आर्ति प्रबंधं – ११

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम: आर्ति प्रबंधं << पासुर १० उपक्षेप इस पासुरम में, मणवाळ मामुनि के कल्पना में श्री रामानुज उनसे एक प्रश्न करते हैं। “हे ! मणवाळ मामुनि ! आप  “निळळुम अडित्तारुमानोम (पेरिय तिरुवन्दादि ३१ ), “मेविनेन अवन  पोन्नडि (कण्णिनुन चिरुत्ताम्बु २) और “रामानुज पदच्छाया” (एम्बार के तनियन ) वचनों … Read more

आर्ति प्रबंधं – १०

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम: आर्ति प्रबंधं << पासुर ९ उपक्षेप  अपने अनेक जन्म मरणो के कारण पर मणवाळ मामुनि विचार करते हैं और इस निर्णय पर पहुँचते हैं कि उनके अनेक जन्मों और उससे सम्बंधित पीड़ाओं का एक मात्र कारण, श्री रामानुज  के चरण कमलों में शरणागति न करना ही है। … Read more

आर्ति प्रबंधं – ९

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम: आर्ति प्रबंधं << पासुर ८ उपक्षेप मणवाळ मामुनि से कुछ लोग पूछते हैं, “हे! मणवाळ मामुनि! पेरिय तिरुमोळि १. ९. ८  के वचन “नोट्रेन पल पिरवि” के अनुसार जीवात्मा के अनेक जीवन हैं , प्रति जीवन भिन्न शरीर में।  और प्रति जीवन कर्मानुसार है। आपके कहना है … Read more

आर्ति प्रबंधं – ८

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम: आर्ति प्रबंधं << पासुर ७ पासुरम ८ तन कुळवि वान किणट्रै चार्न्दिरुक्क कनडिरुन्दाल एन्बदन्रो अन्नै पळियेर्किन्राल – नंगु उणरिल एन्नाले नासं मेलुम एतिरासा उन्नाले आम उरवै ओर शब्दार्थ तन कुळवि – अगर अपना बच्चा चार्न्दिरुक्क – निकट वान किणट्र – एक बड़ा कुआँ (कुऍ में गिरने से … Read more

शरणागति गद्य – चूर्णिका 5 – भाग 3

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नम: शरणागति गद्य << चूर्णिका 5 – भाग 2 पिछले अंकों में हमने भगवान के स्वरुप (प्रकृति), रूप गुण (दिव्य विग्रह के गुण), आभूषणों, आयुधों, और महिषियों के विषय में किये गए वर्णन को देखा। अब हम श्रीवैकुण्ठ और लीला विभूति में उनके आश्रितों के विषय में जानेंगे। … Read more

आर्ति प्रबंधं – ७

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम: आर्ति प्रबंधं << पासुर ६   उपक्षेप मणवाळ मामुनि की कल्पना में पिछले पासुरम के अनुबंध में, श्री रामानुज उनसे प्रश्न करते हैं। मणवाळ मामुनि, पूर्व पासुरम में शीघ्र अपने शरीर की नाश कर, श्री रामानुज के चरण कमलों में स्वीकरित करने की प्रार्थना करते हैं। इसकी … Read more

आर्ति प्रबंधं – ६

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम: आर्ति प्रबंधं << पासुर ५ उपक्षेप पिछले पासुर और इस पासुर के संबंध को “उन भोगं नन्रो एनै ओळिन्द नाळ” से स्थापित किया गया हैं।  पिछले पासुर में मणवाळ मामुनि (वरवरमुनि), श्री रामानुज से प्रश्न करते हैं कि, उनके (मणवाळ मामुनि के) सांसारिक बंधनों में रहते हुए, वे … Read more

आर्ति प्रबंधं – ५

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम: आर्ति प्रबंधं << पासुर ४ उपक्षेप पूर्व पासुर में, मणवाळ मामुनि, श्री रामानुज के प्रति “उणर्न्दु पार” अर्थात, अपने परमपद प्राप्ति  पर विचार करने कि प्रार्थना करते हैं। इसके अनुबंध में, यह प्रश्न आता हैं कि मणवाळ मामुनि किस आधार पर श्री रामानुज से इतने अधिकार से … Read more

शरणागति गद्य – चूर्णिका 5 – भाग 2

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नम: शरणागति गद्य << चूर्णिका 5 – भाग 1 अब हम उनके स्वरुप के गुणों के विषय में जानेंगे। जिस प्रकार उनके रूप (विग्रह) के गुण, रूप के सुंदर आभूषणों के समान है, उसी प्रकार उनके स्वरुप के गुण भी उनके स्वरुप के आभूषणों के समान है।   … Read more

आर्ति प्रबंधं – ४

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम: आर्ति प्रबंधं << पासुर ३ उपक्षेप शरीर, जो पिछले पासुरम में विरोधी चित्रित किया गया था, यहाँ आत्मा का कारागार बताया जाता है। इस पासुरम में मणवाळमामुनि, श्री रामानुज से उस कारागार से मुक्ति कि प्रार्थना करते हैं और बताते हैं कि यह कार्य केवल श्री रामानुज … Read more