चतुः श्लोकी – अंत में कहे जाने वाला श्लोक

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः

चतुः श्लोकी

श्लोक
varadharaja-perundhevithayar-ekasanam

अंत में कहे जाने वाला श्लोक:

आकार त्रय संपन्नाम अरविंद निवासिनीम् |
अशेष जगतीशित्रीम् वंदे वरद वल्लभाम् ||

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अनुवाद

संसार के श्रृष्टि एवं परिपालन करने वाले श्री वरदराजपेरुमाळ के प्रिय, जो केवल उनके प्रति शीश (दास्यता), पारतंत्र्य (पूर्ण निर्भरता) तथा अनन्य भोग्यता ( उन्ही के आनंद मात्र) निभाती हैं और कमल में वास करति हैं, उनको मैं पूजता हूँ ।

इस अनुभव को बढ़ाने के लिए कुछ और श्लोक (दामल वंकिपुरम पार्थसारथी स्वामि) प्रस्तुत करते हैं-

ॐ भगवन्नारायण अभिमतानुरूप स्वरूपगुणविभवैश्वर्य शीलाध्य अनवदिकातिशय असंख्येय कल्याण गुणगणाम , पद्मवनालयाम , भगवतीं , श्रियं देवीं , नित्यानपायिनीम् , देवदेवदिव्यमहिषीम , अखिल जगन्मातरम् अस्मन्मातरम् अशरण्य शरण्याम अनन्य शरण: शरणमहं प्रपध्ये ।।

अनुवाद

श्रीमन नारायण के लिए रूप, स्वरूप ,गुण ,वैभव, ऐश्वर्य तथा अकलंकित स्वभाव में जो योग्य हैं, असंखित कल्याण गुण संपन्न, भगवति नाम के ६ शुभों से पूर्ण, श्री नामक, मेरी प्रिय माते, अन्य गति न होने के कारण में उनको गति मानकर  प्रपत्ति करता हूँ।

 — शरणागति गद्यं , १ चुरणै

उल्लास पल्लवित पालित सप्तलोकी
निर्वाह गोरकित नेम कटाक्ष लीलां।
श्री रंग हर्म्य तव मंगळ दीप रेखां
श्री रंगराज महिषीं श्रियं आश्रयाम: ||

अनुवाद

हम उन श्रीमहालक्ष्मीजी के शरणों में आत्म समर्पण करे, जो अपनी झलक से सातो लोकों को समृद्ध करती हैं और श्री रंगराज के दिव्यमहिषी होने से श्रीरंगम कि शुभ दीप की रेखा हैं।

समस्त जननीं वन्दे चैतन्य स्तन्य धायिनीम् ।
श्रेयसीं श्रीनिवासस्य करुणामिव रूपिणीम् ।।

अनुवाद

अपने आनंददायी झलक से जीवात्माओं को अपने स्तनों से ज्ञान की दूध पिलाने वालि जो श्री श्रीनिवास के करुणा कि रूप हैं और जो उनके श्रेयस की कारण हैं (उनमें वास कर) उन श्री महालक्ष्मी को मैं पूजता हूँ।

अडियेन् प्रीती रामानुज दासि

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