श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नमः
हमारा श्रीवैष्णव संप्रदाय मुख्यतः रामानुज दर्शन के नाम से जाना जाता है और अत्यंत आदर के साथ स्मरण किया जाता है। हमारे आचार्य रामानुज की महानता का विस्तार से गुणगान इरामानुस नूट्रन्दादि में किया गया है। इस ग्रंथ की रचना रङ्गनाथ गुरु (तिरुवरङ्गत्तु अमुदनार्) ने कृपा पूर्वक की थी। पहले, तिरुवरङ्गत्तु अमुदनार् एम्पेरुमानार् (रामानुजाचार्य) को स्वीकार नहीं करते थे और केवल सांसारिक विषयों में लिप्त रहते थे। परंतु आचार्य रामानुज की कृपा से उनका हृदय परिवर्तित हुआ और वे पेरिय पेरुमाळ् (भगवान श्रीरंगनाथ) के एक दृढ़ भक्त बन गए। अपने जीवन के उत्तरार्ध में, तिरुवरङ्गत्तु अमुदनार् आचार्य रामानुज के प्रति अत्यंत समर्पित हो गए और उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन एम्पेरुमान् (भगवान) के लिए समर्पित कर दिया।
प्रपन्न गायत्री
श्री वरवरमुनि स्वामी (मणवाळ मामुनिगळ्) ने इरामानुस नूट्रन्दादि पर एक संक्षिप्त व्याख्या प्रदान की है। उसमें वे बताते हैं कि जैसे एक ब्राह्मण के लिए १०८ बार गायत्री जप करना सबसे महत्वपूर्ण होता है, वैसे ही इरामानुस नूट्रन्दादि एक श्रीवैष्णव के लिए सर्वश्रेष्ठ और गायत्री के जैसे है। इसलिए इसे प्रपन्न गायत्री कहा जाता है। इसी कारण यह विशेष रूप से बताया गया है कि सभी श्रीवैष्णवों को इसे प्रतिदिन पाठ करना चाहिए। इरामानुस नूट्रन्दादि में १०८ पासुर (श्लोक) हैं। इन सभी १०८ पासुरों में अमुदनार् ने पूर्ण रूप से आचार्य रामानुज के तिरुनाम (पवित्र नाम) को रखा है। जब इस ग्रंथ का पाठ किया जाता है, तब १०८ बार आचार्य रामानुज के नाम का उच्चारण करने का सौभाग्य मिलता है।
पासुरम् १:
पू मन्नु मादु पॊरुन्दिय मार्बन्* पुगऴ् मलिन्द
पा मन्नु माऱन् अडि पणिन्दु उय्न्तवन्* पल् कलैयॊर्
ताम् मन्न वन्द इरामानुसन् चरणारविन्दम्
नाम् मन्नि वाऴ नॆन्जे! सॊल्लुवोम् अवन् नामङ्गळे।
भावार्थ:
हे मेरे मन! कृपया स्वयं को रामानुजाचार्य के चरण कमलों में समर्पित कर दो और उनके पवित्र नाम का गौरव करो — वे ही हैं जिन्होंने माऱन् (नम्माऴ्वार्/श्री शठकोप स्वामी) के चरणों में शरण लेकर आत्मोन्नति (उज्जीवन) प्राप्त की, और श्री शठकोप स्वामी वे हैं जो सदैव उसी की महिमा गाते हैं, जिनके वक्षस्थल पर श्रीमहालक्ष्मी, कमल पर आसीन हुए निवास करती हैं।
यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि अमुदनार् इस पाशुर का आरंभ सीधे रामानुज से नहीं करते। परंतु पासुरम् अति सुंदर ढंग से आरंभ होता है – “पू मन्नु मादु पॊरुन्दिय मार्बन् ”, जो दर्शाता है कि श्रीमहालक्ष्मी भगवान के वक्षस्थल में निवास करती हैं। इसके आगे वे कहते हैं – “पुगऴ् मलिन्द पा मन्नु माऱन ” – अर्थात वह प्रसिद्ध श्री शठकोप स्वामी जो उस भगवान की महिमा गाते हैं जिनके वक्ष पर लक्ष्मी विराजती हैं। और अंत में वे कहते हैं – “माऱन् अडि पणिन्दु उयन्दवन्” – अर्थात रामानुजाचार्य, जिन्होंने श्री शठकोप स्वामी के चरणों में शरण लेकर उन्नति पाई। “हे मेरे मन! ऐसे रामानुज के दिव्य नाम को गाओ और स्वयं को समर्पित करो।”
यह पाशुरम् जिस सुंदर परंपरा से आरंभ होता है, वह इस प्रकार है – सबसे पहले श्री महालक्ष्मी (तायार्/पिराट्टि), जिन भगवान के वक्षस्थल पर निवास करती हैं उनके प्रति श्री शठकोप स्वामी ने शरणागत भाव रखा, रामानुजाचार्य ने उन श्री शठकोप स्वामी के चरणों में शरण ली, और अब मेरा मन रामानुजाचार्य के चरणों में समर्पित होता है।
