तिरुप्पल्लाण्डु – सरल व्याख्या

।।श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमते वरवरमुनये नमः।।

मुदलायिरम्

pallandu

श्री मणवाळ मामुनिगळ् ने अपनी उपदेश रत्नमालै के १९ वे पाशुर में तिरुप्पल्लाण्डु की महत्ता बहुत ही सुन्दर ढंग से समझायी है।

पशुराम    १९ .

कोदिलवाम् आळ्वार्गळ् कूऱु कलैक्केल्लाम्

आदि तिरुप्पल्लाण्डु आनदुवुम् – वेदत्तुक्कु।

ओम् एन्नुम्म् अदुपोल् उळ्ळदुक्केळ्ळाम् सुरुक्काय्त्

तान् मन्गलम् आनदाल्।।

श्री मणवाळ मामुनिगळ्, यहाँ दृढ़ मत प्रस्तुत कर रहे है की, वेद गायन के पहले , जिस तरह वेदों का सार प्रणव है , ठीक उसी तरह दिव्य प्रबंधं का सर तिरुपल्लाण्डु माना जाता है। इसी लिये तिरुपल्लाण्डु का अनुसंधान दिव्य प्रबंधं के प्ररंभ में किया जाता है।

पाण्ड्य राजा वल्लभदेव के दरबार में शास्त्रार्थ में भगवान श्रीमन्नारायण की सर्वोच्चता, प्रभुत्व स्थापित करने के बाद, राजा ने पेरिय आळ्वार के सम्मान में उन्हें ,गज पर आरूढ़ करवाकर नगर भ्रमण करवाये। अपने भक्त आळ्वार संत का यह सम्मान देखने स्वयं भगवान देवियों के साथ गरुडारुढ़ हो आ गये। आळ्वार संत भगवान को श्रीवैकुण्ठ को छोड़, इस चराचर जगत में आया देख, भगवान श्रीमन्नारायण के कुशल मंगल के लिये चिंतित हो गये, अपनी उसी अवस्था में प्रभु श्रीमन्नारायण को इस चराचर जगत में कोई तकलीफ न हो इसके लिये मंगलाशासन में,  गुणानुवाद में, यह प्रबंध गा उठे, इन्ही प्रबंधों के समूह, तिरुपल्लाण्डु कहलाये।इस तरह पेरिया आळ्वार ने स्वयं भी नारायण का गुणानुवाद करते हुये, इस भौतिक संसार वासियों से भी भगवद गुणानुवाद करवया।

इस तिरुपल्लाण्डु की सरल व्याख्या स्वामी पेरियावाचन पिल्लै द्वारा की गयी व्यख्या पर आधारित है। 

तनियन् 

गुरुमुखमनधीत्य प्राहवेदानशेशान्

नरपतिपरीकृलप्तम् शुल्कमादातु कामः।  

श्वसुरममरवन्द्यम् रन्गनाथस्यसाक्शात्

द्विजकुल तिलकम् तम् विष्णुचित्तम् नमामि ।।

पेरियाळ्वार, जिन्हें विष्णुचित्त स्वामीजी के नाम से भी जाना जाता है, ये आळ्वार संत किसी आचार्य के पास शिक्षा प्राप्त करने नहीं गए थे, इन्हें तो स्वयं तिरुमाल (भगवान) ने ही वेदांत ज्ञान और भक्ति समर्पण प्रदान किया था।

