आर्ति प्रबंधं – ५३

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पाशुर ५२

 

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उपक्षेप

पिछले पासुरम में मामुनि अपने अंतिम दिशा को वर्णन करते समय, पेरिय पेरुमाळ के गरुड़ में सवार उन्के (मामुनि को दर्शन देनें) यहाँ आने की बात भी बताया। इससे यह प्रश्न उठता है कि अपने अंतिम दिशा पर पेरिय पेरुमाळ के पधारने तक मामुनि क्या करेँगे ? मामुनि कहतें हैं कि, “उस अंतिम महान क्षण आने केलिए, सारे दुखों और पीड़ाओं की मूल कारण , इस शरीर को गिरना हैं। अत: हे रामानुज ! आप मुझे वह दीजिये जो उचित और आवश्यक है: दर्द और दुःख भरे इस सँसार से मुक्ति दिलाइये।  

 

पासुरम ५३

इदत्ताले तेन्नरंगर सेयगिरदु एन्ड्ररिन्दे

इरुंदालुम तर्काल वेदनैयिन कनत्ताल

पदैत्तु आवो एन्नुम इंद पाव उडंबुडने

पल नोवुं अनुबवित्तु इप्पवत्तु इरुक्कपोमो?

मदत्ताले वलविनैयिन वळी उळन्ड्रु तिरिंद

वलविनैयेन तन्नै उनक्कु आळाक्कि कोंड

इद तायुम तंदैयुमाम ऐतिरासा! एन्नै

इनि कडुग इप्पवत्तिनिन्ड्रुम एडुत्तरुळे

 

शब्दार्थ

इदत्ताले  – “हित” के कारण ( हमेशा अच्छाई केलिए सोचना और करना )

तेन्नरंगर- पेरिय पेरुमाळ (श्री रंगनाथ)

सेयगिरदुएन्ड्ररिन्दे इरुंदालुम – मेरे कर्मों के फल बुगतने दे रहें हैं , पर मुझे पता हैं कि यह भी मेरे हित में हैं।  

तर्काल वेदनैयिन कनत्ताल – उस समय के पीड़ाओं से मैं

पदैत्तु –  दर्द में तड़पा

आवो एन्नुम – दर्द और संकट में ले जाने वाली “हा” तथा “ओह” जैसे आवाज़ों को किया

इरुक्कपोमो?-  क्या मैं जी पाऊँगा ?

इप्पवत्तु –  इस तुच्छ सँसार में ?

इंद पाव उडंबुडने – इस शरीर के संग जो खुद पाप हैं

पल नोवुं अनुबवित्तु – और बहुत सारें दुःख एवं संकट झेलकर ?

मदत्ताले – इस शरीर के संबंध से

वलविनैयिन वळीउळन्ड्रु तिरिंद – मेरे कर्मों से निर्धारित मार्ग में भटकता गया और उसी यात्रा में था

वलविनैयेन तन्नै  – मैं जो सबसे क्रूर पापी हूँ

आळाक्कि कोंड – आप (एम्पेरुमानार) के कृपा से आपका सेवक बना

उनक्कु – आप जो इन जीवात्माओं के आधार हैं

इद तायुम – हित करने वाली माता के रूप में किया , और मेरे

तंदैयुमाम – पिता

ऐतिरासा! – हे एम्पेरुमानारे

इनि – इसके बाद

कडुग – शीग्र

एडुत्तरुळे – सुधारों और मुक्ति दो

एन्नै – मुझे

इप्पवत्तिनिन्ड्रुम – इस सँसार से

 

सरल अनुवाद

मामुनि मुक्ति केलिए श्री रामानुज से प्रार्थना ज़ारी रख्ते हैं। उनको यह ज्ञान होता हैं कि उन्की कर्मों को शीग्र मिटाने के लिए ही दयाळु पेरिय पेरुमाळ उन्को इतने पीड़ा दिए। यह जानते हुए भी कर्मों के फलों के तीव्रता असहनीय है। शरीर के संबंध से ही निरंतर बने इस काँटो से भरे मार्ग से मुक्ति कि प्रार्थना, मामुनि पिता और माता समान श्री रामानुज से करतें हैं।  

 

स्पष्टीकरण

इस विषय में अपना ज्ञान और परिपक्वता को प्रकट करतें हुए मामुनि कहतें हैं , “अरपेरुंतुयरे सेयदिडिनुम (ज्ञान सारम २१) तथा इस्के तुल्य अन्य पासुरमों से समझ में आता हैं कि उन्के “हित” गुण (जिस्से दूसरों के अच्छाई सोचना और उन्के बलाई केलिए कार्य करना) और उन्के आशीर्वाद के कारण ही मैं इतना दुःख और संकट झेल रहा हूँ। अर्थात, कर्म  मिटाने केलिए पीड़ाओं झेलना ही रास्ता है। यह समझते हुए भी पीड़ा अन्यभाव करते समय, अत्यंत दुःख पहुँचता है और इतना असहनीय है की मैं “हा”, “ ओह” चिल्लाता हूँ। जो शरीर इन पीड़ाओं का मूल कारण है मैं उस्से ही ये बेबसी का आवाज़ निकालता हूँ। इसी स्थिति मैं अनादि काल से हूँ , मेरा ऐसे रहना उचित है क्या ? मैं पाप के सिवाय और कुछ नहीं कर रहा हूँ।  इसी विषय को तिरुमंगैयाळवार भी कहतें हैं: “पावमे सेयदु पावि आनेन” (पेरिय तिरुमोळि १.९.९). शरीर के खींच में मग्न मैं उन दिशाओं में जाता हूँ और पाप करता जाता हूँ। लगातार किये जाने वाले इन पापों से मेरे दुःख और पीड़ा भी अधिक होतीं जा रहीं हैं। किंतु हे एम्पेरुमानार! मेरे माता और पिता होने के कारण और आपके “हितं” गुण के कारण आप ने मुझे स्वीकार कर आशीर्वाद भी किया हैं। अत: आपसे विनम्र प्रार्थना हैं कि मेरी निरंतर पीड़ाओं को मिटाकर इस सँसार के बंधनों से विमुक्त करें।  

अडियेन प्रीती रामानुज दासि

आधार : http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2017/03/arththi-prabandham-53/

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