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तिरुवाय्मोळि नूट्रन्दादि (नूत्तन्दादि) – तनियन्

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श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमत् वरवरमुनये नमः

पूरी श्रृंखला

तनियन् 1
अल्लुम् पगलुम् अनुबविप्पार् तन्गळुक्कुच्
चोल्लुम् पोरुळुम् तोगुत्तुरैत्तान् – नल्ल
मणवाळ मामुनिवन् माऱन् मऱैक्कुत्
तणवा नूऱ्ऱन्दादि तान्

जो लोग मीठे शब्दों और उनके अर्थों का आनंद लेने की इच्छा, हमेशा रात और दिन , रखते हैं, उनके लिए मणवळ मामुनिगळ् ने दयापूर्वक, तिरुवैमोझी का अर्थ , तमिळ् वेदं को, संक्षेप में , इस प्रबंध में 100 पाशुरामों के रूप में, दिया ।


तनियन् 2
मन्नु पुगळ् सेर् मणवाळ मामुनिवन्
तन् अरुळाल् उट्पोरुळ्गळ् तन्नुडने सोन्न
तिरुवाय्मोळि नूऱ्ऱन्दादियाम् तेनै
ओरुवादरुन्दु नेन्जे उऱ्ऱु

ओ मन ! तिरुवाय्मोळि नूत्तन्दादि नामक शहद को प्राप्त करें, जो कि अनंत काल के गौरवशाली मणवाळ मामुनिगळ् द्वारा दया से
बोला गया था, उनकी दया से, गहरे अर्थों को प्रकट करने के लिए [तिरुवाय्मोळि], और इसे लगातार पीते रहें |

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुज दासन

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तिरुवाय्मोळि नूट्रन्दाधि (नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या

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श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमत् वरवरमुनये नमः

श्रीमन्नारायण ने नम्माळ्वार को उनके प्रति उत्तम ज्ञान और भक्ति का आशीर्वाद दिया। नम्माळ्वार की अपरिहार्य प्रवाह से
तिरुविरुत्तम, तिरुवासिरियम, पेरिय तिरुवन्दादी और तिरुवाय्मोळि नामक चार अद्भुत प्रबंध बन गए। इनमें से
तिरुवाय्मोळि को सामवेद का सार माना जाता है। तिरुवाय्मोळि में उन सभी महत्वपूर्ण सिद्धांतों को शामिल किया गया है
जिन्हें एक मुमुक्षु (मुक्ति साधक), अर्थात् अर्थ पंचकम द्वारा जाना जाता है। तिरुवाय्मोळि के लिए नम्पिळ्ळै के ईडु
व्याख्यान में तिरुवाय्मोळि के अर्थों को विस्तार से बताया गया है।

तिरुवाय्मोळि नूत्तन्दादि एक अद्भुत प्रबंध है जिसकी रचना अळगिय मणवाळ मामुनिगळ् (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) ने
की है। यह एक अद्भुत रचना है जो कई प्रतिबंधों से बनी है जैसे:

  • कविता अंदाधि प्रकार की होनी चाहिए जिससे उसका पठन /सीखना सरल हो
  • इस प्रबंध के प्रत्येक पाशुरम में तिरुवाय्मोळि के प्रत्येक दशक जैसा अर्थ ईडु व्याख्यान में बताया गया है |
  • प्रत्येक पाशुरम में नम्माळ्वार का दिव्य नाम और महिमा होनी चाहिए |

यह प्रबंध सबसे आनंददायक है और हम इस प्रबंध के लिए पिळ्ळै लोकम् जीयर् द्वारा दिए गए विस्तृत व्याख्यान की मदद से पाशुरमों के
सरल अर्थों का आनंद लेंगे।

  • तनियन
  • पाशुरम 1 to 10
  • पाशुरम 11 to 20
  • पाशुरम 21 to 30
  • पाशुरम 31 to 40
  • पाशुरम 41 to 50
  • पाशुरम 51 to 60
  • पाशुरम 61 to 70
  • पाशुरम 71 to 80
  • पाशुरम 81 to 90
  • पाशुरम 91 to 100

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुज दासन

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अमलनादिपिरान् – सरल व्याख्या

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।।श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमत् वरवरमुनये नमः।।

मुदलायीरम्

श्री मणवाळ मामुनिगळ् स्वामीजी ने अपनी उपदेश रत्नमालै के दसवें पाशुर में अमलनादिपिरान् की महत्ता को बड़े ही सुन्दर ढंग से प्रस्तुत वर्णित किया है।

कार्त्तिगैयिल् रोहिणि नाळ् काण्मिनिन्ऱु कासियिनीर्
वाय्त्त पुगळ्प् पाणर् वन्दु उदिप्पाल् – आत्तियर्गळ्
अन्बुडने तान् अमलन् आदिपिरान् कऱ्ऱदऱ् पिन्
नन्गुडने कोण्डाडुम् नाळ्।

अरे दुनिया के लोगों! देखो, आज दक्षिणात्य माह, कार्तिक का रोहिणी नक्षत्र है। कार्तिक माह के रोहिणी नक्षत्र का यह दिवस महान आळ्वार संत तिरुप्पाणाळ्वार् का अवतरण दिवस है।

वेदों को मानने वाले और श्रद्धा और सम्मान करने वालों , तिरुप्पाणाळ्वार् द्वारा रचित अमलनादिपिरान् को पढ़ा तो जाना की आळ्वार संत ने सिर्फ १० प्रबंध पाशुरों में, वेदों का सार बहुत ही सुन्दर भाव से समझा दिया है। सदापश्यन्ति (सदा एम्पेरुमान को देखते रहना), बतला दिया इनके तिरुनक्षत्र को सभी उत्साह से मानते हैं।

तिरुप्पाणाळ्वार् द्वारा श्रीवैष्णवों पर अनुग्रह कर इन दस पाशुरों की रचनाकर इनमे , श्रीरंगम दिव्य धाम में शेष शैया पर लेटे हुये भगवान श्रीरंगनाथजी के दिव्य स्वरुप का वर्णन कर कह रहे है, उनके अपने आनंद के लिये बस यही एक मात्र साधन है।

श्री रंगेश के अर्चक पुरोहित (भगवान रंगनाथजी के प्रधान अर्चक) लोकसारंगमुनि द्वारा आळ्वार संत का अपचार हो गया था, जिससे पेरिय पेरुमाळ् ने अर्चक को आळ्वार संत को सम्मुख लाने का आदेश दिये। 

अर्चक तुरन्त तिरुप्पाणाळ्वार्के पास पहुँच, उन्हें अपने साथ मंदिर चलने का आग्रह किये,  पर आळ्वार संत ने दिव्य वैकुण्ठ श्रीरंगम में चरण रखने के योग्य नहीं हूँ, कह, चलने से मना कर दिये, तब लोकसारंगमुनि उन्हें अपने काँधे पर बैठाकर भगवान् पेरिय पेरुमाळ् के सम्मुख ले गये। इस कारण आळ्वार संत को मुनिवाहन योगी के नाम से बुलाने लगे,  सम्प्रदाय में ऐसी किवंदती है की, लोकसारंगमुनि के मंदिर में चरण रखते ही आळ्वार संत प्रबंध पाशुरों की रचना शुरू कर दिये, और जब भगवान् के सम्मुख पंहुचे तब दसवें पाशुर की रचना कर पेरिय पेरुमाळ् को सुनाये और उनके श्रीचरणों को प्राप्त कर, परमपद कि प्राप्ति कर लिये।

हमारे पूर्वाचार्य इन प्रबंधों का अनुभव दो प्रकार के सम्बन्ध से करते है,  

१. जैसे आळ्वार संत को पेरिय पेरुमाळ् ने अपने चरणों से दर्शन देते हुये किरीट तक क्रमशः दर्शन दिये।  

२. दूसरा पेरिय पेरुमाळ् द्वारा प्रसादित अनुग्रह का वर्णन,  इन प्रबंध पाशुरों को इन दोनों तरह के अनुभव को ध्यान में रख आनंद लेना चाहिये।

प्रस्तुत सरल भावार्थ पूर्वाचार्यों के उद्घृत व्याख्यानों पर आधारित है।

तनियन्

आपाद चूडम् अनुभूय हरीम् सयानम्
मद्ये कवेर दुहितुर् मुदितान्तरात्मा
अदृश्टृताम् नयनयोर् विशयान्तराणाम्
यो निश्चिकाय मनवै मुनिवाहनम् तम्।

मैं उन तिरुप्पाणाऴ्वार को प्रणाम करता हूँ, जिन्हें लोकसारंगमुनिवर ने अपने कंधों पर बिठाकर, दो कावेरी नदियों के बीचोबीच लेटे हुए पेरिय पेरुमाळ के सम्मुख उपस्थित किया; जिन्होंने पेरिय पेरुमाळ के श्रीचरणों से किरीट तक के दिव्य दर्शन का आनंदित अनुभव लिया; जिन्हें इस दर्शन के बाद संसार में और कुछ देखने की इच्छा ही नहीं थी।

काट्टवे कण्ड पाद कमलम् नल्लाडै उन्दि
तेट्टरुम् उदर बन्दम् तिरुमार्बु कण्डम् सेव्वाय्
वाट्टमिल् कण्गळ् मेनि मुनियेऱित् तनि पुगुन्दु
पाट्टिनाल् कण्डु वाळुम् पाणर् ताळ् परविनोमे।

हम उन तिरुपाणाळ्वार का मंगल गाते हैं, जिन्होंने लोकसारंगमुनि द्वारा ले आने के बाद अकेले ही पेरिय पेरुमाळ के गर्भगृह में प्रवेश किया और पेरिय पेरुमाळ का दर्शन कुछ इस प्रकार किया: उनके दिव्य श्रीचरणों से आरंभ कर, दिव्य वस्त्र का दर्शन कर, दिव्य नाभि कमल, सुन्दर दिव्य उदर, दिव्य वक्षस्थल, दिव्य कण्ठ, लालिमा लिए हुए सुन्दर श्रीमुख और दिव्य चक्षु जो नवखिले कमल की भाँति हैं।

आळ्वार संत ने अपने जीवन का लक्ष्य केवल पेरिय पेरुमाळ के गुणानुवाद ही रखा।

**********

प्रथम पाशुर:

आळ्वार संत पेरिय पेरुमाळ् के द्वारा उन्हें प्रसादित दिव्य श्रीचरणों के दर्शन का अनुभव करते है।

उन्हें अपने श्रीचरणों का सेवक और उनके भक्तों का भी सेवक बनाने के पेरिय पेरुमाळ् के इस कल्याण मंगल गुण का अनुभव कर रहे है।

अमलन् आदिपिरान् अडियार्क्कु एन्नै आट्पडुत्त
विमलन् विण्णवर् कोन् विरैयार् पोळिल् वेन्गडवन्
निमलन् निन्मलन् नीदि वानवन् नीळ् मदिळ् अरन्गत्तु अम्मान् तिरुक्
कमल पादम् वन्दु एन् कण्णिन् उळ्ळन ओक्किन्रदे।

हे! स्वामी (भगवन) आप तिरुवरंगम के ऊँचे परकोटों के मध्य लेटे हुये हों।

 हे! कल्याणगुण संपन्न मुझसे कोई आशा रखे बगैर आपने मुझे अपना ही नहीं अपने भक्तों का भी सेवक बनाने की कृपा की है।

हे! नित्यसुरियों (श्रीवैकुण्ठ में नित्य निवास करनेवाले) के स्वामी, आप सुवासित पुष्पों के उद्यान से घिरे, तिरुवेंगडम में निवास कर रहे हो।

आप अपने कारुण्य गुणों के कारण, अपने भक्तों द्वारा हुए अपचारों को ध्यान न देकर अपने सौलभ्य गुण के कारण बड़ी सुलभता से उन्हें उपलब्ध हो।

वहीं आपके परमपद में आपके सेवकों द्वारा नियमों का उल्लंघन कभी नहीं होता।

आपके दिव्य श्रीचरणों की छवि मेरे नेत्रों में बस गयी है।

दूसरा पाशुर:

आळ्वार संत पेरिय पेरुमाळ् के तिरुपीताम्बरम् के दर्शन का आनंद अनुभव कर रहे है।

जैसे समुद्र की लहरें नाव को आगे धकेलती है, ऐसे ही आळ्वार को पेरिय पेरुमाळ् ने अपने क्रमशः एक एक अंग के दर्शन दे रहे है।

आळ्वार को जब पूछा गया क्या भगवान ने कभी अकारण किसी पर कृपा की।

तब आळ्वार संत भगवान त्रिविक्रम का वर्णन कर आनन्द का अनुभव है।

उवन्द उळ्ळत्तनाय् उलगम् अळन्दु अण्डम् उऱ
निवन्द नीळ् मुडियन् अन्ऱु नेर्न्द निसासररैक्
कवर्न्द वेन्गणैक् कागुत्तन् कडियार् पोळिल् अरन्गत्तु अम्मान् अरैच्
चिवन्द आडैयिन् मेल् सेन्ऱदाम् एन सिन्दनैये।

अपने त्रिविक्रम अवतार में,  एम्पेरुमान ने जब तीनों लोको को नाप लिया तब उनका किरीट इस ब्रह्माण्ड के ऊपरी छोर को छू गया।

अपने क्रूर बाणों से शत्रु राक्षसों दैत्यों का नाश करने वाले श्रीराम, सुगन्धित उद्यानों से घिरे श्रीरंगम में पेरिय पेरुमाळ् के रूप में विराजमान हैं।

मेरा ध्यान भगवान की कमर को सुशोभित करते उस कटी वस्त्र पर केन्द्रित है।

तीसरा पाशुर:

एम्पेरुमान आळ्वार संत भगवान की दिव्य सुन्दर नाभि के दर्शन कर आनन्द का अनुभव करते है, आळ्वार संत कहते है, ब्रह्माजी के प्राकट्य के बाद वह और भी सुन्दर दृष्टव्य हो गयी।

पिछले पाशुर में आळ्वार संत त्रिविक्रम भगवान का वर्णन किये है,  एम्पेरुमान तिरुवॅगडमुडैयन् का वर्णन कर रहे है।

आळ्वार संत कहते है, पेरिय पेरुमाळ्और तिरुवॅगडमुडैयान्, एम्पेरुमान के ही दो स्वरुप है।

मन्दि पाय् वड वेन्गड मामलै वानवर्गळ्
सन्दि सेय्य निन्ऱान् अरन्गत्तु अरविन् अणैयान्
अन्दि पोल् निऱत्ताडैयुम् अदन् मेल् अयनैप् पडैत्तदोर् एळिल्
उन्दि मेलदन्ऱो अडियेन् उळ्ळत्तु इन्नुयिरे।

एम्पेरुमान तिरुवेन्गडम् के पर्वत्त पर तमिल देश के उत्तरी भाग में खड़े है, जहाँ मर्कट (बन्दर) उछल कूद करते रहते है, जहाँ नित्य सूरी भगवान श्रीनिवास की सेवा आराधना करने आते है।

श्रीरंगम में पेरिय पेरुमाळ् तिरुवनन्दाळ्वान् (शेषजी) की कोमल शैया पर लेटे हुये है।

मेरा मन भगवान पेरिय पेरुमाळ् के कटिभाग (कमर),  जो उषा काल में आकाश में फैली हलकी लालिमा लिए हुये है,  की सुंदरता पर मुग्ध हो गया।

जिसके ऊपर भगवान का नाभिकमल ब्रह्माजी के अवतरण के बाद और भी सुन्दर लग रहा है।

चतुर्थ पाशुर:

आळ्वार संत, एम्पेरुमान के दिव्य पेट के दर्शन का आनन्द ले रहे हैं, जो दिव्य नाभि के संग ही जुड़ा हुआ है।

जबकि दिव्य नाभि ने केवल ब्रह्मा को जन्म दिया है,  दिव्य पेट यह जतलाता है, “क्या मैंने पूरी दुनिया को अपने अंदर नहीं रखा है!”

क्या एम्पेरुमान किसी को स्वीकार करने से पहले,  उसके अहंकार और अधिकार भावना को दूर नहीं करेंगे?