एक बार पांड्या राजा वल्लभदेव ने अपने दरबार में विद्वानों के बीच शास्त्रार्थ की प्रतियोगिता रखी और जीतने वाले को पुरस्कार में स्वर्ण की मोहरें देने की घोषणा भी की। पेरियाळ्वार जो श्रीविल्लिपुत्तूर में भगवान वटपत्रशायि के पुष्प सेवा में अपना कैंङ्कर्य देते थे, इस प्रतियोगिता की बात सुन अपने मन में यह आशय किए की, अगर यह पुरस्कार इन्हें प्राप्त हो जाए तो वे भगवान वटपत्रशायि के मंदिर में सुधार का कार्य करवाएँगे। भक्त का आशय देख रात्रि स्वप्न में भगवान ने उन्हें आदेश दे दिया, पेरियाळ्वार भगवत आज्ञा पाकर, शास्त्रार्थ के लिए पांड्या राजा वल्लभदेव के दरबार में पहुँचे। विद्वानों की इस सभा में, वेदों के उद्घोष से भगवान श्रीमन्नारायण का परत्व स्थापित कर इस प्रतियोगिता को जीतकर, पुरस्कार स्वरुप स्वर्ण मोहरें प्राप्त किए। यही नहीं, आळ्वार संत ने अपनी पालित पुत्री देवी आण्डाळ का विवाह भी श्रीरंगम में भगवान रंगनाथजी के साथ संपन्न करवाया, जिससे नित्यसूरी ने इन्हें श्रद्धा से “श्री रंगनाथ श्वशुर” कहकर बुलाया। पेरियाळ्वार वेदाध्ययन करने वाले ब्राह्मण कुल में सर्वोच्च हैं।

“मिन्नार् तडमदिळ् सूळ् विल्लिपुत्तूर् एन्ऱु ओरुकाल्

सोन्नर् कळऱ्कमलम् सूडिनोम् – मुन्नाळ्

किळयऱुत्तान् एन्ऱुरैत्तोम् कीळ्मैयिनिल् सेरुम्

वळियऱुत्तोम् नेन्जमे वन्दु।।“

हे मन! चलो हम उन महानुभावों की चरणवंदना करते हैं, जो श्रीविल्लिपुत्तूर का गुणगान करते हैं, वह श्रीविल्लिपुत्तूर जिसकी बड़ी बड़ी दीवारें रौशनी सी चमकती हैं, वह श्रीविल्लिपुत्तूर जो हमारे माथे की मुकुट मणि है, जो पेरियाळ्वार की बातें करके हमें उनका यह स्मरण कराती है, उनका वह कार्य- पांड्य राजा के दरबार में जाकर शास्त्रार्थ में विजय होना, और जिनके हाथों में पुरस्कार का स्वर्ण मुद्राओं की थैली स्वयं आकर गिर गई।

“पाण्डियन् कोण्डाडप् पट्टर्पिरान् वन्दान् एन्ऱु

ईण्डिय सन्गम् एडुत्तूद – वेण्डिय

वेदन्गळ् ओदि विरैन्दु किळियऱुत्तान्

पादन्गळ् यामुडैय पऱ्ऱु।।“

पांड्या राजा वल्लभदेव भी पेरिय आळ्वार की बहुत प्रंशंसा करते हैं, सारे दरबारी, दरबार में शंखनाद कर कहते हैं, भट्टरपिरान ने भरे दरबार में वेदों के प्रमाण देते हुए भगवान श्रीमन्नारायण के परत्व को स्थापित किया है, ऐसे भट्टरपिरान के चरण ही हमारा आश्रय स्थान है।

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प्रथम पाशुर:

पहले पाशुर में,  पेरिया आळ्वार जैसे ही अपनी शोभा यात्रा में एम्पेरुमान को उभय देवियों के साथ अपने सुन्दर रूप संपन्न मंगल विग्रह के गरुडारुढ़ दर्शन करते है, उन्हें इस मृत्युलोक में आया देख, आळ्वार संत भगवान के सुन्दर सुकोमल चरणों की हलकी लालिमा भरे चरण देखते ही, उनके मन में आशंका आति है की कहीं भगवान को इस संसार की दृष्टी न लग जाये , वह भगवान के विजय गीत गाने शुरू कर देते है, जैसे एम्पेरुमान चिरंजीवी रहे।   

