श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः
आऴ्वार् वे हैं जिन्हें “मयर्वऱ मदिनलम्” (कल्मष-रहित ज्ञान) के कारण दिव्य भक्ति का वरदान प्राप्त हुआ। ऎम्पॆरुमान् (भगवान) के साथ उनका उमड़ता हुआ अनुभव “दिव्यप्रबन्धम्” के रूप में प्रकट हुआ। “दिव्यप्रबन्धम्” वेदों का सार प्रस्तुत करता है।
“दिव्यप्रबन्धम्” का उद्देश्य हमें भगवान तक ले जाना है।
आऴ्वार् कहते हैं कि केवल भगवान ही उपाय (साधन) हैं और वही उपेय (लक्ष्य) भी हैं। यही सिद्धान्त वेद में भी प्रतिपादित है।
“भगवद्गीता”, “श्रीरामायण” और “वराहपुराण” में बताया गया है कि जो व्यक्ति भगवान के प्रति शरणागति करता है उसकी रक्षा निश्चय ही होती है।
“श्रीगीता” के अठारहवें अध्याय (१८.६६) का श्लोक स्पष्ट करता है कि वही उपाय हैं –
सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥
ऋषियों, आऴ्वारों और आचार्यों ने भी यही दर्शाया है कि भगवान ही उपाय हैं। उन्हीं के चरणकमलों का आश्रय लेकर हमें उन तक पहुँचना है, और उन तक पहुँचना ही उपेय (लक्ष्य) है। यही हमारा वास्तविक फलम् है।
तिरुमङ्गै आऴ्वार् (परकाल स्वामी) के कृतियाँ :
तिरुमङ्गै आऴ्वार् के कृतियाँ – पॆरिय तिरुमॊऴि, तिरुक्कुरुन्दाण्डकम्, तिरुवॆऴुकूट्रिरुक्कै, सिऱिय तिरुमडल्, पॆरिय तिरुमडल्, तिरुनेडुन्दाण्डकम्।
इन षट्कृत्यों में से पॆरिय तिरुमॊऴि, तिरुक्कुरुन्दाण्डकम्, तिरुनेडुन्दाण्डकम् – द्वितीय सहस्त्र में आते हैं।
शेष तीन कृतियाँ – तिरुवॆऴुकूट्रिरुक्कै, सिरिय तिरुमडल्, पॆरिय तिरुमडल् – इयऱ्-पा अर्थात तृतीय सहस्त्र में आते हैं। ये तीनों इयऱ्-पा के अन्तर्गत हैं। “इयल्” सामान्यतः संगीत के साथ नहीं गाये जाते, और इन्हें किसी संगीतमय रूप में व्यवस्थित भी नहीं किया जाता।
श्रीवरवरमुनि (मामुनिगळ्) द्वारा तिरुमङ्गै आऴ्वार् की स्तुति
श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का परकाल स्वामीजी पर एक पाशुरम्, उपदेश रत्तिन मालै के अष्टम पाशुरम् में, तिरुमङ्गै आऴ्वार् के कृत्य की महिमा का वर्णन करता है।
पेदै नॆञ्जे इऩ्रैप्पॆरुमै अरिन्दिलैयो
एदु पॆरुमै इऩ्रैक्कॆन् ऎन्निल् ओदुगिन्रॆन्
वाइत्त पुगऴ् मङ्गैयर्क्कोऩ् मानिलत्तिल् वऩ्दुदित्त
कार्त्तिगैयिल् कार्त्तिगै नाळ् काण्
हे मूर्ख मन! क्या तुम इस दिन से सम्बन्धित महिमा को नहीं जानते? जगत में विख्यात तिरुमङ्गै आऴ्वार् कार्त्तिगै मास में कार्त्तिगै नक्षत्र के अन्तर्गत अवतीर्ण हुए।
परकाल स्वामीजी (तिरुमङ्गै आऴ्वार्) और श्रीशठकोप सूरी (नम्माऴ्वार्) का सम्बन्ध
नम्माऴ्वार् के कृत्य चारों वेदों के तुल्य माने जाते हैं।
- तिरुविरुत्तम् – १०० पाशुर – ऋग्वेद
- तिरुवासिरियम् – ७ पाशुर – यजुर्वेद
- पॆरिय तिरुवन्दादि – ८७ पाशुर – अथर्वणवेद
- तिरुवाय्मोऴि – ११०२ पाशुर – सामवेद