सभी पाशुर् एक सुंदर क्रम में रचे गए हैं, जिनमें रामानुजाचार्य के दिव्य नाम को विशेष रूप में स्थान दिया गया है। अमुदनार् अपने पूरे ग्रंथ में आचार्य भक्ति को प्रमुख रूप से उजागर करते हैं। एक पाशुर् – “मॊऴियैक् कडक्कुम् पॆरुम् पुगऴान्” – जिसमें वे कहते हैं कि उनके आचार्य कूरत्ताऴ्वान् (कूरेश स्वामी) की महिमा अवर्णनीय है, जिसे शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता। कूरत्ताऴ्वान् ने उन तीन प्रकार के अभिमानों को पार कर लिया जो प्रायः सभी को बाँध लेते हैं – विद्या मतम् (ज्ञान का गर्व), धन मतम् (धन का गर्व), और आभिजात्य मतम् (उच्च कुल में जन्म का गर्व)। कूरत्ताऴ्वान् एक सम्मानित कुल में जन्मे थे, उनके पास अपार संपत्ति थी, और वे इतने विद्वान थे कि उनके स्वयं के आचार्य रामानुजाचार्य भी उन्हें आदरपूर्वक देखते थे। तत्पश्चात भी, कूरत्ताऴ्वान् के पास किसी भी प्रकार का अहंकार नहीं था। अमुदनार् इस विनम्रता से अत्यंत प्रभावित होकर अपने आचार्य की स्तुति करते हैं। वे आगे कहते हैं कि उनके आचार्य में यह विलक्षण गुण भी है कि वे दूसरों के हृदय में छिपे दुःख को भी हरा सक्ते हैं।
यह अद्भुत ग्रंथ “इरामानुस नूट्रन्दादि”, जो अमुदनार् द्वारा रचित है, आचार्य रामानुज का प्रत्येक आऴ्वार् से उत्कृष्ट और दिव्य संबंध को जगाता है।
आनेवाले पाशुर् हमारे श्रीवैष्णव संप्रदाय में अत्यंत श्रद्धा और सम्मान के साथ गाये जाते हैं।
पाशुरम् ४५:
पेऱु ऒन्ऱु मट्रु इल्लै निन् चरण् अन्ऱि*अप्पेऱु अळित्तऱ्-क्कु
आऱु ऒन्ऱुम् इल्लै* मट्रु अच्चरण् अन्ऱि** ऎन्ऱु इप्पॊरुळैत्
तेऱुम् अवर्क्कुम् ऎनक्कुम् उनैत् तन्द सॆममै सॊल्लाल्*
कूऱुम् परम् अन्ऱु* इरामानुस! मॆय्म्मै कूऱिडिले
इस पाशुर में अमुदनार् घोषणा करते हैं कि रामानुजाचार्य के बिना वे कुछ भी नहीं है।
पाशुरम् ७६
निन्ऱ वण् कीर्त्तियुम् नीळ् पुनलुम् * निरै वेङ्गडप्पोर् कुन्ऱमुम्
वैगुण्ड नाडुम् कुलविय पार्क्कडलुम्
उन् तनक्कु ऎत्तनै इन्बम् तरुम् उन इणै मलर्त्ताळ् *
ऎन तनक्कुम् अदु * इरामानुसा! इवै ईन्दु अरुळे
इस पाशुर् में बताया गया है कि जो दिव्य अनुभव विभिन्न दिव्य देशों में प्राप्त होते हैं, उन्हें केवल रामानुजाचार्य के चिंतन मात्र से ही पाया जा सकता है। रामानुजाचार्य के कमल समान चरण (तिरुवडि) ही जीवन का परम लक्ष्य हैं, और उन्हीं चरणों की कृपा से वह लक्ष्य प्राप्त भी होता है। यह पाशुर् यह भी दर्शाता है कि अमुदनार् पूर्णतः रामानुजाचार्य की कृपा पर ही आश्रित हैं और उनके अतिरिक्त उन्हें कोई और साधन या उपाय नहीं है।
पाशुरम् ९८
इडुमे इनिय सुवर्क्कत्तिल् * इन्नम् नरगिलिट्टुच्
चुडुमे? * अवट्रैत् तॊडर् तरु तॊल्लै सुऴल् पिरप्पिल्
नडुमे? इनि नम् इरामानुसन् * नम्मै नम् वसत्ते
विडुमे? शरणम् ऎन्ऱाल् * मनमे! नैयल् मेवुदर्के
अमुदनार् इस पाशुर् में रामानुजाचार्य द्वारा किए गए उपकारों को दर्शाते हैं। वे बताते हैं कि एक बार यदि कोई व्यक्ति रामानुजाचार्य के चरणों में शरणागति कर लेता है, तो वे यह सुनिश्चित करते हैं कि वह आत्मा न तो स्वर्ग जाती है, न ही नरक, परंतु जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त होकर परमपद की ओर प्रयाण कर्ती है।
इस प्रकार, यह दिव्य ग्रंथ यह दिखाता है कि आचार्य रामानुजाचार्य जीवों को परमपद प्राप्त कराने में एक मुख्य दायित्व निभाते हैं।
अडियेन् जानकी रामानुज दासी
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