पल्लाण्डु पल्लाण्डु पल्लायिरत्ताण्डु

पल कोडि नूऱायिरम्

मल्लाण्ड तिन् तोळ् मणिवण्णा उन्

सेवडि सेव्वि तिरुक्काप्पु ।।

हे भगवान! मजबूत दिव्य कंधे हैं आपके, आप विशाल भुजा धारी हो, मल्लों का संहार करने वाले हो, आप बादलों के वर्ण वाले हो, आपके सुकोमल चरण, नवजात शिशु के चरणों की भाँति हलकी लालिमा लिए हुए हैं, यह सदा सुरक्षित रहे। यहाँ इस पाशुर में आळ्वार संत युगों युगों तक भगवान के चिरंजीवी होने का मंगलाशासन करते हैं।

द्वितीय पाशुर:

दूसरे पाशुर में आळ्वार संत एम्पेरुमान (भगवान) की परमपद (नित्यविभूति) और चराचर संसार (लीला विभूति)  में सर्वोच्च स्थान का वर्णन कर रहे है।

अडियोमोडुम् निन्नोडुम् पिरिविन्ऱि आयिरम् पल्लाण्डु

वडिवाय् निन् वलमार्बिनिल् वाल्गिन्ऱ मन्गैयुम् पल्लाण्डु

वडिवार् सोदि वलत्तुऱैयुम् सुडरालियुम् पल्लाण्डु

पडै पोर् पुक्कु मुलन्गुम् अप्पान्चसन्नियमुम् पल्लाण्डे।।

आपका और अकिंचन का सेवक और मालिक का रिश्ता सदा ऐसे ही बना रहे। पेरिय पिराट्टी (माता महालक्ष्मी) अतुलनीय रूपलावण्य से परिपूर्ण, सारे आभूषणों से शृंगारित आपके दाहिने वक्षस्थल पर सदा विराजित रहे। आपके दाहिने हाथ में सुदर्शन चक्रराज सदा सुशोभित रहे। आपके बायें हाथ में पाञ्चजन्य शंख, जिसकी ध्वनि से रणक्षेत्र में आपके शत्रुओं में कंप कंपी मच, उनका नाश हो जाता है, सदा शोभायमान रहे। यहाँ आळ्वार संत भागवतों के सम्बोधन से संसार को इंगित कर रहे हैं, और माता लक्ष्मीजी, शंख चक्र के सम्बोधन से परमपद को इंगित कर रहे हैं।

तीसरा पाशुर:

अपने तीसरे पाशुर से पाशुर से तीन पाशुरों तक पेरिया आळ्वार उन भागवतों का आह्वान कर रहे , जो इस चराचर जगत में भगवद अनुभव कर प्रसन्न रहना चाहते है, उन भागवतों को आह्वान कर रहे है जो कैवल्य गुणानुभव करना कहते है , उन भागवतों को आवाज़ दे रहे है जो श्री भगवन का कैंकर्य करने की इच्छा रखते है। इन सब्भी भागवतों को अपने साथ इस भगवद गुणगान में साथ रहने के लिये आमंत्रित कर रहे है।

वाळापट्टु निन्ऱीर् उळ्ळीरेल् वन्दु मण्णूम् मणमुम् कोण्मिन्

कूळाट्पट्टु निन्ऱीर्गळै एन्गळ् कुळुविनिल् पुगुदलुट्टोम्

एळाट्कालुम् पळिप्पु इलोम् नान्गळ् इराक्कदर् वाळ् इलन्गै

पाळाळ् आगप् पडै पोरुदानुक्कु पल्लाण्डु कूरुदुमे

आळ्वार संत यहाँ कह रहे हैं, अगर तुम भगवद सेवा रूपी अमूल्य निधि पाना चाहते हो, तो जल्दी आओ, भगवद उत्सव हेतु मिट्टी खोद के भूमि तैयार करो, यहाँ कोई भी सेवा करने हेतु तत्पर रहो, हम यहाँ सिर्फ प्रसाद पाने वाले भागवतों को नहीं बुला रहे, कई पीढ़ियों से हम बिना कोई त्रुटि के, सिवाय भगवद सेवा के, और कोई इच्छा नहीं रखी। हम यहाँ उन भगवान का गुणानुवाद कर रहे हैं, जो अपना धनुष लेकर लंका में रह रहे राक्षसों से युद्ध किए, तुम भी हमारे साथ सम्मिलित हो जाओ।