तिरुमङ्गै आऴ्वार् के षट्कृत्य नम्माऴ्वार् के कृत्यों के अंग माने जाते हैं। जैसे चार वेदों के लिए छह वेदाङ्ग होते हैं, वैसे ही तिरुमङ्गै आऴ्वार् ने छः प्रबन्ध लिखे, जिनमें १३६१ पाशुर हैं। यह किसी भी आऴ्वार् द्वारा सर्वाधिक रचना है। श्रीवैष्णव इन्हें “छः वेदाङ्ग” मानते हैं, अर्थात् नम्माऴ्वार् के चार प्रबन्धों के सहायक प्रबन्ध।
इस लेख में हम तिरुमङ्गै आऴ्वार् की तीन कृतियों का परिचय देखेंगे। ये तीन कृत्य हैं – तिरुवॆऴुकूट्रिरुक्कै, सिऱिय तिरुमडल् और पॆरिय तिरुमडल्।
रामानुजाचार्य (ऎम्पॆरुमानार्) द्वारा अनुगृहीत मंगळाचरण (तनियन्)
आइए उस मंगळाचरण को देखें जो तिरुमङ्गै आऴ्वार् की महिमा का गान करता है और जिसकी रचना रामानुजाचार्य ने की है।
वाऴि परकालन् वाऴि कलिकन्ऱि
वाऴि कुऱैयलूर् वाऴ् वेऩ्दन्
वाऴियरो मायोनै वाळ् वलियाल् मन्दिरम् कॊळ्
मङ्गैयर्कोन् तूयोन् सुडर्मान वेल्
परकाल स्वामी युग युग जीए, जो भिन्न दर्शनों के लोगों के लिये यम के समान हैं; परकाल स्वामी, जिन्होंने कलियुग की व्याधि का नाश किया युग युग जीए; तिरुक्कुऱैयलूर् के राजा परकाल स्वामी, जो उनके कारण गौरवान्वित है युग युग जीए; परकाल स्वामी युग युग जीए – भीतर और बाहर से शुद्ध-जिन्होंने अपने खड्ग की शक्ति से भगवान से तिरुमन्त्र (अष्टाक्षरी मंत्र) प्राप्त किया, और जिनका भाला उज्ज्वल और महिमामय है।
तिरुमङ्गै आऴ्वार् का तिरुवॆऴुकूट्रिरुक्कै :
तिरुवॆऴुकूट्रिरुक्कै, इयऱ्-पा विभाग में आता है। इसका व्याख्यान ‘व्याख्यान चक्रवर्ती’ (व्याख्यान-सम्राट्) पॆरियवाच्चान् पिळ्ळै द्वारा दिया गया है।
तिरुमङ्गै आऴ्वार् ने पहले पॆरिय तिरुमॊऴि की रचना की; पॆरिय तिरुमॊऴि के अनुभव के समय, आऴ्वार् दिव्यदेशों के अनुभव में अत्यंत निमग्न रहे। भगवान को लगा कि कहीं आऴ्वार् वैकुण्ठ को भूल तो नहीं गये; अतः उन्होंने आऴ्वार् को संसार का वास्तविक स्वरूप दिखाया। आऴ्वार् ने इस संसार का सत्य स्वरूप अनुभव किया और पॆरिय तिरुमॊऴि के अन्तिम दशक – “माट्ट्रमुळ” – में गाया कि वे इस संसार में ऐसे पीड़ित हैं जैसे कोई चींटी जो जली लकड़ियों से घिरी हुई हो। उन्होंने भगवान से प्रार्थना की कि वे देह-सम्बन्ध (आत्मा का देह से सम्बन्ध) को दूर कर दें।
दूसरे प्रबन्धम् तिरुक्कुरुन्दाण्डकम् में, भगवान आऴ्वार् को अभी प्रकट नहीं हुए – क्योंकि वे चाहते थे कि आऴ्वार् में दर्शन की अभिलाषा और बढ़े – आऴ्वार् उस विलम्ब को सह नहीं सके। जैसे अत्यन्त प्यासा मनुष्य जल पीता है, उसमें डूबता है और अपने ऊपर जल उँडेलता है, वैसे ही आऴ्वार् ने भगवान के विषय में बोलकर, प्रणाम करके और स्मरण करके अपने आप को संभालने का प्रयास किया। आऴ्वार् ने तिरुक्कुरुन्दाण्डकम् गाया, जहाँ वे वचन, चिन्तन और आचरण (जैसे चरणों में गिरना) द्वारा भगवान में लीन हो गये।
