श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नमः

मुनिवाहन स्वामी (तिरुप्पाणाऴ्वार्) की महिमा
मुनिवाहन स्वामी (तिरुप्पाणाऴ्वार्) का अवतार उऱैयूर् नामक एक दिव्य क्षेत्र में हुआ था। आज यह स्थल तिरुक्कोऴि नाम से प्रसिद्ध है, जो श्रीरंगम् के निकट है। इस तीर्थक्षेत्र में महालक्ष्मी देवी स्वरूप कमलवल्ली देवी (कमलवल्ली नाच्चियार्) का विशेष महत्त्व है। सेर्त्ति (दिव्य मिलन) उत्सवम् नामक एक विशेष उत्सव काल में, श्रीरंगम से नम्पेरुमाळ् (उत्सव मूर्ति – अऴगिय मणवाळन् भगवान) यहाँ कमलवल्ली के साथ रहने के लिए उऱैयूर् आते हैं। मुनिवाहन स्वामी का प्राकट्य ऐसे महिमामयी स्थान पर हुआ था। उनका जन्म नक्षत्र तमिऴ् महीने कार्तिकै (कार्तिक) का रोहिणी नक्षत्र है। उन्होंने हमें “अमलनादिपिरान्” नामक प्रबंधम् (दिव्य रचना) से अनुग्रहित किया।
तॊण्डरडिप्पॊडी आऴ्वार् (विप्रनारायण) की तरह ही, मुनिवाहन स्वामी भी श्रीरंगनाथ के प्रति एकनिष्ठ थे। ऐसा कहा जाता है कि अंतिम तीन आऴ्वार्—विप्रनारायण, मुनिवाहन स्वामी और परकाल सूरी (तिरुमङ्गै आऴ्वार्) — अर्चावतारों (अर्चावतार – विग्रह रूप) में पूरी तरह लीन थे। इन तीनों में से, विप्रनारायण और मुनिवाहन स्वामी मुख्य रूप से केवल श्रीरंगनाथ की भक्ति में ही निमग्न रहते थे। परकाल सूरी सभी अर्चावतार भगवानों से जुड़े थे।
मुनिवाहन स्वामी ने “अमलनादिपिरान्” की रचना करके पॆरिय पॆरुमाळ् के दिव्य मंगल विग्रह (तिरुमेनी) का मंगलाशासनम् (मंगलवाचन/स्तुति) किया। उन्होंने अपना पूरा जीवन भगवान श्रीरंगनाथन के के दिव्य मंगल विग्रह का दिव्य अनुभव प्राप्त करने के एकमात्र लक्ष्य के साथ जिया।
मुनिवाहन स्वामी का जन्म पंचम कुल में हुआ था। शास्त्रों ने वर्ण के ४ वर्गीकरण दिए हैं — ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इन चारों वर्णों में से किसी में भी वर्गीकृत नहीं हैं, जो शास्त्रों द्वारा दिखाई गई किसी भी बात को स्वीकार नहीं करते हैं और अपनी इच्छानुसार जीवन जीते हैं। किंतु ऐसे कुल में भी, भगवान की कृपा से, कुछ लोग भगवान के प्रति अगाध भक्ति के साथ जन्म लेते हैं। भक्त नम्पाडुवान् के जैसे, मुनिवाहन स्वामी भी एक ऐसे कुल में अवतरित हुए जो वेदों द्वारा परिभाषित ४ वर्णों के अंतर्गत नहीं था।
मुनिवाहन स्वामी की महिमा की व्याख्या करते हुए, हमारे आचार्यों ने टीकाओं में कहा है कि इस संसार के लोग सोच सकते हैं कि मुनिवाहन स्वामी का जन्म निचले कुल में हुआ है क्योंकि वे शास्त्रों द्वारा बताए गए चार वर्णों से बाहर के कुल से हैं। हालाँकि, जब भगवान मुनिवाहन स्वामी को ४ वर्णों से परे मानते हैं, तो वे उन्हें नित्यसूरियों (परमधाम के शाश्वत जीव) के रूप में सोचते हैं, जो स्वयं भी चारों वर्णों (जो मनुष्यों पर लागू हैं) में से किसी के अंतर्गत नहीं आते हैं। इस प्रकार मुनिवाहन स्वामी एक ऐसे व्यक्तित्व हैं जिन्हें भगवान की पूर्ण कृपा प्राप्त हुई है।
मुनिवाहन स्वामी की कथा सुप्रसिद्ध है। वह नियमित रूप से कावेरी (तिरुक्कावेरी) नदी के दूसरी ओर बैठते हैं और श्रीरंगम के भीतर आए बिना श्रीरंगनाथ की महिमा का गान करते हैं। ऐसे ही एक अवसर पर, जब मुनिवाहन स्वामी भगवान की महिमा गाने में लीन होकर लोकसारंग मुनि के मार्ग में खड़े थे, तब मुनि ने मार्ग देने के लिए आऴ्वार् की ओर एक पत्थर फेंका, जो भूल से आऴ्वार् के माथे पर लग गया, जिससे वे घायल हो गए और माथे से रक्त बहने लगा।