चतुर्थ पाशुर:

चतुर्थ पाशुर इसमें आळ्वार संत यहाँ भगवद कैंकर्य में रत महानुभावों के कैंकर्य से संतुष्टि नहीं पाकर, उन भागवतों को आमंत्रित कर रहे है, जो स्वयं आत्मानुभव करना चाहते है, आळ्वार संत इच्छा रखते है की भगवद कैंकर्य निधि की इच्छा रखने वाले, और स्वयं आत्मानुभव करने वाले भी भगवद गुणानुवाद में सम्मिलित होने चाहिये, आळ्वार संत कहते है की जो इस संसार में धन पाने में अनुरक्त है, वह कोई समय  कभी भी भगवद सेवा में अनुरक्त हो सकते है, पर कैवल्य मोक्ष को प्राप्त कैवलयार्थी जो सिर्फ आत्मानुभव में ही रहते है, आळ्वार संत उन्हें पहले बुला रहे है।

एडु निलत्तिल् इडुवदन् मुन्नम् वन्दु एन्गळ् कुळाम् पुगुन्दु

कूडुम् मनम् उडैयीर्गळ् वरम्बोळि वन्दु ओल्लैक् कूडुमिनो

नाडु नगरमुम् नन्गु अऱिय नमो नारायणाय एन्ऱु

पाडुम् मनम् उडैप् पत्तरुळ्ळीर् वन्दु पल्लाण्डु कूऱुमिने

आळ्वार संत इस पाशुर में, आत्मानुभव करने वाले भागवतों से कह रहे हैं, आप सब की भगवद गुणानुवाद में रुचि हो तो, भौतिक शरीर छूटने से पहले हमारे साथ मिलकर भगवद गुणानुवाद करो, अगर आपको दिव्य मंत्र के जपने के प्रति निष्ठा हो तो, अष्टाक्षर मंत्र जो श्रीमन्नारायण की महिमामंडन करता है, जिसके जपने से गाँव के साधारण मनुष्य या शहर में वासित विद्वान भी एम्पेरुमान की दिव्यता को पहचानते हैं, आओ हमारे साथ भगवान श्रीमन्नारायण का गुणानुवाद करो।

पंचम पाशुर:

इस पंचम पाशुर में, आळ्वार संत उन भागवतों को आह्वान कर रहे है, जो इस चराचर जगत की भव्यता में अनुरक्त है।

अण्डक्कुलत्तुक्कु अदिपदियागि असुरर् इराक्कदरै

इण्डैक्कुलत्तै एडुत्तुक् कळैन्द इरुडीकेसन् तनक्कु

तोण्डक्कुलत्तिल् उळ्ळीर् वन्दु अडि तोळुदु आयिर नामम् सोल्लिप्

पण्डैक्कुलत्तैत् तविर्न्दु पल्लाण्डु पल्लायिरत्ताण्डु एन्मिने

आळ्वार संत यहाँ कहते हैं की हम उस समूह में हैं जिसमें भगवान ऋषिकेश, जो दैत्य कुलों के नियंत्रक हैं, जो दैत्यों के समूल संहारक हैं, ऐसे भगवान के दासत्व भाव से परिपूर्ण है। आप भी हमारे समूह में सम्मिलित हो जाइए, भगवान श्रीमन्नारायण के श्रीचरणों की शरणागति कर उनके सहस्त्र नामों को उच्चार कर मोक्ष को प्राप्त कर जन्म मरण के चक्र – जिसमें जीव इस चराचर जगत में आकर पुनः भगवान से अन्यान्य भौतिक साधनों को माँग, उसी में अनुरक्त होकर भगवान को ही भूल जाता है – उससे मुक्त हो जाइए, और प्राप्त साधनों के लिए भगवद गुणानुवाद कीजिए।

