रामानुस नूट्रन्ददि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या – पाशुर 21 से 30

श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत् वरवरमुनये नम:

रामानुस नूट्रन्दादि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या

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पाशूर २१: श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीमत् यामुनाचार्य स्वामीजी के उभयपादों को उपाय मानकर प्राप्त कर, मेरा रक्षण कर दिया। अत: अब मैं उन नीच जनों की स्तुति नहीं करूंगा।  

निदियैप् पोळियुम् मुगिल् एन्ऱु नीसर् तम् वासल् पऱ्ऱि

तुदि कऱ्ऱु उलगिल् तुवळ्गिन्ऱिलॅ इनि तूय् नेऱि सेर्

एदिगट्कु इऱैवन् यमुनैत् तुऱैवन् इणै अडियाम्

गदि पेऱ्ऱुडैय इरामानुसन् एन्नैक् कात्तनने

श्रीमद्यामुनाचार्य स्वामीजी जिनके दिव्य चरण एक दूसरे के सहायक हैं वें सभी यतियों के अधिनायक है। मैं अब से इस भूमितल पर रहनेवाले नीच जनों की, ‘यह निधि  वरसनेवाला कालमेघ हैं’ इत्यादि मिथ्यास्तुति करता उनके द्वार पर बैठकर दुःख नहीं पाऊंगा; क्योंकि परिशुद्ध आचारवाले सन्यासियों के स्वामी श्रीमद्यामुनाचार्य स्वामीजी के उभयपादों को प्राप्त कर उससे सारे संसार के ही स्वामी बननेवाले श्रीरामानुज स्वामीजी ने मेरा रक्षण कर दिया।

पाशूर २२: जब देवता, भगवान का उल्लंघन कर, बाणासुर का पक्ष लेते हैं तब भगवान उनके उल्लंघन को सहते हैं जब वे भगवान की महिमा को जानते हैं और्वें भगवान कि प्रशंसा करने  (क्षमा मांगने ) लगते हैं। श्रीरामानुज स्वामीजी  जो भगवान की प्रशंसा करते हैं , वह धन हैं जो मुझे मेरे बुरे समय में मदद करेगा।

कार्त्तिगैयानुम् करि मुगत्तानुम् कनलुम् मुक्कण्

मूर्त्तियुम् मोडियुम् वेप्पुम् मुदुगिट्टु मूवुलगुम्

पूत्तवने एन्ऱु पोऱ्ऱिड वाणन् पिळै पोऱुत्त

तीर्त्तनै एत्तुम् इरामानुसन् एन्दन् सेम वैप्पे

(बाणासुरयुद्ध-प्रसंग में) कार्तिकेय, गजमुख, अग्निदेव, त्रिलोचन शिव, दुर्गा देवी और ज्वरदेवता, इन सब के पराजित और पलायमान होने के बाद, जब बाणासुर ने (अथवा शिव ने) यों स्तुति की कि, “हे अपने नाभीकमल से तीनों लोकों की सृष्ठि करनेवाले! (मेरी रक्षा करो)”, तब उसके अपराध की क्षमा करनेवाले परमपावन श्रीकृष्ण भगवान की स्तुति करनेवाले श्री रामानुज स्वामीजी मेरा आपद्धन हैं।

 पाशूर २३: श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं ,  “अगर मैं जो पूर्ण रूप से दोषवाला हूँ , श्रीरामानुज स्वामीजी की प्रशंसा करता हूँ जिनकी प्रशंसा बिना दोषवाले करते हैं,  तो उनके दिव्य गुणों का क्या होगा?” 

