Author Archives: narasimhantsl

उत्तरदिनचर्या – निष्कर्ष

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक १४

निष्कर्ष

दिनचर्या शब्द नित्यानुष्ठान को सूचित करती हैं।

आराधनीय भगवान , आराधना करनेवाले मनवालाममुनि के प्रति ,  आराधन-रूप  इन  अनुष्ठानो  के   प्रति    अतीत    भक्ति के सात इस ग्रन्थ को हमेशा अनुसंधान करनी हैं।

परमपद –  नित्य विभूति जो  ऊंची  स्थान  हैं।

अण्डों और उनसे  ऊंचे प्रस्तुत महथाधियो और उनसे भी ऊँचे और अद्वितीय लोक जो श्रीवैकुण्ट हैं।

प्राप्नोति – प्रकर्षेण आप्नोति , सिद्ध होना।  भगवान , नित्यसूरिया ,और मुक्तात्माये , इन तीनो  को  कैंकर्य    करने वाले  तीन  फलो की  सिद्धि के लिए  निर्विग्न स्थान को प्रकर्ष ,एवं गर्व संग आचार्य पर्यंत कैंकर्य  को  सिद्ध करता हैं ,.

भगवद आराधन रूप , यह पंचकालीय कर्म, मोक्ष की  ओर  सीधे  उपाय  हैं। लक्ष्मी तंत्र कहती हैं  की,   एक के बाद एक पधारने वाले इन अनुष्ठानों  के समय को जान कर , उन  अनुष्ठानो  की  पूर्ती करने  वाली ताखतमंद  और   बुद्धिशाली  जन अपने   सौ     प्रायो    के पश्चात  शीग्र  ही परमपद प्राप्थ करते हैं।   सर्व मोक्षोपायो  को छोड़ , इन पाँच  अनुष्ठानो को निभानेवाले, एक से एक जुड़े हुए कर्मग्ननभक्ति  जैसे उपायो से भी मुक्त ,  एम्बेरुमान  और परमपद  को प्राप्त  करते है, यह चांडिल्य स्मृति में भी उपस्तित सच्चाई हैं।

फिर भी भरद्वाज जैसे बड़ो के कहने से यह माँननीय है की , एम्बेरुमान  को सिद्धोपय मानने   वालो  को  फलरूप ही  ( भगवतकैंकर्य रूप ही) करनी चाहिए।

प्रपन्न को अपनाने वाले धर्मों को बताते हुए , “ पहले अभिगमन करके,  फिर उपाधान  जो भगवदराधन  केलिए   उचित वस्तुवो को इकट्ठा करके ,  फिर भगवान की आराधना  इग्न को अनुष्ठान करके , अच्छे ग्रन्थ की स्वाध्याय करके , अंत में भगवान की ध्यान करके इन पांच कालो को संतुष्ट भिताना  हैं” ,  बताया गया है की संतोष , फलानुभव के समय  पर हैं।  इस से निश्चित कर सकते है की, इन पाँचो को उपायरूप में नहीं, पर फलरूप में ही निभाना  हैं।

इस पर, पराशर मुनि की उत्तेजना भी सोचनीय हैं, “ कर्म , ज्ञान, भक्ति, प्रपत्ति  इन चारो  को  मोक्षोपाय के रूप में  अनुष्ठान न करके, चारो फलो  में से ममता  रहित , इन पांचकालीय  अनुष्ठानो  को केवल परमात्मा  के संतुष्टि  की प्रयोजन केलिए कैंकर्य रूप में करनी हैं”.

श्री देवराज गुरु कहलाने वाले एरुम्बियप्पा के प्रसादित श्री वरवरमुनि दिनचर्या  एवं उस की , वादूल  वीर राघव गुरु के नाम   से जाने वाले तिरुमलीसै अन्नवप्पय्यंगर स्वामी से लिखित संस्कृतत व्याख्यान पर आधारित  ति अ   कृष्णमाचार्य  दास  की तमिल टिप्पणियाँ पूर्ण हुई।