षष्टम पाशुर 

इस पाशुर में आळ्वार संत तीनो प्रकार के भागवत समूह का आह्वान कर रहे है , इस तरह सभी भागवत समूह आकर आळ्वार संत के साथ भगवद गुणानुवाद में सम्मिलित होते है। इसमें वाळाट्पट्टु  (तृतीय पाशुर)  में आह्वानित भागवत जो भगवान का कैंकर्य करने के इच्छुक है, वह अपने कार्य करने की रुपरेखा और उसे संपन्न करने की अपनी प्रवीणता बतला रहे है जिसे आळ्वार संत स्वीकार कर लेते है।    .

एन्दै तन्दै तन्दै तन्दै तम् मूत्तप्पन् एळ्पडिगाल् तोडन्गि

वन्दु वळि वळि आट्चेय्गिन्ऱोम् तिरुवोणत्तिरुविळविल्

अन्दियम् पोदिल् अरियुरुवागि अरियै अळित्तवनै

पन्दनै तीरप् पल्लाण्डु पल्लायिरत्ताण्डु एन्ऱु पाडुदुमे

पिछले सात पीढ़ियों से, मैं और मेरे पिताजी, उनके पिताजी, उनके पिताजी, उनके पिताजी, वेदों में वर्णन किए अनुसार उन सुन्दर भगवान नृसिंह (जिनका सिर सिंह का है और बाकि धड़ मानव सा है) जिन्होंने, अपने भक्त की रक्षा के लिए ऐसा स्वरुप धर, दैत्य हिरण्य का संहार किया था। भगवान को इस दैत्य के संहार में जो भी थकान हुई है, उसे दूर करने हम भगवन के गुणानुवाद कर रहे हैं।

सप्तम पाशुर 

इस सप्तम पाशुर में आळ्वार संत उन कैवलयार्थी भागवतों को अपने संग स्वीकार कर रहे है, जो एडु निलत्तिल् (चतुर्थ पाशुर) में आळ्वार संत के साथ जुड़े थे। आह्वानित भागवत, अपने कार्य करने की रुपरेखा और उसे संपन्न करने की अपनी प्रवीणता बतला रहे है जिसे आळ्वार संत स्वीकार कर लेते है।

तीयिल् पोलिगिन्ऱ सेन्जुडर् आळि तिगळ् तिरुच्चक्करत्तिन्

कोयिल् पोऱियाले ओऱ्ऱुण्डु निन्ऱु कुडि कुडि आट् सेय्गिन्ऱोम्

मायप् पोरुपडै वाणनै आयिरम् तोळुम् पोळि कुरुदि

पायच् चुळऱ्ऱिय आळि वल्लानुक्कुप् पल्लाण्डु कूऱुदुमे

अपने बाहु मूल पर लाली लिये हुए वैभवपूर्ण चक्रांकन को देख, जो अग्नि से भी ज्यादा प्रकाशमान लग रहा है, उसका गौरव महसूस कर हम सभी आपका कैंकर्य करने के लिए यहाँ आए हैं। हमारे साथ हमारी अगली पीढ़ियाँ भी आपके कैंङ्कर्य में सम्मिलित रहेंगी। हम उन सुदर्शन चक्र धारी भगवान का गुणानुवाद कर रहे हैं जिन्होंने बाणासुर के सहस्त्र बाहु को काट दिए थे, जिससे उसके बाहुओं से रक्त की बाढ़ सी आ गई थी।

अष्टम पाशुर 

आळ्वार संत इस पाशुर में ऐश्वर्यार्थी (धन की कामना करने वाले) भागवतों को जो अण्डक्कुलत्तुक्कु (पांचवे पाशुर) में आळ्वार संत के साथ भगवद गुणानुवाद के लिये संग आये थे को स्वीकार कर रहे है। 

