श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नमः
हम ने पूर्व में दिव्यप्रबंधम् का संक्षिप्त परिचय देखा और उसे कैसे प्राप्त किया इससे भी अवगत हैं। यह हमारे आचार्यों की कृपा है कि हम इस विषय से ज्ञात हो सके कि आऴ्वारों (द्रविड़ भाषा के कवि संत) की काव्यात्मक रचनाएँ दिव्यप्रबंधम् कहलाती हैं। हमारे आचार्यों ने यह भी अवगत कराया कि भगवान की कृपा से इस संसार उनके द्वारा चुनिंदा आत्मा (जीव) के माध्यम से हमें पासुरम् (किसी प्रबंधम् का एक पद) अर्थात अरुळिच्चॆयल् प्रदान किया गया।
अरुळिच्चॆयल् क्या है
अरुळिच्चॆयल् तमिऴ् भाषा का एक सुंदर शब्द है। अरुळिच्चॆयल् का अर्थ है वह जो दिव्य कृपा से प्रदान किया गया है (अरुळाले सॆय्यप् पट्टदु)। यदि कोई पूछे, किसकी कृपा (अरुळ्) से? यह हमारे भगवान की कृपा से। भगवान की कृपा से आऴ्वारों ने उनके गुणगान किए। रोचकता से यह भी कहा जा सकता कि आऴ्वारों की कृपा से। क्योंकि ये दिव्यप्रबंधम् पूर्णतः उनके अनुभव हैं। चाहे तो सारे आऴ्वार् अपने अंतःकरण में ही इन सारे दिव्य अनुभवों को रखते हुए श्री वैकुंठ धाम पधारते। परंतु उनकी दिव्य कृपा के कारण उन्होंने इन पासुरों के रूप में अपने अनुभवों का प्रकटीकरण किया। यद्यपि आऴ्वारों ने पासुरम् प्रदान किया था, कालान्तर में उनकी रचनाएँ लुप्त हो गईं, जिन्हें आचार्य श्रीमन्नाथमुनि ने श्री शठकोप स्वामी के निकट प्रार्थना कर इनका पुनरुद्धार किया। इस प्रकार, इन्हें आचार्य की कृपा (अरुळ्) भी कहा जा सकता है। अतः ये भगवान, आऴ्वार् और आचार्यों की कृपा (अरुळ्) से परिपूर्ण होने के नाते, दिव्यप्रबंधम् को अरुळिच्चॆयल् कहा जाता है।
जीवनम् एवं उज्जीवनम् (जीवन और उज्जीवन):
सभी आत्माएँ इस संसार में अनादिकाल से हैं, जीवन-मृत्यु के अनंत चक्र में बीतते हुए। कृष्ण भगवान अर्जुन से कहते हैं – “हे अर्जुन, तुम और मैं दोनों कोटि-कोटि जन्म ले चुके हैं, परंतु अंतर यह है कि, मुझे मेरे सारे पूर्वजन्म (अवतार) ज्ञात हैं, और तुम्हें अपने पूर्वजन्म ज्ञात नहीं।” अर्जुन सारे जीवात्माओं का प्रतिनिधि है, अतः हम समझ सकते हैं कि सभी जीवात्माएँ अनगिनत जीवन-मरण चक्रों में अनादिकाल से हैं।
हमारे सनातन धर्म में, अनादि का अर्थ है जिसका कोई आरंभ न हो। ईश्वर अनादि है, आत्मा अनादि है और संसार भी अनादि है । ये सभी काल के अपार हैं। हमने केवल वही वस्तुएँ ज्ञात हैं जिनका एक आरंभ और एक अंत है। इस प्रकार, आत्मा किसी समय पर सृष्टि की गई हो ऐसे हमारा भ्रमित होना संभव है। यह संकल्पना कि आत्मा किसी समय में सृजित की गई है, मूलतः वेद के विरुद्ध है।