जैसे प्रस्तावना में ही सूचित हैं , श्री वरवरमुनि दिनचर्या  पूर्वदिनचर्य, मनवालाममुनि  की प्रसादित यतिराज  विंसति एवं उत्तरदिनचर्य ,ऐसे तीन भागों में हैं।  दोनों दिनचर्यो की केवल अन्नावप्पय्यंगर स्वामी के संस्कृत व्याख्यान ही  छपाई में हैं।  यतिराज विंसति की अन्नावप्पय्यंगर स्वामी के संस्कृत व्याख्यान के सात शुद्धसत्वं दोड्डेयाचार्य स्वामी तथा पिल्लैलोकम जीयर स्वामी के लिखित मणिप्रवाळ व्याख्यान भी हैं।  मणिप्रवाळ व्याख्यानों में प्रस्तुत विषयो की ज्ञान अनेकों को होने के कारण उनको छोड़  , अन्नावप्पय्यंगर स्वामी से लिखित इन तीनो की संस्कृत व्याख्यानों पर आधारित ही इसको मैंने लिखा हैं।  संस्कृत व्याख्यान में उपस्तित विस्तारपूर्वक कुछ विषयों को मैंने छोड़ दिया।  पुस्तक की विस्तीर्ण   के शंका और मेरे अज्ञान के  कारण इस पुस्तक में घटित अपराधो की क्षमा प्रार्थना करता हूँ।

हिंदी अनुवाद – प्रीति रामानुज दासि

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उत्तरदिनचर्या – श्लोक – १४

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक १३                                                                                                                                   निष्कर्ष

श्लोक १४

दिनचर्याम इमाम दिव्यां रम्य जामातृ योगिन:
भक्त्या नित्यमनुध्यायन प्राप्नोति परमम् पदम

शब्द से शब्द

इमाम                                                  : “पटेर्त्यु पश्चिमे यामे” (पूर्व दिनचर्या १४) से “सयानम संस्मरामी तम” तक के                                                                 श्लोक।
दिव्याम् रम्यजामातृ योगिन: दिनचर्याम : अलगियामणवाळमामुनि के नित्य अनुष्ठान के विवरण
नित्यं : प्रति दिन (दिन और रात)            : जब एक व्यक्ति भक्ति संग दोहराता हैं
प्राप्नोति परमम् पदम                           : वह सर्वश्रेष्ठ निवासस्थान, परमपद सिद्द करता हैं जो जिसके आगे कुछ भी                                                                 नहीं।

अर्थ

अंत में यह दिनचर्या  ग्रन्थ अनुसंधान करने कि फल प्रकट करते हैं।
हमने देखा के पूर्वदिनचर्या के १३वे श्लोक तक प्रस्तावना; उपोध्गात हैं।

वहाँ के १४वे श्लोक से उत्तरदिनचर्या के १३वे श्लोक तक ही वरवरमुनि दिनचर्या हैं।

दिव्याम् को सर्वश्रेस्ट पांचरात्र के तरह शास्त्र सिद्धीय अनुष्ठानों को प्रकट करने वाली ग्रन्थ तथा दिव्यां -परमपदीय , इस संसार में असंभव, केवल परमपद में संभवित पञ्चकालिका (पांच कालों में करने वाले) अनुष्ठानों को प्रकट करने वालि ग्रन्थ भी मान सकते हैं।

भरद्वाजपरिसिष्ट कहति हैं कि अभ्यास में दुर्लभ ये अनुष्ठान कृतयुग में परमाइकान्तियो के द्वारा पूर्ण रूप से, त्रेतद्वापर युगो में घटते, कलियुग में अधिकतर अप्रचलित ही हो जाएगी।

विविध इच्छाओं और अनेक गौण देवताओं को पूजने वाले व्यक्ति , केवल श्रीमन नारायण को मानने वाले इस धर्म को नहीं अपनाएंगे।

कलि के क्रूरता से अल्प विषयों में मोहित रहते हैं और उनसे छुटकारा पाने कि बुद्धि भी उनमें कलि के पीड़ा के कारण सिद्ध नहीं होती हैं। और अगर उनमें कोई भगवान को पूजते भी हैं , तो परमतीय दुरशक्ति उनको अपने ओर मोह कर लेंगीं।

हिंदी अनुवाद – केशव रान्दाद रामानुजदास

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उत्तरदिनचर्या – श्लोक – १३

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक १२                                                                                                           श्लोक १४

श्लोक १३

अतः ब्र्थयां अनुग्नाप्य कृत्वा चेत: सुभाश्रये।
सयनीयम् परिष्कृत्य सयानं संस्मरामि तम||