नेय्यिडै नल्ल्लदोर् सोऱुम् नियतमुम् अत्ताणिच् चेवगमुम्

कै अडैक्कायुम् कळुत्तुक्कुप् पूणोडु कादुक्कुक् कुण्डलमुम्

मेय्यिड नल्लदोर् सान्दमुम् तन्दु एन्नै वेळ्ळुयिर् आक्कवल्ल

पैयुडै नागप् पगैक्कोडियानुक्कुप् पल्लाण्डु कूऱुवने 

(इस पाशुर में ऐश्वर्यार्थी कह रहे हैं) हम उन एम्पेरुमान का गुणानुवाद करते है, जो हमें शुद्ध स्वादिष्ट, घी से तर प्रसाद पवाते हैं (आराधना में निवेदित किया हुआ नैवैद्य), जिनकी एकांत सेवा में निवेदित किए ताम्बूल (पान, सुपारी और पोदीना), गले के लिए कंठ हार, कर्ण में धारण करने कुण्डल, स्वास्थ्य के लिए उपकारी चन्दन का लेप, अडियेन को सद्बुद्धि प्रदान करने वाले वह भगवान जिनकी ध्वजा पर सर्पों के शत्रु गरुड़जी विराजमान हैं।

नवम पाशुर 

इस नवम पाशुर में आळ्वार संत ने वाळाट्पट्टु (तीसरे पाशुर) में जिन भागवतों को आमंत्रित किये थे, और जो छठवे पाशुर एन्दै तन्दै. में आळ्वार संत ने जिन्हे स्वीकार किया, यह सभी भागवत मिलकर एम्पेरुमान का गुणानुवाद कर रहे है।

उडुत्तुक् कळैन्द निन् पीदग आडै उडुत्तुक् कलत्तदुण्डु

तोडुत्त तुळाय् मलर् सूडिक्कळैन्दन सूडुम् इत्तोण्डगळोम्

विडुत्त तिसैक् करुमम् तिरुत्तित् तिरुवोणत् तिरुविळविल्

पडुत्त पैन्नागणैप् पळ्ळि कोण्डानुक्कुप् पल्लाण्डु कूऱुदुमे

यहाँ आळ्वार संत सभी भागवतों के साथ मिलकर कह रहे हैं, हे भगवान! हम आपके सेवक हैं, हम आपके धारण किए हुए कटिवस्त्र धारणकर, आपके निर्माल्य की तुलसीमाला धारणकर, आपको ही निवेदित नैवैद्य का उच्छिष्ट प्रसाद पाएँगे, हम अपने फन फैलाये शेषजी की शैया पर शयन कर रहे भगवान श्रीमन्नारायण, आपके हर कार्य को चहुँ दिशाओं में शेषजी पूर्ण कर देते हैं, ऐसे एम्पेरुमान के गुणानुवाद आपके मंगल तिरु नक्षत्र तिरुवोणम (श्रावण) नक्षत्र पर करेंगे।

दशम पाशुर

इस पाशुर में आळ्वार संत उन कैवलयार्थी आत्मानुभव करने वाले भागवत, जिनको आळ्वार संत ने  एडु निलत्तिल् (चतुर्थ पाशुर) में आमंत्रित किये थे, और जो तीयिल् पोलिगिन्ऱ पासुरम्. (सप्तम पाशुर) में स्वीकारे गये, के संग भगवान के गुणानुवाद कर रहे है।

एन्नाळ् एम्पेरुमान् उन् तनक्कु अडियोम् एन्ऱु एळुत्तुप्पट्ट

अन्नाळे अडियोन्गळ् अडिक्कुडिल् वीडु पेऱ्ऱु उय्न्ददु काण्

सेन्नाळ् तोऱ्ऱीत् तिरु मदुरैयुळ् सिलै कुनित्तु ऐन्दलैय

पैन्नागत् तलैप् पाय्न्दवने उन्नैप् पल्लाण्डु कूऱुदुमे

हे भगवान, हमने जबसे आपके कैंङ्कर्य में, आपकी सेवा में स्वयं को समर्पित किया है, तब से हमारा वंश आत्मानुभव के सुख से ऊँचा उठ गया है, हे कृष्ण! आपका शुभ मंगल दिवस में आविर्भाव हुआ है, जिन्होंने मथुरा में कंस के खेल उत्सव में धनुष को तोड़ दिया था ,जो कालिया दाह में कूद कर कालिया नाग के फनों पर नृत्य किए थे, हम सब मिलकर आपके ही गुणगान के गीत गाएँगे।