आत्मा जब अनादि है, उसके कर्म भी अनादि होने चाहिए और संसार भी अनादि होना चाहिए। हम इस संसार में अनादि काल से कोटि-कोटि जन्म लेते आ रहे हैं। इस जन्म-मृत्यु की निरंतर प्रक्रिया के चक्र से हमें मुक्त होना है जिससे उज्जीवन मिलेगा। केवल शरीर की देखभाल करते हुए जीवन यापन करने को जीवन (जीवनम्) कहते हैं – अस्तित्व के कारण जाने बिना, केवल जीवित रहना। इसके विपरीत, उज्जीवन आत्मा/जीव के हित में उद्देशित है न कि नश्वर शरीर के हित में (आत्मा का स्वरूप अथवा उद्देश्य भगवद् सेवा है)।
उन कालों में भी, जब हम इस संसार में बँधे रहे, अज्ञान से ढँककर, भगवान हमारी सहायता करने का प्रयास करते रहे थे। कई जन्मों के उपरांत, हमें आचार्य संबंध लाभ होता है। वह भी, एकमात्र भगवान की दिव्य कृपा के कारण। हम में इस संसार से स्वयं को मुक्त करानी की क्षमता कदापि नहीं है। हमारे आऴ्वार् और आचार्यों ने इस पर बलपूर्वक व्यक्त किया है कि यह संसार कितना घातक रूप से विचलित करता है। अतः जितनी भी कम मात्रा में क्यों न हो, आत्मा का आध्यात्मिक संबंध एकमेव भगवान की कृपा से ही होता है।
आत्मा को केवल इतना ही करना है कि वह भगवान की कृपा को न रोके। उन्हें प्राप्त करने के लिए भगवान सदा हमारा मार्गदर्शन करते रहते हैं। उदाहरण में: एक पिता अपनेपुत्र की सहायता के लिए सदा तत्पर रहते हैं। भले ही वह पुत्र कठोरता से कह दे कि उसे सहायता की कोई आवश्यकता नहीं है, तब भी पिता अपने स्नेह के कारण उसकी प्रत्यक्ष न सही अप्रत्यक्ष मार्ग से सुनिश्चित करेंगे कि उनके पुत्र को सहायता मिले। ठीक उसी प्रकार, भगवान आत्मा के उज्जीवन के लिए निरंतर विचार करते हैं, भले ही आत्मा अज्ञानी (अविद्या) हो। ये सारे विषय आऴ्वारों ने अपने पासुर् द्वारा हमें प्रदान किया है।
अब तक हमने प्रथम (मुदल्), द्वितीय (इरण्डाम्) और तृतीय (मून्ऱाम्) सहस्त्र (आयिरम्) (प्रथम तीन सहस्त्र) देखा। तृतीय सहस्त्र में हमने तिरुविरुत्तम्, पॆरिय तिरुवन्दादि और तिरुवासिरियम् देखा। अब हम तिरुवाय्मॊऴि (सहस्त्रगीति) का संक्षिप्त अनुभव करेंगे।
तिरुवाय्मॊऴि का महत्त्व
तिरुवाय्मोऴि को सामवेद और छांदोग्य उपनिषद के सार के प्रतिष्ठित रूप में माना जाता है। सामवेद के जैसे ही, तिरुवाय्मॊऴि भी संगीतमय है। सर्वप्रथम हम देखते हैं कि तिरुवाय्मॊऴि हमें क्यों प्राप्त हुआ। शठकोप स्वामी (नम्माऴ्वार्) स्वयं अपने पासुरम् (ऎन्ऱैक्कुम् ऎन्नै उय्यक्कॊण्डु पोगिय) में कहते हैं कि भगवान ने किस प्रकार उनपर अनुग्रह कर यह मंगलकारी दिव्य अवसर उन्हें प्रदान किया और आऴ्वार् इस तिरुवाय्मॊऴि के माध्यम से अपना (भगवान का) गुणगान करवाया।
