श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः

इस दिव्य दशक (दशक की भूमिका) को, श्री शठकोप् स्वामी (नम्माऴ्वार्/पराङ्कुश) ने स्वयं को ‘पराङ्कुश नायिका (पराङ्गुश नायकि)’ (परमात्मा के प्रेम में मग्न गोपी या नायिका) के विरह-भाव में स्थापित किया है। वे प्रभु के वियोग से दुखी होकर ‘मडल्’ (लोक-मर्यादा को त्यागकर समाज के समक्ष यह सार्वजनिक घोषणा करना कि उनके प्रिय भगवान ने उन्हें त्याग दिया है) करने का दृढ़ निश्चय कर लेती है। रात्रि के घनघोर अंधकार में वह विरह की तीव्र अग्नि में अत्यंत तड़पती है, किंतु भोर (प्रातःकाल) की पहली किरण के साथ उसके चित्त में थोड़ी स्पष्टता और चेतना आती है। इसके पश्चात्, उसकी माताएँ और सखियाँ उसे कुल-मर्यादा का वास्ता देकर अनेक प्रकार की उपदेश देने लगती हैं। परंतु, पराङ्कुश नायिका उन लौकिक वचनों को अनसुना कर देती है; वह केवल अपने प्रियतम के ध्यान में मग्न होकर कभी परम आनंद का अनुभव करती है, तो कभी उन्हें साक्षात् सम्मुख न पाकर अगाध शोक में डूब जाती है। यह संपूर्ण दशक आऴ्वार् के इसी दिव्य हर्ष और विषाद (अश्रु-आनंद) का एक जीवंत प्रकटीकरण है। इस दशक का गान ‘उरुवॆळिप्पाडु’ (साक्षात् प्रत्यक्ष दर्शन की भावावस्था या भाव-विभोर कर देने वाली कल्पना) के रूप में किया गया है, मानो आऴ्वार् साक्षात् अपने सामने भगवान को खड़े देख रहे हों। यहाँ आऴ्वार ‘नम्बि एम्पेरुमान्’ (पावन तिरुक्कुऱुङ्गुडि धाम के दिव्य विग्रह) के अत्यंत मनमोहक और आलौकिक सौंदर्य का पूर्ण तन्मयता से रसपान कर रहे हैं।
प्रथम पासुरम् में, पराङ्कुश नायिका (प्रेमिका/नायिका भाव में निमग्न श्री नम्माऴ्वार्/पराङ्कुश) कहती है —’मेरा यह व्याकुल हृदय साक्षात उन आऴ्वारों (शंख, चक्र आदि के रूप में अवतरित हुए नित्यसूरियों) के प्रति पूर्णतः अनुरक्त हो चुका है, जो हमारे दिव्य प्रभु ‘नम्बि’ के विशिष्ट, अलौकिक प्रतीक हैं और जो उनकी अनुपम एवं सर्वोपरि शारीरिक छवि की परम शोभा हैं।’
प्रथम पासुरम –
ऎङ्गनेयो अन्नैमीर्गाळ्! ऎन्नै मुनिवदु नीर्
नङ्गळ् कोलत् तिरुक्कुऱुङ्गुडि नम्बियै नान् कण्ड पिन्
सङ्गिनोडुम् नेमियोडुम् तामरैक् कण्गळोडुम्
सॆङ्गनिवाय् ऒन्ऱिनोडुम् सॆल्गिन्ऱदॆन् नॆञ्जमे
हे मेरी स्नेहमयी माताओं! इस मंगलमय समय पर जब आप सभी को हर्षित और प्रफुल्लित होना चाहिए, तब आप उत्सव मनाने के स्थान पर मुझ पर ऐसा कोप और क्रोध क्यों प्रदर्शित कर रही हैं?