आळ्वार संत कहते है की, जैसे एम्पेरुमान ने लंका के चारों ओर की सुरक्षात्मक दीवारों को ध्वस्त कर दिया,  वैसे ही वह अपने शत्रुओं, अहंकार और अधिकार भावना को भी मिटा देते है।

चदुर मामदिळ् सूळ् इलन्गैक्कु इऱैवन् तलै पत्तु
उदिर ओट्टि ओर् वेम् कणै उय्त्तवन् ओद वण्णन्
मदुर मावण्डु पाड मामयिल् आडु अरन्गत्तम्मान् तिरु वयिऱ्ऱु
उदर बन्दम् एन् उळ्ळत्तुळ् निन्ऱु उलागिन्ऱदे।

पेरिय पेरुमाळ्, श्रीरंगम में भगवान के रूप में शेष शैया पर लेटे हुये है, जहाँ भृंग अपने मधुर स्वर में गुनगुना रहे है और महान मोर नृत्य कर रहे हैं।

ऐसे पेरिय पेरुमाळ् ने, लंका , जो चार अलग-अलग प्रकार की सुरक्षात्मक परतों से घिरी हुयी है, के राजा रावण को युद्ध के मैदान से दूर भगा दिया था, समुद्र से रंग वाले एम्पेरुमान ने, बाद में एक क्रूर बाण से रावण के दस सिर काट दिये।

उन दिव्य पेरिय पेरुमाळ् के दिव्य पेट को सुशोभित करने वाला दिव्य आभूषण उदरबन्ध,  मेरे हृदय में दृढ़ता से स्थापित हो गया है और आँखों के सामने घूम रहा है।

पञ्चम पाशुर:

इस पाशुर में आळ्वार संत पेरिय पेरुमाळ् के दिव्य वक्षस्थल के दर्शन कर आनन्द का अनुभव ले रहे है।

एम्पेरुमान के दिव्य वक्षस्थल पर श्रीवत्स और कौस्तुभ चिन्हित है, यह उनकी पहचान है,

जो चित् और् अचित् तत्वों का प्रतिनिधित्व करती हैं।

इस पाशुर में आळ्वार  ने कहा है,  पेरिय पेरुमाळ् का वक्ष स्थल, उनका उदर (पेट) जिसमें जलप्रलय के समय सारा ब्रह्माण्ड उसके अंदर होता है, से भी अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि  यह पेरिय पिराट्टी का निवास स्थान है, जो पेरुमाळ् की पहचान है।

आळ्वार उस दिव्य वक्षस्थल के दर्शन का आनन्द ले रहे है, यह उन्हें इसकी सुंदरता देखने के लिए आमंत्रित कर रहे है।

अहंकार और अधिकारिता नष्ट हो जाने के बाद भी, क्या पाप और पुण्य (क्रमशः दोष और गुण) जीव का पीछा छोड़ देते है?

`आळ्वार संत कहते हैं कि एम्पेरुमान उनसे भी छुटकारा दिला देते है।

बारम् आय पळविनै पऱ्ऱु अऱुत्तु एन्नैत्तन्
वारमाक्कि वैत्तान् वैत्तदन्ऱि एन्नुळ् पुगुन्दान्
कोर मा तवम् सेय्दनन् कोल् अऱियेन् अरन्गत्तु अम्मान् तिरु
आर मार्वु अदु अन्ऱो अडियेनै आट्कोण्डदे।

पेरिय पेरुमाळ्  ने  मेरे  उन  कर्मों  से  जो  एक  बोझ की तरह थे, जो अनादि काल से मेरा पीछा कर रहे थे से, छुटकारा दिलवा दिया और उन्होंने मुझे अपने प्रति स्नेही बना दिया, इतने पर ही नहीं रुके वो मेरे मन में उतर गये।

मुझे नहीं पता कि इस भाग्य को पाने के लिए मैंने अपने पिछले जन्मों में कितनी बड़ी तपस्या की होगी। पेरिय पेरुमाळ् जो श्रीरंगम के स्वामी है,  जिनके दिव्य वक्षस्थल पर तिरु (श्री महालक्ष्मी) है, उनके दिव्य प्रेम की सांकलों ने मुझ दास को उनके सेवक बना लिया। 

छठवां पाशुर:

इस पाशुर में आळ्वार संत पेरिय पेरुमाळ् की ग्रीवा (गर्दन) के दर्शन अनुभव का आनंद ले रहे है।

आळ्वार संत अनुभव कर रहे है की , ग्रीवा कुछ इस तरह कह रही है, जबकि पिराट्टी, श्रीवत्स और कौस्तुभ उनके वक्षस्थल पर विराजित है, पर आपदा के समय में ही हूँ जो इस संसार को निगल कर उसकी रक्षा करता हूँ, यह सुन आळ्वार संत आनंदित हो उठते है।

क्या इस तरह एम्पेरुमान किसी को अपने कर्मो से छुटकारा दिलवाये है?

तब आळ्वार संत याद दिलवाते है,  रूद्र को ब्रह्माजी के श्राप से, और साथ में चंद्र को भी, जब उनकी छटा घट रही थी श्राप से मुक्त किया थे।

तुण्ड वेण् पिऱैयन् तुयर् तीर्त्तवन् अन्जिऱैय
वण्डु वाळ् पोळिल् सूळ् अरन्ग नगर् मेय अप्पन्
अण्डरण्ड बगिरण्डत्तु ओरु मानिलम् एळुमाल् वरै मुऱ्ऱुम्
उण्ड कण्डम् कण्डीर् अडियेनै उय्यक्कोण्डदे।

एम्पेरुमान ने रूद्र के सन्ताप को मिटाया,  संग में चंद्र जो उनके शीश पर अर्धचन्द्राकार रूप में विराजमान है, के  भी सन्ताप को मिटाया।

वह सुन्दर पंखो वाले भृंग से भरे उद्यानों से घिरे, श्रीरंगम के वासी “पेरिय पेरुमाळ्” ही है।

आळ्वार संत कहते हैं कि, उन पेरिय पेरुमाळ् की दिव्य गर्दन, जिसने इस  ब्रह्मांड, ब्रह्मांडों, ब्रह्मांडों के बाहरी आवरणों को, अद्वितीय पृथ्वी और अन्य सभी स्थानों में रहने वालों को निगल लिया, ने उनका उत्थान किया है।

सातवां पाशुर:

इस पाशुर में आळ्वार संत, एम्पेरुमान के दिव्य मुख और ओष्ठ के दर्शन पाकर उनके दिव्य अनुभव का आनंद ले रहे है।

यह अनुभव कर रहे है की, मुख कह रहा है, निश्चय ही ग्रीवा (गर्दन) ने संसार को निगला है, पर वह उसी समय संभव हुआ जब में लेता हूँ, और कहता हूँ,  “मा  शुचः” (डरो मत) यह सुन, आळ्वार आनंद ले रहे है।

रुद्र और अन्य देव, देवता हैं, इसलिए एम्पेरुमान ने उनकी रक्षा की।

लेकिन क्या? वह आपकी रक्षा करेंगे?

आळ्वार संत जवाब देते हुये कहते हैं कि, एम्पेरुमान उसकी रक्षा करेंगे, जो केवल एम्पेरुमान की इच्छा रखता है, अन्य लाभों की इच्छा रख अन्य देवताओं की इच्छा रखने वालों से अधिक रक्षा करेंगे।

कैयिन् आर् सुरि सन्गु अनल् आळियर् नीळ् वरै पोल्
मेय्यनार् तुळब विरैयार् कमळ् नीळ् मुडि एम्
अय्यनार् अणि अरन्गनार् अरविन् अणैमिसै मेय मायनार्
सेय्य वाय् अय्यो एन्नैच् चिन्दै कवर्न्ददुवे।

पेरिय पेरुमाळ् के पास दिव्य शंख है जो मुड़ा हुआ है,  दिव्य चक्र है जो अग्नि का उत्सर्जन करता है, दिव्य रूप है, वह एक विशाल पर्वत की तरह है और उनके शीश पर एक लंबा दिव्य मुकुट है, जो दिव्य तुलसी की मानिंद  सुगंधित है।

वह मेरे स्वामी (भगवान) हैं, जो सुंदर श्रीरंगम में तिरुवन्दाळ्वान् (आदिशेशन्) के कोमल नरम शैया पर लेटे हुये हैं,  उनकी अद्भुत लीलाएं है।

ऐसे एम्पेरुमान की हलकी लालिमा लिये मुखाकृति ने मुझे आकर्षित किया।

आठवाँ पाशुर:

इस पाशुर में आळ्वार संत एम्पेरुमान के दिव्य सुन्दर चक्षुओं (आँखों) के दर्शन का अनुभव और आनंद ले रहे है।

मुख चाहे जो कहे,  आँखे ही है जो वात्सल्य झलकाती है  और भगवानके दर्शन करवाती है।

इस लिए आळ्वार संत भगवान की आँखों के दर्शन का सुख अनुभव कर रहे है।

चतुर्थ और पंचम पाशुर में आळ्वार संत ने कहा, अहम्, अधिकार भावना और पिछले  कर्म मिटा दिये जायेंगे, पर यह मिटा दिये जाने के बाद भी अविद्या (अज्ञान) रह जाने से, क्या अहम्, अधिकार भावना वापस नहीं आयेंगे?

आळ्वार संत कहते है, जैसे एम्पेरुमान ने दैत्य हिरण्य कश्यप (तमोगुणी (अज्ञान और आलस्य) प्रवर्त्ती का प्रतिक)} का नाश किया, ऐसे ही एम्पेरुमान हमारे तमोगुणों का नाश करेंगे।

परियन् आगि वन्द अवुणन् उडल् कीण्ड अमरर्क्कु
अरिय आदिप् पिरान् अरन्गत्तु अमलन् मुगत्तुक्
करियवागिप् पुडै परन्दु मिळिर्न्दु सेव्वरियोडि नीण्ड अप्
पेरिय आय कण्गळ् एन्नैप् पेदैमै सेय्दनवे।

एम्पेरुमान ने विशालकाय राक्षस हिरण्य कश्यप को चीर दिया।

वह ब्रह्मा जैसे दिव्य देवताओं के लिए भी सुलभ नहीं है।

वह सभी के कारक है, वह सभी पर कृपा करते है, और श्रीरंगम में विश्राम करते है।

ऐसे एम्पेरुमान के दिव्य मुख पर शोभित सुन्दर कानों तक फैले बड़े विशाल दिव्य काले नेत्र, जिनमे लाल रंग की रेखाएं हैं, ने मुझे भ्रमित कर दिया।

नवम पाशुर:

आल मामरत्तिन् इलै मेल् ओरु पालगनाय्
ज्ञालम् एळुम् उण्डान् अरन्गत्तु अरविन् अणैयान्
कोल मा मणि आरमुम् मुत्तुत् ताममुम् मुडिवु इल्लदु ओर् एळिल्
नील मेनि ऐयो निऱै कोण्डदु एन् नेन्जिनैये।

इस पाशुर में आळ्वार संत भगवान् की दिव्य छवि के दर्शन कर उसका दिव्य आनन्द का अनुभव कर रहे है।

आळ्वार संत भगवान के अघटित को घटित करने के गुण का आनंद ले रहे है।

जब यह प्रश्न पूछा गया,  वेदांत (वेदों का सार, जिसे उपनिषद् भी कहते है) के ज्ञान से तमोगुण का भी नाश होता है, पर आळ्वार संत चतुर्थ वर्ण से थे जिन्हे वेद पढ़ने का भी अधिकार नहीं है।

तब आळ्वार संत ने कहा, एम्पेरुमान अपने अद्भुत गुण को दर्शाते है, प्रलय काल में सारे ब्रह्माण्ड को निगलकर, एक वटपत्र पर लेटे हुये है,   वह मेरे भी सभी तमोगुण का नाश करेंगे।

सभी लोकों को निगलकर, एक वटपत्रपर लेटे करनेवाले, श्रीरंगम में तिरुवन्दाळ्वान् (आदिशेशन्) की नरम शैया पर लेटे हुये है। 

उन पेरिय पेरुमाळ् की अद्वितीय कला दिव्य स्वरुप जो रत्न जड़ित स्वर्णाभरणों से सुसज्जित है, बरबस ही मेरे मन को आकर्षित कर रहा है, काश मैं भी, इसके लिये कुछ कर सकता।

दसवां पाशुर:

अंत में आळ्वार संत ने पेरिय पेरुमाळ् में भगवान कृष्ण के दर्शन किये, तब आळ्वार संत ने मुझे और कुछ देखना नहीं कह, भगवान के श्रीचरणों को प्राप्त कर वैकुण्ठधाम  चले गये।

कोण्डल् वण्णनैक् कोवलनाय् वेण्णेय्
उण्ड वायन् एन् उळ्ळम् कवर्न्दानै
अण्डर् कोन् अणि अरंगन् एन् अमुदिनैक्
कण्ड कण्गळ् मऱ्ऱोन्ऱिनैक् काणावे।

वह जो मेघों के रंग और गुणों से संपन्न है, वह जो गो-कुल में जन्म लिया है, जिनकी सुन्दर दिव्य मुखाकृति है, जो मक्खन चुराकर खाता है, जो नित्यसुरियों का नेता है, जिसने मेरे मन को आकर्षित किया है , वह श्रीरंगम में लेटा हुआ है।

मेरी अतृप्त आँखों ने, उन एम्पेरुमान को देखा है, अब और आगे कुछ भी नहीं देखना है।

अडियेन श्याम सुन्दर रामानुज दास

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स्तोत्र रत्नम – श्लोक 1 – 10 – सरल व्याख्या

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श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

पूरी श्रृंखला

<<तनियन्

श्लोक 1

इस प्रथम श्लोक में श्री आळवन्दार् स्वामीजी, श्रीनाथमुनी स्वामीजी के ज्ञान और वैराग्य रूपी यथार्थ संपत्ति का वंदन करते है।  

नमो’चिंत्याद्भुधाक्लिष्ट ज्ञान वैराग्यराश्ये |
नाथाय मुनये’गाधभगवद् भक्तिसिंधवे ||

मैं श्रीनाथमुनि स्वामीजी को नमस्कार करता हूं, जो बुद्धि से परे अद्भुत ज्ञान और वैराग्य का संग्रह हैं, वह ज्ञान आर वैराग्य उन्हें (भगवान की कृपा से) सरलता से प्राप्त है, वह जो भगवान का ध्यान करते हैं और भगवान के प्रति असीम भक्ति के सागर हैं।

श्लोक 2 –

तस्मै नमो मधुजिधंग्री सरोज तत्व:
ज्ञानानुराग महिमातीशयांतसीम्ने |

नाथाय नाथमुनये’त्र परत्र चापि
नित्यं यदीय  चरणौ शरणं मदीयम् ||

इस श्लोक में, भगवान के अवतारों से संबंधित श्रीनाथमुनि स्वामीजी के ज्ञान आदि की परम महानता का वर्णन किया गया है। वैकल्पिक रूप से, यह समझातें हैं कि “उनका ज्ञान आदि (जो पिछले श्लोक में समझाया गया है) उसमें सीमित रहने के बजाय, मुझ (आळवन्दार्) तक बह रहा है”।

श्रीमान् श्रीनाथमुनि स्वामीजी को मेरा नमस्कार, जिनके दिव्य चरण हमेशा इस दुनिया में और दूसरी दुनिया में भी मेरी शरण हैं, जो सच्चे ज्ञान और मधु नामक राक्षस का वध करने वाले, श्रीभगवान के दिव्य चरणकमलों में भक्ति के शिखर हैं, और जो [मेरे] नाथ/ स्वामी है।

श्लोक 3 – 

जैसे प्यासे की प्यास अधिक से अधिक पानी पीने से नहीं बुझती, वैसे ही श्रीआळवन्दार् कह रहे है कि “मैं उनका दास हूं, बारंबार”।

भूयो  नमो’परिमिथाच्युत भक्ति तत्त्व
नामृताबद्धि परिवाह शुभैर्वचोभि: |

लोके’वतीर्ण परमार्थ समग्र भक्ति-
योगाया नाथमुनये यमिनाम् वराय ||

श्रीनाथमुनि स्वामीजी को फिर से मेरा नमस्कार, जिन्होने सच्चे ज्ञान और भगवान के प्रति असीमित भक्ति के सागर से बहते हुए शुभ शब्दों के रूप में इस संसार में अवतार लिया है, जिनका अवतार हमारे लिए परम कृपा/उपकार है, जो पूर्ण है, जिनमें भक्ति योग है और जो योगियों में सबसे श्रेष्ठ है।

श्लोक 4

इस श्लोक में, श्रीआळवन्दार्, श्री पराशर भगवान को श्रीविष्णु पुराण के रूप में उनके योगदान के कारण प्रणाम करते हैं।

तत्वेन यश्चिदचिदीश्वर तत्स्वभाव:
भोगापवर्ग तधुपायगतीरुधार: |

संदर्शयन् निरमिमीत पुराणरत्नम
तस्मै नमो मुनिवराय पराशराय
||

उन उदार श्रीपराशर ऋषि को मेरा नमस्कार, जो ऋषियों में सर्वश्रेष्ठ हैं, जिन्होंने दयापूर्वक श्रीविष्णु पुराण, जो पुराणों में मणि (सर्वोत्तम) समान है, हमें प्रदान किया , जो स्पष्ट रूप से तीन तत्वों, अर्थात्, चित, अचित और ईश्वर (तत्व त्रय) की व्याख्या करता है, जैसे वे हैं ,उन तत्वो के गुण, सुख (इस भौतिक क्षेत्र के), मोक्ष (मुक्ति), इस भौतिक जगत में सुख के साधन और इस क्षेत्र से मुक्ति, और जो लक्ष्य जीवात्माओं द्वारा प्राप्त किया गया है।

श्लोक 5

श्रीआळवन्दार्, श्रीशठकोप स्वामीजी के दिव्य चरणों में प्रणाम करते है और शरणागति करते है।