अब, जब कोई प्यासा व्यक्ति थोड़ा जल पी लेता है, तो उसे और अधिक पीने की चाह होती है; उसी प्रकार आऴ्वार् को भगवान के लिये और भी तीव्र पिपासा हुई। अतः तीसरे प्रबन्धम् तिरुवॆऴुकूट्रिरुक्कै में उन्होंने तिरुक्कुडन्दै आरावमुदन् में महान् लालसा के साथ शरणागति की। यह एक शरणागति प्रबन्धम् है।
भगवान पूछते हैं – “तुम्हें मुझसे क्या चाहिए?”; आऴ्वार् उत्तर देते हैं – “कृपया मुझे इस संसार से पूर्णतः उबार दीजिये – इसका किंचित भी अंश न बचे – क्योंकि यही हमें आपका आस्वादन करने से रोकता है।” भगवान पूछते हैं – “क्या यह मेरे लिये करने योग्य है?” आऴ्वार् कहते हैं – “आपके सिवा अन्य सब कुछ आप ही से उत्पन्न और आप ही द्वारा संरक्षित है; आप ही उनके हेतु हैं; सब आपके शरणागत हैं और आप पर आश्रित हैं, इसलिये केवल आप ही हमें इस संसार से छुड़ा सकते हैं; हम स्वयं इससे नहीं निकल सकते।”
आप हमारे स्वामी हैं – सभी आऴ्वारों ने यह कहा और स्वीकार किया है; उन्होंने स्वीकार किया है कि वे आपके अधिकार में हैं। यह कहते हुए तिरुमङ्गै आऴ्वार् तिरुक्कुडन्दै आरावमुदन् के दिव्य चरणों में गिरते हैं और अपनी दशा तथा अवस्था को उनके सम्मुख निवेदन करते हैं।
नम्माऴ्वार् ने भी तिरुवाय्मोऴि (५-८) – “आरावमुदे अडियेन् उडलम्” – में इसी भगवान के लिये एक दशक गाया और आरावमुदन् भगवान के प्रति शरणागति की। इस प्रकार हम देखते हैं कि तिरुमङ्गै आऴ्वार् का समस्त प्रबन्धम् तिरुक्कुडन्दै आरावमुदन् पर ही गाया गया है।
इस दिव्यप्रबन्धम् पर दूसरी व्याख्यान भी व्याख्यान-चक्रवर्ती पॆरियवाच्चान् पिळ्ळै ने दी है।
पॆरियवाच्चान् पिळ्ळै द्वारा तिरुवॆऴुकूट्रिरुक्कै पर दी गयी इस दूसरी व्याख्यान को ‘अत्यन्त दयालु पॆरियवाच्चान् पिळ्ळै द्वारा दी गयी व्याख्यान’ कहा जाता है, क्योंकि यह उन (अधिक) श्रीवैष्णवों के लिये दी गयी थी जिन्होंने उनसे इसका निवेदन किया था।
यहाँ वे कहते हैं: हम इन्द्रियों और क्रियाशील अंगों से रहित थे, प्रलय के समय तमस् से घिरे हुए थे, ज्ञान से रहित थे, अचित् के समान थे, और आपकी देह में अचित् के समान ही निहित थे। आपने हमारी यह दयनीय स्थिति देखी और बिना हमारे निवेदन के ही, हमारे प्रति आपकी करुणा और हमारे साथ अपने नित्य सम्बन्ध के कारण, सृष्टि करके हमें देह प्रदान किया।
जैसा कि यामुनाचार्य जी (आळवन्दार्) ‘स्तोत्ररत्नम्’ (१०) में कहते हैं- ‘आपकी अनुग्रह के बिना ये लोक उत्पन्न ही न हों। अनादि काल से हमारा अस्तित्व ही आपके वश में है; अतः यह तो स्वयं सिद्ध है कि आपके बिना हम कुछ भी नहीं कर सकते।’
उसी प्रकार नम्माऴ्वार् तिरुवाय्मोऴि १०-१०-६ में निवेदन करते हैं- ‘आपने यह जगत् रचा; फिर आपने हमारी चिन्ता क्यों छोड़ दी, या हमें अपने पास ले जाने में विलम्ब क्यों कर रहे हैं?’
भगवान प्रश्न करते हैं- ‘जब वशिष्ठ, विश्वामित्र आदि जैसे इतने ज्ञानवान हैं, तब आप कैसे कह सकते हैं कि रक्षक कोई नहीं?’