जब से मैंने हमारे पावन कुल की महिमा और गरिमा के सर्वथा अनुकूल, समस्त दिव्य कल्याणकारी गुणों से परिपूर्ण, परम दिव्य धाम ‘तिरुक्कुऱुङ्गुडि’ के उस अत्यंत मनमोहक (कोलम्) प्रभु ‘नम्बि’ के सौंदर्य् का रसपान किया है, तब से मेरा यह चंचल हृदय पूर्णतः उन्हीं के अनुराग में बंध गया है। मेरा यह मन अब पूरे रूप से उनके पावन ‘श्री पाञ्चजन्य’ शंख, उनके तेजस्वी दिव्य चक्र, उनके कमल-समान सम्मोहक एवं विशाल नयनों और पके हुए रक्त-वर्ण (लाल) फल के समान अद्वितीय एवं रसीले अधरों की अनुपम छवि में ही जाकर रम गया है।
अनुवादक टिप्पणी – कोलम् (मनमोहक), जिसे नम्बि भगवान के लिए विशेषण के रूप में समझाया है, यह विशेषण तिरुक्कुऱुङ्गुडि क्षेत्र के साथ भी व्याख्या में स्पष्ट किया जाता है।
द्वितीय पासुरम् में, पराङ्कुश नायिका कहती है —’हमारे प्रिय प्रभु ‘नम्बि’ के पावन वक्षस्थल और उनके अलौकिक दिव्य कंधों की वह स्वाभाविक, नैसर्गिक सुंदरता तथा उन पर सुशोभित दिव्य आभूषण, मुझे चारों ओर से घेरकर मेरे भीतर विरह की अग्नि प्रज्वलित कर रहे हैं और मुझे निरंतर व्याकुल (उद्वेलित) कर रहे हैं।’
द्वितीय पासुरम –
ऎन् नॆञ्जिनाल् नोक्किक् काणीर् ऎन्नै मुनियादे
तॆन्नन् सोलैत् तिरुक्कुऱुङ्गुडि नम्बियै नान् कण्ड पिन्
मिन्नु नूलुम् कुण्डलमुम् मार्बिल् तिरुमऱुवुम्
मन्नु पूणुम् नान्गु तोळुम् वन्दॆङ्गुम् निन्ऱिडुमे
हे मेरी माताओं! मुझ पर इस प्रकार अधिकार जताने और क्रोध करने के स्थान पर, आपको एक बार मेरे इस व्याकुल हृदय की अनुभूति से उस ‘नम्बि’ के सौंदर्य को साक्षात देखना और अनुभव करना चाहिए। जब से मैंने दक्षिण दिशा में स्थित, सुरम्य एवं चित्ताकर्षक उपवनों (बागों) से घिरे उस पावन धाम ‘तिरुक्कुऱुङ्गुडि’ के परम सुंदर प्रभु ‘नम्बि’ के दर्शन किया है, तब से उनकी छवि मुझ पर छा गई है। उनके असीम वैभव को प्रकट करता उनका वह जाज्वल्यमान दिव्य ‘यज्ञोपवीत’ (जनेऊ), उनके कानों में झिलमिलाते अलौकिक कुंडल, उनके वक्षस्थल पर सदैव विराजमान रहने वाला उनका अनन्य आभूषण ‘श्रीवत्स’ चिह्न, उनके विग्रह पर नित्य सुशोभित अन्य समस्त आभूषण और उनकी वे चार विशाल, प्रतापी भुजाएँ… अब मेरा पीछा ही नहीं छोड़तीं। मैं जहाँ भी जाती हूँ, उनकी यह अनुपम और मनमोहक छवि साया बनकर मेरे साथ चलती है और मेरे सम्मुख आकर खड़ी हो जाती है।
तृतीय पासुरम में, पराङ्कुश नायिका कहती हैं—’हमारे परम कृपालु प्रभु ‘नम्बि’ के दिव्य आयुध (अस्त्र-शस्त्र), जिनकी शुरुआत उनके परम प्रतापी धनुष ‘श्री सारंग’ से होती है, अब शाश्वत रूप से मेरे भीतर और मेरे बाहर, सर्वत्र हर ओर साक्षात प्रकट होकर मुझे अपनी दिव्य उपस्थिति का आभास करा रहे हैं।’
तृतीय पासुरम –
निन्ऱिडुम् तिसैक्कुम् नैयुमॆन्ऱु अन्नैयरुम् मुनिदिर्
