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भक्ताङ्घ्रिरेणु आऴ्वार् की महिमा

भक्ताङ्घ्रिरेणु सूरी का जन्म के समय नाम विप्र नारायणन था। उनका जन्म कुम्भकोणम् क्षेत्र के सुन्दर स्थान तिरुमण्डङ्गुड़ी में मार्गशीर्ष (तमिऴ् मास मार्गऴि) मास में, ज्येष्ठा (केट्टै) नक्षत्र में हुआ था। उन्होंने हमें दो दिव्य प्रबन्ध प्रदान किए, तिरुमालै और तिरुप्पळ्ळियेऴुच्चि। तिरुमालै अत्यंत प्रसिद्ध है, इतना कि कहा जाता है, “तिरुमालै अऱियादार् तिरुमाले अऱियादार्” (तिरुमालै को न जानने वाले तिरुमाल (श्रीमान नारायण) को भी नहीं जान सकते।) अर्थात जो इस ग्रन्थ को नहीं समझते, वे भगवान नारायण के वास्तविक स्वरूप को नहीं जान सकते। बहुत ही कम जनों ने तिरुप्पळ्ळियेऴुच्चि का गायन किया है (प्रातःकाल में भगवान को जगाने के लिए स्तोत्र)। यह सर्वविदित है कि महर्षि विश्वामित्र ने श्रीराम के लिए तिरुप्पळ्ळियेऴुच्चि का गायन किया था। उनके पश्चात यह समझा जाता है कि केवल भक्ताङ्घ्रिरेणु स्वामी ने ही श्रीरंगनाथ (श्रीरंगम के भगवान) के लिए यह स्तुति रची।
भक्ताङ्घ्रिरेणु सूरी ने श्रीरंगनाथ के अतिरिक्त किसी अन्य रूप में भगवान का मंगलाशासन नहीं किया। उन्होंने समस्त अर्चा रूपों में केवल श्रीरंगनाथ का ही अनुभव किया। अपने प्रमुख ग्रन्थ तिरुमालै में उन्होंने भगवान के नाम-संकीर्तन की महिमा को स्पष्ट किया तथा शरणागति का मार्ग दिखाया। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि भगवान के भक्तों में जन्म, धन अथवा ज्ञान के आधार पर भेद नहीं करना चाहिए।
भक्ताङ्घ्रिरेणु स्वामी वाऴि तिरुनामम्
मण्डङ्गुडियदनै वाऴ्वित्तान् वाऴिये
मार्गऴियिल् केट्टै तनिल् वन्दुतित्तान् वाऴिये
तॆण्डिरै सूऴ् अरङ्गरैये दैवम् ऎन्ऱान् वाऴिये
तिरुमालै ऒन्पत्तञ्जुम् सॆप्पिनान् वाऴिये
पण्डु तिरुप्पळ्ळियेऴुच्चि पत्तुरैत्तान् वाऴिये
पावैयर्गळ् कलवितनैप् पऴित्त सॆल्पन् वाऴिये
तॊण्डु सॆय्दु तुळपत्ताल् तुलङ्गिनान् वाऴिये
तॊण्डरडिप् पॊडि आऴ्वार् तुणैप्पदङ्गळ् वाऴिये
वाऴि तिरुनामम् का तात्पर्य
मण्डङ्गुडियदनै वाऴ्वित्तान् वाऴिये
उन्होंने अपने जन्म से मण्डङ्गुडि स्थान को अत्यन्त गौरव प्रदान किया, उनकी जय हो।
मार्गऴियिल् केट्टै तनिल् वन्दुतित्तान् वाऴिये
भगवान ने गीता में मार्गशीर्ष मास को अपना स्वरूप बताया है। उस पवित्र मास में जन्म लेने वाले आऴ्वार् की जय हो।
तॆण्डिरै सूऴ् अरङ्गरैये दैवम् ऎन्ऱान् वाऴिये
यहाँ अरंगर से अभिप्राय पेरिय पेरुमाळ श्रीरंगनाथ हैं। भक्ताङ्घ्रिरेणु स्वामी ने अपने अनेक पासुरों में श्रीरंगनाथ को परमेश्वर, परम देवता तथा सर्वोच्च भगवान् के रूप में प्रतिपादित किया है।