श्री वरवरमुनि स्वामी (मामुनिगऴ्) भी इसी का संदर्भ देते हैं तिरुवाय्मॊऴि नूट्रन्दादि में – “ऎन्ऱनै नहीं इङ्गु वैत्तदु एदुक्कॆन्न मालुम् ऎन्ऱनक्कुम् ऎन् तमर्क्कुम् इन्बमदाम्” – अर्थात – आऴ्वार् भगवान से पूछते हैं – “तुमने मुझे इस संसार में क्यों रखा है?” भगवान उत्तर देते हैं – “मैं और मेरे भक्त तुम्हारे मधुर वाणी से दिव्य आनंद प्राप्त करते हैं और यही एकमात्र कारण है तुम्हें इस संसार में रखने के लिए”। तिरुविरुत्तम् में, आऴ्वार् ने यह प्रकट कर दिया कि भगवान का विरह उनसे कितना असहनीय है। भगवान की दिव्य इच्छा थी कि आऴ्वार् से और पासुरम् प्राप्त करे, इसलिए उन्होंने आऴ्वार् को यहीं रोककर रखा जिसके कारण तिरुवाय्मॊऴि प्राप्त हुआ। ऐसे करने का कारण यह था कि भगवान संसार के सभी आत्माएँ उज्जीवन प्राप्त करने में सहायता करना चाहते हैं। अब श्रीवरवरमुनि स्वामी के तिरुवाय्मॊऴि नूट्रन्दादि को लौटकर देखेंगे कि भगवान के उत्तर से आऴ्वार् का हृदय पिघल गया और आऴ्वार् भगवान की दिव्य इच्छा और अनुग्रह के पूर्णतः ऋणी होने की अनुभूति करते हैं।
आऴ्वार् स्वयं अपने एक पासुरम् में कहते हैं कि उन्होंने भगवद् सेवकों को इस अमृत समान शब्दों की माला द्वारा प्रदान किया इसलिए कि सारे भागवत तिरुवाय्मॊऴि में इसका आस्वाद कर सकें (तॊण्डर्क्कु अमुदु उण्ण सॊल् मालैगळ् सॊन्नेन्)।
मधुरकवि आऴ्वार् अपने पासुरम् में कहते हैं – नाविनाल् नविट्रु इन्बम् ऎय्दिनेन् – अर्थात – मेरे आचार्य श्री शठकोप स्वामी के अमृतमय पासुरों का जिव्हा से पाठ कर मैंने परम आनंद का अनुभव किया है। हमारे पूर्वाचार्यों ने भी तिरुवाय्मॊऴि के पाठ करने पर प्राप्त आनंदमय अनुभव का वर्णन किया है, भले उन पासुरों के अर्थ का बोध हो या न हो, ऐसी महिमा है श्री शठकोप स्वामी के तिरुवाय्मॊऴि की!
आचार्य हृदयम् में नायनार् बताते हैं कि रामानुजाचार्य श्री भाष्यम् लिखते समय प्रायः तिरुवाय्मोऴि का ही संदर्भ लेते। श्री भाष्यम् ब्रह्मसूत्रं की व्याख्या है। वेदव्यास जी ने वेदान्त के गुह्य अर्थों को सूत्रं के रूप में ब्रह्मसूत्रं की रचना की। अतः रामानुजाचार्य ब्रह्मसूत्र के सूक्ष्मताओं को समझने तिरुवाय्मोऴि का अवलोकन करते जिससे कि वेदान्त के रहस्य अर्थों को समझ सके। शास्त्रों के सारे गहने अर्थ तिरुवाय्मॊऴि में शठकोप स्वामी द्वारा दिया गया है। इससे हमें तिरुवाय्मॊऴि की महानता का बोध होता है।
तिरुवाय्मोऴि का संक्षिप्त अवलोकन
तिरुवाय्मोऴि के एक तनियन् (ध्यान वर्धक श्लोक) में,
मिक्क इऱै निलैयुम् मॆय्याम् उयिर् निलैयुम्
तक्क नॆऱियुम् तडैयागि तॊक्कियलुम् – ऊऴ् विनैयुम्
वाऴ्विनैयुम् ओदुम् कुरुगैयर् कोन् याऴिन् इसै वेदत्तियल्
