श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमत् वरवरमुनये नमः

कुलशेखर आऴ्वार् का जन्म तिरुवंजिक्कळम् में हुआ था, जो तिरुमूऴिक्कळम् के निकट स्थित एक केरळ दिव्यदेश है। उनका जन्म मासि (माघ) मास के पुनर्पूसम् (पुनर्वसु) नक्षत्र में हुआ। उनका जन्म भगवान श्रीराम के नक्षत्र पुनर्वसु में होने के कारण वे श्रीरामावतार में अत्यन्त अनुरक्त थे। वे अपना अधिकांश समय श्रीरामायण श्रवण में व्यतीत करते थे। उन्होंने विद्वानों द्वारा रामायण-प्रवचन की व्यवस्था की और निरन्तर उसका श्रवण करते रहे।
वे क्षत्रिय कुल में अवतरित हुए थे। वे राजाओं के भी राजा थे, किन्तु स्वयं को भगवान का सेवक मानते थे और इसी में अपना सौभाग्य समझते थे। उन्हें श्रीरंगम् के प्रति अत्यंत प्रेम था और वे प्रतिदिन वहाँ जाने की इच्छा रखते थे। उनकी भक्ति दृढ़ थी और भगवद्भक्तों (भागवतों) के प्रति उनकी श्रद्धा और विश्वास अटूट था।
कुलशेखर आऴ्वार् वाऴि तिरुनामम् :-
अञ्जन मामलै पिरवि आदरित्तोन् वाऴिये।
अणि अरङ्गर मणत्तूणै अडैन्दु उय्न्दोन् वाऴिये॥
वञ्जि नगरम् तन्निल् वाऴ वन्दोन् वाऴिये।
मासि तनिल् पुनर्पूसम् वन्दुदित्तान् वाऴिये॥
अञ्जल् ऎनक् कुडप् पाम्बिल् अङ्गै इट्टान् वाऴिये।
अनवरतम् इराम कथै अरुळुमवन् वाऴिये॥
सॆञ्जॊल् मॊऴि नूट्रञ्जुम् सॆप्पिनान् वाऴिये।
सेरलर् कोन् सॆङ्गमलत्तिरुवडिगळ् वाऴिये॥
सरल अर्थ :
अञ्जन मामलै पिरवि आदरित्तोन् वाऴिये
“अञ्जन मामलै” का अर्थ तिरुमला (तिरुवेंगड़म पर्वत) है। आऴ्वार् की तीव्र अभिलाषा थी कि उन्हें तिरुवेंगड़म पर्वत पर किसी भी रूप में जन्म प्राप्त हो। उन्होंने पेरुमाळ् तिरुमोऴि में “ऊनेरु सेल्वत्तु” नामक दशक की रचना की, जो तिरुवेंकटमुडैयान् के लिए समर्पित है।
इस दशक में आऴ्वार् ने इच्छा व्यक्त की कि वे भगवान से किसी भी प्रकार सम्बन्धित वस्तु बन जाएँ। वे कोनेरी पुष्करणी में रहने वाला बगुला बनना चाहते थे; तिरुमला के सरोवर में मछली बनना चाहते थे। जब भगवान को अर्घ्य और पाद्य अर्पित किया जाए, तब वे उस स्वर्ण-पात्र के रूप में रहना चाहते थे जिसमें जल लाया जाता है। वे चम्पक-वृक्ष बनना चाहते थे, स्तम्भ बनना चाहते थे, सीढ़ी बनना चाहते थे अथवा तिरुवेंकट पर्वत तक जाने वाला मार्ग बनना चाहते थे।
उनकी एकमात्र इच्छा थी कि किसी भी रूप में तिरुमला में रहें, जहाँ भगवान स्थायी रूप से विराजमान हैं। हमारे पूर्वाचार्यों ने पेरुमाळ् तिरुमोऴि के इन पदों का अत्यन्त गहन अर्थों सहित सुंदर विवेचन किया है।
प्रसिद्ध पूर्वाचार्य अनन्ताऴ्वान् ने भी तिरुवेंकटमुडैयान् की सेवा के लिए तिरुमला में पुष्पोद्यान और सरोवर का निर्माण किया तथा पुष्प-कैङ्कर्य करते रहे। उनका भी यही भाव था कि किसी भी रूप में तिरुमला में रहना ही परम सौभाग्य है। चाहे वे स्वयं तिरुवेंकटमुडैयान् हों, चाहे किसी अन्य रूप में हों, किन्तु उनका अस्तित्व तिरुमलै में होना चाहिए।
पराशर भट्टर जब पेरुमाळ् तिरुमोऴि का पाठ करते थे, तो उन्हें अनुभव होता था कि कुलशेखर आऴ्वार् तिरुमला में किसी अदृश्य पत्थर या लकड़ी के टुकड़े के रूप में भी रहना स्वीकार करेंगे। वे नहीं चाहते थे कि देवता, मनुष्य या कोई अन्य उन्हें पहचाने या सम्मान दे। उनकी एकमात्र अभिलाषा तिरुमला में उपस्थित रहना थी।
इसी प्रकार आऴ्वार् ने प्रार्थना की,
“पडियाय् किडन्दु उन् पवळ वाय् काण्बेने”
अर्थात्, “मैं आपके सन्निधि के बाहर एक सीढ़ी बनकर पड़ा रहूँ और आपके प्रवाल-सदृश अधरों का दर्शन करता रहूँ।”
यद्यपि सीढ़ी एक जड़ वस्तु है, उसमें ज्ञान नहीं है, फिर भी आऴ्वार् भगवान के दिव्य अधरों और उनकी मंदस्मिता का आनन्द लेने की इच्छा रखते थे। इसी कारण आज भी भगवान के सन्निधि के निकट स्थित उस सीढ़ी को ‘कुलशेखर पड़ी’ कहा जाता है।
ऐसे आऴ्वार्, जिन्होंने तिरुमलै में इस सर्वोच्च स्थिति की कामना की, चिरंजीवी रहें!
