऴ्वार्) में निमग्न थे। उन्होंने संसार को आचार्य-भक्ति का सर्वोच्च आदर्श दिखाया।
मधुरकवि आऴ्वार् वाऴि तिरुनामम्
चित्तिरैयिल् चित्तिरै नाळ् सिऱक्क वन्दोन् वाऴिये
तिरुक्कोळूर् अवदरित्त सॆल्वनार् वाऴिये
उत्तर गङ्गा तीरत्तु उयर् तवत्तोन् वाऴिये
ऒळि कदिरोन् तॆऱ्-कु उदिक्क उगन्दु वन्दोन् वाऴिये
पत्तियॊडु पदिनॊन्ऱुम् पाडिनान् वाऴिये
पराङ्गुसने परन् ऎन्ऱु पट्रिनान् वाऴिये
मत्तिममाम् पदप् पॊरुळै वाऴ्वित्तान् वाऴिये
मधुरकवि तिरुवडिगळ् वाऴि वाऴि वाऴिये
मधुरकवि आऴ्वार् वाऴि तिरुनामम् – सरल अर्थ
चित्तिरैयिल् चित्तिरै नाळ् सिऱक्क वन्दोन् वाऴिये
मधुरकवि आऴ्वार् का जन्म चैत्र (तमिऴ् में चित्तिरै) मास के चित्रा (तमिऴ् में चित्तिरै) नक्षत्र में हुआ। उनके अवतार के कारण चित्रा नक्षत्र की महिमा बढ़ी। ऐसे मधुरकवि आऴ्वार् का मंगल हो (दीर्घायु/चिरायु रहें) (पल्लाण्डु) !
तिरुक्कोळूर् अवदरित्त सॆल्वनार् वाऴिये
मधुरकवि आऴ्वार् का जन्मस्थान तिरुक्कोलूर दिव्य देशम् है, जहाँ अधिष्ठाता देव श्री वैत्तमानिधि भगवान हैं। आऴ्वार् को “सॆल्वनार्” (धनवान) कहा जाता है क्योंकि उनके पास कैङ्कर्य-श्री (भगवत् सेवा रूपी परम धन) और आचार्य-भक्ति का सर्वोच्च धन था। ऐसे आऴ्वार् का मंगल हो (दीर्घायु/चिरायु रहें) (पल्लाण्डु) !
उत्तर गङ्गा तीरत्तु उयर् तवत्तोन् वाऴिये
मधुरकवि आऴ्वार् ने भारत देश के उत्तरी भाग में अनेक वर्षों तक निवास किया और पवित्र गंगा नदी के तट पर महान तपस्या की। ऐसे मधुरकवि आऴ्वार् का मंगल हो (दीर्घायु/चिरायु रहें) (पल्लाण्डु) !
ऒळि कदिरोन् तॆऱ्-कु उदिक्क उगन्दु वन्दोन् वाऴिये
जब मधुरकवि आऴ्वार् उत्तर भारत में थे, तब उन्होंने दक्षिण दिशा से आती हुई एक दिव्य ज्योति देखी। वे अत्यन्त उत्साह से उस प्रकाश का अनुसरण करते हुए दक्षिण की ओर चले। अंततः वे तिरुक्कुरुगूर में एक पवित्र इमली वृक्ष (तिरुप्पुलियाऴ्वार्) तले पहुँचे, जहाँ नम्माऴ्वार योग-स्थिति में विराजमान थे।
मधुरकवि आऴ्वार् ने प्रश्न किया:
“सॆत्तदिन् वयिट्रिल् सिऱियदु पिरन्दाल्, ऎत्तै तिन्ऱु ऎङ्गे किडक्कुम्?” (यदि अचित शरीर में आत्मा जन्म ले, तो वह क्या अनुभव करेगा और कहाँ रहेगा?)
शठकोप स्वामी ने उत्तर दिया:
“अत्तै तिन्ऱु अङ्गेये किडक्कुम्।” (आत्मा शरीर के माध्यम से सब कुछ अनुभव करते हुए उसी में स्थित रहेगा।)
यह सुनकर मधुरकवि आऴ्वार् समझ गए कि शठकोप स्वामी महान ज्ञानी हैं। वे उनके शिष्य बन गए और अपने आचार्य की विविध प्रकार से सेवा करने लगे। दक्षिण की दिव्य ज्योति से आकर्षित होकर अपने आचार्य को प्राप्त करने वाले ऐसे आऴ्वार् का मंगल हो (दीर्घायु/चिरायु रहें) (पल्लाण्डु) !