वैप्पाय वान् पोरुळ् एन्ऱु नल् अन्बर् मनत्तगत्ते

एप्पोदुम् वैक्कुम् इरामानुसनै इरु निलत्तिल्

ओप्पार् इलाद उऱु विनैयेन् वन्ज नेन्जिल् वैत्तु

मुप्पोदुम् वाज़्ह्त्तुवन् एन्नाम् इदु अवन् मोय् पुगळ्क्के

 विलक्षण भक्तिवाले महात्मा लोग अपने आपद्रक्षक निधि मानते हुए, जिनका नित्य-ध्यान करते हैं, ऐसे श्रीरामानुजस्वामीजी को इस विशाल प्रपंच में ,असदृश महापापी मैं, अपने कपटपूर्ण मन में रख कर स्तुति कर रहा हूँ। अब मुझे यह डर लगता है कि इससे उन आचार्यसार्वभौम के यश की हानि पहुंचेगी।  इस प्रबंध की इतनी गाथाओं में श्री रामानुज स्वामीजी की अप्रतिम स्तुति करने के बाद, अब अमुदनार् का ध्यान अपनी ओर फिरा और उनके मन में ऐसा एक विलक्षण भय उत्पन्न हुआ कि परमभक्तिसम्पन्न महापुरुषों के स्तुत्य आचार्य-सार्वभौम की स्तुति को यदि महापापी मैं करूँ, तो इससे अवश्य ही उनकी महिमा घट जायेगी। समझना चाहिए कि नैच्यानुसन्धान करने का यह भी एक प्रकार है।

 पाशूर २४: जब यह पूछताछ हुआ  कि  कैसे वें एक निचले स्थिति से आज के वर्तमान स्थिति में आये,  तो श्रीरंगामृत स्वामीजी अपने पहिले स्थिति के विषय में चर्चा करते हैं और कैसे वें आज के वर्तमान स्थिति में आते हैं।

मोय्त्त वेम् ती विनैयाल् पल् उडल् तोऱुम् मूत्तु अदनाल्

एय्त्तु ओळिन्दॅ मुन नाळ्गळ् एल्लाम् इन्ऱु कण्डु उयर्न्दॅ

पोय्त् तवम् पोऱ्ऱुम् पुलैच् चमयन्गळ् निलत्तु अवियक्

कैत्त मेइग्यानत्तु इरामानुसन् एन्नुम् कार् तन्नैये

जैसे मधुमक्खी अपने छत्ते के पास झुण्ड बनाकर घूमती हैं वैसे हीं पुरातन काल से बुरे कर्म आत्मा के आगे पीचे घूमती हैं जिसके कारण मैं अनेक प्रकार के जन्म अनेक बार लिया हूँ। वेद यह बताता हैं कि, संसार के सुख से कैसे दूर रहे, कैसे दूसरों को कष्ट न देना और कैसे अपने आचार्य की  सेवा करना। निचले तत्त्वज्ञान, वेदों में कहे अनुसार कार्य नहीं करते हैं, परंतु स्वयं अनुसार अनुचित तरीके से कार्य करते हैं । श्रीरामानुज स्वामीजी, ऐसे निचले तत्त्वज्ञान और उनके तरीकों कों पूर्णत: नष्ट कर दिये। ऐसे श्रीरामानुज स्वामीजी जो अत्यधिक उदार शख्स हैं स्वयं को ऐसे दिखाते कि वो मेरे लिए हीं हैं जिसके कारण मैं आज मेरे इस वर्तमान प्रसिद्ध स्थिति में पहुंचा हूँ।

पाशूर २५:. श्रीरामानुज स्वामीजी ने जो उनके ऊपर कृपा किये वह स्मरण कर श्रीरंगामृत स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य मुखारविंद को देखकर उन्हें पूछते “इस संसार में कौन आपकी कृपा को जान सकता हैं?”