माता पिता  युवतयस्तनया  विभूति:
सर्वं यदेव नियमेन मदन्वयानाम् |

आध्यस्य न: कुलपतेर्वकुलाभिरामं 
श्रीमत् तदंघ्रियुगलम् प्रणमामि मुर्धना ||

श्रीशठकोप स्वामीजी के दिव्य चरण हमेशा [मेरे और] मेरे वंशजों के लिए माता, पिता, स्त्री [पति/पत्नी], बच्चे, महान-धन और बाकी वह सब कुछ हैं, जो यहां वर्णित नहीं है। मैं ऐसे आळ्वार के दिव्य चरणों में शीष झुकाकर नमन करता हूं, जो हमारे [वैष्णव] वंश के अग्रणी और मुखिया हैं, जो मजीझा के फूलों से सुशोभित हैं और जिनके पास श्रीवैष्णवश्री (कैंकर्य का धन) है।

श्लोक 6 – 

जैसा कि तिरुवाइयमौळी 7.9.7 में कहा गया है “वैगुन्तनागप् पुगळ” (आळ्वार  भगवान की कृपा से  उनकी स्तुति श्रीवैकुण्ठ के स्वामी के रूप में करते है)। क्योंकि भागवतों द्वारा की गयी स्तुति भगवान को प्रिय है, और भगवान का गुणगान करना आचार्यों को भी प्रिय है, तो भगवान की प्रशंसा करने के आशय से, संक्षेप में उपाय (साधन) और उपेय (लक्ष्य) की व्याख्या करते हुए, भगवान की स्तुति करने लगते हैं।

यन्मूर्ध्नि मे श्रुतिशिरस्सु च भाति यस्मिन्
अस्मन् मनोरथपथस् सकलस्समेति ।

स्तोश्यामि नः कुलधनम् कुलदैवतम् तत्
पादारविन्दम् अरविन्दविलोचनस्य ॥

मैं ,श्रीपुण्डरीकाक्ष  के दिव्य चरणकमलों की स्तुति करने जा रहा हूँ, जो हमारे कुल के धन हैं और हमारे कुल के (भरोसेमंद) आराध्य हैं, जिनके दिव्य चरणों में हमारा सारा प्रेम पहुँचता है, जिनके दिव्य चरण मेरे शीष पर है और वेदांत में भी है।

श्लोक 7

श्री भगवत गीता 1.47 में कहा गया है कि “विसृज्य सशरं चापं ” (बाणों के साथ धनुष को गिरा दिया) अर्थात अर्जुन ने युद्ध के लिए निकलने के बाद युद्ध का त्याग कर दिया, उसी प्रकार श्रीआळवन्दार् भी प्रयास से पीछे हट गए।

तत्वेन यस्य महिमार्णवशीकराणुः
शक्यो न मातुमपि शर्वपितामहाद्यैः ।

कर्तुम् तदीयमहिमस्तुतिमुद्यताय
मह्यम् नमो’स्तु कवये निरपत्रपाय ॥

भगवान की महानता के सागर की एक बूंद में व्याप्त एक छोटे से परमाणु को भी सही मायने में मापना शिव, ब्रह्मा आदि के लिए भी असंभव है। मैं, निर्लज्जतापूर्ण कवि होने का दावा करते हुए जो ऐसे भगवान की महानता का गुणगान करने [गाने] के लिए निकला हूँ, इसके लिए मुझे [इस हँसने योग्य प्रयास के लिए] स्वयं का अभिवादन करना चाहिए।

श्लोक 8

जैसे भगवान ने युद्ध से पीछे हट गये अर्जुन को प्रेरित किया, जिस पर अर्जुन ने श्रीभगवत गीता 18.73 में कहा “करिष्ये वचनं तव ” (जैसा आपने कहा था, मैं लड़ूंगा), उसी प्रकार यहाँ, भगवान श्रीआळवन्दार् को प्रेरित करते है और कहते है कि “मुख केवल भगवान की स्तुति करने के लिए उपस्थित है; जैसा कि श्रीविष्णु सहस्रनाम में कहा गया है ‘स्तव्य: स्तवप्रिय:’ (भगवान प्रशंसनीय है और उन्हें प्रशंसा पसंद है), प्रशंसा के लिए मुझे प्रिय है”। यह सुनकर, श्रीआळवन्दार् आश्वस्त हो जाते हैं [भगवान की स्तुति करने के लिए]।

यद्वा श्रमावधि यथामथि वाप्यशक्तः
स्तौम्येवमेव खलु ते’पि सदा स्तुवन्तः ।

वेदाश्चतुर्मुख मुखाश्च महार्णवान्तः
को मज्जतोरणुकुलाचलयोर्विशेषः ॥

या, मैं जो असमर्थ हूं, भगवान की  प्रशंसा तब तक करूंगा जब तक मैं  थक न जाऊँ अथवा जितना मैं जानता हूं; इस प्रकार सदा स्तुति करने वाले वेद, और चतुर्मुख ब्रह्मा आदि, जो स्तुति कर रहे हैं; तब एक (छोटे) परमाणु और एक (बड़े) पर्वत में क्या अंतर है, जो एक विशाल महासागर के अंदर डूबा हुआ है?

श्लोक 9

अब, श्रीआळवन्दार् कहते हैं कि वे ब्रह्मा आदि की तुलना में भगवान की स्तुति के लिए अधिक योग्य हैं।

किञ्चैष शक्त्यतिशयोन न ते’नुकम्प्यः
स्तोतापि तु स्तुति कृतेन परिश्रमेण ।

तत्र श्रमस्तु सुलभो मम मन्दबुद्देः
इत्युद्यमो’यमुचितो मम चाप्जनेत्र ॥

इसके अलावा, मैं आपकी प्रशंसा करने की अपनी क्षमताओं के कारण आप के द्वारा कृपा करने के योग्य नहीं हूं; परन्तु मैं इस विधि आपकी कृपा के योग्य हूँ क्योंकि आपकी स्तुति करते हुए मैं थक गया हूँ; थकान अर्थात अत्यंत कम बुद्धि होने के कारण मैं आसानी से थक जाऊँगा; इस प्रकार, यह प्रयास [आपकी स्तुति करने का] केवल मेरे लिए [ब्रह्मा वगैरह की तुलना में] उपयुक्त है।

श्लोक 10

भगवान के गुणगान से पीछे हटने और पुनः उनके गुणगान करने के लिए आश्वस्त होने के बाद, श्रीआळवन्दार् भगवान के परत्वम (सर्वोच्चता) की व्याख्या करते है, और बाद के पांच श्लोकों में शरणागति को दर्शाते है। इस पहले श्लोक (पांचों में से) में, श्रीआळवन्दार् दयापूर्वक “कारण वाक्य” (शास्त्र के वे अंश, जो भगवान ही आधारभूत है, इस बात की चर्चा करते हैं) के माध्यम से भगवान की सर्वोच्चता की व्याख्या करते हैं।

नावेक्षसे यदि ततो भुवनान्यमूनि
नालं प्रभो ! भवितुमेव कुतः प्रव्रुत्तिः

एवं निसर्ग सुह्रुदि त्वयि सर्वजन्तोः
स्वामिन् न चित्रम् इदं  आश्रित वत्सलत्वम् ॥

हे भगवान! यदि (आप) ने सम्पूर्ण जलप्रलय के बाद अपनी दया दृष्टि नहीं की होती, तो ये संसार नहीं बनते; यह स्पष्ट है कि कोई भी कार्य नहीं हुआ होता [यदि दुनिया को शुरू करने के लिए नहीं बनाया गया होता]। हे प्रभो! इस प्रकार, जब आप सभी प्राणियों के स्वाभाविक मित्र हैं, तो अपने भक्तों के प्रति मातृ स्नेह प्रकट करने के इस गुण को देखना असामान्य नहीं है।

– अडियेन भगवती रामानुजदासी

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रामानुस नूट्रन्ददि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या – पाशुर 101 से 108

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श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत् वरवरमुनये नम:

रामानुस नूट्रन्दादि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या

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पाशुर १०१: श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं श्रीरामानुज स्वामीजी की मिठास उनके पवित्रता से भी उच्च हैं। 

मयक्कुम् इरु विनै वल्लियिल् पूण्डु मदि मयन्गित्
तुयक्कुम् पिऱवियिल् तोन्ऱिय एन्नै तुयर् अगऱ्ऱि
उयक्कोण्डु नल्गुम् इरामानुस एन्ऱदु उन्नै उन्नि
नयक्कुम् अवर्क्कु इदु इळुक्कु एन्बर् नल्लवर् एन्ऱु नैन्दे

अब मैं आपकी यह स्तुति कर रहा हूं कि “अज्ञानप्रद पुण्यपाप नामक दो प्रकारके कर्म रूपी बेडीमें फंसाकर, (उससे) विवेक को नाशकर भ्रम पैदा करनेवाले संसार में जन्म लेनेवाले मेरे दुःख दूरकर, कृपया मेरा उद्धार करनेवाले हे श्रीरामानुज स्वामिन्।” परंतु सत्पुरुष कहते हैं कि यों स्तुति करना, प्रेमपूर्वक आपका ही नित्यध्यान करनेवाले द्रुतहृदयों के लिए अनुचित है। श्रीरामानुज स्वामीजी के पावनत्व व भोग्यत्व नामक दो धर्म होते हैं। पावनत्व माने भक्तों के पाप मिटाकर उनको पवित्र बनाना, और भोग्यत्व माने नित्य अनुभव करने योग्य मधुर रहना। रसिक लोगों का यह मंतव्य है कि इन दोनों में पावनात्व की अपेक्षा भोग्यत्व का अनुसंधान करना ही श्रेष्ठ है। क्योंकि पावनत्व का अनुसंधान करने वाला कुछ स्वार्थका ख्याल करता है, अर्थात् अपने पाप मिटाने की इच्छा करता है; भोग्यत्व के अनुसंधान में यह स्वार्थभावना नहीं रहती। अतः हाल में अमुदनार कह रहे हैं कि मैंने श्रीस्वामीजी के पावनत्व का ही जो बहुत अनुसंधान किया यह कुछ अनुचित- सा लगेगा। इसका यह तात्पर्य नहीं कि पावनत्व का अनुसंधान सर्वथा अनुचित है। क्योंकि श्रीस्वामीजी के सभी गुणों का चिन्तन करना आवश्यक है ही। और गुरुजी ने जो हमारे पापों को समूल मिटा दिया, उसका अनुसंधान नहीं करने पर हम कृतघ्न भी बनेंगे। अतः एक दृष्टि से यह काम करना पड़ता है और दूसरी दृष्टि से इस पर जोर डालना कुछ अनुचित सा प्रतीत होता है।

पाशुर १०२: श्रीरंगामृत स्वामीजी स्वयं श्रीरामानुज स्वामीजी से उनके उदार गुण का कारण पूछते हैं ताकि वें इस संसार में उनके ओर बढ़ सके।

नैयुम् मनम् उन् गुणन्गळै उन्नि एन् ना इरुन्दु एम्
ऐयन् इरामानुसन् एन्ऱु अळैक्कुम् अरु विनैयेन्
कैयुम् तोळुम् कण् करुदिडुम् काणक् कडल् पुडै सूळ्
वैयम् इदनिल् उन् वण्मै एन् पाल् एन् वळर्न्ददुवे

(हे गुरुजी!) मेरा मन आपके गुणों का ही ध्यान करता हुआ पिघल जा रहा है; मेरी वाणी सुदृढ़ अध्यवसाय के साथ यों पुकार रही है कि, “हे हमारे नाथ श्री रामानुज स्वामिन् !” मुझ महापापी के हाथ भी (आपके लिए) अंजलि कर रहे हैं; आँख(आपके) दर्शन पाना चाहती हैं । समुद्र-परिवृत इस विशाल पृथ्वीतल पर मुझ पर ही आपकी दया जो इस प्रकार फैल रही है, इसका कारण क्या होगा ?

पाशुर १०३: श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कि उनकी इंद्रीया श्रीरामानुज स्वामीजी की ओर शामिल हो गई क्योंकि वें बड़ी कृपा से अपने कर्मों से मुक्त हो गये और उन्होंने उन्हें बहुर अमूल्य ज्ञान प्रदान किया।

वळर्न्द वेम् कोबम् मडन्गल् ओन्ऱाय् अन्ऱु वाळ् अवुणन्
किळर्न्द पोन् आगम् किळित्तवन् कीर्त्तिप् पयिर् एळुन्दु
विळैन्दिडुम् सिन्दै इरामानुसन् एन्दन् मेय् विनै नोय्
कळैन्दु नल् ज्ञानम् अळित्तनन् कैयिल् कनि एन्नवे

पूर्वकाल में कठोर कोपवाले एक नरसिंगरूप को धारण कर, खङ्गधारी (हिरण्य) असुर का मत्त व दृढ़ वक्ष चीर डालने वाले भगवान का दिव्य यशरूपी सत्य जिसमें खूब उत्पन्न होता है, ऐसे (सुक्षेत्र) मनवाले श्रीरामानुज स्वामीजीने, मेरे शरीर में व्याप्त समस्त पाप मिटा कर, मुझ करतलामलक की तरह अतिस्पष्ट ज्ञान को भी प्रदान किया। श्रीरामानुज स्वामीजी के मनरूपी अच्छे क्षेत्र में भगवान के दिव्ययशरूपी सस्य खूब उपजते हैं; कहनेका यह तात्पर्य है कि श्री स्वामीजी के मन में सदा भगवान के दिव्य यश के सिवा दूसरी किसी वस्तु की चिंता नहीं रहती। ऐसे उन्होने अमुदनार के समस्त पाप मिटाकर उन्हें अतिविशद ज्ञान को प्रदान किया।

पाशुर १०४:  श्रीरामानुज स्वामीजी द्वारा हीं एक काल्पनिक प्रश्न का उत्तर देते हुए “अगर आप भगवान को देखेंगे तो क्या करेंगे?” श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कि अगर भगवान स्वयं के विषय में भी प्रगट होते हैं तो भी वें कहते हैं कि वें श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य गुणों को छोड़ और कुछ नहीं मांगेंगे जो उनके दिव्य स्वरूप में दीप्तिमान हैं।

कैयिल् कनि अन्न कण्णनैक् काट्टित् तरिलुम् उन्दन्
मेय्यिल् पिऱन्गिय सीर् अन्ऱि वेण्डिलन् यान् निरयत्
तोय्यिल् किडक्किलुम् सोदि विण् सेरिलुम् इव्वरुळ् नी
सेय्यिल् तरिप्पन् इरामानुस एन् सेळुम् कोण्डले

(औदार्य के विषय में) विलक्षण मेघ के समान विराजमान हे श्रीरामानुज स्वामिन्! यदि आप मुझे साक्षात् भगवान के ही हस्तामलक की भांति अतिविशद दर्शन करा दें, तो भी मैं (उनकी परवाह न करता हुआ) आपके दिव्यमंगलविग्रह के (सौन्दर्यादि) शुभगुणों के सिवा दूसरी किसी वस्तू पर अपनी नजर नहीं डालूंगा; मैं बेशक संसाररूपी इस नरक में ही पड़ा रहूंगा; अथवा ज्योतिर्मय परमधाम पहुँचूंगा, इसकी चिंता नहीं। परंतु आप यही कृपा करें (कि मैं उक्त प्रकार आपके श्रीविग्रह के ही दर्शन करता रहूं); यह कृपा पाकर ही मैं (संसार में ही अथवा मोक्षमें हो) शांति पा सकूंगा।

पाशुर १०५: जबकी सभी जन कहते हैं संसार को छोड़ना हैं और परमपद को प्राप्त करना हैं और उस परमपद को पाने की इच्छा के लिए दोनों को समान समझना चाहिए। आपका इच्छुक स्थान कौनसा हैं? वें इस पाशुर के जरिए बताते हैं।

सेळुम् तिरैप् पाऱ्कडल् कण् तुयिल् मायन् तिरुवडिक्कीळ्
विळुन्दिरुप्पार् नेन्जिल् मेवु नल् ज्ञानि नल् वेदियर्गळ्
तोळुम् तिरुप् पादन् इरामानुसनैत् तोळुम् पेरियोर्
एळुन्दु इरैत्तु आडुम् इडम् अडियेनुक्कु इरुप्पिडमे

सुंदर लहरों से समावृत क्षीरसागर में शयन करनेवाले अत्याश्चर्यचेष्टित भगवान के श्री पादों के आश्रय में रहनेवाले महात्माओं के हृदय में नित्यनिवास करनेवाले, श्रेष्ठ ज्ञानियों तथा परमवैदिकों से प्रणम्य श्रीपादवाले श्री रामानुज स्वामीजी के भक्त महात्मा लोग जिस स्थल में, आनंद के मारे उठकर नाचते, कूदते और कोलाहल मचाते हुए निवास करते हैं, वही स्थान मेरा भी निवासस्थान होगा। कितने ही महात्मा लोग क्षीराब्धिनाथ भगवान के भक्त होते हुए भी, उनकी उपेक्षा कर, श्रीरामानुज स्वामीजी के श्रीपादों का निरंतर ध्यान करते हैं, और उस आनंद से मस्त होकर नाचते कूदते और कोलाहल मचाते रहते हैं। ऐसे महात्मा श्रीरामानुज-भक्त लोग जहा विराजते हैं, मैं भी वहीं निवास करना चाहता हूं।