कुन्ऱ माडत् तिरुक्कुऱुङ्गुडि नम्बियै नान् कण्ड पिन्
वॆन्ऱि विल्लुम् तण्डुम् वाळुम् चक्करमुम् सङ्गमुम्
निन्ऱु तोन्ऱिक् कण्णुळ् नीङ्गा नॆन्जुळ्ळुम् नीङ्गावे
हे मेरी माताओं! आप ही वे प्रथम मार्गदर्शिका थीं जिन्होंने मेरे भीतर प्रभु के प्रति इस अनन्य प्रेम का बीजारोपण किया था। किंतु आज, आप ही मुझे यह कहकर कटु वचन सुना रही हैं कि मैं सुध-बुध खोकर जड़वत खड़ी हूँ, मैं किकर्तव्यविमूढ़ (व्याकुल) हो चुकी हूँ और मेरा शरीर अत्यंत क्षीण और दुर्बल हो गया है। किंतु जब से मैंने पर्वतों के समान उत्तुंग एवं भव्य प्रासादों (महलों) से सुशोभित उस पावन धाम ‘तिरुक्कुऱुङ्गुडि’ के परम सुंदर प्रभु ‘नम्बि’ के आलौकिक सौंदर्य का रसपान् किया है, तब से एक चमत्कार घटित हो गया है। उनकी विजय के प्रतीक — उनका विजयी धनुष (सारंग), गदा (कौमोदकी), नंदकं (तलवार), सुदर्शन चक्र और पाञ्चजन्य शंख — ये पाँचों दिव्य आयुध अब सामूहिक रूप से मेरी आँखों के सम्मुख साक्षात आकर स्थित हो गए हैं और मेरी दृष्टि से पल भर के लिए भी ओझल नहीं होते। ठीक इसी प्रकार, वे मेरे हृदय के अंतस्थल से भी कभी दूर नहीं जाते; वे मेरे भीतर और बाहर, हर ओर रच-बस गए हैं।
चतुर्थ पासुरम में, पराङ्कुश नायिका (भगवद-रंग में आकंठ डूबे हुए श्री नम्माऴवार) कहती हैं—’हमारे परम आराध्य प्रभु ‘नम्बि’ के वे दिव्य और विशिष्ट परिधान (पीतांबर आदि दिव्य वस्त्र), अब निरंतर मेरे अत्यंत सन्निकट बने रहते हैं और मुझे अपनी पावन छाया में समेटे रखते हैं।’
चतुर्थ पासुरम –
नीङ्ग निल्ला कण्ण नीर्गळ् ऎन्ऱु अन्नैयरुम् मुनिदिर्
तेन् कॊळ् सोलैत् तिरुक्कुऱुङ्गुडि नम्बियै नान् कण्ड पिन्
पून्दण् मालैत् तण्डुऴायुम् पॊन् मुडियुम् वडिवुम्
पाङ्गु तोन्ऱुम् पट्टुम् नाणुम् पावियेन् पक्कत्तवे
हे मेरी माताओं! आप ही वे थीं जिन्होंने पूर्व ही मुझे प्रभु ‘नम्बि’ के इस अनुराग-पाश में बांधा था। किंतु आज आप ही मुझे यह कहकर झिड़क रही हैं कि “इसकी आँखों से बहने वाली अश्रु-धाराएँ भला थम क्यों नहीं रहीं!” किंतु जब से मैंने मधुर मकरंद से परिपूर्ण उपवनों से सुशोभित उस पावन धाम ‘तिरुक्कुऱुङ्गुडि’ के चित्ताकर्षक प्रभु ‘नम्बि’ के दिव्य सौंदर्य का रसपान किया है, तब से मुझ जैसी अल्पभागिनी के अत्यंत सन्निकट एक आलौकिक दृश्य उपस्थित हो गया है। उनकी वह नवीन और सुगंधित तुलसी-माला जो मन को परम आनंद और नव-ऊर्जा से भर देती है, उनकी सर्वोच्च सत्ता और संप्रभुता को उद्घोषित करता उनका वह दीप्तिमान स्वर्ण-मुकुट, उनके दिव्य स्वरूप पर सर्वथा सुशोभित उनका वह पीतांबर (रेशमी वस्त्र), और उनकी कटि पर बंधा हुआ दिव्य कटिबंध (करधनी)… यह सब साक्षात मेरे अत्यंत निकट खींचे चले आए हैं और मुझे अपनी पावन छत्रछाया में समेटे हुए हैं।