अर्थ: कुरुगापुरि (तिरुक्कुरुगूर्/कुरुगूर्) के प्रमुख शठकोप स्वामी हैं और उनके पासुरम् दिव्य वीणा नाद के समान हैं। अपने पासुर् द्वारा उन्होंने ये ज्ञान प्रदान किया – भगवान ही सर्वोच्च हैं (इऱै निलै – परत्वम्/सर्वोच्चता या श्रेष्ठता), आत्मा की वास्तविक स्थिति (उयिर् निलै), यद्यपि आत्माएँ स्वरूप में समान हैं, संसार में अनगिनत आत्माएँ हैं, मायावदि सिद्धांत के विपरीत जो ब्रह्मण एक और कोई आत्मा न होने का अभिकथन करता है, परंतु यहाँ आऴ्वार् आत्माओं की वास्तविक स्वरूप को दर्शाते हैं। तदुपरान्त, भगवान को प्राप्त करने का मार्ग अथवा उपाय (तक्क नॆऱि) दिखाया गया है। भगवान को प्राप्त करने के मार्ग पर आनेवाली बाधाएँ (तडैयागि तॊक्कियलुम्) जो आत्मा को भगवान के पास जाने से रोकती हैं। सबसे प्रधान बाधा हमारे पूर्व में किए दुष्कर्म हैं (ऊऴ् विनै)। परमपद में भगवान को प्राप्त करने पर आत्मा भगवान की नित्य सेवा (वाऴ्वु) का आनंद अनुभव करता है।
यह श्लोक तिरुवाय्मोऴि पासुरम् में दर्शाए गए अर्थ पञ्चकम् का उल्लेख करता है:
- परमात्म स्वरूपं – परमात्मा – श्रीमन्नारायण का स्वरूप
- जीवात्म स्वरूपं – जीवात्मा का वास्तविक स्वरूप
- उपाय स्वरूपं – भगवान को प्रापवत करने के मार्ग
- विरोधी स्वरूपं – बाधाएँ जो भगवान को प्राप्त करने से रोकती हैं (कर्म)
- उपेय स्वरूपं – भगवान की प्राप्ति में जो आनंद (फल)
आचार्य हृदयम् में नायनार् स्पष्ट वर्णन करते हैं किस प्रकार अर्थ पञ्चकम् तिरुवाय्मोऴि में संदर्भित है। आचार्य हृदयम् अऴगिय मणवाळप्पॆरुमाळ् नायनार् (रम्यजामातृदेव) के द्वारा रचित ग्रंथ है। आचार्य शब्द श्री शठकोप स्वामी को सूचित करता है और हृदयम् वर्णन करता है शठकोप स्वामी के दिव्य हृदय।
यह ग्रंथ विशेषतः तिरुवाय्मोऴि के अर्थों को और शठकोप स्वामी के वैभवों को प्रकाशित करता है। श्री वरवरमुनि स्वामी ने इस ग्रंथ का टीकाकरण किया है। एक चूर्णिका (मून्ऱिल् सुरुक्किय अय्न्दु) में वरवरमुनि वर्णन करते हैं कि किस प्रकार रहस्य त्रय में अर्थ पञ्चकम् विद्यमान है और कैसे तिरुवाय्मॊऴि में अर्थ पञ्चकम् का ज्ञान व्यापक रूप से देखा जा सकता है।
तिरुवाय्मोऴि में अर्थ पञ्चकम्
वरवरमुनि स्वामी ने तिरुवाय्मोऴि के कुछ चुने हुए भागों पर प्रकाश डालते हैं जहाँ अर्थ पञ्चकम् का प्रत्यक्ष ज्ञान मिलता है।
परस्वरूपं – ४ दशक
आऴ्वार् ने भगवान की सर्वोच्चता का वर्णन किया है – उनके रूप, गुण और विभूतियाँ
- १.१ – उयर्वऱ
- २.२ – तिण्णन्
- २.८ – अणैवदु
- ४.१० – ऒन्ऱुम् देवुम्
जीवात्मा स्वरूपं – ४ दशक
आऴ्वार् इन दशकों में आत्मा का वास्तविक स्वरूप और उसके गुणों का वर्णन करते हैं ।
- ३.७ – पयिलुम्