पत्तियॊडु पदिनोन्ऱुम् पाडिनान् वाऴिये
मधुरकवि आऴ्वार् ने महान भक्ति से “कण्णिनुञ् चिरुत्ताम्बु” नामक दिव्य प्रबन्ध की रचना की, जिसमें ११ पासुरम् हैं। अधिकांश दिव्य देशों में दिव्यप्रबन्ध सेवा का आरंभ विष्णुचित्त स्वामी (पेरियाऴ्वार्) के “तिरुप्पल्लाण्डु” से होती है। किन्तु आऴ्वार् तिरुनगरी में सेवा “कण्णिनुञ् चिरुत्ताम्बु” से प्रारम्भ होती है।
इस प्रबन्ध के माध्यम से मधुरकवि आऴ्वार् ने सिखाया कि सच्चा भक्त सर्वप्रथम अपने आचार्य का सेवक बने, तदुपरान्त भगवान की सेवा करे। हमारे पूर्वाचार्यों ने दिखाया है कि भगवान के चरणों तक पहुँचने का सबसे सरल और सुनिश्चित मार्ग आचार्य-भक्ति है। मधुरकवि आऴ्वार् की अपने आचार्य शठकोप स्वामी के प्रति अटूट भक्ति थी, इसलिए उन्होंने केवल अपने आचार्य की महिमा में ११ पासुरम् गाए। ऐसे मधुरकवि आऴ्वार् का मंगल हो (दीर्घायु/चिरायु रहें) (पल्लाण्डु) !
पराङ्गुसने परन् ऎन्ऱु पट्रिनान् वाऴिये
नम्माऴ्वार् के अन्य नामों में शठकोपन् और पराङ्कुशन् प्रमुख हैं। “अङ्कुश” हाथी को नियंत्रित करने का उपकरण है। नम्माऴ्वार् ने अपने “तिरुवाय्मोऴि” द्वारा भगवान को भी अपने प्रेम में बाँध लिया, इसलिए वे “पराङ्कुशन” कहलाए।
एक वैकल्पिक अर्थ यह है कि उन्होंने वेदों के वास्तविक अर्थ को अपने प्रबन्धों में प्रकट कर अन्य मतों का खंडन किया और सत्य मार्ग दिखाया। मधुरकवि आऴ्वार् ने अपने आचार्य पराङ्कुशन को ही अपना परमेश्वर माना और केवल उनके चरणों का आश्रय लिया। ऐसे मधुरकवि आऴ्वार् का मंगल हो (दीर्घायु/चिरायु रहें) (पल्लाण्डु) !
मत्तिममाम् पदप् पॊरुळै वाऴ्वित्तान् वाऴिये
तिरुमन्त्र अत्यन्त महान मन्त्र है। इसमें तीन पद हैं- “प्रणवम्”, “नम:” और “नारायणाय”। इनमें मध्य पद “नम:” है। मधुरकवि आऴ्वार् ने अपने जीवन “नम:” पद के अर्थानुसार व्यतीत किया।
“नम:” का अर्थ है, “मैं अपने लिए नहीं हूँ।”
“म:” का अर्थ है, “मैं अपने लिए हूँ।”
“नम:” इस अहंभाव का निषेध करता है। जीवात्मा न अपने लिए, न दूसरों के लिए, परंतु केवल भगवान की सेवा के लिए अस्तित्व है। और भगवान की सच्ची सेवा उनके भक्तों की सेवा में है।
जीव का प्रथम स्वरूप भगवान का दास होना है, और सर्वोच्च अवस्था उनके भक्तों का दास होना है। इसे “प्रथम पर्वम् (अवस्था)” और “चरम पर्व (अवस्था)” कहा जाता है। मधुरकवि आऴ्वार् ने भगवान की अपेक्षा शठकोप स्वामी की सेवा को सर्वोच्च माना और चरम पर्वम् का आचरण किया। उनके आचार्य-भक्ति के कारण ही हम “नम:” के वास्तविक अर्थ को समझ पाते हैं। ऐसे मधुरकवि आऴ्वार् का मंगल हो (दीर्घायु/चिरायु रहें) (पल्लाण्डु) !
मधुरकवि तिरुवडिगळ् वाऴि वाऴि वाऴिये
यह वाऴि तिरुनामम् मधुरकवि आऴ्वार् के दिव्य श्रीचरणों की महिमा का गान करते हुए समाप्त होता है। उनके पावन चरण अनन्त वर्षों तक यशस्वी रहें!
अडियेन् श्रीकांत रामानुज दास
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