उदाहरण के लिए, तिरुमालै में वे कहते हैं, “नाट्टिनान् दैवम् ऎङ्गुम् नल्लदोर् अरुळ् तन्नाले काट्टिनान् तिरुवरङ्गम् वुय्बवर्क्कु वुय्युम् वण्णम्” अर्थात् भगवान् ने अपनी महान कृपा से तिरुवरंगम् (श्रीरंगम्) को प्रकट किया, जिससे जीवों को कल्याण एवं उद्धार प्राप्त हो सके। इसी प्रकार “कट्रिनम् मेय्त्त ऎन्दै” इस पंक्ति के द्वारा वे यह प्रतिपादित करते हैं कि गोपालक-लीला करने वाले श्रीकृष्ण (कण्णन्) ही परब्रह्म हैं। इस प्रकार अनेक पासुरों में भक्ताङ्घ्रिरेणु स्वामी दृढ़तापूर्वक स्थापित करते हैं कि अर्चावतार रूप में विराजमान श्रीरंगनाथ ही परम भगवान हैं। अतः इस पंक्ति का भाव यह है—असंख्य तरंगों से युक्त निर्मल कावेरी नदी से परिवेष्टित श्रीरंगम् में निवास करने वाले श्रीरंगनाथ को ही एकमात्र सर्वोच्च भगवान के रूप में स्थापित करने वाले भक्ताङ्घ्रिरेणु स्वामी की जय हो, उनकी कीर्ति चिरकाल तक बनी रहे।
तिरुमालै ऒन्पतञ्जुम् सॆप्पिनान् वाऴिये
आऴ्वार् ने अपनी असीम कृपा से तिरुमालै नामक दिव्य प्रबन्ध प्रदान किया, जिसमें ४५ पासुरम् हैं।
इस प्रबन्ध में वे अत्यन्त सुन्दर रीति से यह प्रतिपादित करते हैं कि भगवान् पेरुमाळ अपने दिव्य सौन्दर्य के द्वारा जीवों का परिष्कार करते हैं और उन्हें अपने मार्ग पर प्रवृत्त करते हैं।
इसके अतिरिक्त, वे “मेम्पॊरुळ् पोग विट्टु” नामक ३८वें पासुरम् में शरणागति-तत्त्व का निरूपण करते हैं। केवल इतना ही नहीं, वे उन भगवद्भक्तों की महिमा का भी वर्णन करते हैं जिन्होंने भगवान् के चरणों में शरण ग्रहण की है। ४१वें पासुरम् “पोनगम् सॆय्द सेडम् तरुवरेल् पुनिदमन्ऱे” में वे यह उपदेश देते हैं कि भगवान् के भक्तों का किस प्रकार सम्मान करना चाहिए। आऴ्वार् कहते हैं कि कोई व्यक्ति निम्न कुल में उत्पन्न हुआ हो अथवा भगवान् का भक्त बनने से पूर्व उसने हीन आचरण किए हों, किन्तु जब वह भगवद्भक्त बन जाता है, तब उसके अन्न के अवशेष का ग्रहण करना भी महान पुण्य और सौभाग्य का विषय है। इस प्रकार भक्ताङ्घ्रिरेणु स्वामी भगवद्भक्तों के प्रति समता, आदर और श्रद्धा का उपदेश देते हैं तथा यह दर्शाते हैं कि भगवद्भक्ति ही किसी व्यक्ति की वास्तविक महत्ता का आधार है, न कि उसका जन्म, धन अथवा लौकिक विद्या। ऐसे महान भक्ताङ्घ्रिरेणु स्वामी की जय हो, जिन्होंने हमें इस दिव्य ४५ पासुरम् युक्त तिरुमालै का अमूल्य उपहार प्रदान किया।
पण्डु तिरुप्पळ्ळियेऴुच्चि पत्तुरैत्तान् वाऴिये
जिन्होंने भगवान को निद्रा से जगाने हेतु स्तोत्रों की रचना की उनकी जय हो।
पावैयर्गळ् कलवितनैप् पऴित्त सेल्पन् वाऴिये
अपने दिव्य प्रबन्ध तिरुमालै में आऴ्वार् यह बताते हैं कि मनुष्य स्त्री-संसर्ग (स्त्री के लिए पुरुष-संसर्ग) के माध्यम से विविध भोगों और सुखों का उपभोग करता हुआ यह मानता है कि वह आनन्द प्राप्त कर रहा है, किन्तु उसे यह ज्ञात नहीं होता कि वह अपने ऊपर महान् दुःख और बन्धनों का भार ले रहा है। इस भाव को वे निम्नलिखित पंक्ति में व्यक्त करते हैं, “पॆण्डिराल् सुगङ्गळ् उय्प्पान् पॆरियदोर् इडुम्बै पूण्डु” अर्थात्, स्त्री-संसर्ग से सुख प्राप्त करने का प्रयास करने वाला मनुष्य अन्ततः महान् क्लेशों को प्राप्त करता है। आऴ्वार् के जीवन-वृत्त से भी हमें ज्ञात होता है कि स्त्री-आकर्षण के कारण उन्हें स्वयं भी कितनी कठिनाइयों और वेदनाओं का अनुभव करना पड़ा। भक्ताङ्घ्रिरेणु स्वामी के रूप में विख्यात होने से पूर्व उनका नाम विप्र