- ४.८ – एऱाळुम्
- ८.८ – कण्गळ् सिवन्दु
- ८.९ – करुमाणिक्क मलै
विरोधि स्वरूपं – ४ दशक
आऴ्वार् भगवान की प्राप्ति के मार्ग में उपस्थित बालाओं का वर्णन करते हैं जो हमें भगवान को प्राप्त करने से रोकती हैं।
- १.२ – वीडुमिन् मुट्ट्रवुम्
- ३.९ – सॊन्नाल्
- ४.१ – ऒरुनायगमाय्
- ९.१ – कॊण्ड पॆण्डिर्
उपाय स्वरूपं – ४ दशक
इन दशकों में आऴ्वार् भगवान को प्राप्त करने का निर्धारित मार्ग (उपाय) का वर्णन करते हैं।
- ५.७ – नोट्र नोन्बु
- ५.८ – आरावमुदे
- ५.९ – मानेय् नोक्कु
- ५.१० – पिऱन्दवाऱुम्
उपेय स्वरूपं – ४ दशक
आऴ्वार् प्राप्य को प्रतिपादित करते हैं – वह जो भगवान को प्राप्त करने के पश्चात किसी भी आत्मा के लिए परम पुरुषार्थ / फल है।
- २.९ – ऎम्मावीडु
- ३.३ – ऒऴिविल् कालम्
- ८.१० – नॆडुमाऱ्-कडिमै
- १०.३ – वेय्मरुतोळ्
तिरुवाय्मोऴि में १०० दशक हैं, और उनमें से ऊपर वर्णित २० दशक अर्थ पञ्चकम् के गहन अर्थों विस्तार विवरण देते हैं। अन्य ८० दशक भी अर्थ पञ्चकम् का ही विवरण हैं ऐसे वरवरमुनि स्वामी आचार्य हृदयम् की व्याख्या में कहते हैं।
आचार्य की कृपा के कारण ही हम अर्थ पञ्चकम् का दर्शन तिरुवाय्मोऴि में पा रहे हैं अन्यथा तिरुवाय्मोऴि का सच्चा अर्थ हमारे द्वारा समझने में दुर्गम है। आचार्य के चूर्णिका के उल्लेख करने का उद्देश्य यह है कि आचार्यों के टीकाकरण के महत्त्व पर बल देना और दिखाना कि कैसे उनके टुकाकरण के बिना तिरुवाय्मोऴि के रहस्यार्थों को समझना असंभव है।
पॆरिय पॆरुमाळ्, तिरुवाय्मोऴि का साक्षात रूप
तिरुवाय्मोऴि के एक तनियन्,
वान् तिगऴुम् सोलै मदिल् अरङ्गर् वण्पुगऴ् मेल्
आन्ऱ तमिऴ् मऱैगळ् आयिरमुम्
ईन्ऱ मुदल् ताय् सटकोपन्
मॊय्मबाल् वळर्त्त इडत्ताय् इरामानुसन्
यह तनियन् जो पराशर भट्टर् द्वारा अनुग्रहित है, यह निर्धारित करता है कि तिरुवाय्मोऴि पॆरिय पॆरुमाळ् – श्रीरंगनाथ भगवान पर ही गाया गया है। शठकोप स्वामी माता होते हुए, तमिऴ् वेद समान इस तिरुवाय्मोऴि को जन्म दिया और इसका पालन-पोषण (सबके पास प्रचार करना) पालक माता रामानुजाचार्य ने किया। ये पासुरम् श्रीरंगनाथ की महिमा गाते हैं, जो एक दुर्ग के भीतर शयनित हैं जिसे लहलहाती हरियाली और व्योम को स्पर्श करनेवाले ऊँचे वृक्षों ने घिरा हुआ है।
पूरी तिरुवाय्मोऴि में, पॆरिय पॆरुमाळ् (भगवान श्रीरंगनाथ मूल मूर्ति) पर केवल एक दशक (पदिगम्) गाया गया है, जो ७.२ – “कंङ्गुलुम् पगलुम्” है। उस दशक का हर पासुर भगवान (एम्पेरुमान) के एक गुण को दर्शाता है। इस गुण को हर दशक में और विस्तार से बताया गया है (एक दशक एक गुण को दिखाता है)। इसलिए हमारे पूर्वाचार्यों ने समझाया है कि ७.२ में पॆरिय पॆरुमाळ् के ये १० गुण तिरुवाय्मोऴि के १०० दशकों की पूरी रचना में और अधिक विस्तृत हुए हैं। इसलिए हम समझते हैं कि किस प्रकार पॆरिय पॆरुमाळ् तिरुवाय्मोऴि का सार हैं।
