श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः
<< भाग ९
उपदेश रत्न माला
उपदेश रत्न माला यह एक अद्भुत कृति है और नाम से ही हमें पता चलता है कि यह माला उपदेशों (निर्देश/शिक्षा) से बनाई गई है। इन उपदेशों की तुलना पन्ना (मरकत मणियों) और माणिक जैसे रत्नों (रत्नम्) से की गई है। इसलिए इसका नाम ‘उपदेश रत्न माला’ है।
‘उपदेश रत्न माला’ श्री पिळ्ळै लोकाचार्य द्वारा रचित ‘श्रीवचन भूषणम्’ नामक रहस्य ग्रंथ का सार है। उन्होंने ‘तिरुवाय्मोऴि’ का सार ‘श्रीवचन भूषणम्’ के रूप में दिया, और यह निष्कर्ष निकाला कि आचार्य की कृपा अथवा अभिमान (दया) ही उज्जीवनम् (परम लक्ष्य की प्राप्ति) के लिए सर्वस्व है।
श्री वरवरमुनि स्वामी (मणवाळ मामुनिगळ्) ने श्रीवचनभूषणम् को समझने के लिए ‘उपदेश रत्न माला’ नामक एक संक्षिप्त और सरल ग्रंथ की रचना की, ताकि यह सभी के लिए सरल और सुलभ हो सके।
भगवद्गीता में, कण्णन् एम्पेरुमान् (भगवान् श्रीकृष्ण) कहते हैं, “सर्वधर्मान् परित्यज्य”- इसका अर्थ है- “सभी अन्य साधनों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जाओ।” एम्पेरुमान् (भगवान्) यह दूसरे अध्याय में ही कह सकते थे, परंतु उन्होंने इसे केवल अंत में कहा। भगवान् ने आत्मा, परमात्मा, कर्म योग, ज्ञान योग, भक्ति योग आदि का निरूपण (व्याख्या) करना आरम्भ किया और अंत में स्वयं के प्रति शरणागति का रहस्य प्रकट किया। हमारे आऴ्वारों और आचार्यों ने भी इसी का अनुसरण (पालन) किया है, पहले परिचयात्मक (प्रारंभिक) जानकारी देते हैं और पश्चात हमें परम ज्ञान की ओर ले जाते हैं।
श्री वरवरमुनि स्वामी उपदेश रत्न माला का आरंभ करते हैं आऴ्वारों के दिव्य जन्म स्थान, अवतार महीने और तिरुनक्षत्रम् और उनके प्रकट होने का महत्व जैसे प्रारंभिक (परिचयात्मक) जानकारी। फिर, वह आचार्य श्रीमान् नाथमुनिगळ् के वैभव (महिमा) के बारे में बताते हैं, क्योंकि वह मुख्य आचार्यों में से एक हैं। हमारे संप्रदाय को स्वयं नम्पेरुमाळ् (हमारे-भगवान्- श्रीरंगनाथ भगवान का उत्सव विग्रह) द्वारा “रामानुज दर्शनम्” के रूप में अत्यंत प्रतिष्ठित (या पूजित) किया गया है। श्री वरवरमुनि स्वामी बताते हैं कि कैसे रामानुजाचार्य हमारे संप्रदाय के शिखर (या सर्वोच्च) हैं और उन्हीं के कारण हमारा श्रीवैष्णव संप्रदाय बहुत ऊँचाइयों तक पहुँचा। उन्होंने तिरुवाय्मॊऴि पर दी गईं व्याख्याओं (भाष्य) के क्रम पर भी प्रकाश डाला।