शब्द से शब्द

अतः          : जैसे पूर्व निर्दिश्ट किया गया हैं, शिष्यों को व्यक्तिगत शिक्षण के दो जामों के पश्चात,
ब्र्थयां         : शिष्य
अनुग्नाप्य  : प्रस्थान करने के पश्चात
सुभाश्रये     : आँखों और मन को आकर्षित करने वाले भगवान के दिव्य रूप में
चेत:कृत्वा   : अपनी धारणा बढ़ा कर (उस पर द्यान कर)
सायनीयं     : बिस्तर पर
परिष्कृत्य   : शयन करने से सुशोबित कर
सयानम     : विश्राम करना
तम           : उन स्वामी मणवाला मामुनि
संस्मरामी  : मेरे गहरी द्यान में हैं

अर्थ

“कृत्वा चेत सुभाश्रये” से यहाँ रात में भगवान पर किये गए द्यान की प्रस्ताव हैं।

“ततः कनक पर्यङ्के “, प्रकाशित करता हैं की मामुनिग़ल भगवद द्यान की प्रति उचित आसन से उठ कर, स्तोत्र में मग्न शिष्यों को कटाक्ष करते हैं, और उनकी प्रस्थान करने के बाद बिस्तर को, भगवान पर धारणा बढ़ाते हुए अलंकृत करते हैं।

इन महामुनि पर द्यान करते है येरुम्बियप्पा। आदिशेष के अवतार होने के कारण, महामुनि के अप्राकृत दिव्य रूप निद्रावस्था में दुगुनी और इसलिए निर्विग्न द्यान के हेतु हैं।

महामुनि केलिए सुभाश्रय भगवान की दिव्या मंगला रूप है और इस प्रकार अप्पा केलिए सुभाश्रय महामुनि की दिव्या मंगला रूप हैं।

हम यह मान सकते हैं की महामुनि जो यतीन्द्र प्रवणर् हैं भगवान पर द्यान करते हैं, यतीन्द्र स्वामी रामानुज के प्रसन्नता केलिए। वैसे, येरुम्बियप्पा के आराधित भगवान श्री राम जिनके निर्बंध के कारण महामुनि येरुम्बियप्पा को स्वीकार किये, उनके प्रसन्नता केलिए सौम्यजामातृयोगीन्द्र श्री महामुनि पर येरुम्बियप्पा द्यान करते हैं।

श्री राम की यह आज्ञा यतीन्ध्रप्रवणप्रभाव और अप्पा की वरवरमुनि सतक में प्रस्तुत हैं।

हिंदी अनुवाद – केशव रान्दाद रामानुजदास

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उत्तरदिनचर्या – श्लोक – १२

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक ११                                                                                                             श्लोक १३

श्लोक १२

इति स्तुति निबन्धेन सूचितस्व्मनीषितान्
भृत्यान प्रेमार्द्रया दृश्ट्या सिञ्चन्तं सिन्तयामि तं  //१२//

शब्दश: अर्थ :

इति                         : जैसे अब तक इसे ६ छन्द में विस्तारपूर्वक किया गया है
स्तुति निबन्धेन        : स्तोत्र का मूलग्रंथ –
सूचितस्व्मनीषितान्  : स्वयं को लाभ पसन्द आना
भृत्यान                    : कोइल अन्नान जैसे शिष्य जो खरीद या बेच या ठीक रख सकते है
प्रेमार्द्रया                   : नेत्र जो प्रेम और कृपा से भरी हो
दृश्ट्या                     : आँखों कि दृष्टि
सिञ्चन्तं तं              : जो श्रीवरवर मुनि स्वामीजी
सिन्तयामि               : हमेशा मेरे ख़यालो और ध्यान में है

अर्थ

अब तक हम श्रीवरवर मुनि स्वामीजी के स्तोत्र का आनन्द लिया जिसे दिनचर्या कहते है। इसके पश्चात श्री एरुम्बियप्पा आचार्य को स्तोत्र सुनाकर आनन्द प्रदान करते है। इति = ऐसा। यानि पिछले ६ पदों के अनुसार। अगले ४ पद “त्वम् मे बन्धु”(७) से “याया वृत्ति”(१०) उनके द्वारा रचित वरवर मुनि सटकम में भी प्रगट होता है। “उन्मीलपद्म”(७) और “अपगता गत मानै” उन ४ पदो के जैसे है और इसलिए उन्हें उनकी हीं रचनाये ऐसा मान सकते है। इन ६ पदों में “दिव्यं तदपादा युग्मम दिसतु”(६), “तवपदयुगम देहि(९), “अंग्री द्वयं पस्यन पस्यन(८)”, इन ३ पदों में वें श्रीवरवर मुनि स्वामीजी से उनके चरण कमल उनके मस्तक पर रखने कि और उसे इन चरणों कि अब से पुजा करने कि प्रार्थना करते है । इस पद में प्रार्थना स्वाभाविक है और इसलिये यह ६ पद ६ अष्ट दिग्गजों द्वारा कोइल अण्णन, वानमामलै जीयर, एरुम्बियप्पा, तिरुवेंकटा रामानुज जीयर, परवस्तु पट्टर्पीरण जीयर, प्रतिवादी भयंकर अण्णा, आप्पिल्लै और अप्पुल्लार को छोड़ कर भी गाया जा सकता था।