पंचम पासुरम में, पराङ्कुश नायिका कहती है कि—’हमारे प्रभु ‘नम्बि’ के मुखमंडल का वह आलौकिक सौंदर्य सीधे मेरी ‘आत्मा’ को स्पर्श कर रही है ।’
पंचम पासुरम –
पक्कम् नोक्कि निऱ्-कुम् नैयुम् ऎन्ऱु अन्नैयरुम् मुनिदिर्
तक्क कीर्त्तित् तिरुक्कुऱुङ्गुडि नम्बियै नान् कण्डपिन्
तॊक्क सोदित् तॊण्डै वायुम् नीण्ड पुरुवङ्गळुम्
तक्क तामरैक् कण्णुम् पावियेन् आवियिन् मेलनवे
हे मेरी स्नेहमयी माताओं! आप सब मुझ पर कुपित होकर मुझे यह उलाहना दे रही हैं कि ‘यह व्याकुल होकर निरंतर उसी दिशा में टकटकी लगाए खड़ी रहती है (जहाँ से प्रभु के आने की आस है) और उनके न पधारने के दुःख में भीतर ही भीतर क्षीण हो रही है।’ किंतु, अपनी परम कीर्ति और अनंत महिमा के सर्वधा अनुरूप साक्षात वैभवशाली धाम ‘तिरुक्कुऱुङ्गुडि’ केउस पूर्ण पुरुष प्रभु ‘नम्बि’ के अलौकिक सौंदर्य का रसपान करने के पश्चात, मेरी दशा शब्दों से परे हो चुकी है। असीम कांति से देदीप्यमान् उनके बिम्बा-फल (तॊंडै फल) के समान लाल रसीले अधर, उनके धनुष की भाँति विशाल एवं सुंदर भृकुटि (भौहें), और उन्हीं भृकुटियों के समान ही दीर्घ सम्मोहक उनके करुणामयी कमल-नयन… अब केवल मेरी दृष्टि का विषय नहीं रहे। वे सीधे मुझ जैसी अल्पभागिनी की ‘आत्मा’ की गहराइयों से उतर गए हैं, जो अपने ही किन्हीं प्रारब्ध (पापों) के कारण उन्हें अपनी इच्छानुसार पूर्ण रूप से भोगने में असमर्थ है।
छठे पासुरम में, पराङ्कुश नायिका कहती हैं—’ हमारे सर्वेश्वर प्रभु ‘नम्बि’ के वे विशिष्ट एवं अलौकिक अंग-प्रत्यंग, उनके परम प्रतापी विशाल कंधे और उनके मुखमंडल का वह सम्मोहक सौंदर्य साक्षात मेरे हृदय के अंतस्थल में प्रवेश कर गए हैं और उन्होंने मेरे संपूर्ण अस्तित्व को अपनी अनन्य दिव्यता से परिपूर्ण कर दिया है।’
छठे पासुरम
मेलुम् वन् पऴि नम् कुडिक्किवळ् ऎन्ऱु अन्नै काण कॊडाळ्
सोलै सूऴ् तण् तिरुक्कुऱुङ्गुडि नम्बियै नान् कण्डपिन्
कोल नीळ् कॊडि मूक्कुम् तामरैक् कण्णुम् कनि वायुम्
नील मेनियुम् नान्गु तोळुम् ऎन् नॆन्जम् निऱैन्दनवे
पराङ्कुश नायिका की माता लोक-निंदा और कुल् की मर्यादा के भय से व्याकुल हैं। वे यह सोचकर कि उनकी पुत्री लोक-समाज में सदैव के लिए केवल उपहास और अपयश का प्रतीक बनकर रह जाएगी, उसे प्रभु ‘नम्बि’ के दर्शन करने से बलपूर्वक रोक रही हैं। किंतु, नव-ऊर्जा और शीतलता प्रदान करने वाले सुरम्य उपवनों से घिरे उस पावन धाम ‘तिरुक्कुुऱुगुडि’ के सर्वेश्वर प्रभु ‘नम्बि’ की दिव्य छवि, कल्पवृक्ष की सुंदर, सुडौल लता के समान उनकी वह तीखी और दीर्घायु नासिका, कमल के समान खिले उनके करुणामयी नयन, पके हुए रसीले फल के सदृश उनके अद्वितीय लाल अधर, मेघों के समान श्यामल (नील-वर्ण) कांति से दमकता उनका वह अलौकिक विग्रह, और उनकी वे चार प्रतापी, अभय प्रदान करने वाली भुजाएँ… अब साक्षात मेरे हृदय के रोम-रोम में समा चुकी हैं।