पाशुर १०६: श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीरंगामृत स्वामीजी का उनके प्रति स्नेह को देखकर बड़ी कृपा से श्रीरंगामृत स्वामीजी के मन की इच्छा करते हैं। यह देखकर श्रीरंगामृत स्वामीजी प्रसन्नता से और शुक्र से यह पाशुर का पाठ करते हैं। 

इरुप्पिडम् वैगुन्दम् वेन्गडम् मालिरुन्जोलै एन्नुम्
पोरुप्पिडम् मायनक्कु एन्बर् नल्लोर् अवै तम्मोडुम् वन्दु
इरुप्पिडम् मायन् इरामानुसन् मनत्तु इन्ऱु अवन् वन्दु
इरुप्पिडम् एन्दन् इदयत्तुळ्ळे तनक्कु इन्बुऱवे

साधु पुरुष कहते हैं कि अत्याश्चर्य दिव्य चेष्टितवाले भगवान जिनके अद्भुत गतिविधियों के वासस्थान, श्रीवैकुंठ धाम, श्रीवेंकटाचल और श्रीवनगिरी (तिरुमालिरुन्जोलै) नामक पर्वत हैं; ऐसे भगवान उक्त समस्त स्थानों के साथ पधारकर श्रीरामानुज स्वामीजी के हृदय में निवास करते हैं; एवं वे गुरुजी हाल में यहां पधार कर मेरे हृदय में सानंद विराज रहे हैं।

पाशुर १०७:  श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य मुखारविंद को देखकर जिन्होंने श्रीरंगामृत स्वामीजी के प्रति स्नेह प्रगट किया हैं, श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कुछ हैं जो वें उन्हें प्रदान करना चाहते हैं और अपनी इच्छा को प्रगट करते हैं।

इन्बुऱ्ऱ सीलत्तु इरामानुस एन्ऱुम् एव्विडत्तुम्
एन्बुऱ्ऱ नोय् उडल् तोऱुम् पिऱन्दु इऱन्दु एण् अरिय
तुन्बुऱ्ऱु वीयिनुम् सोल्लुवदु ओन्ऱु उण्डु उन् तोण्डर्गट्के
अन्बुऱ्ऱु इरुक्कुम्बडि एन्नै आक्कि अन्गु आट्पडुत्ते

हे आनंदपूर्ण व सौशील्यगुणविभूषित श्रीरामानुज स्वामिन्। आपसे मेरी यह एक विनती है कि, हड्डी में घुसकर दुःख देने वाले रोगों के आस्पद अनेक शरीरों में जन्म लेना, फिर मरना, इस प्रकार अनंत दुःख पाते रहने पर भी, मुझे सर्वदेशों व सर्वकालों में आप अपने भक्तों का ही भक्त बनाकर उन्हीकी सेवा में लगा दीजिए, यही मेरी प्रार्थना है। (मैं जन्म व्याधि जरा मरण रूप अनंत दुःखपूर्ण इस संसार से डरता हुआ, इससे मुक्ति नहीं माँगूंगा। यह कैसा भी हो, इसकी चिंता नहीं; किंतु मैं आपके भक्तों का ही भक्त और नित्यसेवक हो जाऊं, यह एक ही मेरी प्रार्थना है।)

पाशुर १०८:  इस प्रबन्ध के प्रारम्भ में श्रीरंगामृत स्वामीजी ने “रामानुजन् चरणारविन्दम् नाम्मन्निवाळ नेञ्जे” के लाभ की प्रार्थना किए हैं (हमें श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य चरण कमलों में उपयुक्त होकर रहना चाहिए), श्रीमहालक्ष्मीजी से प्रार्थना करते हैं कि उनकी इच्छा पूर्ण करने की पुरूषकार करे। अंतिम पाशुर में भी वें श्रीमहालक्ष्मीजी को पाने को पूछते हैं जो हमें कैंकर्य रूपी धन प्रदान करेंगे।

म् कयल् पाय् वयल् तेन्नरन्गन् अणि आगम् मन्नुम्
पन्गय मामलर्प् पावयैप् पोऱ्ऱुदुम् पत्ति एल्लाम्
तन्गियदु एन्नत् तळैत्तु नेन्जे नम् तलै मिसैये
पोन्गिय कीर्त्ति इरामानुसन् अडिप् पू मन्नवे

हे मन! मानों सारी भक्ति हमारें यहां ही स्थिर प्रतिष्ठित हुई होगी, ऐसा विलक्षण भाग्य पाने के लिए, और विशाल यशवाले श्रीरामानुज स्वामीजी के चरणारविन्दों को अपने शिरोभूषण के रूप में नित्य धारण करने के लिए, सुंदर मिनभरित खेतों से परिवृत श्रीरंगक्षेत्र में विराजमान भगवान के अतिमनोहर श्रीवक्ष में नित्यनिवास करनेवाली, श्रेष्ठ कमल पुष्प में अवतीर्ण, प्रतिमासदृश सुंदरी श्री महालक्ष्मीजी की हम स्तुति करेंगे। इस प्रार्थना के साथ यह दिव्यप्रबन्ध समाप्त किया गया। इसके आदि तथा अंत में श्री महालक्ष्मीजी का नामस्मरण मंगलार्थ किया गया है। इसमें कविनामांकन और फलश्रुति नहीं हैं। इसका गान स्वयंपुरुषार्थ है; अतः इसके लिए दूसरा फल ढूंढने की आवश्यकता नहीं है। और अत्यंत विनयपूर्ण होने से अमुदनार ने इसमें अपना नाम नहीं बताया।

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अडियेन् केशव् रामानुज दास्

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रामानुस नूट्रन्ददि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या – पाशुर 91 से 100

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श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत् वरवरमुनये नम:

रामानुस नूट्रन्दादि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या

<< पाशुर 81 से 90 

पाशुर ९१: हालांकि संसारी जन भागीदारी नहीं थे श्रीरंगामृत स्वामीजी यह स्मरण कराते हैं कि कैसे श्रीरामानुज स्वामीजी ने उन्हें इस संसार से ऊपर उठाया और उनकी प्रशंसा किये।

मरुळ् सुरन्दु आगम वादियर् कूऱुम् अवप् पोरुळाम्
इरुळ् सुरन्दु एय्त्त उलगु इरुळ् नीन्गत् तन् ईण्डिय सीर्
अरुळ् सुरन्दु एल्ला उयिर्गट्कुम् नादन् अरन्गन् एन्नुम्
पोरुळ् सुरन्दान् एम् इरामानुसन् मिक्क पुण्णियने

विवेकशून्य शुष्कतर्कानुसारी शैवागमियों से प्रतिपादित शिवपारम्यरूप अपार्थ से मोहित अज्ञानसमावृत, अज्ञान मिटानेवाले, इस भूमंडल में अवतार लेकर, इस परमार्थ को प्रकाशित करते हुए कि, “भगवान श्रीरंगनाथ ही सकल जगत के स्वामी हैं”, परमदयालु श्री रामानुजस्वामीजी परमधार्मिक हैं।

पाशुर ९२:  जब यह अहसास हुआ कि श्रीरामानुज स्वामीजी ने उन्हें बिना कोई कारण से स्वीकार कर लिया हैं और उनके आंतरीक और बाह्य इंद्रीयों पर कृपा किये हैं, वें प्रसन्न होकर श्रीरामानुज स्वामीजी से पूछते हैं कि इसका क्या कारण हैं।

पुण्णियनोन्बु पुरिन्दुम् इलेन् अडि पोऱ्ऱि सेय्युम्
नुण् अरुम् केळ्वि नुवन्ऱुम् इलेन् सेम्मै नूल् पुलवर्क्कु
एण् अरुम् कीर्त्ति इरामानुस इन्ऱु नी पुगुन्दु एन्
कण्णुळ्ळुम् नेन्जुळ्ळुम् निन्ऱ इक्कारणम् कट्टुरैये

हे सकलशास्त्रवेत्ता कवियों के भी नापने की अशक्य दिव्य कीर्तिवाले श्रीरामानुज स्वामिन्! मैंने किसी पवित्र व्रतका अनुष्ठान नहीं किया; और आपके पादारविन्दों की स्तुति करने में अपेक्षित सूक्ष्म व श्रेष्ठ अर्थ सुने भी नहीं। तो भी आप मेरे नेत्र व हॄदय में प्रवेश कर जो विराजमान हैं, इसका कारण बता दीजिए। और क्या? आपकी निर्हेतुक कृपा ही इसका कारण हैं।

 पाशुर ९३:  हालांकि श्रीरामानुज स्वामीजी उन्हें कुछ नहीं कहते हैं परन्तु श्रीरंगामृत स्वामीजी को यह स्पष्ट हो जाता हैं कि जैसे श्रीरामानुज स्वामीजी ने बिना किसी के कहे कुदृष्टि तत्त्वों का नाश किये हैं वैसे ही श्रीरंगामृत स्वामीजी के कहे बिना उनके कर्म अनुसार किया और कहे कि श्रीरामानुज स्वामीजी ने कृपा कर यह किया हैं।

कट्टप् पोरुळै मऱैप्पोरुळ् एन्ऱु कयवर् सोल्लुम्
पेट्टैक् केडुक्कुम् पिरान् अल्लने एन् पेरु विनैयैक्
किट्टिक् किळन्गोडु तन् अरुळ् एन्नुम् ओळ् वाळ् उरुवि
वेट्टिक् कळैन्द इरामानुसन् एन्नुम् मेय्त् तवने

मेरे पास पधारकर अपनी कृपारूपी सुंदर खड्ग को मियान से निकाल कर, उससे मेरे घोर पापों को जड़ से उखाड़ देनेवाले महातपस्वी श्रीरामानुज स्वामीजी ने वेदों के अपार्थ करनेवाले कुदृष्टियों के दुर्वाद दूर किये।

पाशुर ९४:  श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं हालांकि श्रीरामानुज स्वामीजी बड़ी कृपा से शरणागति से श्रीवैकुण्ठ तक उन सभी को लाभ देंगे, जो उनके शरण हुए हैं, परन्तु श्रीरंगामृत स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य गुणों को छोड़ और किसी का भी अनुभव नहीं करना चाहते हैं।

तवम् तरुम् सेल्वुम् तगवुम् तरुम् सरियाप् पिऱविप्
पवम् तरुम् तीविनै पाऱ्ऱीत् तरुम् परन्दामम् एन्नुम्
तिवम् तरुम् तीदिल् इरामानुसन् तन्नैच् चार्न्दवर्गट्कु
उवन्दु अरुन्देन् अवन् सीर् अन्ऱि यान् ओन्ऱुम् उळ् मगिळ्न्दे

किसी प्रकार के दोष से विरहित श्रीरामानुज स्वामीजी अपने आश्रितों को शरणागति नामक तपस्या देते हैं; भक्तिसंपद देते हैं; अपनी कृपा भी देते हैं; मिटाने के अशक्य जन्म परम्परा के हेतु भूत उनके पाप मिटा देते हैं; और परमधाम नामक दिव्यस्थान (श्रीवैकुंठ) भी देते हैं। अतः मैं उनके कल्याणगुणों के सिवा दूसरी किसी वस्तु का सप्रेम अनुभव नहीं करूंगा।

पाशुर ९५: श्रीरामानुज स्वामीजी के ज्ञान, शक्ति, आदि बारें सोचते हुए श्रीरंगामृत स्वामीजी बड़ी करुणा से कहते हैं कि श्रीरामानुज स्वामीजी इस संसार से नहीं हैं बल्कि नित्यसूरी है जिनका इस संसार से कोई सम्बन्ध नहीं हैं, परन्तु इस संसार में अवतार लिया हैं।

उळ् निन्ऱु उयिर्गळुक्कु उऱ्ऱनवे सेय्दु अवर्क्कु उयवे
पण्णुम् परनुम् परिविलनाम्बडि पल् उयिर्क्कुम्
विण्णिन् तलै निन्ऱु वीडु अळिप्पान् एम् इरामानुसन्
मण्णिन् तलत्तु उदित्तु उय्मऱै नालुम् वळर्त्तनने

समस्त आत्माओं को मोक्षप्रदान करने के लिए श्रीवैकुंठ से भूतल पर अवतार लेकर श्री रामानुज स्वामीजी ने इस प्रकार सबके उज्जीवनहेतु चारों वेदों का पोषण किया, जिसे देख कर कहना पड़ता है कि समस्त आत्माओं के अंतर्यामी रह कर, सदा उनके उद्धार के ही प्रयत्न करनेवाले भगवान की कृपा भी (श्री स्वामीजी की कृपा की अपेक्षा) कम है।

पाशुर ९६: श्रीरामानुज स्वामीजी ने कृपा कर वेदान्त के अनुसार दो राह दिखाये हैं एक भक्ति और दूसरी प्रपत्ती। इन दोनों में क्या प्रपत्ती हीं सरल हैं? श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं उन्होंने श्रीरामानुज स्वामीजी के स्नेह में शरण ली हैं। 

वळरुम् पिणि कोण्ड वल्विनैयाल् मिक्क नल्विनैयिल्
किळरुम् तुणिवु किडैत्तऱियादु मुडैत्तलै ऊन्
तळरुम् अळवुम् तरित्तुम् विळुन्दुम् तनि तिरिवेऱ्कु
उळर् एम् इऱैवर् इरामानुसन् तन्नै उऱ्ऱवरे

अत्यधिक दुःख देनेवाले पापों के निमित्त, शरणागति नामक श्रेष्ठधर्म के आवश्यक दृढविश्वास से विरहित होकर, फलतया दुर्गंध युक्त शरीर छूटने तक नानाविध क्षुद्र सुखदुख भोगते हुए इसी में असहाय पडे रहनेवाले मेरे लिए श्रीरामानुज स्वामीजी के भक्त ही स्वामी होते हैं। श्रीरामानुज स्वामीजी से उपदिष्ट भक्ति या प्रपत्ति में मेरा कोई संबंध नहीं; मैं संसार में ही पडा रहा हूँ ; तथापि मैं उनके पादभक्तों का कृपापात्र हूँ और इसीसे मेरा उद्धार होगा।

पाशुर ९७: क्या कारण हैं कि न केवल श्रीरामानुज स्वामीजी परन्तु उनके शिष्य के भी हम इच्छुक हैं? श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं यह केवल श्रीरामानुज स्वामीजी के कृपा के कारण हुआ हैं।

 तन्नै उऱ्ऱु आट्चेय्युम् तन्मैयिनोर् मन्नु तामरैत्ताळ्
तन्नै उऱ्ऱु आट्चेय्य एन्नै उऱ्ऱान् इन्ऱु तन् तगवाल्
तन्नै उऱ्ऱार् अन्ऱित् तन्मै उऱ्ऱार् इल्लै एन्ऱु अरिन्दु
तन्नै उऱ्ऱारै इरामानुसन् गुणम् साऱ्ऱिडुमे

“मेरे भक्त तो मिलते हैं, परंतु उन भक्तों के गुणकीर्तन करने के स्वभाववाले मिलते नहीं”; यों विचार करते हुए श्रीरामानुज स्वामीजी ने आज अपनी विशेष कृपा से मुझे, अपना (श्री स्वामीजी का) आश्रय लेकर सेवा करने के स्वभाववाले (अर्थात् अपने भक्तों के) सुंदर उभय पादारविन्दों का सेवक बना दिया। जैसे भगवद्भक्ति की अपेक्षा भगवद्भक्तभक्ति (अथवा आचार्यभक्ति) श्रेष्ठ मानी जाती है, ठीक इसी प्रकार उस आचार्यभक्ति से भी बढ़कर आचार्यभक्तभक्ति श्रेष्ठ है। अब श्रीरामानुज स्वामीजी ने सोचा कि, “सभी लोग मेरे भक्त बनना चाहते हैं; कोई मेरे भक्तों का भक्त बनता नहीं। इस अमुदानार को यह भाग्य दूं ।” अतः उन्होंने परमकृपा से मुझे (अमुदानार को) अपने भक्त श्री कूरेशस्वामीजी का भक्त बना दिया ।

पाशुर ९८: श्रीरंगामृत स्वामीजी अपने दिव्य मन में यह कल्पना करते हैं कि भगवान उन्हें उनके कर्मानुसार स्वर्ग या नरक में भेजेंगे और श्रीरामानुज स्वामीजी से पूछते हैं। श्रीरामानुज स्वामीजी उन्हें यह आश्वासन देते हैं कि भगवान ऐसे नहीं करेंगे जो उनके शरण हुए हैं और उन्हें कहते हैं कि इस बात से परेशान मत होईए। 

इडुमे इनिय सुवर्क्कत्तिल् इन्नम् नरगिलिट्टुच्
चुडुमेअवऱ्ऱैत् तोडर् तरु तोल्लै सुज़्हल् पिऱप्पिल्
नडुमे इनि नम् इरामानुसन् नम्मै नम् वसत्ते
विडुमे सरणम् एन्ऱाल् मनमे नैयल् मेवुदऱ्के