लोकसारंग मुनि दुःखी होकर मंदिर वापस लौट आए। भगवान ने लोकसारंग मुनि को बुलाकर कहा, “तुमने बहुत बड़ा अपचार (अपराध/अवहेलना) किया है।” और उन्होंने लोकसारंग मुनि को वापस जाकर मुनिवाहन स्वामी को मंदिर में ले आने का आदेश दिया। लोकसारंग मुनि तुरंत मुनिवाहन स्वामी के पास पहुँचे, उनसे क्षमा माँगी और उनसे श्रीरंगम् मंदिर आने की प्रार्थना की। किंतु मुनिवाहन स्वामी ने उत्तर दिया कि वे एक निचले कुल से हैं, इसलिए उनके चरण दिव्य धाम श्रीरंगम को नहीं छू सकते और उन्हें केवल इस दिव्य स्थान से बाहर ही रहना चाहिए।
तब, लोकसारंग मुनि ने कहा, “नहीं, यह श्रीरंगनाथ का दिव्य आदेश है और किसी को भी उनके आदेशों की अवज्ञा नहीं करनी चाहिए।” उन्होंने आगे कहा, “यदि आपके चरण इस स्थान पर नहीं लगने चाहिए, तो आप मेरे कंधों पर बैठ सकते हैं और मैं आपको अंदर ले जाऊँगा।” पहले तो मुनिवाहन स्वामी ने इसे स्वीकार नहीं किया, परंतु जब लोकसारंग मुनि ने बहुत आग्रह किया, तो उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया।
आचार्य इस घटना को बहुत ही आश्चर्यजनक और विस्मयकारी मानते हैं। मुनिवाहन स्वामी भले ही पहले लोकसारंग मुनि के अनुरोध पर तुरंत सहमत नहीं हुए थे, परंतु उन्हें भली-भाँति ज्ञात था कि हमें भगवान के भक्तों का आज्ञाकारी होना चाहिए। चूँकि लोकसारंग मुनि भगवान के सच्चे भक्त थे, इसलिए वह उनके अनुरोध पर सहमत हुए और उनके कंधों पर चढ़कर श्रीरंगम् में प्रवेश किया।
श्रीरंगम् मंदिर में प्रवेश करते ही मुनिवाहन स्वामी ने अमलनादिपिरान् के पासुरमों (छंदों) को गाना आरंभ कर दिया। यह विख्यात है कि जैसे ही वे पॆरिय पॆरुमाळ् सन्निधि (मुख्य गर्भगृह) में आते हैं, वे लोकसारंग मुनि के कंधों से नीचे उतर जाते हैं और भगवान के दिव्य चरणों को प्राप्त (लीन) हो जाते हैं। हमारे आचार्यों का कहना है कि आज भी, मुनिवाहन स्वामी के परमपदम प्राप्त कर लेने के बाद भी, वे अभी भी भगवान के चरण कमलों के दिव्य अनुभव में डूबे हुए माने जाते हैं।
मुनिवाहन स्वामी वाऴि तिरुनामम्
उम्बर्तॊऴुम् मॆय्ज्ञानत्तु उऱैयूरान् वाऴिये
उरोगिणिनाळ् कार्त्यिगैयिल् उदित्त वळ्ळल् वाऴिये
वम्बविऴ्तार् मुनितोळिल् वन्द पिरान् वाऴिये
मलर्क्कण्णिल् वेरॊन्ऱुम् वॆय्यादान् वाऴिये
अम्बुवियिल् मदिळरङ्गरगम् पुगुन्दान् वाऴिये
अमलनादिपिरान् पत्तुम् अरुळिनान् वाऴिये
सॆम्पॊन अडि मुडि अळवुम सेविप्पोन् वाऴिये
तिरुप्पाणन् पॊऱ्-पदङ्गळ सॆगतळत्तिल् वाऴिये
मुनिवाहन स्वामी वाऴि तिरुनामम — सरल व्याख्या
- उम्बर्तॊऴुम् मॆय्ज्ञानत्तु उऱैयूरान् वाऴिये – ‘उम्बर्’ नित्यसूरियों/देवताओं को उल्लेख करता है। ऐसा कहा जाता है कि नित्यसूरी भी मुनिवाहन स्वामी की पूजा करते हैं। उनकी महिमा इतनी महान है। उऱैयूर् में प्रकट हुए और सच्चा ज्ञान रखने वाले मुनिवाहन स्वामी चिरंजीवी हों (दीर्घायु हों)।