कार् एय् करुणै इरामानुस इक्कडल् इडत्तिल्

आरे अऱिबवर् निन् अरुळिन् तन्मै अल्ललुक्कु

नेरेउऱैविडम् नान् वन्दु नी एन्नै उय्त्तपिन् उन्

सीरेउयिर्क्कुयिराय् अडियेऱ्कु इन्ऱु तित्तिक्कुमे

हे मेघ के सदृश कृपामूर्ते श्रीरामानुज स्वामीन्! मैं तो समस्त सांसारिक क्लेशों का नित्यनिवास स्थान हूँ । ऐसे मुझको आपने अपनी निर्हेतुक कृपा से स्वीकार कर लिया। अतः अब आपके कल्याणगुण ही मेरी आत्मा के धारक होकर मुझे अत्यंत प्रिय लग रहे हैं। समुद्रपरिवृत इस भूतल पर कौन आप की कृपा का प्रभाव जान सकता? (कोई भी नहीं।) जैसे मेघ, श्रेष्ठ-नीच विभाग का ख्याल किये बिना सर्वत्र बरस कर सबका ताप मिटाता है, ठीक उसी प्रकार श्रीरामानुज स्वामीजी भी किसीकी योग्यता या अयोग्यता का ख्याल न करते हुए सबके ऊपर अपनी सीमातीत दया बरसाते हुए उनके तापत्रय मिटा देते हैं। ऐसी आपकी विशेष कृपा का वैभव कौन समझ सकता है?

पाशूर २६:. श्रीवैष्णव वह है जिनके पास श्रीरामानुज स्वामीजीके श्रीचरण कमलों में पूर्णत: अन्तर्भूत होने का एक महान वैभव हैं। श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कि श्रीवैष्णवों के पहले की  स्थिति के ऐसे गुण में मुझे दास बना रहा हैं।

तिक्कुऱ्ऱ कीर्त्ति इरामानुसनै एन् सेय् विनैयाम्

मेय्क्कुऱ्ऱम् नीक्कि विळन्गिय मेगत्तै मेवुम् नल्लोर्

एक्कुऱ्ऱवाळर् एदु पिऱप्पु एदु इयल्वु आग निन्ऱोर्

अक्कुऱ्ऱम् अप्पिऱप्पु अव्वियल्वे नम्मै आट्कोळ्ळुमे

मेरे असंख्य पापों को दूर कर उससे संतोष पानेवाले, परमोदार और दिगंतविश्रांत यशवाले श्री रामानुज स्वामीजी की शरण में रहनेवाले जन, उससे पहले जैसे अपराधवाले रहे, जैसे कुल में उत्पन्न हुए थे और जैसे आचरण करते रहे, उनके वे ही अपराध, वे ही कुल और वे ही आचरण हमारे लिए पूज्य हैं। श्री भगवद्रामानुज स्वामीजी के भक्तों में उनके पूर्वकृत पुण्यपाप, दुराचार, उच्चनीच कुल इत्यादियों का ख्याल नहीं किया जा सकता।

 पाशूर २७:. अभी जब वें श्रीरामानुज स्वामीजी के शिष्यों की ओर प्रिय हो रहे थे, श्रीरामानुज स्वामीजी स्वयं को श्रीरंगामृत स्वामीजी के हृदय के ओर अनुरूप किया। श्रीरंगामृत स्वामीजी उद्विगन हो गये कि यह श्रीरामानुज स्वामीजी कीओर दोष लायेगा।  

कोळ्ळक् कुऱैवु अऱ्ऱु इलन्गि कोज़्हुन्दु विट्टु ओन्गिय उन्

वळ्ळल् तनत्तिनाल् वल्विनैयेन् मनम् नी पुगुन्दाय्

वेळ्ळैच् चुड्डर् विडुम् उन् पेरु मेन्मैक्कु इळुक्कु इदु एन्ऱु

तळ्ळुऱ्ऱु इरन्गुम् इरामानुसा एन् तनि नेन्जमे

हे उड़यवर! (जिनके वश में दोनों लीला और नित्य विभूति हैं) प्रतिक्षण बढते रहनेवाले अपने सौशिल्यगुण की वजह से ही (अपनी महिमा का ख्याल नहीं करते हुए) आपने मुझ घोरपापी के मन में प्रवेश किया। यह सोचता हुआ कि (वसिष्ठ के चंडालगृहप्रवेश की भांति) आपका यह कृत्य, परम परिशुद्ध व जाज्वल्यमान आपके प्रभाव में शायद कलंक डालता होगा, मेरा यह विचित्र मन चिंतित हो रहा है।