सप्तम पासुरम में, पराङ्कुश नायिका कहती हैं — ‘हमारे परम कृपालु प्रभु ‘नम्बि’, अपनी अनंत जाज्वल्यमान, परम वैभवशाली और परम चित्ताकर्षक दिव्य छवि के साथ साक्षात प्रकट हुए हैं। वे अपने कर-कमलों में, प्रतापी दिव्य ‘सुदर्शन चक्र्’ को धारण किए हुए, अब मेरे हृदय सिंहासन पर सदा-सर्वदा के लिए आसीन हो गए हैं।’
सप्तम पासुरम
निऱैन्द वन् पऴि नम् कुडिक्किवळ् ऎन्ऱु अन्नै काण कॊडाळ्
सिऱन्द कीर्त्तित् तिरुक्कुऱुङ्गुडि नम्बियै नान् कण्डपिन्
निऱैन्द सोदि वॆळ्ळम् सूऴ्न्द नीण्ड पॊन् मेनियॊडुम्
निऱैन्दॆन्नुळ्ळे निन्ऱॊऴिन्दान् नेमियङ्गैयुळदे
पराङ्कुश नायिका की माता लोक-लाज के वशीभूत होकर अपनी पुत्री को प्रभु ‘नम्बि’ के दर्शन करने से सर्वथा वंचित कर रही हैं, क्योंकि उनका मानना है कि ‘यह लड़की हमारे संपूर्ण संभ्रांत कुल के माथे पर एक अमिट, अत्यंत सुदृढ़ और भयानक कलंक (उपहास) बन चुकी है।’ किंतु, अपनी अनुपम एवं परम गौरवशाली कीर्ति से सुशोभित उस पावन धाम ‘तिरुक्कुऱुङ्गुडि’ के पूर्ण पुरुष प्रभु ‘नम्बि’ की दिव्य छवि का एक बार रसपान करने के पश्चात, मेरी स्थिति पूर्णतः बदल चुकी है। अथाह पुंजीभूत प्रकाश के महासागर (कांति के दिव्य प्रवाह) से घिरा हुआ उनका वह असीम वैभवशाली, अलौकिक और परम चित्ताकर्षक विग्रह साक्षात् मेरे हृदय के अंतस्थल में आकर स्थापित हो गया है। केवल इतना ही नहीं, वह परम प्रतापी ‘सुदर्शन चक्र्’ भी उनके अत्यंत सुंदर कर-कमलों में सुशोभित है |
अष्टम पासुरम में, पराङ्कुश नायिका कहती हैं कि —’हमारे प्राणप्रिय प्रभु ‘नम्बि’ के वे अलौकिक, प्रतापी विशाल कंधे—जिन्हें उनके घुंघराले, सघन और अत्यंत सुंदर केश-पाश (बाल) मंद-मंद स्पर्श कर रहे हैं—तथा उनके विग्रह के अन्य सभी चित्ताकर्षक दिव्य अंग, साक्षात मेरी आँखों के सम्मुख आकर खड़े हो जाते हैं और मुझे अपनी अनुपम माधुरी से निरंतर व्याकुल (उद्वेलित) करते हैं।’
अष्टम पासुरम
कैयुळ् नन्मुगम् वैक्कुम् नैयुम् ऎन्ऱु अन्नैयरुम् मुनिदिर्
मै कॊळ् माडत् तिरुक्कुऱुङ्गुडि नम्बियै नान् कण्ड पिन्
सॆय्य तामरैक् कण्णुम् अल्गुलुम् सिट्रिडैयुम् वडिवुम्
मॊय्य नीळ् कुऴल् ताऴ्न्द तोळ्गळुम् पावियेन् मुन् निऱ्-कुमे
हे मेरी माताओं! आप सब मुझ पर कुपित होकर यह उलाहना दे रही हैं कि ‘यह हर समय अपने दोनों हाथों में अपना मुख छिपाए बैठी रहती है और भीतर ही भीतर क्षीण (कमज़ोर) होती जा रही है।’ किंतु आप यह भूल रही हैं कि आदि में मुझे इस अनुराग के मार्ग पर अग्रसर करने वाली और मेरे भीतर इस विरह-व्याकुलता का बीजारोपण करने वाली भी स्वयं आप ही थीं! जब से मैंने गगनचुंबी श्यामल (काले) मेघों को छूते ऊँचे वह भव्य प्रासादों (महलों) से सुशोभित उस पावन धाम ‘तिरुक्कुऱुङ्गुडि’ के परम सुंदर प्रभु ‘नम्बि’ का दर्शन किया है, उनके वे रक्त-कमल (लाल कमल) के समान सम्मोहक करुणामयी नयन्, उनकी सुंदर कटि, उनकी पतली सुडौल कमर, उनका वह अनुपम दिव्य स्वरूप, और उनके कंधों पर लहराते सघन, लंबे व घुंघराले केश-पाश… यह सब अलौकिक दृश्य मुझ जैसी अल्पभागिनी के सम्मुख साक्षात आकर खड़े हो गए हैं।
