नाच्चियार् तिरुमोऴि – सरल व्याख्या – बारहवां दशक – मट्रु इरुन्दीर्गट्कु

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नमः नाच्चियार् तिरुमोऴि << ग्यारहवां दशक आण्डाळ् एम्पेरुमान् के सुवचनों का आश्रय लेती हैं कि वे सर्वरक्षक हैं,पेरियाळ्वार(श्री विष्णुचित्त स्वामी जी)के साथ सम्बन्ध का आश्रय लेती हैं परन्तु इच्छा पूर्ण न होने से(एम्पेरुमान् के दर्शन और प्राप्ति) व्यथित हो गई “एम्पेरुमान् स्वातंत्र्य … Read more

नाच्चियार् तिरुमोऴि – सरल व्याख्या – ग्यारहवां दशक – ताम् उगक्कुम्

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नमः नाच्चियार् तिरुमोऴि << दसवां तिरुमोऴि भगवान कभी अपना वचन नहीं त्यागेंगे; वे सदा हमारी रक्षा करेंगे। गोदा देवी (आण्डाळ्) दृढ़ थी कि यदि यह भी असफल होने पर भी वे हमें इसलिए शरण देंगे क्योंकि हम श्रीविष्णुचित्त (पेरियाऴ्वार्) की दिव्य पुत्री … Read more

नाच्चियार् तिरुमोऴि – सरल व्याख्या – दसवां तिरुमोऴि – कार्क्कोडल् पूक्काळ्

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नमः नाच्चियार् तिरुमोऴि << नौंवा तिरुमोऴि प्रारंभ में वह स्वयं को बनाए रखने के लिए कामदेव, पक्षियों और मेघों के चरणों को पकड़ती है। इससे उसका‌ कोई लाभ नहीं हुआ। यद्यपि भगवान नहीं आए, उसने सोचा कि वह भगवान से संबंधित वस्तुओं … Read more

नाच्चियार् तिरुमोऴि – नौंवा तिरुमोऴि – सिन्दुरच् चॆम्बॊडि

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नमः नाच्चियार् तिरुमोऴि << आठवां तिरुमोऴि आठवें दशक में आण्डाळ् (गोदाम्बा) दुःखी थी अर्थात उसके अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगा था। वहाँ कुछ मेघ थे भगवान के पास जाकर इसकी दशा के बारे में बताने। परंतु वे कहीं नहीं ग‌ए, और पूरा जल … Read more

नाच्चियार् तिरुमोऴि – सरल व्याख्या – आठवां तिरुमोऴि – विण्णील मेलाप्पु

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नमः नाच्चियार् तिरुमोऴि <<सातवां तिरुमोऴि इसके‌ पूर्व के दशक में वह पाञ्चजन्य आऴ्वान् से भगवान श्रीमन्नारायण (एम्पेरुमान्) के अधरामृत के स्वरूप के विषय में पूछती है। उससे पूछताछ करने के पश्चात आण्डाळ् के हृदय का अनुभव भगवान तक पहुँच जाता है। उसी … Read more

उपदेश रत्तिनमालै – सरल व्याख्या – पासुरम् ७३ और समापन

। ।श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत् वरवरमुनये नमः। । उपदेश रत्तिनमालै << पासुरम् ७० – ७२ पासुरम् ७३  तिहत्तरवां पासुरम्। इस प्रबंध को सीखने पर प्राप्त लाभ दयापूर्वक बताते हुए श्रीवरवरमुनि स्वामी इसका समापन करते हैं।  इन्द उपदेस रत्तिन मालै तन्नै सिन्दै तन्निल् नाळुम् सिन्दिप्पार् – ऎन्दै ऎतिरासर् इन्नरुळुक्कु ऎन्ऱुम् इलक्कागिच् चदिराग वाऴ्न्दिडुवर् … Read more

उपदेश रत्तिनमालै – सरल व्याख्या – पासुरम् ७० – ७२

। ।श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत् वरवरमुनये नमः। । उपदेश रत्तिनमालै << पासुरम् ६७-६९ पासुरम् ७० सत्तरवां पासुरम्। श्रीवरवरमुनि स्वामी उस बुराई की व्याख्या करते हैं जब प्रतिकूल लोग, जो त्याज्य हैं, उनकी संगत के कारण हमारे साथ होती है। तीय गन्दम् उळ्ळदॊन्ऱैच् चेर्न्दिरुप्पदॊन्ऱुक्कुतीय गन्दम् एऱुम् तिऱम् अदु पोल् – तीयगुणम् उडैयोर् … Read more

उपदेश रत्तिनमालै – सरल व्याख्या – पासुरम् ६७ – ६९ 

। ।श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत् वरवरमुनये नमः। । उपदेश रत्तिनमालै << पासुरम् ६६ पासुरम् ६७  सड़सठवां पासुरम्। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने हृदय को कुछ इस प्रकार उत्तर दे रहे हैं, मानो‌ वह उनसे पूछ रहा‌ हो, “तुम कह रहे हो कि हमें ऐसा जीना चाहिए जैसे कि आचार्य ही सब कुछ हैं, जबकि … Read more

उपदेश रत्तिनमालै – सरल व्याख्या – पासुरम् ६६

। ।श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत् वरवरमुनये नमः। । उपदेश रत्तिनमालै << पासुरम् ६४ – ६५ पासुरम् ६६ छियासठवाँ पासुरम्। वे अपने हृदय को उत्तर देते हैं, जिसने संभवतः उनसे प्रश्न किया कि क्या कोई ऐसा व्यक्ति है जिसे पिछले पाशुरों में बताई गई अवधारणाओं के उदाहरण के रूप में पृथक किया … Read more

उपदेश रत्तिनमालै – सरल व्याख्या – पासुरम् ६४ – ६५

। ।श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत् वरवरमुनये नमः। । उपदेश रत्तिनमालै << पासुरम् ६२ – ६३ पासुरम् ६४ चौंसठवां पासुरम्। वे अपने हृदय से कहते हैं कि यद्यपि आचार्य ही परम लाभ हैं, अर्थात उन्हें प्राप्त करना चाहिए और उनके साथ रहकर आनंद लेना चाहिए, किन्तु किसी शिष्य के लिए उनके आचार्य … Read more