(ध्यान दें: १ पत्तु (शतक) में १० पदिगम् (दशक) होते हैं, १ पदिगम् में १० पासुरम् (श्लोक) होते हैं)
आऴ्वार् ने अपने पासुर् अलग-अलग भावों में गाए हैं, जिन्हें “ज्ञानत्तिल् तन् पेच्चु” (ज्ञानावस्था में स्वयं ) और “प्रेमत्तिल् पॆण् पेच्चु” (प्रेमावस्था में स्त्री भाव से बोलना) कहा जाता है। इसका अर्थ है: जब आऴ्वार् सम्पूर्ण ज्ञान की स्थिति में होते हैं, तो उन्होंने पासुरम् स्वयं श्री शठकोप के रूप में दिए हैं। जब यह ज्ञान अत्यंत प्रेम की स्थिति में परिवर्तन हो जाता है, तो पासुरम् स्त्री भाव में गाते हैं: एक नायिका, नायिका की माता और नायिका की सहेली के रूप में।
तिरुवाय्मोऴि का व्याख्यान
रामानुजाचार्य (एम्पेरुमानार्) ने तिरुक्कुरुगैप्पिरान् पिळ्ळान् को तिरुवाय्मोऴि के लिए टिप्पणियाँ लिखने का कार्य सौंपा। यह व्याख्या प्राप्त करने वाला पहला दिव्यप्रबंध था। इसके पश्चात, कई आचार्यों ने तिरुवाय्मोऴि के लिए टिप्पणियाँ देकर योगदान दिया है।
तिरुवाय्मोऴि के ५ मुख्य व्याख्यान (भाष्य) हैं:
तिरुक्कुरुगैप्पिरान् पिळ्ळान् द्वारा ६००० पडि
वेदान्ती जीयर् (नन्जीयर्) द्वारा ९००० पडि
कलिवैरिदास स्वामी (नम्पिळ्ळै) द्वारा ईडु ३६००० पडि जिसे वडक्कुत् तिरुवीधिप्पिळ्ळै द्वारा प्रलेखित किया गया था।
पेरियवच्चान् पिळ्ळै द्वारा २४००० पडि (उनके आचार्य कलिवैरिदास स्वामी के आदेश से किया गया)
१२००० पडि (पद-पद अर्थ) वादि केसरी अऴगिय मणवाळ जीयर् (सुंदरजामातृ मुनि) द्वारा
(टिप्पणी: १ पडि में ३२ अक्षर होते हैं)
श्री वरवरमुनि स्वामी (मणवाळ मामुनिगळ्), बड़े उत्साह से, ईडु ३६००० पडी व्याख्यान से तिरुवाय्मोऴि के अर्थ समझाते हैं। भगवान श्रीरंङ्गनाथ (नम्पेरुमाळ्, उत्सव मूर्ति) वरवरमुनि के प्रवचन सुनना चाहते थे और उन्हें श्रीरंङ्गम् के पेरिय कोयिल् (श्रीरंङ्गम्) में गर्भगृह के ठीक सामने पूरे एक साल तक प्रवचन देने का आदेश दिया।
प्रवचन पूरा होने के पश्चात, आनि तिरुमूलम् (तमिऴ् ज्येष्ठ माह के मूल नक्षर) के शुभ दिन, नम्पेरुमाळ् एक छोटे बालक के रूप में प्रकट हुए और “श्रीशैलेश दयापात्रम्” तानियन प्रस्तुत किया और श्री वरवरमुनि स्वामी को अपना आचार्य स्वीकार किया।
इस प्रकार ईडु व्याख्यानम् सभी के बीच प्रसिद्ध हुआ और गौरवशाली तिरुवाय्मोऴि की प्रसिद्धि दूर-दूर तक पहुँची।
अडियेन् दीपिका रामानुज दासी
अडियेन् वैष्णवी रामानुज दासी
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