श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमत् वरवरमुनये नमः
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श्री शठकोप स्वामी (नम्माऴ्वार्) की महिमा

श्री शठकोप स्वामी का अवतार क्षेत्र आऴ्वार् तिरुनगरी है। वहाँ एक स्थान है जिसे अप्पन् कोयिल् कहा जाता है। श्री शठकोप स्वामी का जन्म इसी स्थान पर हुआ था। आज भी वहाँ तिरुवेंकटमुडैयान (श्री बालाजी) का एक मंदिर स्थित है, इसी कारण इस स्थान को अप्पन् कोयिल् कहा जाता है। “अप्पन्” का अर्थ तिरुवेंकटमुडैयान (श्री बालाजी भगवान) है। जिस कक्ष में आऴ्वार् का जन्म हुआ था, उसे आज भी उस मंदिर में संरक्षित किया गया है। श्री शठकोप स्वामी का अवतार नक्षत्र विशाखा है और उनका जन्म वैकासी (तमिऴ् वर्ष का वैशाख मास) महीने में हुआ था।
उन्होंने वेदों की चार शाखाओं के समान चार प्रबंधों की रचना की। उनके प्रबंध—तिरुविरुत्तम्, तिरुवासिरियम्, पॆरिय तिरुवंदादी और तिरुवाय्मोऴि, को क्रमशः ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद और सामवेद के समकक्ष माना जाता है। इन प्रबंधों को वेदों के समकक्ष इसलिए माना जाता है क्योंकि इनमें वेदों के अर्थ का सार समाहित है।
वे श्रीकृष्ण अवतार में अत्यंत अनुरक्त थे। उन्हें “प्रपन्न जन कूटस्थर्”, अर्थात श्रीवैष्णवों के नेता, के रूप में सम्मानित किया जाता है। उनके अन्य दिव्य नाम माऱन् और शठकोपन् भी हैं। वे नम्पेरुमाळ् (श्रीरंगनाथ भगवान उत्सव मूर्ति) को अत्यंत प्रिय थे, इसलिए उन्हें “हमारे (नम्) आऴ्वार्” कहा गया, और इसी कारण वे नम्माऴ्वार् कहलाए।
वे आऴ्वारों में सर्वोच्च माने जाते हैं। अन्य सभी आऴ्वार् उनके दिव्य अंगों के समान माने जाते हैं, जबकि श्री शठकोप स्वामी को सम्पूर्ण शरीर के रूप में माना गया है।
श्री शठकोप स्वामी का वाऴि तिरुनामम् –
आन तिरुविरुत्तम् नूऱुम् अरुळिनान् वाऴिये
आसिरियम् एऴु पाट्टळित्त पिरान् वाऴिये
ईनमऱ अन्दादि ऎण्बत्तेऴीन्दान् वाऴिये
इलगु तिरुवाय्मॊऴि आयिरत्तॊरु नूऱिरण्डुरैत्तान् वाऴिये
वानणियुम् मामाडक् कुरुगै मन्नन् वाऴिये
वैगासि विसागत्तिल् वन्दुदित्तान् वाऴियॆ
सेनैयर् कोन् अवतारम् सॆय्द वळ्ळल् वाऴिये
तिरुक्कुरुगैच् चडगोपन् तिरुवडिगळ् वाऴिये
श्री शठकोप स्वामी का वाऴि तिरुनामम् – सरल अर्थ
आन तिरुविरुत्तम् नूऱुम् अरुळिनान् वाऴिये
इस प्रबंध तिरुविरुत्तम् में १०० पाशुरम् | श्री शठकोप स्वामी ने हमें यह प्रबंध कृपा करके प्रदान किया। ऐसे आऴ्वार् का मंगल हो (दीर्घायु/चिरायु रहें) (पल्लाण्डु) ! “आन” शब्द का अर्थ है “बहुत उपयुक्त”।
आऴ्वार् ने तिरुविरुत्तम् के पहले ही पाशुरम में “पॊय् निन्ऱ ज्ञानमुम् पॊल्ला ऒऴुक्कुम् अऴुक्कुडम्बुम् इन्निन्ऱ नीर्मै इनियाम् उऱामै”, यह स्पष्ट कर दिया कि वे इस संसार (संसारिक जीवन) में टिक नहीं सकते। उसी पाशुरम् में उन्होंने यह भी बताया कि भगवान ने उन्हें निर्मल ज्ञान और भक्ति प्रदान की।
यह तिरुविरुत्तम् अत्यंत गूढ़ अर्थों (स्वापदेशम्) से युक्त कठिन प्रबंध है। ऐसे तिरुविरुत्तम् को प्रदान करने वाले आऴ्वार् का मंगल हो (दीर्घायु/चिरायु रहें) (पल्लाण्डु) !
आसिरियम् एऴु पाट्टळित्त पिरान् वाऴिये
सात पाशुरमों का संग्रह तिरुवासिरियम् जो कहलाता है, जिसमें भगवान के दिव्य रूप (तिरुमेनि) की सुंदरता और गुणों का अत्यंत सुंदर वर्णन किया गया है।
इस प्रबंध में भगवान के शुभ गुणों, तथा अन्य देवताओं की उपासना न करके केवल भगवान की शरण लेने का उपदेश दिया गया है, जो माता के समान सदा रक्षक हैं।
ऐसे श्री शठकोप स्वामी का मंगल हो (दीर्घायु/चिरायु रहें) (पल्लाण्डु) !