अणि अरङ्गर मणत्तूणै अडैन्दु उय्न्दोन् वाऴिये
श्रीरंगम् में पेरिय पेरुमाळ् के सम्मुख दो स्तम्भ हैं, जिन्हें तिरुमणत्तूण (मंगलमय स्तम्भ) कहा जाता है। आऴ्वार् और आचार्य जब भगवान का मंगलाशासन करते थे, तब वे इन स्तम्भों का सहारा लेते थे।
भगवान के अप्रतिम सौन्दर्य को देखकर उनका हृदय और शरीर प्रेम से द्रवित हो जाता था और वे खड़े नहीं रह पाते थे। तब ये स्तम्भ उन्हें गिरने से बचाते थे।
ऐसे आऴ्वार्, जिन्होंने जीवन के अन्त में श्रीरंगम् पहुँचकर अपनी अभिलाषित परम स्थिति प्राप्त की, उनका मंगल हो (दीर्घायु/चिरायु रहें) (पल्लाण्डु) !
वञ्जि नगरम् तन्निल् वाऴ वन्दोन् वाऴि –
यह आऴ्वार् तिरुवंजिक्कळम् में अवतरित हुए। वे श्रीरामावतार में अत्यन्त अनुरक्त थे और अन्ततः श्रीरंगम् पहुँचे। ऐसे आऴ्वार् का मंगल हो (दीर्घायु/चिरायु रहें) (पल्लाण्डु) !
मासि तनिल् पुनर्पूसम् वन्दुदित्तान् वाऴिये –
जो आऴ्वार् मासि मास के पुनर्पूसम् नक्षत्र में अवतरित हुए, उनका मंगल हो (दीर्घायु/चिरायु रहें) (पल्लाण्डु) !
अञ्जल् ऎनक् कुडप् पाम्बिल् अङ्गै इट्टान् वाऴिये –
यह घटना आऴ्वार् की अद्भुत भक्तिभावना को दर्शाती है।
वे श्रीरामभक्तों और भागवतों के प्रति अत्यन्त श्रद्धावान थे। उनके मंत्री सोचते थे कि राजा का भक्तों के प्रति इतना अनुराग उचित नहीं है। इसलिए उन्होंने भगवान के कुछ आभूषण छिपा दिए और श्रीवैष्णवों पर चोरी का आरोप लगाया।
आऴ्वार् को पूर्ण विश्वास था कि वे भक्त निर्दोष हैं। सत्य सिद्ध करने के लिए उन्होंने विषैले सर्पों से भरा एक घड़ा मँगवाया और घोषणा की, “यदि श्रीवैष्णव चोर हैं तो मेरे हाथ को सर्प डँस लें; अन्यथा मंत्रियों का अपराध सिद्ध हो।”
उस समय ऐसी परीक्षा सत्य-प्रतिपादन का एक स्वीकार्य माध्यम मानी जाती थी।
आऴ्वार् ने अपना हाथ घड़े में डाल दिया, किन्तु सर्पों ने उन्हें नहीं काटा। तब मंत्रियों ने अपना अपराध स्वीकार कर क्षमा माँगी।
अनवरतम् इराम कथै अरुळुमवन् वाऴिये –
यह आऴ्वार् सदैव श्रीराम की कथाओं का श्रवण करते थे। रामायण सुनते समय वे स्वयं को उसी युग में उपस्थित अनुभव करते थे।
एक बार प्रवचनकर्ता सीताजी के रावण द्वारा अपहरण का वर्णन कर रहे थे। यह सुनकर आऴ्वार् समय और स्थान का भान भूल गए और अपने सैनिकों को श्रीराम की सहायता के लिए युद्ध-तैयारी का आदेश दे दिया।
तब प्रवचनकर्ता ने उन्हें बताया कि श्रीराम रावण का वध कर चुके हैं और सीताजी सुरक्षित हैं। तब जाकर उन्हें स्मरण हुआ कि वे किसी अन्य काल में हैं। ऐसे श्रीरामावतार में पूर्णतया निमग्न आऴ्वार् का मंगल हो (दीर्घायु/चिरायु रहें) (पल्लाण्डु) !
सॆञ्जॊल् मॊऴि नूट्रञ्जुम् सॆप्पिनान् वाऴिये –
सम्प्रदाय में श्रीराम को विशेष रूप से “पेरुमाळ” कहा जाता है। चूँकि आऴ्वार् का श्रीराम के प्रति अत्यन्त गहरा अनुराग था, इसलिए वे “कुलशेखर पेरुमाळ्” के नाम से विख्यात हुए।
उन्होंने इस संसार को पेरुमाळ् तिरुमोऴि के 105 मधुर और सुन्दर पाशुरम् प्रदान किए। ऐसे आऴ्वार् का मंगल हो (दीर्घायु/चिरायु रहें) (पल्लाण्डु) !
सेरलर् कोन् सॆङ्गमलत्तिरुवडिगळ् वाऴिये –
चेर वंश के इस महान राजा के लाल कमल के समान दिव्य चरण सदा-सर्वदा मंगलमय रहें और युग-युगांतर तक प्रतिष्ठित रहें!
अडियेन् श्रीकांत रामानुज दास
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