आऴ्वार् कहते हैं: जैसा कहा गया है- आपके लिये कुछ भी अगम्य नहीं; कोई भी (अपने प्रयत्न से) आपको पूर्ण रूप से जान नहीं सकता; कोई भी (अपने प्रयत्न से) आपको प्राप्त भी नहीं कर सकता। आप सब जानते हैं; ऐसा कुछ नहीं जिसे आप न जानते हों या न पा सकें। चाहे हममें से किसी के पास कितना भी ज्ञान और शक्ति हो, अपने ही बल से हम आपको न तो पूर्ण रूप से जान सकते हैं, न ही पा सकते हैं। उदाहरण देखिये- एक व्यक्ति नेत्रहीन है और चल भी नहीं सकता; दूसरा उत्तम दृष्टि वाला और ठीक से चलने-फिरने में समर्थ है। जब तक दूसरा पहले को सहारा देकर मार्ग नहीं दिखाता, पहला कुछ भी नहीं कर सकता, है न? मेरे पास न ज्ञान है, न सामर्थ्य; आप सर्वज्ञ और सर्व-समर्थ हैं; ऐसे में पहल आप ही को करनी है- मेरे द्वारा कुछ कर लेने और उसे पूरा कर लेने जैसा यहाँ कुछ नहीं।
यदि मैं आपके द्वारा प्रदत्त ज्ञान से समझने का प्रयत्न भी करूँ, तो क्या मेरे पास लक्ष्य-प्राप्ति का बल है (वैकुण्ठम् तक पहुँचने का)? केवल ज्ञान के आधार पर मैं आप तक नहीं पहुँच सकता; मुझे यही ज्ञान हुआ है कि आप ही एकमात्र उपाय हैं- आप तक पहुँचने का उपाय भी आप ही हैं।
आऴ्वार् कहते हैं- “हम क्या कर सकते हैं? जैसे शिशु, माता दृष्टि से निकलते ही रो पड़ता है, वैसे ही हम भी केवल रोकर आपकी करुणा माँग सकते हैं कि आप हमें इस संसार से उबार लें।”
ये पॆरियवाच्चान् पिळ्ळै के सुन्दर व्याख्यान के कुछ अंश हैं जो तिरुमङ्गै आऴ्वार् के ग्रन्थों पर हैं। नम्माऴ्वार् को “इन्ब मारि” (मिठास का मेघ) कहा जाता है और तिरुमङ्गै आऴ्वार् को “अरुळ् मारि” (कृपा का मेघ) कहा जाता है।
तिरुवॆऴुकूट्रिरुक्कै तनियन्:
सीरार् तिरुवॆऴुकूट्रिरुक्कै ऎन्नुम् सॆन्दमिऴाल् आरावमुदन्
कुडन्दैप् पिरान् तन् अडियिणैक् कीऴ्
एरार् मऱैप् पॊरुळ् ऎल्लाम् ऎडुत्तु इव्वुलगु उय्यवे
सोरामल् सॊन्न अरुळ् मारि पादम् तुणै नमक्के
तनियन् का अर्थ:
तिरुवॆऴुकूट्रिरुक्कै नामक प्रबन्धम्, जो एक सुन्दर तमिऴ् प्रबन्धम् (काव्य) के रूप में है और आरावमुदन् नाम वाले भगवान के कमल-चरणों का गान करता है, वेदों के उन तात्पर्यों को स्पष्ट रूप से दिखाता है जो इस जगत को समझ कर कल्याणपूर्वक जीने का मार्ग प्रतिपादित करते हैं। आऴ्वार् ने कुछ भी छोड़े बिना वेदों के समान अर्थ हमें प्रदान किया। ऐसे तिरुमङ्गै आऴ्वार्, जिन्होंने हम पर करुणा की वर्षा की- उनके कमल-चरण ही हमारी शरण हैं।
भगवान के अतिरिक्त कोई अन्य रक्षक नहीं। उनके करों में शङ्ख और चक्र हैं। उन्होंने ब्रह्मा को ज्ञान दिया; वही हमारे एकमात्र रक्षक हैं। ‘हे भगवान ! आप सब कुछ जानते हैं; मुझे बचा सकने वाले केवल आप ही हैं; मैं स्वयं अपनी रक्षा नहीं कर सकता’- यह शरणागत भक्त की विनय है।
प्रबन्धम् तिरुवॆऴुकूट्रिरुक्कै का नाम:
“एऴु” का अर्थ ७, “कूट्रु” का अर्थ भाग, और “इरुक्कै” का अर्थ है होना / धारण करना। इसे ‘चित्रक कविता’ कहा जाता है – तिरुवॆऴुकूट्रिरुक्कै को हम रथ के रूप में चित्रित कर सकते हैं।
रथ पहले संकीर्ण होता है तत्पश्चात क्रमशः चौड़ा होते जाता है। उसी प्रकार तिरुवॆऴुकूट्रिरुक्कै में पहले पाशुर में संख्याएँ १-२-३ आती हैं, अगले में १-२-३-२-१, फिर १-२-३-४-३-२-१, उसके बाद १-२-३-४-५-४-३-२-१, और इसी प्रकार आगे बढ़ता है।
१-२-१
ऒरु पॆरुन्दि इरु मलर् तविसिल् ऒरु मुरै अयनै ईन्ऱनै
१-२-३-२-१
ऒरु मुरै इरु सुडर् मीदिनिल् इयङ्गा मुम् -मदिळ् इलङ्गै इरुकाल् वळैय, ऒरु सिलै
तिरुवॆऴुकूट्रिरुक्कै का सार
जब प्रलय के बाद सम्पूर्ण जगत् अस्तित्व में नहीं था, तब भगवान के कारण-रहित कृपा (निर्हेतुक कृपा) के कारण, उन्हीं ने सम्पूर्ण जगत् को उत्पन्न किया। उन्हीं ने लोकों की सृष्टि की, अपने कमल-नाभि से ब्रह्मा की रचना की और उनके अन्तर्यामी रूप में स्थित हुए। उन्होंने चेतन और अचेतन के लिये संसार को रचा। वे ही सभी कारणों के कारण हैं। तो फिर क्या हम सबको मोक्ष देने का उपकार करना उनके लिये कठिन है?
