आर्ति प्रबंधं – १

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

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emperumanar

वाळि एतिरासन वाळि एतिरासन
वाळि एतिरासानेन वाळ्तुवार वाळियेन
वाळ्तुवार वाळि एन वाळ्तुवार ताळिनैयिल
ताळ्तुवार विण्णोर तलै

शब्दार्थ

विण्णोर – नित्यसूरीया (श्रीमन नारायण के नित्य निवास परमपद में उनके नित्य सेवक)
तलै – कोई जनों को अपने स्वामी मानते हैं।
ताळ्तुवार – (जो) शरणागति करते हैं
ताळिनैयिल – दो चरण कमलों में
वाळियेन वाळ्तुवार – जो भक्तों कि मंगळासासनं करते हैं।
वाळियेन वाळ्तुवार – जो भक्तों कि मंगळासासनं करते हैं।
वाळ्तुवार – जो यह गा कर श्री रामानुज कि मँगळम करते हैं
वाळि एतिरासन – जय श्री रामानुज !!!
वाळि एतिरासन – जय श्री रामानुज !!!
वाळि एतिरासन – जय श्री रामानुज !!!
एन – इस प्रकार तीन बार

सरल अनुवाद

नित्यसूरीया कुछ जनों को अपने स्वामी मानते हैं। श्री रामानुज की मंगळासासनं करने वाले भक्तों कि मंगळासासनं करने वाले भक्तों कि मंगळासासनं करने वालो के चरण में शरणागति करने वाले जान हैं वे।

विवरण

वैदिक ग्रंथो के अनुसार अपने जीवन जीने वाले परम वैदिक कहलाते हैं। “पल्लाण्डु पल्लाण्डु पल्लायिरत्थांडु” (तिरुपल्लाण्डु १ ), “पोलिग पोलिग पोलिग” (तिरुवाय्मोळि 5.२.१ ), जैसे मंगळम गाना इनका स्वभाव हैं। प्रारुपिकतया वे तीन बार गाते हैं। इसी प्रकार मणवाळ मामुनि अपने ग्रंथ को प्रारंभ करते हैं। एक भक्तों कि गण हैं (गण १) जो “वाळि एतिरासन वाळि एतिरासन वाळि एतिरासन” , से श्री रामानुज कि मँगळम गाते हैं। एक दुसरे गण हैं (गण २ ) जो श्री रामानुज के प्रति मँगळम गाते हुए गण (गण १ ) को देख, उत्साह में उनकी मँगळम “श्री रामानुज की मँगळम गाने वाले इन भक्तों कि जय”, से करते हैं। इस घटना को तीसरी गण (गण ३ )ने दर्शन किया। श्री रामानुज कि मंगळम गाने वाले (गण १) जनों कि मंगळम गाने वाले (गण २ ) इस गण को देख, उत्साह में ये (गण ३ ), “वाळियेन वाळ्तुवार वाळी” से मंगळम गाने लगे। “वाळियेन वाळ्तुवार वाळी” गाते इस गण को देख, एक गण (गण ४) उनके चरणकमलों में शरणागति किये। सारे ब्रह्मांड में इनके चरण कमलों से उचित अन्य कुछ नहीं हैं। शायद उन्कि दाहिनी और बायें पाँव के मध्य हि तुल्ना की जा सकति हैं। नित्यसूरीया इस गण को अपने स्वामी मान्ते हैं और यह गण नित्यसूरियों से भी बढ़ कर हैं। मणवाळ मामुनि, इस ग्रंथ की शुरुआत “वाळी” से करते हैं।

अडियेन प्रीती रामानुज दासि

आधार :  http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2016/06/arththi-prabandham-1/

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