हमारे यह अनुसंधान करने के बाद, कि “श्रीरामानुज स्वामीजी ही हमारे लिए गति हैं”, क्या वे हमें (अत्यल्प व नश्वर) सुखदायक स्वर्ग भेजेंगे ? अथवा नरक भेज कर दुःख भुगावेंगे ? अथवा उन स्वर्गनरकों के संबंधित अनादि जन्मचक्र में फ़सावेंगे ? अथवा अपने रास्ते पर छोड़कर उपेक्षा कर देंगे? कुछ नहीं। अतः हे मन। तुम अपने स्वरूपानुरूप पुरुषार्थ पाने के विषय में चिंता मत करो ।श्री रामानुज स्वामीजी की शरण में जाने मात्र से वे हमें स्वर्ग नरक व संसार रूप दुर्गति पाने से रोककर स्वरूपानुरूप सद्गति पहुंचा देंगे। अतः इस विषय में हमें चिंता करने की आवश्यकता नहीं रहती।

 पाशुर ९९: क्योंकि हम इस संसार में रहते हैं जहाँ बाह्य और कुदृष्टि जन की संख्या अधिक हैं, क्या यहाँ हमें भूलने कि संभावना अधिक नहीं हैं? श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं ,श्रीरामानुज स्वामीजी के अवतार लेने के पश्चात इन जनों ने अपना आजीविका खो दिया। 

तऱ्कच् चमणरुम् साक्कियप् पेय्गळुम् ताळ् सडैयोन्
सोल् कऱ्ऱ सोम्बरुम् सूनिय वादरुम् नान्मऱैयुम्
निऱ्कक् कुऱुम्बु सेय् नीसरुम् माण्डनर् नीळ् निलत्ते
पोऱ्कऱ्पगम् एम् इरामानुस मुनि पोन्द पिन्ने

समणास जो बड़ी चालाकी से अपने तत्त्वों को बहस द्वारा आचारण किया, बौद्ध अपने तत्त्वों को चकमा देने के समान पकड़ते थे, शैव में तामस गुण है जिन्होंने शैवागमन सीखे, माध्यामिक जन सून्य सिद्धान्त का पालन करते थे, कुदृष्टि जन जो ऊपर कहे अनुसार नहीं रहते थे, वेदों का पालन करते थे परंतु उसका गलत अर्थ बताते थे ,यह सब , कल्पवृक्ष के समान उदार और हमे यह जन दिखाये ऐसे श्रीरामानुज स्वामीजी जब इस संसार मे अवतार लिए, नष्ट हो गए। (इस विशाल पृथ्वीतल पर श्रेष्ठ कल्पवृक्ष के सदृश परमोदार श्री रामानुज स्वामीजी का अवतार होने के बाद, शुष्कतर्क करने वाले क्षपणक, मूर्ख शाक्य, शैवागम के अभ्यासी राजस शैव, शून्यवादी और वेदों का अपार्थ करनेवाले, ये सभी नष्ट हो गये।)

 पाशुर १००: यह देखकर की उनके दिव्य मन श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य चरण कमलों मे निरत हैं, श्रीरंगामृत स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी से कहते हैं कि उन्हें कुछ और दिखाकर भूलना नहीं। 

पोन्ददु एन् नेन्जु एन्नुम् पोन्वण्डु उनदु अडिप् पोदिल् ओण् सीर्
आम् तेळि तेन् उण्डु अमर्न्दिड वेण्डिल् निन् पाल् अदुवे
ईन्दिड वेण्डुम् इरामानुस इदु अन्ऱि ओन्ऱुम्
मान्द किल्लादु इनि मऱ्ऱु ओन्ऱु काट्टि मयक्किडले

हे रामानुज स्वामिन! मेरे मनोरूपी सुन्दर भ्रमर ने, आपके पादारविन्दों में मनोहर दिव्यगुणरूपी मधु पाता हुआ वहीं नित्यवास करने के उद्देश्य से उन्हें प्राप्त किया; अतः आप भी उसे उन गुणों को ही प्रदान कीजीएगा; वह दूसरे किसी पदार्थ को नहीं पाएगा; इस कारण से आप दूसरी किसी (सांसारिक)  वस्तु बताकर उसे भ्रम में मत डालें।

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अडियेन् केशव् रामानुज दास्

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रामानुस नूट्रन्ददि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या – पाशुर 81 से 90

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श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत् वरवरमुनये नम:

रामानुस नूट्रन्दादि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या

<< पाशुर 71 से 80 

पाशुर ८१: वों स्वयं श्रीरामानुज स्वामीजी को समर्पण करते हैं कि वों कैसे श्रीरामानुज स्वामीजी द्वारा संशोधित किए गये हैं और कहते हैं उनके कृपा के समान ओर कुछ नहीं हैं।

सोर्वु इन्ऱि उन्दन् तुणै अडिक्कीळ्त् तोण्डुपट्टवर् पाल्
सार्वु इन्ऱि निन्ऱ एनक्कु अरन्गन् सेय्य ताळ् इणैगळ्
पेर्वु इन्ऱि इन्ऱु पेऱुत्तुम् इरामानुस इनि उन्
सीर् ओन्ऱिय करुणैक्कु इल्लै माऱु तेरिवुऱिले

मैं उन जनों से जूड़ा हुआ नहीं था जो आपके चरण कमलों के दास हैं और जो अपने मन को और कहीं नहीं लगाते थे। हे श्रीरामानुज ! जिन्होने आज मुझे श्रीरंगनाथ भगवान के लाल दिव्य चरण कमल दिये जो एक दूसरे को पूरक हैं और जो उनके दिव्य काले रूप के रंग से पूर्ण भिन्न हैं। इस बात का विवेचन करने पर यही सिद्ध होता है कि आपकी कृपा सर्वथा उपमानरहित है ।

पाशुर ८२: श्रीरंगामृत स्वामीजी बड़े प्रसन्नता से कहते हैं कि श्रीरामानुज स्वामीजी, जिन्होंने उन्हें ,श्रीरंगनाथ भगवान से जुड़ जानेकी निर्देश दिया, वे  धर्मनिष्ठ मानव हैं।

तेरिवु उऱ्ऱ ज्ञानम् सेऱियप् पेऱादु वेम् ती विनैयाल्
उरु अऱ्ऱ ज्ञानत्तु उळल्गिन्ऱ एन्नै ओरु पोळुदिल्
पोरु अऱ्ऱ केळ्वियनाक्कि निन्ऱान् एन्न पुण्णीयनो
तेरिवु उऱ्ऱ कीर्त्ति इरामानुसन् एन्नुम् सीर् मुगिले

सुप्रसन्न विवेक से विरहित होकर अतिक्रूरपापों के फलतया कृत्याकृत्यविवेक खोकर दुःख पानेवाले मुझको एक क्षण भर में अन्यादृश बहुश्रुत (माने बहुत उपदेश सुनकर ज्ञानी बननेवाला) बनानेवाले, सुप्रसिद्ध कीर्तियुत और कालमेघसदृश परमोदार श्री रामानुज स्वामीजी अनुपम परम धार्मिक हैं। सर्वथा पापी व अज्ञानी मुझको एक क्षण में विलक्षण ज्ञानी बनानेवाले श्री स्वामीजी का यश,औदार्य और धार्मिकत्व दूसरे व्यक्ति में नहीं देखे जा सकते।

 पाशुर ८३: श्रीरामानुज स्वामीजी उन्हें पूछते हैं कि “क्या शरणागति करना सामान्य नहीं हैं?” श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कि वें उन जनों में नहीं हैं जो भगवान के शरण हुए हैं और श्रीवैकुंठ प्राप्त करतें  हैं । परन्तु वें आपके उदारता से आपके दिव्य चरण कमलों में शरण होकर मोक्ष प्राप्त करता हैं।

सीर् कोण्डु पेर् अऱम् सेय्दु नल् वीडु सेऱिदु एन्नुम्
पार् कोण्ड मेन्मैयर् कूट्टन् अल्लेन् उन् पदयुगमाम्
एर् कोण्ड वीट्टै एळिदिनिल् एय्दुवन् उन्नुडैय
कार् कोण्ड वण्मै इरामानुस इदु कण्डु कोळ्ळे

हे श्रीरामानुज स्वामिन्! शमदम इत्यादि आत्मगुणोपेत होकर, शरणागतिरुप श्रेष्ठ धर्म का अनुष्ठान कर, फलतया मोक्षरूप परमपुरुषार्थ पानेके दृढ़ निश्चयवाले, प्रसिद्ध प्रभाववाले महात्माओं की गोष्ठी में मैं नहीं मिलूंगा; किंतु बडी सरलता से आपके उभयपादारविंदरूप परमविलक्षण मोक्ष पाऊंगा। मेरा यह अध्यवसाय भी आपके सीमातीत औदार्य का फल है; यह तो आप ही स्वयं जानते हैं।

 पाशुर ८४: श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं उन्हें भविष्य में और भी लाभ प्राप्त करना हैं परन्तु अभी तक जो लाभ प्राप्त हुये हैं उसका कोई अन्त हीं नहीं हैं।

कण्डु कोण्डेन् एम् इरामानुसन् तन्नै काण्डलुमे
तोण्डु कोण्डेन् अवन् तोण्डर् पोन् ताळिल् एन् तोल्लै वेम् नोय्
विण्डु कोण्डेन् अवन् सीर् वेळ्ळ वारियै वाय् मडुत्तु इन्ऱु
उण्डु कोण्डेन् इन्नम् उऱ्ऱन ओदिल् उलप्पु इल्लैये

मैंने आज श्री रामानुज स्वामीजी के दर्शन किये; (अर्थात् उनके स्वरूप स्वभावादियों को ठीक जान लिया;) दर्शन के समय ही उनके भक्तों के मनोहर श्रीपादों की भक्ति पायी; और (उससे) अपने समस्त पाप खो लिए; उन आचार्य-सार्वभौम के कल्याण गुणामृतसागर का आस्वादन भी किया। इस प्रकार मेरे उपलब्ध-कल्याण परंपरा सत्य ही वर्णनातीत है।

 पाशुर ८५: “आपने कहा कि आपने श्रीरामानुज स्वामीजी को जैसे हैं वैसे देखा हैं। आपने यह भी कहा कि आप उनके दासों के श्रीचरण  कमलों में दास हैं। आप इन दोनों में किसमे अधिक शामिल हैं?” वें कहते हैं उनके आत्मा का श्रीरामानुज स्वामीजी के चरण कमलों को छोड़कर और कोई शरण नहीं हैं। 

ओदिय वेदत्तिन् उट्पोरुळाय् अदन् उच्चि मिक्क
सोदियै नादन् एन अऱियादु उळल्गिन्ऱ तोण्डर्
पेदैमै तीर्त्त इरामानुसनैत् तोळुम् पेरियोर्
पादम् अल्लाल् एन्दन् आरुयिर्क्कु यादु ओन्ऱुम् पऱ्ऱिल्लैये

पठ्यमान वेदों के परम तत्पर्यभूत और वेदों के शिरोभूत उपनिषदों से प्रतिपाद्य परंज्योतिस्वरूप (अथवा उपनिषदों में स्पष्टतया प्रतिपाद्य) श्रीमन्नारायण को सर्वशेषि जानने में अशक्त, और अत एव देवतान्तरभजन करनेवाले पामरों का अज्ञान मिटानेवाले श्री रामानुज स्वामीजी के भक्तों के सिवाय मेरी दूसरी कोई गति नहीं है। परंतु यह अर्थ समझने में अशक्त मुर्खलोग देवतान्तरों की सेवा करने लगे। श्री रामानुज स्वामीजी ने इनकी यह मूर्खता मिटा दी।

 पाशुर ८६: यह स्मरण करना कि वें उन लोगों से प्रीतिमय थे जो सांसारिक सुखों की ओर शामिल थे, वें कहते हैं कि अब वें ऐसे नहीं करेंगे और जो श्रीरामानुज स्वामीजी का ध्यान करेंगे वें उन पर राज्य करने योग्य हैं।

पऱ्ऱा मनिसरैप् पऱ्ऱी अप्पऱ्ऱु विडादवरे
उऱ्ऱार् एन उळन्ऱु ओडि नैयेण् इनि ओळ्ळिय नूल्
कऱ्ऱार् परवुम् इरामानसनैक् करुदुम् उळ्ळम्
पेऱ्ऱार् यवर् अवर् एम्मै निन्ऱु आळुम् पेरियवरे

क्षुद्र मानवों का आश्रयण करके, एक क्षण भर के लिए भी उनका संग नहीं छोड़ते हुए, उनको ही परमबांधव मान कर, उनके पीछे पीछे ही दौडते हुए, उनकी सेवा कर मैंने अब तक जो दुःख पाया ऐसा दुःख अबसे नहीं पाऊंगा । श्रेष्ठ शास्त्रों के वेत्ता महात्माओं से संस्तुत श्रीरामानुज स्वामीजी का ही अपने मन से ध्यान करनेवाले महात्मा लोग ही अब सदा के लिए हमारे शेषी हैं।

 पाशुर ८७: जब स्मरण किया गया कि यह कलियुग हैं और वह उन्हें स्थिर नहीं रहने देगा वें कहते हैं कि कली उन्हीं  पर प्रहार करेगा जो श्रीरामानुज स्वामीजी द्वारा प्रदान किए गये ज्ञान में निरत नहीं रहते हैं।

पेरियवर् पेसिलुम् पेदैयर् पेसिलुम् तन् गुणन्गट्कु
उरिय सोल् एन्ऱुम् उडैयवन् एन्ऱु एन्ऱु उणर्विल् मिक्कोर्
तेरियुम् वण् कीर्त्ति इरामानुसन् मऱै तेर्न्दु उलगिल्
पुरियुम् नल् ज्ञानम् पोरुन्दादवरैप् पोरुम् कलिये

“ज्ञानी लोग स्तुति करें, अथवा अल्पज्ञ स्तुति करें”, गुरुजी के शुभगुण उनकी वाणी के अनुगुण ही होते हैं, यों कहते हुए महात्मा लोग जिनका यशोगान करते हैं, ऐसे श्रीरामानुज स्वामीजी से वेदों का विवेचनपूर्वक इस धरातल पर उपदिष्ट श्रेष्ठ ज्ञान नहीं पानेवाले भाग्यहीन मानव कलिपुरुष से पीड़ित होते हैं। श्री रामानुज स्वामीजी का यशोगान करने के विषय में अज्ञप्राज्ञविभाग होता ही नहीं। दोनों की स्तुति एक समान ही प्रतीत होगी; क्योंकि उनकी महिमा सागर की भांति अथाह रहती है और कोई भी उसको पार नहीं कर सकता। फिर अज्ञकृत स्तुति की अपेक्षा विशेषज्ञ कृत स्तुति में कौनसी विशेषता रह सकेगी? कुछ नहीं। ऐसे महावैभववाले उन्होंने समस्त वेदों का ठीक विवेचन करके सबके योग्य श्रेष्ठ उपदेश दिया। परंतु कोई कोई, कलिपुरुष के भक्त उस उपदेश से लाभ नहीं लेना चाहते। अहो उनकी भाग्यहीनता!