द्वितीय पाशुर में तिरुमङ्गै आऴ्वार् कहते हैं – “मैं उन विषयों को दूर नहीं कर सकता जो मुझे आपसे अलग करते हैं। इस संसार में मेरी अविद्या (आत्मस्वरूप का यथार्थ ज्ञान न होना), कर्म, वासनाएँ (पूर्वकर्मों के गहरे संस्कार), रुचियाँ (पाँच इन्द्रियों द्वारा उत्पन्न भौतिक विषयों की आसक्ति) – इनमें से किसी को भी मैं स्वयं नहीं हटा सकता। केवल आप ही कर सकते हैं। अतः कृपा करके ऐसे राक्षसों को दूर कीजिए जो मुझे आपसे अलग करते हैं।”
अंतिम पाशुर में तिरुमङ्गै आऴ्वार् तिरुक्कुडन्दै भगवान के चरणों में शरणागति करते हैं। वे उस स्थान की समृद्धि और स्वरूप का वर्णन करते हैं – कावेरी नदी अपने जल के साथ रत्न और बहुमूल्य वस्तुएँ लाती है; वहाँ रहने वाले विद्वान् जैसे तिरुमऴिसै आऴ्वार् जिनकी कीर्ति आठों दिशाओं में छाई है, वे वेदान्त सूक्तियों द्वारा भगवान की उपासना करते हैं।
जैसे नम्माऴ्वार् (शठकोप स्वामी) ने शरणागति की, वैसे ही यहाँ तिरुमङ्गै आऴ्वार् भी आरावमुदन् के दिव्य चरणों में समर्पित होकर उनसे संसार से उबारने की प्रार्थना करते हैं।
अन्त में, कवि कम्बर् द्वारा रचित गीत तिरुवॆऴुकूट्रिरुक्कै के अंत में गाया जाता है।
इडम् कॊण्ड नॆन्जत्तु इणङ्गिक् किडप्पन
ऎन्ऱुम् तडम् कॊण्ड तामरै सूऴुम् मलरन्द तण् पूङ्गुडन्दै
विडम् कॊण्ड वॆण् पल् करुम् तुत्ति चॆन्कण् तऴल् उमिऴ् वाय्
पडम् कॊण्ड पाम्बणैप्पळ्ळि कॊण्डान् तिरुप्पादङ्गळॆ
कम्ब नाट्टाऴ्वार् ने इसमें तिरुमङ्गै आऴ्वार् की महिमा का वर्णन किया है। जिस प्रकार तिरुमङ्गै आऴ्वार् ने तिरुवॆऴुकूट्रिरुक्कै में तिरुक्कुडन्दै का वर्णन किया, उसी प्रकार कम्ब नाट्टाऴ्वार् ने भी तिरुक्कुडन्दै, आरावमुदन्, और तिरुवनन्ताऴ्वान् का वर्णन किया है। वे कहते हैं कि उस भगवान के तिरुवडि (दिव्य चरण) ही तिरुमङ्गै आऴ्वार् के विस्तीर्ण और गहरे हृदय में सदा विद्यमान है।
सिरिय तिरुमडल् और पॆरिय तिरुमडल्
तिरुमङ्गै आऴ्वार् ने एक सुन्दर प्रबन्धम् की रचना की जिसका नाम है सिरिय तिरुमडल्। इस प्रबन्धम् में वे भगवान से वियोग का अनुभव करते हैं। उस वियोग की गहन पीड़ा से वे स्त्रीभाव (परकाल नायकि के रूप में) धारण कर लेते हैं और “मडल्” का उल्लेख करते हैं। मडल् – यह एक क्रिया है जिसमें स्त्री अथवा पुरुष अपने प्रिय पर आरोप लगाकर उसे विवाह के लिये मनाने का प्रयास करता है।
तिरुमङ्गै आऴ्वार् ने करुणापूर्वक दो तिरुमडल् प्रबन्द लिखे – १. सिरिय तिरुमडल् – जिसमें कृष्णावतार सम्बन्धी प्रसंग आते हैं। २. पॆरिय तिरुमडल् – जिसमें तिरुनऱैयूर् नम्बि (जो तिरुनऱैयूर् (कुम्भकोणम् के पास स्थित एक दिव्यदेशम्) में अर्चामूर्ति रूप में विराजमान हैं) सम्बन्धी प्रसंग आते हैं।