नवम पासुरम में, पराङ्कुश नायिका कहती है कि — ‘हमारे परम दयालु प्रभु ‘नम्बि’ अपने संपूर्ण, असीम और अनुपम सौंदर्य के साथ मेरे हृदय के भीतर प्रविष्ट हो चुके हैं। वे वहाँ इस प्रकार स्थापित हो गए हैं कि अब वे पल भर के लिए भी मेरे अंतस से दूर नहीं जाते, ताकि मैं चाहकर भी कभी उन्हें भूल न सकूँ।’
नवम पासुरम
मुन् निन्ऱाय् ऎन्ऱु तोऴिमार्गळुम् अन्नैयरुम् मुनिदिर्
मन्नु माडत् तिरुक्कुऱुङ्गुडि नम्बियै नान् कण्ड पिन्
सॆन्नि नीळ् मुडि आदियाय उलप्पिल् अणिगलत्तन्
कन्नल् पाल् अमुदागि वन्दु ऎन् नॆन्जम् कऴियाने
हे मेरी सखियों और मेरी स्नेहमयी माताओं! आप सब मुझ पर कुपित होकर यह उलाहना दे रही हैं कि ‘तू इस प्रकार सुध-बुध खोकर जड़वत हमारे सामने क्यों खड़ी है?’ जब से मैंने चिरस्थायी, सुदृढ़ एवं गगनचुंबी प्रासादों (महलों) से सुशोभित उस पावन धाम ‘तिरुक्कुऱुङ्गुडि’ के पूर्ण पुरुष प्रभु ‘नम्बि’ की दिव्य छवि का रसपान किया है, तब से मेरा हृदय उन्हीं का धाम बन गया है। वे अपने मस्तक पर सर्वोच्च सत्ता को दर्शाता हुआ वह उत्तुंग (ऊँचा) स्वर्ण-मुकुट धारण किए और अपने अंगों पर अनगिनत, दिव्य आभूषणों से सुसज्जित होकर मेरे सम्मुख प्रकट हुए। वे मेरे लिए मिश्री (शर्करा), दुग्ध (दूध) और साक्षात पीयूष (अमृत) के समान त्रिविध मधुरता से परिपूर्ण होकर, परम आस्वादनीय बनकर मेरे हृदय के भीतर प्रविष्ट हो गए हैं। अब वे यहाँ से क्षण भर के लिए भी विमुख (दूर) नहीं होते।
दशम पासुरम् में, पराङ्कुश नायिका कहती है कि — ‘हमारे प्राणप्रिय प्रभु ‘नम्बि’ का वह परम पावन दिव्य विग्रह (स्वरूप), जिसका रसपान वैकुंठ के नित्यमुक्त जीव (नित्यसूरि) निरंतर बिना किसी बाधा के करते हैं, वह अलौकिक रूप, अब मेरे हृदय के अंतस्थल में इस प्रकार देदीप्यमान हो रहा है कि संसार का कोई भी अन्य जीव इसकी थाह नहीं पा सकता।
दशम पासुरम
कऴिय मिक्कदोर् कादलळ् इवळ् ऎन्ऱु अन्नै काण कॊडाळ्
वऴुविल् कीर्त्तित् तिरुक्कुऱुङ्गुडि नम्बियै नान् कण्ड पिन्
कुऴुमित् तेवर् कुऴाङ्गळ् कै तॊऴच् चोदि वॆळ्ळत्तिन् उळ्ळे
ऎऴुवदोर् उरु ऎन् नेन्जुळ् ऎऴुम् आर्क्कुम् अऱिवरिदे