पाशुर ८८: श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं, वें श्रीरामानुज स्वामीजी की प्रशंसा करेंगे, जो सिंह के समान हैं, जो इस संसार में कुदृष्टिवालों (जो वेदों को गलत तरीके से व्याख्या करते हैं) जो बाघ के समान हैं, उनका नाश करने हेतु अवतार लिए हैं ।

कलि मिक्क सेन्नेल् कळनिक् कुऱैयल् कलैप् पेरुमान्
ओलि मिक्क पाडलै उण्डु तन् उळ्ळम् तडित्तु अदनाल्
वलि मिक्क सीयम् इरामानुसन् मऱै वादियराम्
पुलि मिक्कदु एन्ऱु इप् पुवनत्तिल् वन्दमै पोऱ्ऱुवने

अत्यधिक धान उपजनेवाले “कुरैयल” नामक स्थल में अवतीर्ण अप्रतिमविद्वान कलिवैरीसूरी( श्री परकालसूरी) से अनुगृहीत दिव्यश्रीसूक्तियों का अनुभव करके उससे पोषितचित्त एवं सम्प्राप्तज्ञानवाले श्रीरामानुजस्वामीजी नामक सिंहराज, यों कहते हुए कि,” इस धरातल पर वेदों का अपार्थ करनेवाले दुर्वादी रूप बाघ बहुत बढ़ गये”, (उन्हें दंड देने के लिए) यहां अवतीर्ण हुए। आपके इस यशका कीर्तन करूँगा। लोक में बहुत बढे हुए दुर्मतों का विनाश करने के लिए श्रीरामानुज नामक सिंह का अवतार हुआ। उन्होंने, “तिरुक्कुरैयलूर” नाम से प्रसिद्ध दिव्यक्षेत्र में अवतीर्ण, अप्रतिम विद्वत्सार्वभौम, श्री परकालसूरी से अनुगृहीत छे दिव्यप्रबंधों का ठीक अध्ययन कर उससे ज्ञान-वैशद्य प्राप्त किया।

 पाशुर ८९: पिछले पाशूर में श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं, वें श्रीरामानुज स्वामीजी कि प्रशंसा करेंगे। वें श्रीरामानुज स्वामीजी को उनके प्रशंसा के संभन्ध में अपने भय के विषय को बताते हैं।

पोऱ्ऱु अरुम् सीलत्तु इरामानुस निन् पुगळ् तेरिन्दु
साऱ्ऱुवनेल् अदु ताळ्वु अदु तीरिल् उन् सीर् तन्नक्कु ओर्
एऱ्ऱम् एन्ऱे कोण्डु इरुक्किलुम् एन् मनम् एत्ति अन्ऱि
आऱ्ऱगिल्लादु इदऱ्केन् निनैवाय् एन्ऱिट्टन्जुवने

यथार्थ स्तुति करने को अशक्य शीलगुण-परिपूर्ण, हे श्रीरामानुज स्वामिन्! मैं तो यह अर्थ ठीक समझ सकता हूं कि यदि मैं आपके दिव्यगुण जान कर उनकी स्तुति करूं तो (मुझ नीच से कीर्तित होने के कारण) आपको दोष लगेगा, और यदि मैं स्तुति न करूं, तो ही आपके गुणों की महिमा बढ़ेगी। तथापि मेरा मन (आपके गुणों की) स्तुति किये विना शांत न हो सकता है। यह सोचता हुए  कि इस विषय में आपका अभिप्राय कौन-सा होगा, मैं बहुत भयभीत हो रहा हूं।

 पाशुर ९०: श्रीरंगामृत स्वामीजी को भय से मुक्त करने हेतु श्रीरामनुज स्वामीजी उन्हें बहुत करुणा भरी नेत्रों से देखते हैं। भय मुक्त होने के पश्चात उन्हें खेद होता हैं कि जिनके पास अच्छा ज्ञान हैं वें स्वयं को श्रीरामानुज स्वामीजी कि मन, वाखी और शरीर से प्रशंसा कर ऊपर नहीं उठाते हैं और इस संसार के जन्म मरण के चक्कर में फंसे हुए रहते हैं।

निनैयार् पिऱवियै नीक्कुम् पिरानै इन्नीळ् निलत्ते
एनै आळवन्द इरामानुसनै इरुन्गविगळ्
पुनैयार् पुनैयुम् पेरियवर् ताळ्गळिल् पून्दोडैयल्
वनैयार् पिऱप्पिल् वरुन्दुवर् मान्दर् मरुळ् सुरन्दे

जो मानव, संसार दुःख मिटानेवाले परमोपकारक, और मेरा उद्धार करने के लिए ही इस भूतल पर अवतीर्ण, श्रीरामानुज स्वामीजी का ध्यान नहीं करते, उनकी स्तुति नहीं करते और ऐसी स्तुति करनेवाले सज्जनों की पुष्पमालाओं से अर्चना नहीं करते, ऐसे भाग्यहीन जन अत्यधिक अज्ञान से समावृत होकर, संसार में ही पडे रहकर दुःख भोगेंगे।

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अडियेन् केशव् रामानुज दास्

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रामानुस नूट्रन्ददि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या – पाशुर 71 से 80

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श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत् वरवरमुनये नम:

रामानुस नूट्रन्दादि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या

<< पाशुर 61 से 70 

पाशुर ७१: श्रीरामानुज स्वामीजी ने भी उनकी प्रार्थना स्वीकार की और उन्हें उत्कृष्ट झलक देखा और इस तरह श्रीरंगामृत स्वामीजी के ज्ञान को बढ़ाया ताकि वें उनके संग बड़ी दृड़ता से निरत रहे। श्रीरंगामृत स्वामीजी अपने भविष्य को उज्ज्वल माना और संतोष का एहसास  किया। 

सार्न्ददु एन् सिन्दै उन् ताळिणैक्कीळ् अन्बु तान् मिगवुम्
कूर्न्ददु अत्तामरैत् ताळ्गळुक्कु उन् तन् गुणन्गलुक्के
तीर्न्ददु एन् सेय्गै मुन् सेय्विनै नी सेय्विनै अदनाल्
पेर्न्ददु वण्मै इरामानुस एम् पेरुम् तगैये

हे औदार्य गुणवाले, हमारे स्वामिन्, महात्मन् श्री रामानुज स्वामीजी! मेरा मन आपके उभय पादारविन्दों में लग्न हुआ; उन्हीं पादारविन्दों के विषय में भक्ति भी बढ़ गयी; मेरा काम भी आपके कल्याण गुण समूह का ध्यान बन गया, और मेरे जन्मांतर कृत सभी पाप आपके कटाक्षवीक्षण से नष्ट हो गये ।

पाशुर ७२: श्रीरंगामृत स्वामीजी प्रसन्न होते हैं यह सोचकर कि श्रीरामानुज स्वामीजी ने एक और महान लाभ उनपर बरसाया हैं।

कैत्तनन् तीय समयक् कलगरै कासिनिक्के
उय्त्तनन् तूय मऱै नेऱि तन्नै एन्ऱु उन्नि उळ्ळम्
नेय्त्त अन्बोडु इरुन्दु एत्तुम् निऱै पुगळोरुडने
वैत्तनन् एन्नै इरामानुसन् मिक्क वण्मै सेय्दे

श्रीरामानुज स्वामीजी ने मुझको भी उन कीर्तिमान महात्माओं की गोष्ठी में मिला दिया जो यह अनुसंधान करते हुए, परमप्रीति के परवश होकर उनकी स्तुति कर रहे हैं कि, “श्रीस्वामीजी ने अपने विशेष औदार्य गुण से कलह करने में निरत दुर्मतवादियों का नाश कराया; और इस धरतालपर परमपवित्र वेदमार्ग को प्रतिष्ठापित किया ।”

 पाशुर ७३: जब श्रीरंगामृत स्वामीजी से यह कहा गया कि वें श्रीरामानुज स्वामीजी द्वारा उन्हें जो ज्ञान और प्रेम प्रदान किया गया हैं उससे वें पोषण कर सकते हैं तब श्रीरंगामृत स्वामीजी यह कहते हैं कि वें बिना श्रीरामानुज स्वामीजी का चिंतन कराते हुए स्वयं से किसी भी उपाय से नहीं रह सकते हैं। 

वण्मैयिनालुम् तन् मादगवालुम् मदि पुरैयुम्
तण्मैयिनालुम् इत् तारणियोर्गट्कुत् तान् सरणाय्
उण्मै नल् ज्ञानम् उरैत्त इरामानुसनै उन्नुम्
तिण्मै अल्लाल् एनक्कु इल्लै मऱ्ऱु ओर् निलै तेर्न्दिडिले

अपने औदार्यगुण, परम कृपा और चंद्रमा के समान मन की शीतलता से, स्वयं इस धरतालनिवासी सभी लोगों के रक्षक बनकर, उन्हें सत्य व विलक्षण ज्ञान का उपदेश देनेवाले श्री रामानुज स्वामीजी का ही अनवरतध्यान करने के सिवाय मेरा दूसरा कोई अध्यवसाय नहीं है। सुगाढ विमर्श करने के बाद यह बात कर रहा हूँ ।

 पाशुर ७४:  श्रीरंगामृत स्वामीजी यह सोचकर आनन्द होते हैं कि भगवान के तुलना में कैसे श्रीरामानुज स्वामीजी अन्य तत्त्वों पर विजय प्राप्त करते हैं।

 तेरार् मऱैयिन् तिऱम् एन्ऱु मायवन् तीयवरैक्
कूर् आळि कोण्डु कुऱैप्पदु कोण्डल् अनैय वण्मै
एर् आर् गुणत्तु एम् इरामानुसन् अव्वेळिल् मऱैयिल्
सेरादवरैच् चिदैप्पदु अप्पोदु ओरु सिन्दै सेय्दे

भगवान ठीक वेदमार्ग के समझने में अशक्त पापियों को अपने तेज चक्रायुध से दंड देते हैं; मेघके सदृश परमौदार्यवान एवं अनेक शुभगुणों से परिपूर्ण हमारे श्री रामानुज स्वामीजी तो उस श्रेष्ठ वेदमार्ग में संबंध न पानेवालों (बाह्यों व कुदृष्टियों) को, तभी चिंतित अपूर्व शास्त्रीय युक्तिबल से अपने वश कर लेते हैं। भगवान लोगों को वेदोपदिष्ट सन्मार्ग में लाने के लिए सर्वदा नानाप्रकार के प्रयत्न करते ही रहते हैं; परंतु कभी कभी किसी प्रबल पापी चेतन के विषय में उनके ये सभी प्रयत्न व्यर्थ हो जाते हैं; अर्थात् कंस, रावण जैसे वे पापीलोग अपना दुर्मार्ग छोड़ सन्मार्ग में नहीं आते। तब भगवान रुष्ट होकर चक्रायुध से उनके सिर काट डालते हैं। परंतु श्री रामानुज स्वामीजी कभी किसीको ऐसे दंड नहीं देते; किंतु तत्कालचिंतित किसी अपूर्वयुक्तिसे उन्हें सन्मार्ग में लाते हैं।

.पाशुर ७५: यह कल्पना करना कि श्रीरामानुज स्वामीजी कहते हैं कि श्रीरंगामृत स्वामीजी अपने गुणों में तभी निरत रहेंगे जब वें भगवान कि महानता को देखेंगे। श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं अगर भगवान स्वयं प्रगट होकर अपनी सुन्दरता को दिखाते हैं और कहते हैं मैं तुम्हें कभी नहीं छोड़ूँगा, केवल श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य गुण हीं उन्हें बाँध सकते हैं।

सेय्त्तलैच् चन्गम् सेळु मुत्तम् ईनुम् तिरु अरन्गर्
कैत्तलत्तु आळियुम् सन्गमुम् एन्दि नम् कण् मुगप्पे
मोय्त्तु अलैत्तु उन्नै विडेन् एन्ऱु इरुक्किलुम् निन् पुगळे
मोय्त्तु अलैक्कुम् वन्दु इरामानुस एन्नै मुऱ्ऱुम् निन्ऱे

श्लाध्य मोतियों को जन्म देनेवाले शंखों से युक्त खेतों से परिवृत श्रीरंगक्षेत्र में विराजमान श्रीरंगनाथ भगवान अपनी हथेलियों में शंखचक्र लेकर, हमारे सामने पधारकर,दबाते और लुभाते हुए भले ही यों कहें कि मैं तुझे नही छोडूंगा; तो भी हे श्रीरामानुज स्वामिन्! (मैं उनकी ओर न देखूंगा); आपके शुभगुण ही मुझे घेर कर अपनी ओर खींच लेते हैं। मधुरकवि स्वामीजी जैसे आचार्य निष्ठावालों का यह स्वभाव है कि वे भगवान की भी उपेक्षा करते हुए अपने गुरु का ही ध्यान,सेवन इत्यादि करते हैं। यही निष्ठा इस गाथा में भी उपवर्णित है।

 पाशुर ७६: श्रीरंगामृत स्वामीजी से यह सुनकर आनंदित होकर श्रीरामानुज स्वामीजी बड़ी कृपा से सोचते हैं कि वें उनके लिए क्या कर सकते हैं। श्रीरंगामृत स्वामीजी अपनी इच्छा को बड़ी दृढ़ता से प्रगट करते हैं।

निन्ऱ वण् कीर्त्तियुम् नीळ् पुनलुम् निऱै वेन्गडप् पोऱ्
कुन्ऱमुम् वैगुन्द नाडुम् कुलविय पाऱ्कडलुम्
उन् तनक्कु एत्तनै इन्बम् तरुम् उन् इणै मलर्त्ताळ्
एन् तनक्कुम् अदु इरामानुस इवै ईन्दु अरुळे

हे श्रीरामानुज स्वामिन्! शाश्वत विपुल यशवाला व नाना तीर्थभरित श्रीवेंकटाद्रि नामक दिव्य पर्वत, श्रीवैकुंठ दिव्यधाम, और श्लाध्य क्षीरसागर, ये सभी आपको जैसा आनंद देते हैं; आपके उभय पादारविन्द मुझे ठीक वैसा ही आनंद दे रहे हैं। अतः आप कृपया मुझे इन्हींको प्रदान करें।

 पाशुर ७७: श्रीरामानुज स्वामीजी अपने चरण कमल को श्रीरंगामृत स्वामीजी को प्रदान करने के पश्चात वें संतोष प्रगट करते हैं कि उन्हें जो इच्छा हैं वह प्राप्त हो गई हैं आप श्रीमान और मुझ पर क्या कृपा करेंगे।

ईन्दनन् ईयाद इन्नरुळ् एण्णिल् मऱैक् कुऱुम्बैप्
पाय्न्दनन् अम् मऱैप् पल् पोरुळाल् इप्पडि अनैत्तुम्
एय्न्दनन् कीर्त्तियिनाल् एन् विनैगळै वेर् पऱियक्
काय्न्दनन् वण्मै इरामानुसर्क्कु एन् करुत्तु इनिये

मुझ पर ऐसा विलक्षण कृपा करनेवाले, जो कि दूसरे किसी पर नहीं की गयी हो, वेदों के सच्चे अर्थों का प्रकाशन करते हुए असंख्य वेदविरुद्ध मतों का निरास करनेवाले, भूमंडलव्यापी दिव्यकीर्तिवाले, मेरे पापों को सजड मिटा देनेवाले और औदार्य के अपरावतार श्री रामानुज स्वामीजी, न जाने और भी क्या क्या कल्याण करने वाले हैं। श्री रामानुजस्वामीजी का औदार्य इतना विलक्षण है कि वे नाना प्रकार के लोककल्याण करने पर भी तृप्त न होते; किंतु और भी कुछ न कुछ उपकार करने की चिंता में ही मग्न रहते हैं।  

 पाशुर ७८: श्रीरामानुज स्वामीजी द्वारा श्रीरंगामृत स्वामीजी को सही मार्ग पर लाने के लिए, लिये गये कष्टों के विषय में बोलते हैं और आगे कहते हैं कि श्रीरामानुज स्वामीजी ने उन्हें सही किया हैं और उनका हृदय कोई गलत कार्य के बारें में नही विचारेगा।

करुत्तिल् पुगुन्दु उळ्ळिल् कळ्ळम् कळऱ्ऱि करुदरिय
वरुत्तत्तिनाल् मिग वन्जित्तु नी इन्द मण्णगत्ते
तिरुत्तित् तिरुमगळ् केळ्वनुक्कु आक्कियपिन् एन् नेन्जिल्
पोरुत्तप्पडादु एम् इरामानुस! मऱ्ऱोर् पोय्प्पोरुले

हे श्रीरामानुज स्वामीजी! आपने वाचामगोचर परिश्रम उठाकर, छलसे मेरे हृदय में घुसकर, तत्रत्य आत्मापहार-नामक दोष मिटाकर, उसे सुधारकर लक्ष्मीपति का दास बना दिया। अतः इसके (आपके उपकार के) सिवाय दूसरी कोई चिंता मेरे मनमें प्रवेश नहीं कर सकेगी। मैं तो किसी प्रकार से भगवान का दास बनने अथवा श्रीरामानुज स्वामीजी की चिंता करने को तैयार नहीं था; परंतु श्री स्वामीजी ने बहुत प्रयास से और विविध उपायों से, और अंततः छलसे मेरे हृदय  में घुसकर उसे पापशून्य व परिशुद्ध बनाया और मुझको भगवान का दास बना दिया। इसलिए मैं आपके इस महोपकार के सिवाय दूसरे कौनसे विषयकी चिंता कर सकूं ? कुछ नहीं।

 पाशुर ७९:  सांसारियों के लिए श्रीरंगामृत स्वमीजी को बहुत दुख होता हैं, हालाकि संसार से मुक्त होने कि इच्छा हैं परन्तु बहुत दीन परिस्थिती में रहते हैं और ज्ञान प्राप्त करने कि क्षमता खो बैठे हैं। 

पोय्यैच् चुरक्कुम् पोरुळैत् तुरन्दु इन्दप् पूदलत्ते
मेय्यैप् पुरक्कुम् इरामानुसन् निऱ्क वेऱु नम्मै
उय्यक् कोळ्ळ वल्ल देय्वम् इन्गु यादु एन्ऱु उलर्न्दु अवमे
ऐय्यप् पडा निऱ्पर् वैय्यत्तुळ्ळोर् नल्ल अऱिवु इळन्दे

इस भूतल पर असत्य अर्थों का ही प्रचार करनेवाले दुर्मतों का खंडन कर सत्य अर्थों की रक्षा करनेवाले भगवान श्रीरामानुज स्वामीजी के विराजमान रहते हुए ही, इनकी परवाह नहीं करते हुए पृथ्वी तल निवासी (भाग्यहीन) मानव यह चिंता करते हैं कि, ” हमारा उद्धार करने में समर्थ देव कौन हैं।” और दुःखी होकर, विवेक शून्य बनकर हाय ! व्यर्थ ही शंका कर रहे हैं।

