श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः
<< मुदलाऴ्वार् (प्रथम तीन आऴ्वार्)
तिरुमऴिसै आऴ्वार् (भक्तिसार योगी) वाऴि तिरुनामम्
तिरुमऴिसै आऴ्वार् का जन्म तिरुमऴिसै (महीसारपुरम) में हुआ था। उनका जन्म नक्षत्र ‘माघ मघम्’ है — माघ मास (तै माह, तमिऴ् में) और मघ नक्षत्र। उन्होंने कई प्रबन्धम् के साथ इस संसार को अनुग्रहित किया। किन्तु दुर्भाग्यवश, अब उनके केवल दो प्रबन्धम् ही उपलब्ध हैं। वे ‘नान्मुगन् तिरुवन्दादि’ और ‘तिरुच्चन्दविरुत्तम्’ हैं। वे भगवान (एम्पेरुमान्) के ‘अन्तर्यामित्वम्’ (अन्तरात्मा के रूप में भीतर वास करना) में गहराई (सूक्ष्मता) से लीन थे। उनका यह विश्वास (निष्ठा) था कि सर्वशक्तिमान ईश्वर महानतम् योगियों और भक्तों के हृदय में स्वयं को प्रकट करते हैं। भगवान ने इस प्रकार स्वयं को इन आऴ्वार् के सम्मुख प्रकट किया और वे इसमें पूर्ण रूप से निमग्न हो गए। इसके अतिरिक्त, उनकी यह सुदृढ़ निष्ठा थी कि श्रीवैष्णवों को केवल श्रीमन् नारायण के ही अधीन रहना चाहिए और उन्हें अन्य देवताओं (देवतान्तरों) के विषय में विचार नहीं करना चाहिए, चाहे वे श्रीमन् नारायण को विस्मृत ही क्यों न कर दें।
तिरुमऴिसै आऴ्वार् का वाऴि तिरुनामम्:
अन्बुडन् अन्दादि तॊण्णूऱाऱु उरैत्तान् वाऴिये
अऴगारुम् तिरुमऴिसै अमर्न्द सॆल्वन् वाऴिये
इन्बमिगु तैयिल् मगत्तिङ्गु उदित्तान् वाऴिये
ऎऴिर्चन्दविरुत्तम् नूट्रिरुबदीन्तान् वाऴिये
मुन्बुगत्तिल् वन्दुदित्त मुनिवनार् वाऴिये
मुऴुप् पॆरुक्किल् पॊन्नि ऎदिर् मिदन्द सॊल्लोन् वाऴिये
नन्पुवियिल् नालायिरत्तु ऎऴुनूट्रान् वाऴिये
नङ्गळ् पत्तिसारन् इरु नर्पदङ्गळ् वाऴिये
तिरुमऴिसै आऴ्वार् वाऴि तिरुनामम् की व्याख्या:
अन्बुडन् अन्दादि तॊण्णूऱाऱु उरैत्तान् वाऴिये
संसारियों के प्रति अपनी करुणा के कारण और भगवान के प्रति अपने अगाध प्रेम के कारण, उन्होंने ‘नान्मुगन् तिरुवन्दादि’ की कृपा की, जिसमें छियानवे (तॊण्णूऱाऱु) (९६) पाशुर (दिव्य सूक्तियाँ ) हैं। क्योंकि, यह प्रबन्धम् ‘नान्मुगनै नारायणन् पडैत्तान्’ (चतुर्मुख ब्रह्मा को नारायण ने बनाया) से आरम्भ होता है, इसलिए इसे ‘नान्मुगन् तिरुवन्दादि’ के नाम से जाना जाता है।
यह प्रबन्धम् अन्दादि क्रमम् (अन्त्यादि क्रम ) में रचा गया है। इस आऴ्वार् के हृदय में भगवान के प्रति असीम प्रेम (अगाध स्नेह ) था, अतः उन्होंने इस प्रबन्धम् की रचना की। यह एक कारण है। हम यह भी कह सकते हैं कि इस भौतिक संसार में लोग बहुत कष्ट सहते हैं। उन्हें ईश्वर की प्रार्थना करने में समर्थ बनाने के लिए, आऴ्वार् उन्हें एक ऐसा प्रबन्धम् देना चाहते थे जिसके माध्यम से वे भगवान का आह्वान (अनुस्मरण) कर सकें ताकि वे उन पर अपनी करुणा (कृपा) बरसाएँ। यह दूसरा कारण है।
अऴगारुम् तिरुमऴिसै अमर्न्द सॆल्वन् वाऴिये
तिरुमऴिसै क्षेत्रम् बहुत सुन्दर है (दिव्य और रमणीय है)। इसे ‘महीसार क्षेत्रम्’ (पावन स्थल ) के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ, आऴ्वार् को ‘सॆल्वन्’ कहकर संबोधित किया गया है, जिसका अर्थ है – धनवान । इस आऴ्वार् के पास कौन सी समृद्धि है? यहाँ, हम धन के बारे में बात नहीं कर रहे हैं। हम ‘कैङ्कर्य (कैंकर्य) सॆल्वम्’ (सेवा रूपी धन) के बारे में बात कर रहे हैं। वह सॆल्वन्, धनवान (आऴ्वार्) जिन्हें ‘कैङ्कर्य सॆल्वम्’ प्राप्त है, वे कोटी-कोटी वर्षों तक जीवित रहें!