मेरी माता का मानना है कि ‘इस लड़की के भीतर प्रभु के प्रति एक ऐसा अगाध, अमिट और प्रचंड प्रेम उत्पन्न हो चुका है, जिसे किसी भी संसारिक उपाय से मिटाया या कम नहीं किया जा सकता।’ किंतु, अपनी अक्षुण्ण (अक्षय) महिमा और अनंत गौरव से सुशोभित उस पावन धाम ‘तिरुक्कुऱुङ्गुडि’ के परम दयालु प्रभु ‘नम्बि’ की दिव्य छवि, उनका वह अनुपम दिव्य स्वरूप—जो वैकुंठ के परम ज्ञानी ‘नित्यसूरियों’ के समूहों के लिए भी परस्पर मिलकर सेवा करने और परमानंद प्राप्त करने का एकमात्र अंतिम लक्ष्य (परम गंतव्य) है—अथाह कांति के महासागर (प्रकाश के दिव्य प्रवाह) के मध्य अत्यंत भव्य और उत्तुंग रूप में साक्षात मेरे हृदय के अंतस्थल में प्रकट हो गया है। प्रभु के इस अलौकिक स्वरूप की महिमा और मेरे हृदय में उनके इस प्रकार स्थापित होने के रहस्य को समझना, इस संसार के बड़े-से-बड़े तत्त्वज्ञानियों और विद्वानों के लिए भी अत्यंत कठिन है।
एकादश (ग्यारहवें) पासुरम में, श्री नम्माऴ्वार् इस दशक (दस पदों के समूह) के अनुष्ठान व गान का परम फल प्रकट करते हैं—वे समझाते हैं कि इस पावन दशक का निरंतर पाठ करने से जीव को भगवान के प्रति अनन्य ‘शेषत्व’ (परम दासत्व या पूर्ण कैंकर्य भाव) को प्राप्त करने का पूर्ण साक्षात्कार हो जाता है, जो अपना यथार्थ स्वरूप (सच्ची प्रकृति) है।
ग्यारहवें पासुरम
अऱिवरिय पिरानै आऴियङ्गैयनैये अलट्रि
नऱिय नन्मलर् नाडि नन्कुरुगूर्च् चठगोपन् सॊन्न
कुऱि कॊळ् आयिरत्तुळ् इवै पत्तुम् तिरुक्कुऱुङ्गुडि अदन् मेल्
अऱियक् कट्रु वल्लार् वैट्टणवर् आऴ् कडल ज्ञालत्तुळ्ळे
उस पावन धाम ‘तिरुक्कुऱुङ्गुडि’ के परम दयाळु प्रभु ‘नम्बि’ ही वे अखिलाण्डकोटि ब्रह्माण्ड नायक् (सर्वोच्च ईश्वर) हैं, जिन्हें केवल अपनी बुद्धि या कोरे ज्ञान से जान पाना सर्वथा असंभव है; वे अपने अत्यंत सुंदर कर-कमलों में साक्षात ‘सुदर्शन चक्र्’ धारण किए हुए हैं। पावन नगरी ‘अऴ्वार् तिरुनगरी’ के दिव्य नायक, श्री नम्माऴ्वार् (शठकोपन्) — जो उस अनुपम, दिव्य ज्ञान व भक्ति से संपन्न हैं, जो जीव को भगवान के अलौकिक रसास्वादन का परम अधिकारी बनाती है — वे विरह-व्याकुल होकर निरंतर प्रभु के नामों का संकीर्तन करते रहते हैं। जिस प्रकार कोई प्रेमी ईश्वर को अर्पित करने के लिए बागों से सर्वश्रेष्ठ और परम सुगंधित पुष्पों की खोज करता है, ठीक उसी प्रकार श्री नम्माऴ्वार् ने अपने हृदय के भीतर से इन परम पावन शब्दों को चुनकर, अपने दिव्य एक हजार पासुरों (तिरुवायमॊऴि) के मध्य इस विशिष्ट ‘दशक’ की रचना की है। जो भी भाग्यशाली जीव, इस धरा पर इस दशक (दस पदों) के गूढ़ आध्यात्मिक अर्थों को भली-भाँति सीखकर उन पर ध्यान (मनन) करेंगे, ताकि उनका आत्म-ज्ञान निरंतर प्रज्वलित और दीप्तिमान रहे, वे इस गहरे समुद्र से घिरी विशाल पृथ्वी पर रहते हुए भी, साक्षात भगवान के साथ अपने उस ‘परम विशिष्ट संबंध’ (सच्चे वैष्णवत्व/दासत्व) को सिद्ध कर लेंगे और इसी जीवन में ईश्वर के परमानंद का साक्षात अनुभव प्राप्त करेंगे।
अडियेन् श्री तेजा रामानुज दासी
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