ईनमऱ अन्दादि ऎण्बत्तेऴीन्दान् वाऴिये
पॆरिय तिरुवन्दादि में ८७ पाशुरम् हैं। “ईनम्” का अर्थ है नीचता। श्री शठकोप स्वामी ने ८७ पाशुरम् देकर हमारी नीचता को दूर करने का उपाय दिया।
इस प्रबंध को “पॆरिय” (महान) तिरुवन्दादि इसलिए कहा गया क्योंकि इसमें अत्यंत गहन सिद्धांतों का वर्णन है।
पादुरम ७५ में आऴ्वार् भगवान से पूछते हैं, “क्या आप बड़े हैं या मैं बड़ा हूँ?” क्योंकि भगवान उनके हृदय में स्थायी रूप से निवास करते हैं।
ऐसे श्री शठकोप स्वामी का मंगल हो (दीर्घायु/चिरायु रहें) (पल्लाण्डु) !
इलगु तिरुवाय्मोऴि आयिरत्तोरु नूऱिरण्डुरैत्तान् वाऴिये
श्री शठकोप स्वामी ने तिरुवाय्मोऴि नामक ११०२ पाशुरमों की रचना की, जो अत्यंत श्रेष्ठ और अद्वितीय है। यह ४००० दिव्य प्रबंधों में सर्वोच्च माना जाता है।
यह वेदों का सार है और सरल तमिऴ् में वेदों के गहन अर्थों को समझाता है। इसमें भक्ति के विभिन्न भाव, विरह, माता का भाव, प्रेमिका का भाव, दूत भेजना, और भगवान के प्रति उत्कट भक्ति सब वर्णित हैं।
यह पाँच महत्वपूर्ण तत्त्वों (अर्थ पञ्चकम्) का भी बोध कराता है:
- परमात्म स्वरूप
- जीवात्म स्वरूप
- उपाय (मार्ग)
- विरोधी
- अंतिम लक्ष्य (उपेय)
ऐसे श्री शठकोप स्वामी का मंगल हो (दीर्घायु/चिरायु रहें) (पल्लाण्डु) !
वानणियुम् मामाडक् कुरुगै मन्नन् वाऴिये
आऴ्वार् के जन्म के पश्चात कुरुगूर (कुरुगापुरी क्षेत्र) को “आऴ्वार् तिरुनगरी” कहा जाने लगा। यह स्थान भगवान के आर्चावतार (प्रतिमा रूप) अनुभव का केंद्र है।
ऐसे कुरुगूर के राजा समान श्री शठकोप स्वामी का मंगल हो (दीर्घायु/चिरायु रहें) (पल्लाण्डु) !
वैगासि विसागत्तिल् वन्दुदित्तान् वाऴियॆ
श्री शठकोप स्वामी का अवतार दिवस तमिऴ् वर्ष के वैशाख माह (वैगासी) के विशाखा (विसागम्) नक्षत्र है। यह अत्यंत पवित्र माना जाता है।
प्रति वर्ष इस दिन भव्य उत्सव होता है और विशेष तीर्थम् (पवित्र जल) का अभिषेक भी होता है।
ऐसे शुभ दिन पर जन्म लेने वाले श्री शठकोप स्वामी का मंगल हो (दीर्घायु/चिरायु रहें) (पल्लाण्डु) !
सेनैयर् कोन् अवतारम् सॆय्द वळ्ळल् वाऴिये
श्री शठकोप स्वामी को विष्वक्सेन (सेनाधिपति) के गुणों के साथ अवतरित माना जाता है। वे अत्यंत दयालु हैं और उन्होंने अन्य आऴ्वारों के प्रबंध भी सुरक्षित रखे।
उन्होंने नाथमुनि को सभी ४००० दिव्य प्रबंध प्रदान किए।
ऐसे उदार श्री शठकोप स्वामी का मंगल हो (दीर्घायु/चिरायु रहें) (पल्लाण्डु) !
तिरुक्कुरुगैच् चडगोपन् तिरुवडिगळ् वाऴिये
श्री शठकोप स्वामी को शठकोपन् (चडगोपन्) कहा जाता है क्योंकि उन्होंने जन्म के समय अज्ञानता के आवरण को दूर किया।
ऐसे शठकोपन् के चरणकमल का मंगल हो (दीर्घायु/चिरायु रहें) (पल्लाण्डु) !
तिरुक्कुरुगूर् का महत्त्व
तिरुक्कुरुगूर् १०८ दिव्य देशों में से एक है और श्री शठकोप स्वामी का अवतार स्थल है। यहीं भविष्यदाचार्य (रामानुजाचार्य) की प्रतिमा भी प्राप्त हुई थी।
यह स्थान आऴ्वार्, स्वामी रामानुजाचार्य और श्री वरवरमुनि स्वामी (मणवाळ मामुनि), तीनों के संबंध से अत्यंत पवित्र माना जाता है।
ऐसे पवित्र तिरुक्कुरुगूर् की महिमा सदैव बनी रहे।
अडियेन् श्रीकांत रामानुज दास
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