इन्बमिगु तैयिल् मगत्तिङ्गु उदित्तान् वाऴिये
यह पंक्ति हमें आऴ्वार् के जन्म के विषय में दर्शाती है — उनके जन्म का नक्षत्र और मास। आऴ्वार् का अवतार माघ मास में हुआ था। उनका नक्षत्र ‘मघम्’ (मघा) है और आऴ्वार् के अवतार के कारण ही ‘तै’ का मास और ‘मघम्’ नक्षत्र अत्यंत सुखद एवं पावन बन गए हैं। यह आऴ्वार्, जो इस आनन्द के कारण हैं, वे दीर्घायु हों (चिरन्जीवी रहें)!
ऎऴिर्चन्दविरुत्तम् नूट्रिरुबदीन्तान् वाऴिये
तिरुमऴिसै आऴ्वार् के प्रबन्धों में से एक – ‘तिरुच्चन्दविरुत्तम्’ बहुत ही काव्यात्मक है, अर्थात् उस प्रबन्धम् के शब्द अत्यंत समृद्ध (सम्पन्न) हैं। साथ ही, यह प्रबन्धम् काव्य की ‘विरुत्तम्’ शैली (वर्णिक छंद) में रचा गया है। हम उन्हें राग और ताल के साथ गा सकते हैं। ये दोनों विशेषताएँ इस प्रबन्धम् को शोभायमान (सुन्दर) बनाते हैं। ‘तिरुच्चन्दविरुत्तम्’ में १२० पाशुरम् हैं। वह आऴ्वार्, जिन्होंने हमें इस सुन्दर प्रबन्धम् से अनुग्रहित किया (कृपा की), वे चिरंजीवी (दीर्घायु) हों!
मुन्बुगत्तिल् वन्दुदित्त मुनिवनार् वाऴिये
उनका जन्म द्वापर युग में हुआ था और वे कलि युग में कई वर्षों तक ध्यानमग्न अवस्था में रहे। इतिहास से हमें यह ज्ञात होता है कि वे ४७०० वर्षों तक जीवित रहे। वे सदैव ध्यान में लीन रहते थे, और भगवान के दिव्य गुणों में मग्न रहते थे। उनका जन्म पिछले युग में हुआ था। आने वाले अनेक-अनेक वर्षों तक वे दीर्घायु हों!
मुऴुप् पॆरुक्किल् पॊन्नि ऎदिर् मिदन्द सॊल्लोन् वाऴिये
इस आऴ्वार् ने कई प्रबन्धों की रचना की थी। वे यह निर्णय करना चाहते थे कि इस संसार (जगत) में किन प्रबन्धों को बनाए रखा जाना चाहिए। जब ‘पॊन्नि’ नदी (कावेरी) में बाढ़ आई, तब उन्होंने अपने सभी प्रबन्धों को बाढ़ के पानी में प्रवाहित कर दिया। ‘तिरुच्चन्दविरुत्तम्’ और ‘नान्मुगन् तिरुवन्दादि’ तैरकर वापस आऴ्वार् के पास आ गए। अन्य सभी ग्रन्थम् जल में बह गए। ‘सॊल्लोन्’ का अर्थ है – जो उन शब्दों के स्वामी हैं – अर्थात् यह आऴ्वार् – वे कोटी-कोटी वर्षों तक चिरंजीवी हों!
नन्पुवियिल् नालायिरत्तु ऎऴुनूट्रान् वाऴिये
तिरुमऴिसै आऴ्वार् इस संसार में ४७०० वर्षों तक जीवित रहे। यह आऴ्वार् दीर्घायु हों!
नङ्गळ् पत्तिसारन् इरु नर्पदङ्गळ् वाऴिये
इन आऴ्वार् का एक अन्य ‘तिरुनामम्’ (नाम) ‘पत्तिसारन्’ है। उनके दोनों ‘तिरुवडिगळ्’ (दिव्य चरणकमल) सदैव अमर रहें!इन आऴ्वार् को ‘तिरुमऴिसैप् पिरान्’ के नाम से भी जाना जाता है। वे ‘तिरुक्कुडन्दै आरावमुदन्’ भगवान के प्रति अत्यधिक आसक्त थे। सामान्यतः, भगवान को ‘पिरान्’ नाम दिया जाता है – वह जो हमारी सहायता करता है अथवा जो मानव कल्याण में रुचि रखता है। इन आऴ्वार् और भगवान के बीच के दिव्य सम्बन्ध और अगाध स्नेह के परिणाम स्वरूप, ‘पिरान्’ नाम इन आऴ्वार् को प्रदान किया गया है और भगवान को आरावमुदाऴ्वार् के रूप में जाना जाता है।
अडियेन् गीता रामानुज दासी
आधार: https://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2024/03/vazhi-thirunamams-thirumazhisai-azhwar-simple/
संगृहीत- https://divyaprabandham.koyil.org
प्रमेय (लक्ष्य) – https://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – https://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – https://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org