 पाशुर ८०: जब श्रीरामानुज स्वामीजी ने अन्यों के विषय में भूलने को और उनकी क्या धारणा हैं कहने को कहा तब श्रीरंगामृत स्वामीजी ने कहा कि वें जनों की  निरंतर सेवा करते रहेंगे जो सभी जनों के विषय में प्रेम से हैं और श्रीरामानुज स्वामीजी के विषय में अंतग्रस्त हैं।

नल्लार् परवुम् इरामानुसन् तिरुनामम् नम्ब
वल्लार् तिऱत्तै मऱवादवर्गळ् यवर् अवर्क्के
एल्ला इडत्तिलुम् एन्ऱुम् एप्पोदिलुम् एत्तोळुम्बुम्
सोल्लाल् मनत्ताल् करुमत्तिनाल् सेय्वन् सोर्वु इन्ऱिये

सत्पुरुषों से सेवित श्रीरामानुजस्वामीजी के शुभ नामों का ही संकीर्तन करनेवालों के प्रभाव का, जो भूले बिना, सदा ध्यान करते हैं, ऐसे श्रीरामानुजभक्त – भक्तों का ही, मैं आलस्य छोड़कर सर्वदेश, सर्वावस्था और सर्वकालों में भी, वाचा मनसा और कर्मणा सकलविध कैंकर्य करूं।

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अडियेन् केशव् रामानुज दास्

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रामानुस नूट्रन्ददि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या – पाशुर 61 से 70

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श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत्  वरवरमुनये नम:

रामानुस नूट्रन्दादि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या

<< पाशुर 51 से 60 

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पाशुर ६१: जब श्रीरामानुज स्वामीजी के महानता के विषय में पूछताछ किया गया तो श्रीरंगामृत स्वामीजी ने बड़ी दया से उन्हें समझाया। 

कोळुन्दु विट्टु ओडिप् पडरुम् वेम् कोळ् विनैयाल् निरयत्तु
अळुन्दियिट्टेनै वन्दु आट्कोण्ड पिन्नुम् अरु मुनिवर्
तोळुम् तवत्तोन् एम् इरामानुसन् तोल् पुगळ् सुडर् मिक्कु
एळुन्ददु अत्ताल् नल् अदिसयम् कण्डदु इरुनिलमे

ऐसे संत आचार्य हैं, जो निरन्तर भगवान का स्मरण करते हैं और भगवान के लिए भी उनको पाना मुश्किल हैं। हमारे स्वामीजी श्रीरामानुजाचार्य में यह महानता हैं की ऐसे आचार्य उनके दिव्य चरणकमलों में नतमस्तक होते हैं और उन्होंने इस तपस्या को भगवान के शरण किया। मैं मेरे अनगिनत पापों के दु:ख से इस नरक रूपी संसार में डूबा हूँ। श्रीरामानुज स्वामीजी मुझे स्वीकार करके भी उनके दिव्य गुण चमक रही थी, शीघ्रता से सब स्थानों में फैल रही थी और कई अन्य जनों को भी डूबने से उठा रहे थे। यह देख कर यह विशाल भूमंडल आश्चर्यमग्न हुआ।

पाशुर ६२: वें बड़ी दया से अपनी संतुष्टी को प्रगट करते हैं कि उनके पापों से संपर्क को हटाया गया। 

इरुन्देन् इरुविनैप् पासम् कळऱ्ऱि इन्ऱु यान् इऱैयुम्
वरुन्देन् इनि एम् इरामानुसन् मन्नु मा मलर्त्ताळ्
पोरुन्दा निलै उडैप् पुन्मैयिनोर्क्कु ओन्ऱुम् नन्मै सेय्याप्
पेरुम् देवरैप् परवुम् पेरियोर् तम् कळल् पिडित्ते

हमारे नाथ श्रीरामानुज स्वामीजी के श्रेष्ठ पादारविन्दों का आश्रयण नहीं करनेवाले नीचों के प्रति कभी किसी प्रकार का उपकार नहीं करनेवाले श्रीरंगनाथ भगवान की स्तुति करनेवाले महात्मा श्रीकूरेश स्वामीजी के पादारविन्दों की सेवा कर पाने के बाद,अब मैं पुण्यपापरूप कर्मबन्धन से मुक्त हुआ; अब से मैं सांसारिक क्लेशों से सर्वथा दूर हो गया। इस गाथा में यह सुंदर अर्थ बताया गया है कि श्रीरामानुज स्वामीजी के पादारविन्दों के आश्रित भाग्यवान ही भगवत्कृपा के पात्र होते हैं। और इस भाग्य से वंचित लोग तो ज्ञानभक्त्यादि- विभूषित होने पर भी भगवत्कृपा नहीं पा सकते। 

पाशुर ६३: श्रीरंगामृत स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी से उनके चरण कमलों की  सेवा कैंकर्य करने हेतु इच्छा का निवेदन करते हैं, क्योंकि अब वें अनावश्यक अस्तित्व से छुटकारा पाये हैं। 

पिडियैत् तोडरुम् कळिऱेन्न यान् उन् पिऱन्गिय सीर्
अडियैत् तोडरुम्पडि नल्ग वेण्डुम् अऱु समयच्
चेडियैत् तोडरुम् मरुळ् सेऱिन्दोर् सिदैन्दु ओड वन्दु इप्
पडियैत् तोडरुम् इरामानुस मिक्क पण्डिदने

बाह्य व कुदृष्टियों के षड्दर्शन रूप क्षुद्रगुल्मों में प्रवेश करनेवाले अविवेकी लोगों को पराजित व पलायमान बनाने के लिए इस भूतल पर अवतीर्ण, एवं (जनता का उद्धार करने के लिए) उसके पीछे पड़नेवाले हे श्रीरामानुज स्वामिन्! अपनी स्त्रीके पीछे पीछे ही चलनेवाले हाथी की भांति मैं भी आपकी कृपा से, सौन्दर्यादि शुभगुणविभूषित आपके पादारविन्दों का ही अनुसरण करूं। श्रेष्ठ उपवन में प्रवेश कर आनंद पानेवालों की भांति श्रेष्ठ श्रीवैष्णव मत के अनुयायी बन कर आनंदित होने के बदले में, कई लोग इस कारण से बाह्य व कुदृष्टि मतरूप क्षुद्र कंटकवाले गुल्मों में प्रवेश कर दुख भोग रहे हैं कि उनका पाप उन्हें ऐसी प्रेरणा दे रहा है। श्री रामानुज स्वामीजी का अवतार होने के बाद, ये सभी पापी जन वाद में पराजित होकर पलायमान हो गये।

पाशुर ६४: श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कि ,बाह्य (जो वेदों का पालन नहीं करते हैं) एवं कुदृष्टि (जो वेदों को गलत तरीके से पेश करते हैं) तत्ववाले जो तर्क वितर्क में शामिल होना चाहते हैं, इस संसार में उनका विरोध करने हेतु श्रीरामानुज स्वामीजी जो गजराज समान हैं, अवतार लिये हैं और उन जनों का बहुत शीघ्र अन्त भी होगा। 

पण् तरु माऱन् पसुम् तमिळ् आनन्दम् पाय् मदमाय्
विण्डिड एन्गळ् इरामानुस मुनि वेळम् मेय्म्मै
कोण्ड नल् वेदक् कोळुम् दण्डम् एन्दि कुवलयत्ते
मण्डि वन्दु एन्ऱदु वादियर्गाळ् उन्गळ् वाळ्वु अऱ्ऱदे

हमारे श्रीरामानुजमुनि मत्तगज श्रीशठकोपसूरी के अनुगृहीत मधुररागयुत सहस्रगीति के अनुभव से समुत्पन्न आनंदरूपी मदजलवाला होकर, सत्यार्थ प्रकाशक वेदरूपी डंडा लेकर इस भूमंडल पर संचार कर रहे है; अतः हे दुर्वादियों! तुम्हारा आयुष्य समाप्त हो गया। जब श्रीरामानुज स्वामीजी दिव्यप्रबंधों का ठीक अध्ययन का सत्य (नतु दूसरों की भांति मिथ्या) भूत वेदों के यथावस्थित अर्थों का वर्णन करने लगेंगे तब दुर्वादियों को इस भूतल पर रहने का स्थान कैसे मिलेगा ?

पाशुर ६५: श्रीरामानुज स्वामीजी द्वारा ज्ञान प्रदान  करने से श्रीरंगामृत स्वामीजी आनंदित होते हैं ताकि अब वे बाह्य और कुदृष्टि तत्ववालों पर विजय प्राप्त कर सके। 

वाळ्वु अऱ्ऱदु तोल्लै वादियऱ्कु एन्ऱुम् मऱैयवर् तम्
ताळ्वु अऱ्ऱदु तवम् तारणि पेऱ्ऱदु तत्तुव नूल्
कूळ् अऱ्ऱदु कुऱ्ऱमेल्लाम् पदित्त गुणत्तिनर्क्कु अन्
नाळ् अऱ्ऱदु नम् इरामानुसन् तन्द ग्यानत्तिले

हमारे श्रीरामानुज स्वामीजी से अनुगृहीत उपदेश से, इतने प्रकार के कल्याण हुए कि दुर्वादि नष्ट हो गये; वैदिकों का संकट परिहृत हुआ; भूतल भी भाग्यवान बना; तत्वशास्त्रों में सब की शंकाएं एवं भ्रम दूर हो गये; उनका निश्चित व वास्तविक अर्थ समझने में आया; और लोगों का पाप भी विनष्ट हो गया। कितने महान  बुद्धिमत्ता !!

पाशुर ६६: श्रीरंगामृत स्वामीजी, श्रीरामानुज स्वामीजी का मोक्ष प्रदान करने के गुण का आनन्द लेते हैं। 

ज्ञानम् कनिन्द नलम् कोण्डु नाळ् तोरुम् नैबवर्क्कु
वानम् कोडुप्पदु मादवन् वल्विनैयेन् मनत्तिल्
ईनम् कडिन्द इरामानुसन् तन्नै एय्दिनर्क्कु अत्
तानम् कोडुप्पदु तन् तगवु एन्नुम् सरण् कोडुत्ते

साक्षात् लक्ष्मीपति भगवान भी भक्तिरूप से परिणत ज्ञान से नित्य अपनी उपासना करने वालों को ही मोक्ष देते हैं। मुझ महापापी के हृद्गत समस्त कालुष्य मिटानेवाले श्रीरामानुज स्वामीजी तो अपने आश्रितों को स्वयं अपनी कृपा रूप साधन देकर उस मोक्ष को प्रदान करते हैं। मोक्षप्रदान भगवान का प्रसिद्ध व मुख्य काम है। परंतु उनसे मोक्ष लेना बहुत कठीन हैं; क्योंकि अपने पास किसी साधन के विना खाली हाथ रहनेवालों को वे मोक्ष नहीं देंगे। वह साधन भी बहुत दुर्लभ है। तथाहि जिसे पहले ज्ञान उत्पन्न हो, और बाद में वह धीरे धीरे बढ़कर परभक्ति परज्ञान इत्यादि परमभक्ति तक की अवस्थाएं प्राप्त करें, और उसके फलतया निरंतर भजन भी सिद्ध हो, ऐसे भाग्यवान ही भगवान के श्रीहस्त से मोक्ष पा सकेगा। श्रीरामानुजस्वामीजी भी मोक्षप्रदान करते हैं; परंतु वे ऐसे साधन की प्रतीक्षा नहीं करते; किंतु अपने पादाश्रितों को अपनी कृपा ही साधन बनाकर, उनमें और किसी प्रकार की योग्यता के विना ही उन्हें मोक्ष देते हैं। अतः भगवतसन्निधि जाने की अपेक्षा श्रीस्वामीजी का आश्रयण करना ही मुमुक्षुओं के लिए श्रेयस्कर है।

पाशुर ६७: श्रीरंगामृत स्वामीजी यह स्मरण कर आनंदित होते हैं की कैसे श्रीरामानुज स्वामीजी ने उनकी रक्षा की यह निर्देश देते हुए कि  भगवान द्वारा उनके पूजा हेतु दिये हुए इंद्रियाँ का प्रयोग सांसारिक विषयोंमें न करें और यह कहते हैं की अगर श्रीरामानुज स्वामीजी ने यह नहीं किया होता तो, और कोई भी उनकी रक्षा नहीं करता। 

सरणम् अडैन्द दरुमनुक्काप् पण्डु नूऱ्ऱुवरै
मरणम् अडैवित्त मायवन् तन्नै वणन्ग वैत्त
करणम् इवै उमक्कु अन्ऱु एन्ऱु इरामानुसन् उयिर्गट्कु
अरण् अन्गु अमैत्तिलनेल् अरणार् मऱ्ऱु इव्वारुयिर्क्के

“अपनी शरण में आये हुए युधिष्ठिर के लिए पूर्वकाल में दुर्योधनादि एक सौ कौरवों का विनाश करनेवाले भगवान ने अपनी सेवा करने के साधनताया ही तुम्हें ये इन्द्रियाँ दी हैं; अतः ये तुम्हारे अपने भोगके लिए नहीं।” यदि श्रीरामानुज स्वामीजी यह उपदेश देते हुए आत्माओं की रक्षा नहीं करते; तो दूसरा कौन इनका रक्षक होता? (कोई नहीं ।) श्रीरामानुज स्वामीजी ने सबको यह उपदेश दिया की यह अत्यद्भूत मानवशरीर भगवान की सेवा करने के लिए ही मिला है, न तु भोग भोगने के लिए। भगवत्सेवा करने से ही आत्मा का उद्धार होगा; विषयोपभोग करने से अधोगति मिलेगी।

पाशुर ६८: इस संसार में रहते हुए मेरा मन और आत्मा श्रीरामानुज स्वामीजी के शिष्यों के गुणों में निरत रहता हैं। इसके पश्चात मेरे समान और कोई नहीं हैं। 

आर् एनक्कु इन्ऱु निगर् सोल्लिल् मायन् अन्ऱु ऐवर् देय्वत्
तेरिनिल् सेप्पिय गीतैयिन् सेम्मैप् पोरुळ् तेरिय
पारिनिल् सोन्न इरामानुसनैप् पणियुम् नल्लोर्
सीरिनिल् सेन्ऱु पणिन्ददु एन् आवियुम् सिन्दैयुमे

पूर्वकाल में पांडवों के दिव्य रथ पर (अर्जुन के सारथि के रूप में) विराजमान अत्याश्चर्यमय दिव्यचेष्ठितवाले श्रीकृष्णभगवान से अनुगृहीत भगवद्गीता के असली अर्थों को सबको सरलता से समझाते हुए गीताभाष्य रचनेवाले श्रीरामानुज स्वामीजी का भजन करनेवाले श्रेष्ठ पुरुषों के कल्याणगुणों में मेरी आत्मा और मन मग्न हो गये। अब मेरे सदृश धन्य दूसरा कौन होगा? श्री रामानुज-भाष्य पढ़कर ही हम सरलता से भगवद्गीता के सच्चे अर्थ जान सकते हैं।

पाशुर ६९: भगवान से भी अधीक श्रीरामानुज स्वामीजी द्वारा श्रीरंगामृत स्वामीजी के उपर अनेक महान लाभार्थ को स्मरण करते हुए श्रीरंगामृत स्वामीजी बहुत आनंदित होते हैं।  

सिन्दैयिनोडु करणन्गळ् यावुम् सिदैन्दु मुन्नाळ्
अन्दम् उऱ्ऱु आळ्न्ददु कण्डु अवै एन् तनक्कु अन्ऱु अरुळाल्
तन्द अरन्गनुम् तन् चरण् तन्दिलन् तान् अदु तन्दु
एन्दै इरामानुसन् वन्दु एडुत्तनन् इन्ऱु एन्नैये

सृष्टि से पहले (अर्थात् प्रलयकाल में) जब मन और दूसरा इंद्रियां (और शरीर) स्थूल रूप छोड़कर उपसंहृत हुए थे और आत्मा अचेतन-सा रह गया, तब (ऐसे अचेतनप्राय प्राणियों में एक) मुझको अपनी कृपा से फिर शरीर व इंद्रियों का प्रदान करनेवाले श्रीरंगनाथ भगवान ने अपने पादारविन्द नहीं दिखाये( माने पादारविन्दों के दर्शन देकर मेरे उज्जीवित होने का मार्ग नहीं बताया )। हमारे नाथ श्री रामानुज स्वामीजी ने तो अपने आप ही उसे दिखाकर अब मेरा उद्धार किया ।

पाशुर ७०: श्रीरामानुज स्वामीजी को देखते हुए जिन्होंने इतना महान लाभ प्रदान किया हैं श्रीरंगामृत स्वामीजी पूछते हैं अब उनको और क्या प्रदान करेंगे जब कि  इतना कुछ अभी तक दे चुके हैं। 

एन्नैयुम् पार्त्तु एन् इयल्वैयुम् पार्त्तु एण्णिल् पल् गुणत्त
उन्नैयुम् पार्क्किल् अरुळ् सेय्वदे नलम् अन्ऱि एन् पाल्
पिन्नैयुम् पार्क्किल् नलम् उळद्E उन् पेरुम् करुणै
तन्नै एन् पार्प्पर् इरामानुसा उन्नैच् चार्न्दवरे