जबकि कोइल कांतादै श्रीवरवर मुनु स्वामीजी के चरण पकड़ने के लिये प्रसिद्ध है और वानमामलै जीयर श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के चरण के लकीर है और इसलिये वें हमेशा उनके चरण कमलों कि हीं पुजा करने में रुचि रखते थे। यह अन्नवप्पैएंगर स्वामीजी कि व्याख्या है। अब हम यह अंतिम निर्णय करते कि एक पद उनके द्वारा गाया गया और बाक़ी पाँच उनका ढेर सारा प्रेम  और सम्मान के कारण उनके शिष्य द्वारा ।

हिंदी अनुवाद – केशव रान्दाद रामानुजदास

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उत्तरदिनचर्या – श्लोक – ११

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक १०                                                                                                               श्लोक १२

श्लोक ११

अपगतमदमानै: अन्तिमोपाय निष्टै:
अधिगतपरमार्थै: अर्थकामान अपेक्षै:
निखिलजनसुहृदिभि: निर्जित क्रोध लोभै:
वरवरमुनि भृत्यै: अस्तु मे नित्य योग: ॥   //११//

शब्दश: अर्थ

मे                             : मुझे इतने दिनों तक बुरे संगत में
अपगतमदमानै:        : सम्बन्धी जो नाही अहंवादी है और नाही व्यर्थ असम्मानिय बुजुर्ग
अन्तिमोपाय निष्टै:   : इस विश्वास के साथ कि आचार्य में निष्ठा हीं मोक्ष का अन्तिम अनुशासन है
अधिगतपरमार्थै:        : आचार्य और उनके लाभ से उनकी सेवा में पूर्णत: हर्ष में रहना
अर्थकामान अपेक्षै:     : दूसरे सांसारिक वस्तु, धन, आनन्द आदि में आस न रखना
निखिलजनसुहृदिभि: : मनुष्य जो बिना पक्षपात या तरफदारी के सब के भलाई की इच्छा करते है
निर्जित क्रोध लोभै:    : वों जिन्होंने पूर्णत: ग़ुस्से और घृणा पर विजय प्राप्त किया हो
वरवरमुनि भृत्यै:       : और अति मित्रता से श्रीवरवर मुनि स्वामीजी कि उपासना कि हो जैसे कोइल कान्तदै,                                                    वानमामलाई जीयर:
नित्य योग:               : नित्य उनके सम्पर्क में रहना ताकि उनके कोमल चरण को पकड़ सके
अस्तु                        : मुझ पर उसकी कृपा रहे

अर्थ

इससे उन्होंने ग़ुस्से, घृणा और ऐसे गुण वाले लोगों का त्याग के लिए प्रार्थना कि और श्रीवरवर मुनि स्वामीजी के शिष्यों से सम्बन्ध किया जो पक्षपात, तरफदारी या अधिक मान के बिना हमेशा सब का अच्छा सोचते है।

हिंदी अनुवाद – केशव रान्दाद रामानुजदास

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उत्तरदिनचर्या – श्लोक – १०

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक ९                                                                                                               श्लोक ११

श्लोक १०

या या वृत्तीर्मनसि मम सा जायतां संस्मृतिस्ते
यो यो जल्पस्स भवतु! विभो! नामसंकीर्तनं ते ।
या या चेष्टा वपुषि भगवन्! सा भवेद्वन्दनं ते
सर्वं भूयाद्वरवरमुने! सम्यगाराधनं ते ।।१०  ।।