ईडु मुप्पत्तारायिर (३६,०००) पडी टीकाएँ (जानकारी) कलिवैरिदास (नम्पिळ्ळै) द्वारा किस प्रकार दी गईं, जिसे वडक्कु तिरुविधिप पिळ्ळै (श्री कृष्णपाद स्वामी) ने अभिलिखित किया, उसके विवरण, तदुपरान्त इसे उनके शिष्य ईयुण्णि माधवप् पेरुमाळ् (माध्वाचार्य) को दिया गया, एकल बिंदु प्रसार के माध्यम से (के लिए) ईयुण्णि पद्मनाभ पेरुमाळ् (पद्मनाभाचार्य), नालूर् पिळ्ळै (कोलवराहार्य), नालूर् आच्चान् पिळ्ळै (देवराजाचार्य), तिरुवाय्मॊऴि पिळ्ळै और अंत में मामुनिगळ् I वडक्कु तिरुविधिप पिळ्ळै से, यह ज्ञान उनके पुत्र पिळ्ळै लोकाचार्य को हस्तांतरित हुआ (प्राप्त हुआ)। वरवरमुनि स्वामी अद्भुत रूप से पिळ्ळै लोकाचार्य को केंद्र बिंदु पर लाते हैं, क्योंकि श्रीवचन भूषणम् उन्हीं के द्वारा प्रदान किया गया था। ये उपदेश रत्न माला का परिचयात्मक भाग हैं।
मामुनिगळ् श्रीवचन भूषणम् की महत्ता को दृढ़ करते हैं। इस ग्रंथ में कई पाशुरों द्वारा अर्थों का विस्तार से वर्णन किया गया है।
पाशुरम् ६१
ज्ञानम् अनुट्टानम् इवै नन्ऱागवे उडैयन्
आन गुरुवै अडैन्दक्काल् – मानिलत्तीर्
तेनार् कमलत् तिरुमामगळ् कॊऴुनन्
ताने वैकुण्दम् तरुम्
तात्पर्य-
जब कोई सच्चे ज्ञान और आचार से परिपूर्ण आचार्य के प्रति शरणागति लेता है, तो श्रीमन्नारायण, जो तायार् (देवी लक्ष्मी) के साथ हैं, ऐसे व्यक्ति को स्वतः ही परमपदम् में प्रवेश प्रदान करते हैं।
पाशुरम् ६४
तन् आरियनुक्कुत् तान् अडिमै सॆय्वदु अवन्
इन्नाडु तन्निल् इरुक्कुम् नाळ् – अन्नेर्
अऱिन्दुम् अदिल् आसै इन्ऱि आचारियनैप्
पिरिन्दिऱुप्पार् आर् मनमे पेसु
तात्पर्य-
जब कोई इस बात से पूर्णतः अवगत है कि अपने आचार्य (जब तक वे इस भौतिक संसार में हैं) की सेवा सबसे बड़ा वरदान है, तो कोई उससे कैसे विमुख हो सकता है और उनसे दूर रह सकता है? हे मेरे मन, क्या तुम मुझे बता सकते हो कैसे?
वरवरमुनि स्वामी ने अपने आचार्य के परमपद को प्राप्त होने तक उनकी सभी सेवाएँ की। अपने आचार्य के आदेशों के आधार पर, वे उनके काल के पश्चात ही श्रीरंङ्गम् चले गए।
पाशुरम् ६६
पिन्बु अऴगराम् पॆरुमाळ् सीयर् पॆरुन्दिवत्तिल्
अन्बु अदुवुमट्रु मिक्क आसैयिनाल् – नम्पिळ्ळैक्
कान अडिमैगळ् सॆय् अन्निलैयै नन्नॆञ्जे
ऊनमऱ ऎप्पॊऴुदुम् ओर्
तात्पर्य-
इस पासुरम में, श्री वरवरमुनि स्वामी यह दर्शाते हैं कि आचार्य और शिष्य के बीच का संबंध कैसा होना चाहिए। यहाँ नम्पिळ्ळै के शिष्य पिन्बु अऴगिय पेरुमाळ् जीयर् (पश्चात सुंदर देशिक) के अपने आचार्य के प्रति व्यवहार का उदाहरण दिया गया है, आचार्य के दिव्य स्वरूप के प्रति अटूट भक्ति के महत्त्व का वर्णन करते हुए ।
पाशुरम् ७२
पूरवाचारियर्गळ् पोदम् अनुट्टानङ्गाळ्
कूरुवार् वार्त्तैगळैक् कॊण्डु नीर् तेऱि
इरुळ् तरुमा ज्ञालत्ते इन्बमुट्रु वाऴुम्
तॆरुळ् तरुमा देसिगनैच् चेर्न्दु
तात्पर्य –