हे रामानुज स्वामिन्। (गुणलेश से भी दरिद्र और अनवधिक दोषों से पूर्ण) मुझको देखकर, आकिंचन्य व अनन्यगतित्वरूप मेरा स्वभाव देखकर और असंख्येय कल्याणगुणभरित अपने को भी देखने पर, मुझ पर कृपा करना ही आपके लिए उचित होगा। यह छोडकर, फिर भी यदि आप मुझमें किंचित् गुण ढूंढने का ही प्रयत्न करेंगे, (और यह निश्चय कर डालेंगे कि विना किंचितमात्र गुण के, इसका स्वीकार नहीं करना चाहिए) तो आपके आश्रित भक्त जन आपकी महती कृपा के बारे में क्या सोचेंगे? (उसे बहुत अल्प ही मानेंगे; अतः इस अपयश का अवकाश मत दीजिए ।) यह तो साधारण शास्त्र की मर्यादा है कि पुण्यवान मानव ही गुरुकृपा का पात्र होगा। परंतु जरा विचार करने पर कहना पड़ता है कि पुण्यवान के प्रति की जानेवाली कृपा अत्यल्प कृपा है, अथवा कृपा कहलाने योग्य ही नहीं। श्रेष्ठ, अथवा सच्ची कृपा तो वही होगी, जो कि सर्वथा गुणशून्य व पापपूर्ण व्यक्ति पर की जायगी। अतः आप मेरे पाप देखकर दया करने में प्रोत्साहित हो जाइए; इसके बदले में यदि आप संकोच पायेंगे, तो आपके पादाश्रित महात्मालोग आपकी कृपा को अत्यल्प समझ लेंगे। 

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अडियेन् केशव् रामानुज दास्

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रामानुस नूट्रन्ददि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या – पाशुर 51 से 60

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श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत्  वरवरमुनये नम:

रामानुस नूट्रन्दादि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या

<< पाशुर 41 से 50 

पाशूर ५१: श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कि श्रीरामानुज स्वामीजी का इस संसार में अवतार लेने का एक मात्र उद्देश उन्हें (श्रीरंगामृत स्वामीजी) श्रीरामानुज स्वामीजी का दास बनाना हैं।

अडियैत् तोडर्न्दु एळुम् ऐवर्गट्काय् अन्ऱु बारतप् पोर्
मुडियप् परि नेडुम् तेर् विडुम् कोनै मुळुदुणर्न्द
अडियर्क्कु अमुदम् इरामानुसन् एन्नै आळ वन्दु इप्
पडियिल् पिऱन्ददु मऱ्ऱिल्लै कारणम् पार्त्तिडिले

पूर्वकाल में अपने पादारविन्दों का आश्रयण कर धन्य बनने वाले पंचपांडवों के लिए (अर्जुन का सारथी बनकर) घोड़े जुड़ा हुआ बडा रथ हांक कर दुर्योधनादियों का संहार करनेवाले, भगवान को (अर्थात् भगवान के स्वरूप रूप गुण विभूति इत्यादियों, अथवा सौशिल्य आश्रित पारतंत्र्य इत्यादि शुभगुणों को) पूर्णरूप से समझनेवाले भक्तों के अमृतवत् परमभोग्य रहनेवाले श्रीरामानुज स्वामीजी ने मुझ पर अनुग्रह करने के लिए ही इस भूतल पर अवतार लिया; विचार करने पर दूसरा कोई कारण नहीं दिखता।

पाशूर ५२: जब पूछा गया कि क्या श्रीरामानुज स्वामीजी में उन्हें नियंत्रण करने में क्षमता हैं तब वें श्रीरामानुज स्वामीजी के अनगिनत क्षमताओं को समझाते हैं।

पार्त्तान् अऱु समयन्गळ् पदैप्प इप्पार् मुळुदुम्
पोर्त्तान् पुगळ्कोण्डु पुन्मैयिनेन् इडैत् तान् पुगुन्दु
तीर्त्तान् इरु विनै तीर्त्तु अरन्गन् सेय्य ताळ् इणैयोडु
आर्त्तण् इवै एम् इरामानुसन् सेय्युम् अऱ्पुदमे

हमारे गुरु श्री रामानुज स्वामीजी के ये सभी अद्भुत चेष्टित हैं कि उन्होंने अपनी दृष्टि डालने मात्र से (दुष्ट) षड्दर्शनों को शिथिल बना दिया; अपने यश से समग्र भूमंडल ढांक दिया; अपनी निर्हेतुक कृपा से मुझ नीच के हृदय में प्रवेश कर मेरे प्रबल पाप मिटा दिये; और मिटाने के बाद मेरे सिर को श्रीरंगनाथ भगवान के सुंदर पादारविन्दों के साथ मिला दिया ।

पाशूर ५३:  जब पूछा गया कि अन्य तत्वों का नाश कर श्रीरामानुज स्वामीजी ने क्या स्थापित किया तब श्रीरंगामृत स्वामीजी ने कहा कि श्रीरामानुज स्वामीजी ने महान सत्य को स्थापित किया कि सभी चेतन और अचेतन भगवान पर हीं निर्भर हैं।  

अऱ्पुदन् सेम्मै इरामानुसन् एन्नै आळ वन्द
कऱ्पगम् कऱ्ऱवर् कामुऱु सीलन् करुदरिय
पऱ्पल्लुयिर्गळुम् पल्लुलगु यावुम् परनदु एन्नुम्
नऱ्पोरुळ् तन्नै इन्नानिलत्ते वन्दु नाट्टिनने

श्रीरामानुज स्वामीजी अपने शरण में मुझे लेने के लिये अवतार लिए , वें बहुत उदार हैं, उनमें बहुत साधारण गुण हैं जो ज्ञानियों को अभिलषित हैं, |उनके अद्भुत कार्य, उनमें सच्चाई हैं  अपने शिष्यों के लिये स्वयं को उचित बताने के लिये। मेरे उज्जीवन के लिए ही अवतीर्ण, परमोदार, ज्ञानियों के वांछनीयशीलगुणवाले, अत्याश्चर्य मय दिव्य चेष्टितवाले और आर्जव (सीधापन) गुणवाले श्री रामानुज स्वामीजी ने इस भूतल पर अवतार लेकर इस महार्थ की स्थापना की कि ये असंख्य आत्मवर्ग और (इनके निवासस्थान) ये सभी लोक भगवान की मिल्कियत हैं। (इससे अद्वैत मत का निरास सूचित किया जाता है।)

पाशूर ५४:  श्रीरामानुज स्वामीजी भगवान के श्रेष्ठता को स्थापित करते हैं जिसके परिणाम स्वरूप आगे श्रीरंगामृत स्वामीजी भाह्य तत्त्वों, वेदों और श्रीसहस्त्रगीति के स्थान को बताते हैं।

नाट्टिय नीसच् चमयन्गळ् माण्डन नारणनैक्
काट्टिय वेदम् कळिप्पुऱ्ऱदु तेन् कुरुगै वळ्ळल्
वाट्टमिला वण्डमिज़्ह् मऱै वाळ्न्ददु मण्णुलगिल्
ईट्टिय सीलत्तु इरामानुसन् तन् इयल्वु कण्डे

श्रीरामानुज स्वामीजी के स्वभाव को देखते हुए जो इस संसार में अपने गुणों को और  आगे बढ़ाते हैं, भाह्य अधम तत्त्व, जो अधम जनों द्वारा उनके स्वयं के परिश्रम से स्थापित किया गया हैं, ऐसे देह को त्याग दिया जैसे अंधेरा सूर्य के उगम से लुप्त हो जाता हैं। श्रीमन्नारायण का प्रतिपादन करनेवाले वेद आनंदित हुए; और सुंदर कुरुकापुरी में अवतीर्ण परमोदार श्रीशठकोपसूरी से अनुगृहीत, दोषरहित, द्राविड़वेद संजीवित हुआ । श्री रामानुज स्वामीजी ने श्रेष्ठ प्रमाण व युक्तियों के आधार से संस्कृत व द्राविड वेदों के सदर्थों का वर्णन किया; इससे उन वेदोंका दुःख दूर हुआ और दूसरे कुमत नष्ट हो गये ।

 पाशूर ५५:  वेदों को लाभ देनेवाले श्रीरामानुज स्वामीजी के गुणोंको  स्मरण कराते हुए श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कि, वह कुल जो श्रीरामानुज स्वामीजी के उदारता में निरत हैं और उनके शरण हुए हैं, वें उन पर शासन करना उचित हैं।

कण्डवर् सिन्दै कवरुम् कडि पोळिल् तेन्नरन्गन्
तोण्डर् कुलावुम् इरामानुसनै तोगै इऱन्द
पण् तरु वेदन्गळ् पार् मेल् निलविडप् पार्त्तरुळुम्
कोण्डलै मेवित् तोळुम् कुडियाम् एन्गळ् कोक्कुडिये

स्वरप्रधान अनंत वेदों को इस धरातल पर सुप्रतिष्ठित कराने वाले, परमोदार और सर्वजनमनोहर सुगंधि उपवनों से परिवृत एवं दक्षिणदिशा के अलंकारभूत श्रीरंगम दिव्यधाम के स्वामी श्रीरंगनाथ भगवान के परमभक्तों की प्रशंसा के पात्र श्री रामानुज स्वामीजी का सादर आश्रयण करनेवालों का कुल ही हमारे प्रणाम करने योग्य महात्माओं का कुल है। अर्थात् श्रीरामानुजभक्तों का कुल ही सत्कुल कहलाता है और उस कुलमें अवतीर्ण महात्माओं को हम अपने स्वामी मानते हैं।

पाशूर ५६:  जब श्रीरंगामृत स्वामीजी को यह स्मरण कराया गया कि वों यही वे सांसारिक विषयोंमें कहते थे, तब श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कि, श्रीरामानुज स्वामीजी के शरण होने के पश्चात उनके शब्द और मन और किसी को पहचान नहीं सकते हैं।

 कोक्कुल मन्नरै मूवेळुगाल् ओरु कूर् मळुवाल्
पोक्किय द्Eवनैप् पोऱ्ऱुम् पुनिदन् बुवनमेन्गुम्
आक्किय कीर्त्ति इरामानुसनै अडैन्दपिन् एन्
वाक्कुरैयादु एन् मनम् निनैयादु इनि मऱ्ऱोन्ऱैये

क्षत्रियकुलोत्पन्न दुष्टराजाओं का तीक्ष्णकुठार से इक्कीस वार विनाश करनेवाले परशुराम भगवान की स्तुति करनेवाले, परमपवित्र एवं भूतलव्यापी यशवाले श्री रामानुजस्वामीजी का आश्रय लेनेपर, अब से मेरी वाणी दूसरे किसीका नाम नहीं लेगी; मेरा मन चिंतन नहीं करेगा। आचार्यों का सिद्धांत है कि परशुराम हमें उपासना करने योग्य नहीं; क्योंकि वह तो दुष्टक्षत्रिय निरासरूप विशेष कार्य सिद्धि के लिए अहंकारयुत किसी जीव में भगवान की शक्ति का आवेशमात्र है। अत एव उसे आवेशावतार कहते हैं; नतु श्रीरामकृष्णादिवत् पूर्णावतार। प्रकृतगाथा में इतना ही कहा गया है कि श्री रामानुजस्वामीजी उनकी स्तुति करते हैं, नतु उपासना। विरोधिनिरासरूप महोपकार का स्मरण करते हुए उनकी स्तुति करने में कोई आपत्ति नहीं हैं; क्योंकि यह उपासना नहीं हो सकती।

पाशूर ५७:  श्रीरंगामृत स्वामीजी से पूछा गया कि “आप कैसे कह सकते हैं कि आपके शब्द गुण नहीं गायेंगे और आपका मन किसी के बारें सोचेगा नहीं क्योंकि यह संसार हैं?” वें कहते हैं कि श्रीरामानुज स्वामीजी को प्राप्त करने के पश्चात उनमे कोई नादानी नहीं हैं कुछ प्राप्त करने कि, सही और गलत में भेद करने की।  

 मऱ्ऱु ओरु पेऱु मदियादु अरन्गन् मलर् अडिक्कु आळ्
उऱ्ऱवरे तनक्कु उऱ्ऱवराय्क् कोळ्ळुम् उत्तमनै
नल् तवर् पोऱ्ऱुम् इरामानुसनै इन् नानिलत्ते
पेऱ्ऱनन् पेऱ्ऱपिन् मऱ्ऱु अऱियेन् ओरु पेदमैये

प्रयोजनान्तरों से विमुख होकर, श्रीरंगनाथ भगवान के पादारविन्दों में प्रवण महात्माओं को ही अपने आत्मबन्धु मानने वाले, अत्युत्तम कल्याण गुणवाले, और महातपस्वियों से संस्तुत श्रीरामानुजस्वामीजी को मैंने इस भूतल पर ही पाया; ऐसे पाने के बाद मैं विषयान्तर की इच्छा इत्यादि के हेतु किसी प्रकार का अज्ञान नहीं पाऊंगा।

 पाशूर ५८:  श्रीरंगामृत स्वामीजी प्रसन्न होते हैं कि श्रीरामानुज स्वामीजी ने ऐसे जनों के तत्त्वों को नष्ट किया जिन्होने वेदों को गलत तरीके से प्रस्तुत किया हैं।

पेदैयर् वेदप् पोरुळ् इदु एन्ऱु उन्नि पिरमम् नन्ऱु एन्ऱु
ओदि मऱ्ऱु एल्ला उयिरुम् अह्दु एन्ऱु उयिर्गळ् मेय् विट्टु
आदिप् परनोडु ओन्ऱु आम् एन्ऱु सोल्लुम् अव्वल्लल् एल्लाम्
वादिल् वेन्ऱान् एम् इरामानुसन् मेय्म् मदिक् कडले

कितने अविवेकी जन यों कहते थे कि, ” ब्रह्म एक ही सत्य है; दूसरे सभी जीव उससे अभिन्न हैं, और शरीर छूटने के बाद ब्रह्म के साथ उनका ऐक्य पाना ही मोक्ष है; यही सकल वेदों का तात्पर्य है।” यथार्थज्ञाननिधि हमारे आचार्य श्रीरामानुजस्वामीजी ने इन सभी कोलाहलों को वाद में जीत लिया।

पाशूर ५९:  उनमें प्रसन्नता देखकर कुछ लोगों नें कहा कि आत्मा को शास्त्र के जरिये जाना जा सकता हैं कि भगवान श्रीमन्नारायण हीं श्रेष्ठ हैं। वें उत्तर देते हैं कि अगर श्रीरामानुज स्वामीजी कलियुग का अज्ञानता को नष्ट नहीं करते तो किसी को भी यह ज्ञान नहीं प्राप्त होता कि आत्मा के भगवान श्रीमन्नारायण हैं।

कडल् अळवाय तिसै एट्टिनुळ्ळुम् कलि इरुळे
मिडै तरु कालत्तु इरामानुसन् मिक्क नान्मऱैयिन्
सुडर् ओळियाल् अव्विरुळैत् तुरन्दिलनेल् उयिरै
उडैयवन् नारणन् एन्ऱु अऱीवार् इल्लै उऱ्ऱु उणर्न्दे

चतुस्सागर्पर्यंत आठों दिशाओं में जब कलि-अंधकार ही व्याप्त हुआ था, तब श्रीरामानुज स्वामीजी ने अवतार लेकर,चारों वेदों के उज्वल ज्योति से उस अंधकार को यदि नहीं मिटा दिया होता, तो कोई भी मानव यह अर्थ नहीं समझ सकता कि श्रीमन्नारायण समस्त जीवों के प्रभु हैं।

 पाशूर ६०: जब उन्हें श्रीरामानुज स्वामीजी के भक्ति के विषय में पूछा गया तो उन्होंने इसमे समझाया।

उणर्न्द मेइग्यानिअर् योगम् तोऱुम् तिरुवाइमोळियिन्
मणम् तरुम् इन्निसै मन्नुम् इडम् तोऱुम् मामलराळ्
पुणर्न्द पोन् मार्बन् पोरुन्दुम् पदि तोऱुम् पुक्कु निऱ्कुम्
गुणम् तिगळ् कोण्डल् इरामानुसन् एम् कुलक् कोळुन्दे

आत्मगुणों से परिपूर्ण व उज्वल, कालमेघ के समान परमोदार, हमारे कुलकूटस्थ श्रीरामानुज स्वामीजी तत्वज्ञानियों की प्रत्येक गोष्ठी में, सहस्रगीति (प्रभुति दिव्यप्रबंधों) की दिव्य सूक्ति की सुगंध से वासित प्रत्येक स्थल में एवं लक्ष्मीजी से आलिंगित श्रीवक्षवाले भगवान के एकैक दिव्यदेशमें विराजते हैं।

आधार : http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2020/05/ramanusa-nurrandhadhi-pasurams-51-60-simple/

अडियेन् केशव् रामानुज दास्

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