मडलूर्दल् – इसका तात्पर्य उस साहस को उल्लेख करता है जिसे नायिका (या नायक) दिखाती है जब प्रिय उसकी प्रेमभावना को स्वीकार नहीं करता। तब नायिका अपने प्रिय की सार्वजनिक रूप से निन्दा करती है ताकि संसार के लोग उसकी सहायता करें और उसे अपने प्रिय से मिलाएँ। तिरुमङ्गै आऴ्वार् स्त्रीभाव धारण कर इसी प्रकार का साहस इन दोनों मडल् प्रबन्धों में प्रकट करते हैं। यह एक ऐसा उपाय है जिसमें नायिका अपनी स्वाभाविक मर्यादा को भूलकर अपने प्रेम को प्रकट करती है। हमारे पूर्वाचार्य कहते हैं कि ऐसा “मडल्” रचना करना, उपवास करना और मङ्गलाशासनम् करना – ये सब उच्च आचरण हैं। यद्यपि यह अज्ञान से उत्पन्न हुआ प्रतीत होता है (क्योंकि यह तीव्र भक्ति से उपजा है), पर यह भक्ति ज्ञान से भी युक्त है। तिरुक्कुरऴ् में कहा गया है –
कडलन्न कामत्तरायिनुम् मादर् मडलूरार् मट्रैयार् मेल्
कडलन्न कामम् उऴन्दुम् मडल् एऱाप् पॆण्णिऱ् पॆरुन्दक्कदिल्
पर तिरुमङ्गै आऴ्वार् इस मत का अनुसरण नहीं करते। वे कहते हैं कि विन्ध्याचल के उत्तर में प्रचलित संस्कृति के अनुसार, स्त्री या पुरुष- कोई भी यदि अपने प्रेम को रोक न पाए, तो “मडल्” कर सकता है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि जब किसी के प्रति प्रेम बाँध तोड़कर उमड़ पड़ता है, तो वह सारी मर्यादाओं और नियमों को तोड़ देता है, जैसे उफनती हुई कावेरी।
सिरिय तिरुमडल् में आऴ्वार् ने कृष्ण पर मडल् करने का प्रयास किया। परन्तु कृष्ण तो भिन्न युग में थे और स्वयं भी मान-अपमान की चिन्ता नहीं करते थे (जैसे- माखन-चोरी पर माता द्वारा उखल से बाँध दिये जाना, गोपियों के उलाहनों को सहजता से सह लेना आदि); अतः यह प्रयास सफल नहीं हुआ। इसलिये आऴ्वार् ने तिरुनऱैयूर् के अर्चावतार भगवान पर मडल् करने का निश्चय किया, जो उनके समय में साकार रूप से उपस्थित और अत्यन्त सौम्य थे। नम्माऴ्वार् ने तिरुवाय्मोऴि ५-३-९ में कहा – “मडल् ऊर्दुम्” (मैं मडल् करूँगा)। उसी प्रकार यहाँ तिरुमङ्गै आऴ्वार् भी भगवान को डराते हैं कि वे मडल् करने जा रहे हैं ताकि भगवान उनसे मिलने के लिये आयें। परन्तु सारतः उन्होंने केवल डराया; वास्तव में मडल् नहीं किया। इसलिये कहा जा सकता है कि उनकी आत्मसमर्पण की स्वाभाविक स्थिति (भगवान पर सम्पूर्ण आश्रय) को कोई हानि नहीं पहुँची।
इस पाशुर का व्याख्यान पॆरियवाच्चान् पिळ्ळै तथा अऴगिय मणवाळप् पॆरुमाळ् नायनार् ने किया है। हम यहाँ पॆरियवाच्चान् पिळ्ळै के व्याख्यान का अनुसरण करेंगे और जहाँ आवश्यक होगा वहाँ अऴगिय मणवाळप् पॆरुमाळ् नायनार् द्वारा दिये गये महत्वपूर्ण अंशों को भी सम्मिलित करेंगे।
तिरुमङ्गै आऴ्वार् की कृतियों का कालानुक्रम इस प्रकार है – पॆरिय तिरुमोऴि, तिरुक्कुरुन्दाण्डकम्, तिरुवॆऴुकूट्रिरुक्कै, सिरिय तिरुमडल्, पॆरिय तिरुमडल् और तिरुनेडुन्दाण्डकम्। तिरुक्कुरुन्दाण्डकम् में तिरुमङ्गै आऴ्वार् ने अपने अन्तःकरण की इन्द्रियों से परम पुरुष श्रीमन् नारायणन् को अपने हृदय में देखा। तिरुवॆऴुकूट्रिरुक्कै में उन्होंने श्रीमन् नारायणन् की लालसा की और यह इच्छा व्यक्त की कि वे अपनी बाह्य इन्द्रियों से भी उनका अनुभव करें। उन्होंने तिरुक्कुडन्दै स्थित प्रभु के कमल-चरणों में शरणागति की।