नारायणन् था। उस समय भगवान् की दिव्य लीला के अनुसार वे देवदेवी नामक एक स्त्री के प्रति आकर्षित हो गए थे। बाद में भगवान् ने उन पर अनुग्रह कर उन्हें पुनः सही मार्ग पर स्थापित किया और अपनी सेवा (कैंकर्य) में नियुक्त किया। उनके जीवन से यह स्पष्ट होता है कि इसके पश्चात् भक्ताङ्घ्रिरेणु स्वामी ने अत्यन्त वैराग्यपूर्ण जीवन व्यतीत किया। अपने तिरुमालै प्रबन्ध में वे विस्तारपूर्वक समझाते हैं कि इन्द्रिय-भोग और विषय-सुख आध्यात्मिक उन्नति में अत्यन्त बड़ी बाधा उत्पन्न करते हैं। शास्त्र ने मनुष्यों के लिए इस संसार में कुछ भोगों की अनुमति दी है। किन्तु वही शास्त्र यह भी स्पष्ट रूप से सिखाता है कि यदि हम अपने वास्तविक स्वरूप तथा भगवान् के साथ अपने शाश्वत सम्बन्ध का विचार करें, तो शरीर के माध्यम से अनुभव किए जाने वाले समस्त लौकिक भोग आत्मा के वास्तविक स्वरूप के प्रतिकूल हैं और उनसे निवृत्त होना चाहिए। वेदान्त में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जो मोक्ष की कामना रखते हैं, उन्हें लौकिक विषय-भोगों का त्याग करना चाहिए। किन्तु जिनमें अभी इतनी आध्यात्मिक परिपक्वता नहीं आई है, उनके लिए शास्त्र विवाह के माध्यम से मर्यादित एवं धर्मानुकूल रीति से इन भोगों की अनुमति देता है। जब वास्तविक ज्ञान का उदय होता है, तब साधक स्वयं अनुभव करता है कि ये विषय-सुख वास्तव में आवश्यक नहीं हैं, और वह निरन्तर भगवान् के अनुभव एवं स्मरण में ही आनन्द प्राप्त करने लगता है। भक्ताङ्घ्रिरेणु स्वामी स्वयं ऐसे उच्च आध्यात्मिक स्तर पर स्थित थे, जहाँ वे लौकिक भोगों से पूर्णतः विरक्त हो चुके थे। इसी कारण उन्होंने अपने पासुरों में विषय-सुखों का त्याग करने के कारणों का विस्तार से वर्णन किया है। ऐसे भक्ताङ्घ्रिरेणु स्वामी की जय हो, जिन्होंने स्वयं वैराग्यमय जीवन का आचरण किया और हमें भी संसार से अनासक्त होकर भगवदनुभवमय जीवन जीने का मार्ग दिखाया।
तॊण्डु सॆय्दु तुळपत्ताल् तुलङ्गिनान् वाऴिये
भक्ताङ्घ्रिरेणु स्वामी ने एक सुन्दर उपवन का निर्माण किया। उस उपवन से वे पुष्पों तथा तुलसी-दलों का संग्रह करते थे। उन पुष्पों और तुलसी से वे भगवान् के लिए मालाएँ बनाकर उन्हें अर्पित करते तथा भगवत्सेवा में निरन्तर संलग्न रहते थे। इस दिव्य कैंकर्य (सेवा) के प्रभाव से उनका व्यक्तित्व विशेष तेज और आभा से युक्त प्रतीत होता था। यहाँ “तुळपम्” शब्द का अर्थ तुलसी है। अतः इस पंक्ति का भाव यह है, भगवान् के लिए पुष्प-कैंकर्य करने वाले, तुलसी-मालाएँ बनाकर अर्पित करने वाले तथा उस भगवत्सेवा के कारण दिव्य तेज से प्रकाशित होने वाले भक्ताङ्घ्रिरेणु स्वामी की जय हो, उनकी कीर्ति चिरकाल तक बनी रहे।
तॊण्डरडिप् पॊडि आऴ्वार् तुणैप्पदङ्गळ् वाऴिये
भक्ताङ्घ्रिरेणु स्वामी के दिव्य, मंगलमय और परम पावन दोनों चरणों की जय हो, उनकी महिमा चिरकाल तक बनी रहे।
इस प्रकार भक्ताङ्घ्रिरेणु स्वामी के वाऴि तिरुनामम् का समापन होता है।
अडियेन् श्रीकांत रामानुज दास
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