सच्चा ज्ञान यह जानना है कि जो भगवान परमपदम में हैं, वही अर्चावतार (विग्रह) रूप में भी हैं। हम सोच सकते हैं कि परमपदम अर्चावतार से श्रेष्ठ है। हालाँकि, परमपदम में—केवल भगवान के ‘परत्वम्’ (परत्वम् – सर्वोच्चता) का अनुभव होगा, उनका ‘सौलभ्यम्’ (सौलभ्यम् – सुलभता/आसानी से प्राप्त होना) दिन के उजाले में जलाए गए दीपक की तरह होगा। वह परमपदम में अपना सौलभ्यम् नहीं दिखा सकते क्योंकि परमपदम् में ऐसा कोई नहीं है जो त्रुटियाँ करता हो। केवल इस भूलोक (जिसका तात्पर्य यहाँ संसार से है) में, जो अपराध करने वाले लोगों से भरा है, भगवान का सौलभ्यम् दिखाई देता है। इसलिए, इस पृथ्वी पर यह कहा जा सकता है कि उनका अर्चावतार महत्त्वपूर्ण है। अर्चावतार में, भगवान अर्चक (पूजारी) के परतंत्र (अधीन) होते हैं। जब भी अर्चक तिरुमञ्जनम् (अभिषेक) करता है, वह उस समय उसे स्वीकार करते हैं। जब भी अर्चक भोग (भोजन) अर्पित करते हैं, वह उसे स्वीकार करते हैं। अर्चक उन्हें जो भी वस्त्र पहनाते हैं, वह उसे सहर्ष धारण करते हैं। इस तरह, सर्वोच्च सत्ता होने पर भी, वे अर्चावतार में इतने नीचे के स्तर पर आ जाते हैं कि वे सभी के लिए सुलभ हो जाते हैं। मुनिवाहन स्वामी ने भगवान के अर्चावतार और उसकी सर्वोच्चता को पूरी तरह से समझकर अमलनादिपिरान् के दस पासुरमों में भगवान के दिव्य मंगल विग्रह के सौंदर्य का गान किया है। ऐसी महान महिमा वाले मुनिवाहन स्वामी की जय हो। - उरोगिणिनाळ् कार्त्यिगैयिल् उदित्त वळ्ळल् वाऴिये – मुनिवाहन स्वामी कार्तिकै महीने के रोहिणी नक्षत्र में प्रकट हुए थे। भूलोक में रहने वाले सभी लोगों को अर्चावतार की महानता दिखाने वाली इतनी महान उदारता रखने वाले मुनिवाहन स्वामी चिरंजीवी हों।
- वम्बविऴ्तार् मुनितोळिल् वन्द पिरान् वाऴिये – ‘पिरान’ (शुभचिंतक/उपकारी/परोपकारी) का अर्थ है वह जो हमारा भला करता है। तिरुप्पाणाऴ्वार्, एक ऐसे पिरान् जो हमारा भला करते हैं, सुगंधित माला पहनने वाले लोकसारंग मुनि के कंधों पर चढ़कर श्रीरंगम आए थे। ऐसे मुनिवाहन स्वामी चिरंजीवी हों।
- मलर्क्कण्णिल् वेरॊन्ऱुम् वॆय्यादान् वाऴिये – अपनी पुष्प समान नेत्रों में, मुनिवाहन स्वामी ने पॆरिय पॆरुमाळ् की छवि के अतरिक्त और कुछ नहीं रखा। ऐसे मुनिवाहन स्वामी चिरंजीवी हों।
- अम्बुवियिल् मदिळरङ्गरगम् पुगुन्दान् वाऴिये – इस सुंदर संसार में, मुनिवाहन स्वामी ने रङ्गनाथ (रङ्गन्) के दिव्य हृदय में प्रवेश किया, जो श्रीरंगम में निवास करते हैं जिसमें सप्त प्राकारम् (मंदिर को घेरने वाली 7 संकेंद्रित दीवारें) हैं। ऐसे प्रतापी मुनिवाहन स्वामी चिरंजीवी हों।
- अमलनादिपिरान् पत्तुम् अरुळिनान् वाऴिये – १० पासुरम् वाले अमलनदिपिरान् प्रबंधम से हमें अनुग्रहित करने वाले मुनिवाहन स्वामी चिरंजीवी हों।
- सॆम्पॊन अडि मुडि अळवुम सेविप्पोन् वाऴिये – मुनिवाहन स्वामी ने अमलनदिपिरान् प्रबंधम में भगवान के रक्ताभ स्वर्ण कमल चरणों से लेकर उनके तिरुमुडि (मुकुट) तक श्रीरंगम पॆरिय पॆरुमाळ् के सौंदर्य की विस्तार से व्याख्या की है। पॆरिय पॆरुमाळ् के प्रत्येक अंग का दर्शन करने वाले ऐसे मुनिवाहन स्वामी चिरंजीवी हों।
- तिरुप्पाणन् पॊऱ्-पदङ्गळ सॆगतळत्तिल् वाऴिये – इस भूलोक में मुनिवाहन स्वामी के दिव्य स्वर्ण चरण कमलों की जय हो, वे चिरंजीवी हों।
इस प्रकार मुनिवाहन स्वामी का वाऴि तिरुनामम समाप्त होता है।
अडियेन् वैष्णवी रामानुज दासी
आधार – https://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2025/12/vazhi-thirunamams-thiruppanazhwar-simple/
संगृहीत- https://divyaprabandham.koyil.org
प्रमेय (लक्ष्य) – https://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – https://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – https://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org