पाशूर २८:  श्रीरंगामृत स्वामीजी, श्रीरामानुज स्वामीजी के विषय की भाषा यह इच्छा देखकर खुश हो जाते हैं।   

नेन्जिल् कऱै कोण्ड कन्जनैक् काय्न्द निमलन् नन्गळ्

पन्जित् तिरुवडिप् पिन्नै तन् कादलन् पादम् नण्णा

वन्जर्क्कु अरिय इरामानुसन् पुगज़्ह् अन्ऱि एन् वाय्

कोन्जिप् परवगिल्लादु एन्न वाळ्वु इन्ऱु कूडियदे

कल्मषचित्त कंस का संहार करनेवाले, अखिल हेयप्रत्यनीक (माने समस्थविद दोषों के विरोधी) और सुकुमार पादवाली हमारी नीलादेवी के वल्लभ भगवान के पादारविन्दों का आश्रय नहीं लेते हुए, आत्मापहार नामक चोरी करनेवाले को सर्वथा दुर्लभ श्रीरामानुज स्वामीजी की दिव्यकीर्ति के सिवा दूसरे किसीका यशोगान करना मेरा जी नहीं चाहता। ओह ! आज मुझे कैसा सुंदर भाग्य मिला है ?

 पाशूर २९: श्रीरंगामृत स्वामीजी को यह भाग्य हाल में मिल ही चुका था। अतः यहां पर इतना भाग्य माँगा जा रहा है कि, श्रीरामानुज भक्त मंडली के दर्शन मुझे नित्य ही मिलते रहें। 

कूट्टुम् विदि एन्ऱु कूडुन्गोलो तेन् कुरुगैप्पिरान्

पाट्टेन्नुम् वेदप् पसुम् तमिळ् तन्नै तन् पत्ति एन्नुम्

वीट्टिन् कण् वैत्त इरामानुसन् पुगळ् मेय् उणर्न्दोर्

ईट्टन्गळ् तन्नै एन् नाट्टन्गळ् कण्डु इन्बम् एय्दिडवे

श्रीशठकोपसूरी की श्रीसूक्ति के रूप में प्रसिद्ध द्राविडवेदरूप सहस्रगीति का अपने भक्त रूप प्रसाद में स्थापित करनेवाले श्री रामानुज स्वामीजी के कल्याणगुणों का ठीक ध्यान करनेवालों की गोष्ठी के दर्शन कर मेरी आँखे कब आनंदित होंगी। न जाने ऐसा भाग्य (उनकी कृपा) मुझे कब मिलेगी। 

पाशूर ३०:  जब यह पूछा गया कि क्या आपने श्रीरामानुज स्वामीजी से संसार से मोक्ष प्राप्ति को मांगा तब श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कि अब श्रीरामानुज स्वामीजी ने मुझे अपना दास मान लिया हैं, अब मुझे मोक्ष मिले या नरक कोई विषय नहीं रहता हैं।  

 इन्बम् तरु पेरु वीडु वन्दु एय्दिल् एन् एण्णिऱन्द

तुन्बम् तरु निरयम् पल सूळिल् एन् तोल् उलगैल्

मन् पल् उयिर्गट्कु इऱैयवन् मायन् एन मोळिन्द

अन्बन् अनगन् इरामानुसन् एन्नै आण्डनने

सर्वेशवर अपने स्वरूप, रूप और गुण में अद्भुत हैं| वें कई समय से अनगिनत आत्माओं के स्वामी हैं।अपने श्रीभाष्यादिग्रंथों द्वारा इस अर्थका उपदेश देनेवाले कि, “भगवान अनादि से इस प्रपंच में रहनेवाले सभी चेतनों के शेषी हैं,” परमकारुणिक व दोषशून्य श्री रामानुज स्वामीजी ने मुझे अपना दास बना दिया। फिर परमानंद-दायक मोक्ष ही मिले, अथवा अपरिमित दुःख देनेवाला नरक ही क्यों न मिले, मुझे इस बात की चिंता ही कौनसी है? दोनों ही मेरे लिए समान हैं  |

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अडियेन् केशव् रामानुज दास्

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