शब्दश: अर्थ

हे वरवर मुने!   : ओ श्रीवरवर मुनि स्वामीजी!
मम                : मेरे पहिले के जन्म और कर्म की दशा के कारण जो मेरी समझ है
जायतां           : जिस कुछ करणों से भाग्यवान है
सा वृत्ती:        : वह सभी ज्ञान,
ते                   : (आशीर्वाद के बारे मे सोचते हुये) आपका,
संस्मृति:         : आपके सुशोभित और मनोहर यादे,
जायतां           : मेरे लिए  प्रगट होइये /प्राप्त होइये
हे विभो!          : मेरे प्रिय स्वामी!
मे                  :  मेरे तक
या: या: जल्पा:: जो भी पवित्र शब्द है वह आपके स्तुति के लिये हीं है,
जायतां           : वह जो लौटाया जा सकता है (अन्य इंद्रियों के जरिये),
सा:                : वह सभी शब्द
ते                  : जो आपके ज्यादा बढ़ाई करने लायक है
जल्पा:           : शब्दों के रूप में
जायतां          : मेरे लिये प्रगट / उत्पन्न होना।
हे भगवन् !     : हे स्वामि
मम               : मेरा
वपुषि            : इस शरीर में जो हमेशा कुछ कार्य में लगा रहता है,
आ या चेष्टा   : उन कार्यों का प्रबन्ध करना,
ते                  : उनके पूजन करने योग्य
वन्दनं           : दंडवत करने के अवस्था मे
जायतां          : प्रगट / उत्पन्न होना मेरे लिए
सर्वं               : अभी तक जो कुछ सुना गया और जो न सुना गया वह मेरे कर्मो सा उत्पन्न होता है
ते                  : आप के लिए
सम्यगाराधनं : अच्छी प्रार्थना के रूप मे जो आप को अलंकृत करे
भूयात           : मेरे लिए

अर्थ:-

मेरे मन में जो भी बुरे विचार है उनको आपकी कृपा से अच्छे सोच में परिवर्तन कर देना। मेरे जुबान से जो व्यर्थ बातें निकलती है उनकी आपकी कृपा से मेरे द्वारा आपके लिये गाई हुई सुंदर गाथाओं मे परिवर्तित हो जाये । मेरे में जो बुरी आदते है आपको दण्डवत कर अच्छी बन जाये। इस तरह उनकी प्रार्थना चलती है। “जायतां” शब्द हर वाक्य में दो बार समझाया गया है। जायतां शब्द रूप में कई अर्थ देता है। यहाँ पहिले अर्थ में आता है अर्हम = योग्य। तत् पश्चात प्रार्थना में उसका अर्थ आता है। इस श्लोक का शब्दश: अर्थ में समझा जा सकता है। अथवा हम इसका अर्थ इस तरह भी ले सकते है कि मेरे चित्त में जो भी विचार है वह आपके नाम के प्रशंसा के लिये और मेरे शरीर से जो भी कार्य हो वह आपके कैंकर्य हेतु हो।

हिंदी अनुवाद – केशव रान्दाद रामानुजदास

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उत्तरदिनचर्या – श्लोक – ९

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक ८                                                                                                                 श्लोक १०

श्लोक ९

कर्माधिने वपुषि कुमति: कल्पयन्नात्मभावं
धु:खे मग्न: किमिति सुचिरं दूयते जन्तुरेष:
सर्वं त्यक्त्वा वरवरमुने! सम्प्रति त्वत्प्रसादात्
द्दिव्यं प्राप्तुस्तव पदयुगं देहि मे सुप्रमातं ।। ।।

शब्दश: अर्थ

हे वरवर मुने!                                : ओ श्रीमनवाल महामुनि स्वामीजी!
ईष जन्तु                                      : यह आत्मा जो हमारे लिये समर्पित है
कर्मा धिने                                     : अपने पूर्व कर्म के कारण
वपुषि                                           : इस शरीर में
आत्म भावं                                   : उयाह कल्पना करना कि यह स्व आत्मा है
कल्पय                                         : इस भावना के साथ
कुमति:                                         : और दुषित ज्ञान
धु:खे मग्न:                                   : सांसारिक जीवन के दु:ख में डुबता हुआ
किं                                               : क्यों
दूयते                                            : वह कष्ठ भोग रहा है?
इति (मत्वा)                                  : उस तरह सोचना
सर्वं                                              : मुझे योग्य करना ताकी इस माया को छोड़ दू
त्यक्त्वा                                       : और यह सब छोड़ना
सम्प्रति                                        : इसी समय
त्वत्प्रसादाद्दिव्यं पदयुगं प्राप्तुस्तव  : मुझे योग्य करना आपके चरण कमल को पा सँकु
त्वत्प्रसादा                                    : आपके स्वाभाविक दया से
मे                                                : मेरे लिये
सुप्रमातं                                        : इस शुभ दिन में (मुक्त होने के लिये)
देहि                                              : आपको देना होगा

अर्थ:

“कर्माधिने” से “दूयते जन्तुरेष:” तक श्रीवरवर मुनि स्वामीजी अपने शिष्य के कल्याण हेतु सोचते है ऐसा बताया गया है। व्याख्या के लिये “मत्वा” शब्द “इति” से जोड़ा गया है। इससे वह श्रीवरवर मुनि स्वामीजी से यह निवेदन करते है कि दु:ख, डरावनी अंधेरी रात का अपनी कृपा से अन्त कर दे।

हिंदी अनुवाद – केशव रान्दाद रामानुजदास

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उत्तरदिनचर्या – श्लोक – ८

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक ७                                                                                                                   श्लोक ९

श्लोक ८

अग्रे पश्चादुपरि परितो भूतलं पार्श्च्वतो मे
मौलौ वक्त्रे वपुषि सकले मानसाम्भोरूहे च ।
दर्शंदर्शं वरवरमुने दिव्यमङ्गिद्वयं ते
नित्यं मज्जन्नमृतजलधौ निस्तरेयं भवाब्धिं || ८ ||

शब्दश: अर्थ 

हे वरवरमुने!               : ओ श्रीवरवर मुनि स्वामीजी!
ते                              : आपके
दिव्यं                         : भव्य
अङ्गि द्वयं               : चरणों कि जोड़ी
अग्रे                           : (मैं देखना चाहता हूँ) मेरे सामने
पश्चात                      : मेरे पिछे
भू तलं परितो:            : भूमी के चारों दिशा में
मे पार्श्च्वतो:              : मेरे दोनों तरफ
मौलौ                        : मेरे मस्तक पर
वक्त्रे                         : मेरे मुख पर
वपुषि                        : मेरे शरीर के सभी अंगो में
मानसा म्भोरूहे च      : मेरे हृदय में
पस्यं पस्यं (दर्शं दर्शं)  : हमेशा देखना
अमृत जलधौ             : मरते हुए व्यक्ति को जीवन देनेवाला अमृत का समुंदर देना
मज्जन्न                   : डुबता हुआ
भवाब्धिं निस्तरेयं      : मैं इस जन्म रूपी समुंदर को पार करना चाहता हूँ।

अर्थ

गुरु पादाम्बुयं ध्यायेत गुरोरण्यम न भवयेत ….(प्रपंचसाराम)

यह प्रमाण बताता है कि हमे गुरु चरणों के मार्ग पर चलना चाहिये और कुछ भी विचार नहीं करना चाहिये। यह विस्मय है कि एक समुंदर से तैर कर दूसरे से निकलना। परन्तु आचार्य के भव्य चरण इसे होने योग्य बनाते है।

श्री रामानुज स्वामीजी श्री वैकुण्ठ गध्य में कहते है “भगवता आत्मीयं श्रीमद पादारविन्द युगलम शिरसि कृतं ध्यात्वा अमृत सागरान्तर र्निमग्न सर्वावयव: सुखमासीत” अर्थात भगवान के बारें में जो कहा गया है यहाँ वें अपने आचार्य के बारें में कहते है।

हिंदी अनुवाद – केशव रान्दाद रामानुजदास

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उत्तरदिनचर्या – श्लोक – ७

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक ६                                                                                                                     श्लोक ८

श्लोक ७

त्वम् मे बन्धुस्त्वमसि जनकस्त्वं सखा देशिकस्त्वं
विध्या वृत्तं सुकृतमतुलं वित्तमप्युत्तमं त्वं ।
आत्मा शेषी भवसि भगवन्नांतरश्शासिता
त्वं यद्व सर्वं वरवरमुने ! यध्यदात्मानुरुपं ।। ७