प्रत्येक व्यक्ति को एक आचार्य की शरण लेनी चाहिए और हमारे पूर्वाचार्यों द्वारा निर्धारित आचरण (अनुष्ठानों) का पालन करते हुए एक सार्थक जीवन व्यतीत करना चाहिए।
अंतिम पाशुरम् में, फलश्रुति के रूप में, वरवरमुनि स्वामी कहते हैं कि जो कोई भी इन पाशुरों का पाठ करता है और अपने विचारों में उनका मनन करता है, वह स्वयं यतिराज श्री रामानुजाचार्य की दिव्य कृपा का पात्र बनेगा।
पाशुरम् ७४ – देवराज गुरु (एरुम्बियप्पा) द्वारा:
मन्नुयिर्गाळ् इङ्गे मणवाळ मामुनिवन्
पॊन्नडियाम् सॆङ्कमलप् पोदुगळै – उन्निच्
चिरत्ताले तीण्डिल् अमानवनुम् नम्मैक्
करत्ताले तीण्डल् कडन्
तात्पर्य-
हे, इस भौतिक जगत में रहने वाले जीवों! वे लोग जिनके मस्तक श्री वरवरमुनि स्वामी के दिव्य लाल कमल रूपी चरणों का स्पर्श प्राप्त करते हैं, उनका वैकुंठ में प्रवेश निश्चित है; क्योंकि ‘अमानव’ (एक नित्यसूरि) आपको स्पर्श करना और आगे जाने का मार्ग देना अपना कर्तव्य (ऋण) समझेगा।”
यह पाशुरम् श्री वरवरमुनि स्वामी का एक गुणगान है, देवराज गुरु द्वारा। श्री वरवरमुनि स्वामी के चरण कमलों की महिमा को दर्शाया गया है, जीवात्माओं के उद्धार के हेतु। वरवरमुनि ने अपनी दिव्य कृपा से ‘श्रीवचन भूषणम्’ ‘सूत्र’ प्रारूप के विवरणों को ‘उपदेश रत्न माला’ में सरल और समझने योग्य ‘पाशुरम्’ के रूप में प्रस्तुत किया है।
तिरुवाय्मोऴि नूट्रन्दादि
तिरुवाय्मोऴि नूट्रन्दादि श्री वरवरमुनि स्वामी की एक कृपामयी रचना है। रामानुज नूट्रन्दादि आचार्य रामानुज के काल में ही उपस्थित थी, जिसे अमुदनार् ने प्रदान किया था। क्योंकि आऴ्वार् (नम्माऴ्वार्/श्री शठकोप स्वामी) के लिए कोई ‘नूट्रन्दादि’ उपलब्ध नहीं थी, इसलिए वरवरमुनि को ‘तिरुवाय्मोऴि नूट्रन्दादि’ की रचना करने की इच्छा हुई। वे इस ग्रंथ को मुख्य रूप से आऴ्वार् की महिमा का गान करने वाला और साथ ही उनके प्रबंधम् की महत्ता को भी दर्शाने वाला ग्रंथ बनाना चाहते थे।
इस अद्भुत रचना में, वरवरमुनि ने तिरुवाय्मोऴि के एक पदिगम् (दशक्) (जिसमें १० पाशुरम् होते हैं) का सार प्रस्तुत करने, तिरुवाय्मोऴि नूट्रन्दादि के केवल एक पाशुरम् में समाहित कर दिया है। तिरुवाय्मोऴि का अध्ययन करने और समझने में हमें निश्चित रूप से एक लंबा समय लगेगा। वरवरमुनि ने इस ग्रंथ को प्रदान करके हमें अनुगृहीत किया है जो आऴ्वार् की स्थिति, दृष्टिकोण और उनके भावों (भक्ति के भाव) का एक अवलोकन प्रस्तुत करता है। यह इस बात की भी रूपरेखा (प्रारूप) प्रस्तुत करता है कि तिरुवाय्मोऴि का प्रारंभ कैसे होता है, यह कैसे आगे बढ़ता (प्रवाह करता है) है और आऴ्वार् ने इस प्रबंधम् को किस प्रकार पूर्ण किया है।
