आर्ति प्रबंधं – ४३

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

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उपक्षेप

पिछले पासुरम में मामुनि कहतें हैं : “इरंगाय एतिरासा” . इससे ये माना जा सकता है कि मामुनि अपनि निराशा प्रकट कर रहें हैं।  परमपद पहुँचने कि इच्छा करने वाले को दो विषयाँ आवश्यक हैं १) वहाँ जाने कि इच्छा २) (इस भूमि पर) यहाँ रहने से द्वेष। इसी का सारांश है (श्री वचनभूषणम ४५८) “प्राप्य भूमियिल प्रावण्यमुम त्याज्य भूमियिल जिहासयुम” सूत्र। मामुनि को निराशा  हैं कि यह दोनों उनमें नहीं है। अत्यंत उदास होकर मामुनि सोच में पड़ते हैं कि इन दोनों गुण न होते हुए श्री रामानुज उन्को (मामुनि को) परमपद प्राप्ति कैसे दिलाएँगे।

पासुरम ४३

इन्द उलगिल पोरूंदामै  ऐदुमिल्लै

अंद उलगिल पोग आसैयिल्लै

इंद नमक्कु एप्पडियो  तान तरुवार एँदै  एतिरासर

ओप्पिल तिरुनाडु उगंदु

 

शब्दार्थ

ऐदुमिल्लै  – (मुझे) एक अणु  भी नहीं है

पोरूंदामै – दिलचस्पी कि अनुपस्तिथि  जो मुझे निकाल सकती है

इन्द उलगिल – इस क्रूर लोक (से) जिसको फेंकना है

आसैयिल्लै  – (और मुझे ) कोई दिलचस्पि नहीं

पोग – जाने में

अंद उलगिल – परमपद को , जो परम लक्ष्य है

इंद नमक्कु – ऐसे व्यक्ति (मैं ) के प्रति, जिसके पास यह दो आवश्यक गुण नहीं हैं।  

एप्पडियो तान  – किस उपाय से 

एँदै – मेरे पिताश्री

एतिरासर – एम्पेरुमानार (को)

तरुवार  – देंगे

उगंदु – संतोष से

तिरुनाडु – परमपदम

ओप्पिल – जो अद्वितीय है

सरल अनुवाद

इस पासुरम में, मामुनि कहतें हैं कि, परमपदम पहुँचने कि आवश्यक दो गुण उन्के पास नहीं हैं। वें कहतें हैं कि उनमें इस साँसारिक लोक के प्रति एक अणुमात्र द्वेष नहीं है और न ही परमपदम पहुँचने के लिए विशेश दिलचस्पी। वे सोचतें हैं कि ऐसे स्तिथि में उन्के पिता श्री रामानुज कैसे ख़ुशी से परमपदम कि प्राप्ति देँगे।  

स्पष्टीकरण

मामुनि कहतें हैं, “(तिरुवाय्मोळि ४.९.७)”कोडुवुलगम काट्टेल” के अनुसार कठोर और हटाने लायक इस सँसार में मेरी दिलचस्पी की कोई कमी नहीं हैं।  उसी समय (पेरिय तिरुमोळि ६.३.८)”वान उलगम तेळिंदे एन्ड्रैदुवदु” के अनुसार पहुँचने केलिए तरसने लायक जगह जो परमपदम हैं, वहाँ पहुँचने केलिए दिलचस्पी भी नहीं हैं। ऐसे स्तिथि में इस अद्वितीय परमपदम तक मेरे पिताश्री एम्पेरुमानार आनन्द से कैसे ले जाएँगे?

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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