शब्दश: अर्थ

हे वरवर मुने                       : ओ श्रीवरवर मुनि स्वामीजी!
त्वम                                  : हालाकि
मे                                      : मुझको कला
बन्धु असि                          : एक सम्बन्धी जिसका त्याग किया नहीं जा सकता
त्वम जनक असि                 : मेरे पिता, क्योंकि मेरे अच्छे संस्कारों के लिये आपने मुझे शिक्षा प्रदान की।
त्वम सखा असि                  : मेरा मित्र, (१) मेरे संकट में मेरी सहायता करता है (२) और मेरे खुशी में शामिल होता है
त्वम देशिक असि                : आचार्य, वह सिखाते है जिसका मुझे ज्ञान नहीं है
त्वम विद्या असि                : आचार्य जिन्होने ज्ञान प्रदान किया, जो माँ कि तरह रक्षा करते है
त्वम व्र्त्तम असि                : अच्छे शिक्षा से अच्छा आचरण उत्पन्न होता है और फायदा भी होता है
त्वम अतुलम सुक्र्तम असि  : अद्वितीय अच्छे काम जो मुझे लाभ प्राप्त कराते है जैसे अच्छे सम्बन्धी, धन आदि
त्वम उत्तमम वित्तम असि : स्थिर, नहीं बदलनेवाला भव्य (आध्यात्मिक) धन
त्वम आत्मा असि               : मेरी स्वयं कि आत्मा जो यह सब लेती है
त्वम सेशि भवसि                : वह शासक जो मेरी आत्मा को उसके कल्याण के लिये स्वीकार करता है
हे भगवन                           : ओ महामुनि ज्ञान और क्षमता से भरा हुआ
त्वम आन्तरस शसिता असि : हालाकि कला (१) मेरी श्रेष्ठ आत्मा मुझे आज्ञा दे (२) ज्ञानी भी उसमे ही श्रेष्ठ आत्मा को                                                 आज्ञा दे
यद्वा                                 : क्या अगर में ऐसा ही चलता रहूँ ऐसे जोड़ लिजीये?
आत्मा नु रुपम                    : मुझे भगवान और उनके सेवको कि सेवा दि
यद यद भवति                     : कृपया मुझे उन सभी लाभों का अनुदान कीजिये

व्याख्या

बध्नानी इति बन्धु = वह सम्बन्धी जो हमारे दु:ख और सुख में हर समय साथ रहे। सखा = साथी। वह जो हमारे साथ विपत्तिजनक स्थिति में हो और दूसरे अवसर जैसे बोधयंतप परस्परम (गीता, X-१०) दिव्य अनुभवों को बांटना, स्वयं कि आत्मा। वह जो यह सब उपयोग करता है और तत्पश्चात विस्तार से वस्तु

“तंजमाकिया तंतै तायोडु तानुमाइ” (श्रीसहस्त्रगिती ३-६-९) = पिता रक्षक, माता और स्वयं भी, यहाँ श्रीशठकोप स्वामीजी स्वयं शब्द का उपयोग करते है।

इसलिये त्वम आत्मा असि का अर्थ मेरे कला मे। और सेशि भवसि, आन्तरस शसिता भवसि = दो अर्थ देता है उपर शब्दश: में समझाया है। मुझे अपने सेवक के तरह स्वीकार कर लो, आरपार कर लो और मुझे आज्ञा दे।

यहाँ आंतरा = अंतर भाव (१) वह सर्वाश्रेष्ठ आत्मा जो मन में विराजती है। (२) आतमना: अंतरा: (ब्रहदारण्यक उपनिषद ५-७-२२) जहाँ शब्द को परमात्मा आत्मा में बसता है ऐसा समझाया गया है। अंतरस्य अयं आंतरा: = ज्ञानी जो परमात्मा में विराजता और आज्ञा देता है। ज्ञानीतु आत्मैव मे मतम (गीता ७-१८) भगवान का घोषणा करना कि ज्ञानी जो अन्दर बसता है भगवान पर भी आज्ञा करता है।

यद्वा = इसमे वह सब बाहर है जो पहिले विस्तार से अलग अलग कहा गया है। ऐसे विस्तार से सबकुछ अलग अलग कहना एक ग्रन्थ तैयार हो जाता है। यहाँ उनका कहना त्वम आत्मा असि का अर्थ सभी आत्मा को समान करना नहीं है। परन्तु कृपा से बाहर शेष / शेषी भाव और निर्यन्तु / नियाम्य भाव हीं।

सेशि भवसि, आन्तरस शसिता भवति आदि इस उत्साह को सिद्ध करते है।

यह भगवान के साथ समानता शास्त्र का तत्त्व है। और जैसे श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी कहते है पीटकवादैप पिरानार पिरमा गुरूवाकि वन्तु (पेरियाल्वार तिरुमोली ५-२-९) क्योंकि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी भगवान के अवतार है और वह उनको भगवान के बराबर मानते है।

हिंदी अनुवाद – केशव रान्दाद रामानुजदास

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उत्तरदिनचर्या – श्लोक – ६

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक ४-५                                                                                                                         श्लोक ७

श्लोक ६

उन्मॆल्य पद्मगर्भ ध्युतित्लमुपरि क्शॆर सङ्घात गौरम
रा का चन्द्र प्र्काश प्र्चुर नखमनि ध्योत विध्योत मा नम
अङ्गुल्यग्रेशु किचिन्नतमति म्र्दुलम रम्य जामात्रुयोगि
दिव्यम ततपादयुग्मम दिशतु शिरसि मे देशिकेन्द्रो दयालु:   