“मडल्” क्या है? इसमें नायक और नायिका दोनों समान आयु के होते हैं। नायक में ज्ञान, गौरव, जिज्ञासा और दृढ़ता जैसे गुण पूर्ण रूप से होते हैं; नायिका में लज्जा, आज्ञापालन, भय और वियोग में वर्ण-पीतता जैसे स्त्री-सुलभ गुण पूर्ण होते हैं। नायिका अपनी सखियों के साथ पुष्प तोड़ने बगीचे में जाती है। नायक भी उसी बगीचे में शिकार करने जाता है। नायक और नायिका की दृष्टि मिलती है और उससे उनका संयोग होता है। किन्तु यदि उनका संयोग निरन्तर और अखण्ड होता तो वह उनके लिये अन्त का कारण बन जाता, जैसे अधिक वर्षा से फसल नष्ट हो जाती है। इसलिये विधाता ने उन्हें अलग कर दिया ताकि वे धैर्यपूर्वक भविष्य में दीर्घकाल तक आनन्दित हों। किन्तु वियोग ने उनके दुःख को सैकड़ों–सहस्त्रों गुना बढ़ा दिया। ऐसे समय में नायक अथवा नायिका, जब वे एक-दूसरे को प्राप्त नहीं कर पाते, तो एक साहसिक आचरण करते हैं जिसे “मडल्” कहा जाता है।
यह साहसिक आचरण है प्रियतम के स्वरूप, रूप, गुण और विभूति का नकारना। वह व्यक्ति अपने प्रिय का चित्र बनाता है और बिना घी खाये, दूध पिये निरन्तर उस चित्र को देखता रहता है। वह स्नान नहीं करता और न ही स्वयं को अलंकृत करता है। वह ताड़पत्रों से बने घोड़े पर बैठता है और बिखरे बालों के साथ यह दिखावा करता है कि वह उस घोड़े पर बैठकर इधर-उधर घूम रहा है। वह ऊँचे स्वर में विलाप करता है – “यह व्यक्ति मुझसे अलग हो गया है। इसे मुझ पर कोई दया नहीं है। यह कठोर-हृदय और निर्दयी है। इसके दुष्ट आचरणों की कोई सीमा नहीं है।” ऐसा आचरण, जिसमें वह व्यक्ति गलियों में घूमता हुआ अपने विलाप सुनाने लगता है और लोग उस पर दया करने लगते हैं, “मडल् करना” कहलाता है। क्या प्रिय के स्वभाव, सौन्दर्य, गुण और सम्पत्ति का निषेध करना, उस व्यक्ति को नष्ट करने के समान नहीं है?
इस क्रूर आचरण अर्थात् मडल् करने का उद्देश्य क्या है?
प्रेमियों के बंधु उनका मिलन कराने का प्रयास कर सकते हैं। यह भी सम्भव है कि उस देश का राजा उनके मिलन में सहायता करे। यदि दोनों के मित्र और संबंधी उनसे मुँह मोड़ लें, तब भी वे दोनों एक-दूसरे का सहारा लेकर टिक सकते हैं, जैसे हथियारों का ढेर हो जहाँ एक हथियार दूसरे हथियार को थामे रहता है। यदि यह सब भी न हो, तो कम से कम यह गौरव तो होगा कि नायक अथवा नायिका अपने प्रिय को न पा सकने के कारण प्राण त्याग बैठे।
जैसा कि नम्माऴ्वार् ने अपने तिरुवाय्मोऴि १-५ “वळवेऴ् उलगिल्” दशक में कहा है, आऴ्वारों का स्वभाव ऐसा है कि वे अपनी हीनता सोचकर कहते हैं- “यदि मैं ऐसे महान् पुरुष भगवान के पास जाऊँगा तो उनकी गरिमा को नीचा कर दूँगा”- और इस कारण उनसे दूर हट जाते हैं। इस प्रकार के स्वभाव रखनेवाले आऴ्वार् क्या वास्तव में भगवान पर इतनी निर्दयी आघात करनेवाले मडल्-कर्म में संलग्न होंगे? वे श्रीमन नारायण के दिव्य गुणों को नष्ट करनेवाले नहीं हैं। नम्माऴ्वार् ने भी केवल धमकी दी थी कि वे मडल् करेंगे, जैसा कि तिरुवाय्मोऴि ५-३-९ में कहा है- “आणैयेन् तोऴि उलगु तोरु अलर्त्तूट्रि, आम् कोणैगळ् सॆय्दु कुदिरियाय् मडलूर्दुमे” (हे सखी! हम निश्चित रूप से मडल् करेंगे, भगवान को हर स्थान पर उपहासित करते हुए, कठिन आचरण