वरवरमुनि ने इस ग्रंथ की रचना करते समय कुछ निश्चित मर्यादाओं (या नियम) के पालन करने का निर्धारित किया।
- इसे अन्तादि (अन्त + आदि) प्रारूप (पद्धति) में होना चाहिए (क्योंकि तिरुवाय्मोऴि भी अन्तादि शैली में है) और यह संक्षिप्त एवं सुबोध होना चाहिए।
- श्री शठकोप स्वामी का दिव्य नाम (तिरुनामम्) और उनके ‘वैभव’ (महिमा) का उल्लेख प्रत्येक पाशुरम् में होना चाहिए।
- ईडु मुप्पत्तारायिर (३६,०००) पडी की व्याख्यानों को कलिवैरिदास स्वामी द्वारा संक्षिप्त रूप में प्रमुखता दी जानी चाहिए।
वरवरमुनि की ‘तिरुवाय्मोऴि नूट्रन्दादि’ अन्तादि के उसी प्रारूप (कड़ी से कड़ी) का पालन करती है। अर्थात, जिस शब्द से एक पाशुरम् समाप्त होता है, अगला पाशुरम् ठीक उसी शब्द से आरंभ होगा – इसी शैली को ‘अन्तादि’ कहा जाता है। वरवरमुनि स्वामी की तिरुवाय्मोऴि ‘उयर् वर’ से आरंभ होती है और वरवरमुनि की तिरुवाय्मोऴि नूट्रन्दादि भी ‘उयर्वे’ से प्रारंभ होती है। इन सभी मर्यादाओं को ध्यान में रखते हुए, वरवरमुनि ने इस अद्भुत ग्रंथ की रचना की है जिसे ‘तिरुवाय्मोऴि नूट्रन्दादि’ कहते हैं।
तिरुवाय्मोऴि का प्रारंभ ‘उयर् वर उयर् नलम उडैयवन् यवन् अवन्’ से होता है, यह प्रथम पदिगम् श्री शठकोप स्वामी द्वारा रचित वेदान्तम् का वर्णन करता है, जो भगवान के परत्वम् (सर्वोच्चता) भगवान का सर्वशक्तिमान् स्वभाव, शरीर-शरीरी भाव इत्यादि को दर्शाता है कुल १० पाशुरों में। वरवरमुनि के लिए चुनौती यह है कि इन सभी विवरणों को केवल २ पंक्तियों में प्रस्तुत किया जाए।
पाशुरम् १
उयर्वे परन् पडियै उळ्ळदॆल्लाम् तान् कण्डु
उयर् वेद नेर् कॊण्डुरैत्तु – मयर्वेदुम्
वारामल् मानिडरै वाऴ्विक्कुम् माऱन् सॊल्
वेरागावे विळैयुम् वीडु
इस पाशुरम् में, पहले दो शब्दों में, वरवरमुनि ने भगवान की महानता और उनके स्वरूप का सुंदर निरूपण् किया है।
यह सब कुछ आऴ्वार् द्वारा प्रत्यक्ष रूप से देखा गया है, क्योंकि उन्हें स्वयं भगवान की कृपा से निष्कलंक ज्ञान का आशीर्वाद मिला था। श्री शठकोप स्वामी (माऱन्) के ये शब्द, जीवात्माओं के लिए, मोक्ष प्राप्त करने का मूल कारण (जड़) बनेंगे।
वरवरमुनि ने नम्पिळ्ळै के ईडु व्याख्यानम् के गहन ज्ञान को आत्मसात् (ग्रहण) किया है। ईडु व्याख्यानम् के तीन परिचयात्मक भाग हैं- प्रथम, द्वितीय और तृतीय ‘श्रिय:पति पडि’ और उसके साथ ही, प्रत्येक पदिगम् के लिए प्रवेशम् (परिचयात्मक भूमिका) भी है। यह श्री वरवरमुनि स्वामी के तिरुवाय्मोऴि नूट्रन्दादि की महानता (श्रेष्ठता) और महत्व को दर्शाता है।
अडियेन् गीता रामानुज दासी
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