एकादश पाशुर

इस एकादश पाशुर में आळ्वार संत ऐश्वर्यार्थी भागवतों, जिनको संत ने अण्डक्कुलत्तुक्कु (पांचवे पाशुर) में आमंत्रित किये थे और जो “नेय्यिडै” अष्टम पाशुर में संग होते है। 

अल्वळक्कु ओन्ऱुम् इल्ला अणि कोट्टियर् कोन् अबिमानतुन्गन्

सेल्वनैप्पोल तिरुमाले नानुम् उनक्कुप् पळवडियेन्

नल्वगैयाल् नमो नारायणा एन्ऱु नामम् पल परवि

पल् वगैयालुम् पवित्तिरने उन्नैप् पल्लाण्डु कूऱुवने

हे लक्ष्मीरमण, आप तिरुकोष्टियुर में विराजित सेल्वनम्बि की तरह हैं, तिरुकोष्टियुर वासियों के नेता हैं, संसार में एक रत्न की तरह हैं; जो आपके दास्य स्वरुप में सम्मानीय है, यह दास भी, युगों युगों से आप ही का सेवक है, हे भगवान! आप अपने मूल स्वभाव गुण रूप से सबको सुख, संपत्ति, ऐश्वर्य प्रदान करते हैं, यह दास भी आपके अष्टाक्षर मंत्र से आपका ध्यान करेगा और सहस्त्रनाम संकीर्तन करेगा।

द्वादश पाशुर 

तिरु पल्लाण्डु के इस अंतिम पाशुर में, आळ्वार संत बतला रहे है की जो भी भागवत इस प्रबंध से भगवान् को,  समर्पित भाव से, भगवान का मुखोल्लास कर गुणगान करेंगे, निश्चित ही एम्पेरुमान की प्रीती पाकर, काल चक्र के अंत तक सेवा का सौभाग्य प्राप्त करेंगे, इसके साथ ही आळ्वार संत ने इस प्रबंध को पूर्ण किये है। 

पल्लाण्डु एन्ऱु पवित्तिर्नैप् परमेट्टियैच् चार्न्गम् एन्नुम्

विल् आण्डान् तन्नै विल्लिपुत्तूर् विट्टुचित्तन् विरुम्बिय सोल्

नल् आण्डेन्ऱु नविन्ऱु उरैप्पार् नमो नारायणाय एन्ऱु

पल्लाण्डुम् परमात्मनैच् चूळ्न्दिरुन्दु एत्तुवर् पल्लाण्डे

यह द्वादश प्रबंध यह कह रहा है, यह प्रबंध विष्णुचित्त (पेरिय आळ्वार), जिनका प्राकट्य श्रीविल्लिपुत्तूर में हुआ, जो भगवान श्रीमन्नारायण के धनुष के अंश हैं, जो सदा परमपद (श्रीवैकुण्ठ) में विराजते हैं, जिनकी सदा यह अभिलाषा रहती है की एम्पेरुमान का सदा मंगल हो, भागवतों को सदा अनुकूल समय जान कर, अष्टाक्षर मंत्र का ध्यान करते हुए, सदा भगवान श्रीमन्नारायण की परिक्रमा करते हुए, उनका मंगल, पल्लाण्डु (भगवान जब तक पृथ्वी पर रहे तब तक सदा अनुकूल रहे, सुखी रहे ) गाना चाहिए।

अडियेन श्याम सुन्दर रामानुज दास

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