शब्दश: अर्थ

दयालु:                                : वह जो दया का पहलू है
देशिकेन्द्रो                           : आचार्य मे सर्वश्रेष्ठ है
रम्य जामात्रुयोगि                : श्रीवरवरमुनि स्वामीजी
उन्मॆल्य पद्मगर्भ ध्युतित्लम : तेजस्वी श्रीचरण जैसे कमल पुष्प के अन्दर कि पुष्प कि पंखुड़ी
उपरी                                  : उपरी भाग में
क्शॆर सङ्घात गौरम             : सफेद जैसे मिठा दूध
रा का चन्द्र प्र्काश प्र्चुर नखमनि ध्योत विध्योत मा नम : चमकिले नाख़ुन जैसे पूर्ण चन्द्रमा कि सफेदी
अङ्गुल्यग्रेशु                       : नाखूनों का अन्तिम भाग
किचिन्नत                          : थोड़ा सा झुकता हुआ
मति म्र्दुलम                        : बहुत कोमल
दिव्यम                               : इस संसार का नहीं
तत                                    : अत्यंत महान
पादयुग्मम                         : उनके दो श्रीचरण
मे शिरसि                           : मेरे मस्तक पर कृपा करना

व्याख्या

इस गाथा से अगले ६ श्लोक उनके शिष्यों से लिखित स्तोत्र के रूप में है। पहिले श्लोक में एक शिष्य श्रीवरवरमुनि स्वामीजी से उनके श्रीचरण को उनके मस्तक पर भूषण के जैसे रखने कि प्रार्थना करते है। दयालु = वह एक जिसमे दया प्रकृतिक रूप से है। श्रीरामानुज स्वामीजी के जैसे श्रीवरवर मुनि स्वामीजी भी अपने शिष्यों के प्रति दयालु है परंतु दूसरे आचार्य कि तरह सेवा किये नहीं बल्कि उनके स्वभाव से। दिशति उपदिशति इति देशिक: = वह जो शास्त्र का अर्थ सिखाते है वह देशिक है। देशिकानाम इंद्र:= देशिकेन्द्र; आचार्य के प्रधान जो देशिक है। आचार्य के प्रधान यानि ज्ञान को प्राप्त करना, ज्ञान के समनुरूप अभ्यास करना, सभी के ऊपर अनुकम्पा रखना। श्रीवरवर मुनि स्वामीजी के श्रीचरण कमल कि तरह गुलाबी, श्रीनाखून चंद्रमा कि तरह सफेद और सामान्यत: पूर्ण श्रीचरण सुन्दर, चिकना और कोमल है। क्योंकि श्रीवरवर मुनि स्वामीजी श्री आदिशेष के अवतार है उनके श्रीचरण को आप्राकृत है ऐसा समझाया गया है यानि इस दुनिया की नहीं परन्तु परमपद कि कोई श्रेष्ठ वस्तु है। वह इस संसार के ससारियों के जैसे नीचा और सस्ता नहीं है। पहिले का वर्णन “उन्मॆल्य पद्मगर्भ” यह सभी सुन्दरता के पहलु है जो एक व्यक्ति को उत्तम पुरुष के योग्य करता है। यह शिष्य श्रीवरवर मुनि स्वामीजी से यह निवेदन करता है कि उस पर उन चरण कमलों कि कृपा करें जिसके लिये वह प्राकृतिक रूप से शिष्य के रूप में योग्य है। जैसे श्रीशठकोप स्वामीजी सहस्त्रगीति में प्रार्थना करते है “निन सें मा पाड़ा पर्पु (पद्मम) थलै सेर्त्तु” यहाँ एक शिष्य श्रीवरवर मुनि स्वामीजी से प्रार्थना करता है उसे उनके चरण कमलों से कृपा करें क्यों कि वह ही उनके आचार्य है “पाड़ा युग्म शिरसी दिशतु मे” हालाकि यह तीसरे व्यक्ति के लिये कुछ पंक्ति जैसे दिखता है, यह सम्भव है की श्रीवरवरमुनि स्वामीजी मुझ पर कृपा करे, परंतु एक शिष्य की व्यक्तिगत प्रार्थना से श्रीवरवरमुनि स्वामीजी से यही सच्चा इरादा है। यह अगले श्लोक में स्पष्ट हो जायेगा।

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