आर्ति प्रबंधं – २५

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

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उपक्षेप

इस पासुरम में मणवाळ मामुनि एक काल्पनिक प्रश्न उठाते हैं। उनका मानना हैं कि यह शायद श्री रामानुज के मन में होगा और इसका अब मणवाळ मामुनि, इस पासुरम में उत्तर देतें हैं। , श्री रामानुज, मणवाळ मामुनि से (काल्पनिक) प्रश्न करतें हैं , “ हे मणवाळ मामुनि! आपने अपने पापों के हिसाब न लेते हुए, कैंकर्य की प्रार्थना की हैं, इस विषय में, अब मैं क्या करूँ?कृपया उत्तर दीजिये।” मणवाळ मामुनि प्रस्ताव करते हैं , “हे! श्री रामानुज! आश्रय उपहार किये दिन से आज तक , आप मेरे पापो को सहते रहें। मेरे पास योग्यता न होने पर भी, आप  परमपद की आश्वासन दिए।  अब, और विलंब के बिना कृपया तुरंत मोक्ष उपहार कीजिये।”

पासुरम २५

एन्रु निरेतुगमाग एन्नै अभिमानित्तु
यानुम अदरिंदु उनक्केयायिरुक्कुम वगै सैदाई
अन्रू मुदल इन्रळवुम अनवरतम पिळैये
अडुतडुत्तु चेयवदु अनुतविप्पदु इनिच्चेय्येन
एन्रु उन्नै वंदु इरप्पदाम एन कोदूमैं कणडुम
इगळादे इरवुपगल अडिमै कोणडु पोंदाय
इन्रु तिरुनाडुम एनक्कु अरुळ एण्णुगिनराय
इनि कडूग चैदरुळवेणडुम एतिरासा !

शब्दार्थ

एतिरासा – हे ! एतिरासा ! मेरे स्वामी ! यतियों के नेता !
एन्रु –  जिस दिन से
निरेतुगमाग – (जब आप ) बिना कारण के
एन्नै – मेरे प्रति यह सोच कर
अभिमानित्तु – कि “मैं (मणवाळ मामुनि) आपका हूँ”
यानुम  – मैं भी
अदरिंदु – समझकर
उनक्के – (और सेवा की ) केवल आपके प्रति
आयिरुक्कुम – (और मुझे बनाया ) केवल आपकी वस्तु
सैदाई – आपने यह किया, हैं न ?
वगै – (आपके प्रति) ऐसे (भाव होने केलिए )
अन्रू मुदल – उस दिन से
इन्रळवुम – अब तक
अनवरतम – (मैं) सदा
अडुतडुत्तु – लगातार
चेयवदु
कर रहा हूँ
पिळैये – केवल पाप
अनुतविप्पदु – और उन पापो केलिए  तुरंत  पछताता हूँ
इनि – आगे
चेय्येन एन्रु – (ये पाप) नहीं करनी चाहिए
उन्नै वंदु इरप्पदाम – और आपसे सहारा की प्रार्थना करता हूँ
एन कोडूमै कणडुम – आप, मेरे क्रूर पाप देखने पर भी
इगळादे – कभी अस्वीकार या द्वेष न करते हैं
अडिमै कोंडु पोंदाय – (बल्कि) आप के चरण कमलों के प्रति मेरे कैंकर्य स्वीकार करते हैं
इरवुपगल – दिन और रात
इन्रु – (और ) आज
एण्णुगिन्राय – आप विचार कर रहें हैं
अरुळ – आशीर्वाद करने
एनक्कु – मुझे
तिरुनाडुम – परमपद के सात
इनि कडुग – अतः, शीघ्र
चेयदु अरुळवेणडूम – यह उपहार करें

सरल अनुवाद

इस पासुरम में, मणवाळ मामुनि श्री रामानुज से शीघ्र ही परमपद प्राप्ति उपहार करने की प्रार्थना करते हैं। वें कहते हैं कि “मणवाळ मामुनि मेरे हैं”, समझ कर जिस दिन श्री रामानुज आश्रय दिए, तब से , आज तक वे लगातार अनेक पाप करते रहें।  ये पाप करने के पश्चात तुरंत पछताने पर भी वें पाप करने से रूखे नहीं। लंबे समय से यही हो रहा है, किन्तु श्री रामानुज न ही उन पापो पर विचार किये न ही मणवाळ मामुनि के प्रति द्वेष बढ़ाये। मामुनि कहते हैं कि, बल्कि श्री रामानुज उन्को निश्चित रूप में अपने चरण कमलों के प्रति अविछिन्न कैंकर्य उपहार करते रहें। और आज परमपद उपहार करने पर भी विचार कर रहें हैं। मामुनि प्रश्न करतें हैं कि ऐसी स्थिति में विलंब क्यों ? और तुरंत आशीर्वाद करने केलिए प्रार्थना करते हैं।

स्पष्टीकरण

मणवाळ मामुनि कहते हैं , “हे ! यतियों के नेता ! “यह आत्मा मेरा हैं”, ऐसे विचार से आपने इस आत्मा पर कृपा किया हैं।  आपकी कृपा निर्हेतुक, बिना हेतु या कारण की हैं। इसकी मुझे जानकारी हैं और आपके कृपा या आशीर्वाद के कारण मैं केवल आपके उपयोग का वस्तु बना।  उस दिन से अब तक मैंने लगातार अविछिन्न रूप में पाप ही किये हैं।  उस्केलिये तुरंत पछतावे से आपसे ही सहारा की प्रार्थना करता हूँ।  मेरे इन पापो के कारण आपने मुझे अस्वीकार या मेरे प्रति द्वेष नहीं दिखाए।  बल्कि आपके चरण कमलों के प्रति अविछिन्न कैंकर्य की उपहार किये।  और इस से बढ़ कर, मुझे परमपद उपहार करने का भी सोचे, जिसकी मेरी योग्यता ही नहीं हैं।  यह निश्चय करने के पश्चात विलंब क्यों ? आप से ,शीघ्र ही आशीर्वाद करने की प्रार्थना करता हूँ।”

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

आधार :  http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2016/09/arththi-prabandham-25/

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