करते हुए, एक अनियंत्रित कन्या की भाँति), और तिरुवाय्मोऴि ५-३-१० में- “याम् मडलूर्न्दुम् ऎम् आऴियङ्कैप्पिरानुडै, तूमडल् तण्णन्दुऴाय् मलर् कॊण्डु सूडुवोम्” (यदि हमें मडल् भी करना पड़े, तो भी हम करेंगे और भगवान के उस पवित्र शीतल तुलसीमाल्य को धारण करेंगे, जिसे अपने दिव्य सुंदर क्यों में चक्र धारण करनेवाले ने अर्पित किया है), इसी प्रकार यह आऴ्वार् भी श्रीमन नारायण को धमकाते हैं कि वे मडल् करेंगे ताकि वे उनके पास आयें, जैसा कि सिरिय तिरुमडल् में कहा है- “ऊरादॊऴियेन् नान् वारार् पूम् पॆण्णै मडल्” (मैं उस सुन्दर दीर्घ ताड़पत्र से मडल् करने से नहीं रुकूँगा)। और पॆरिय तिरुमडल् में- “उलगऱिय ऊर् वन् नान् मन्निय पूम् पेण्णै मडल्” (मैं उस सुन्दर महान् ताड़पत्र से मडल् करूँगा जिसे सम्पूर्ण जगत् जान ले)। किन्तु उन्होंने भी वास्तव में मडल्-कर्म पूरा नहीं किया।
फिर भी, आऴ्वार् अपनी स्वाभाविक (पुरुष) स्थिति में न बोलकर क्यों एक पिराट्टि (भगवान की नायिका) के रूप में बोलते हैं? इसका कारण यह है कि आत्मा के स्वरूप-निर्देशक धर्म स्वाभाविक रूप से स्त्रियों के असाधारण गुणों की भाँति प्रकट होते हैं, विशेषकर पतिव्रता के गुण जैसे- (क) अनन्यार्हशेषत्वम् (श्रीमन नारायण के अतिरिक्त किसी के अधीन न होना), (ख) अनन्यशरणत्वम् (श्रीमन नारायण के अतिरिक्त किसी के भी शरण न होना), (ग) अनन्यभोग्यत्वम् (श्रीमन नारायण के अतिरिक्त किसी के लिए भी आस्वाद्य न होना)।
क्योंकि आऴ्वारों जैसे महापुरुष केवल भगवान के साथ रहकर ही जीवित रह सकते हैं और उनसे वियोग में नहीं रह सकते; क्योंकि मोक्ष की घड़ी में उनका ज्ञान खिल उठता है और भगवान की सहधर्मिणियों के समान हो जाता है; और क्योंकि आऴ्वारों को इस संसार में रहते हुए भी निर्मल ज्ञान और भक्ति प्राप्त हुई है, जो उन्हें भगवान की नित्य सहधर्मिणियों के समान स्थान देती है—इस कारण आऴ्वार् पिराट्टि के रूप में ही बोलते हैं।
अत्यन्त प्रसिद्ध तमिऴ् साहित्य तिरुक्कुरळ् में कहा गया है- “कडलन्न कामत्तारागिलुम् मादर् मडलूरार् मट्रैयार् मेल्” (यद्यपि उनका काम समुद्र के समान गहन हो, स्त्रियाँ मडल में प्रवृत्त नहीं होतीं) और “कडलन्न काममुऴन्दुम् मडलेराप् पॆण्णिऱ् पॆरुन्दक्कदिल्” (स्त्रियाँ, भले ही काम से अत्यन्त पीड़ित हों, यदि मडल न करें तो उनके जन्म से बढ़कर अन्य कोई जन्म नहीं है)। जब ऐसे तमिऴ् शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है कि स्त्रियों का लक्षण ही है मडल में प्रवृत्त न होना, तो आऴ्वार् के लिए प्रकटतः पिराट्टि की मनोभूमि ग्रहण कर मडल करना उचित है क्या? यदि वास्तव में नारी-पुरुषों में केवल पुरुष ही अपने प्रियतमा के प्रति अनियंत्रित अनुराग रखते हैं और स्त्रियों का अनुराग मर्यादा के भीतर होता है, तो तमिऴ् साहित्य में जो कहा गया है वह सत्य प्रतीत होता है। परन्तु वस्तुतः ऐसा नहीं दिखता, क्योंकि नारी और पुरुष दोनों ही अपने प्रिय के प्रति अनियंत्रित अनुराग रखते हैं। इस प्रकार, संस्कृत शास्त्रों के अनुरूप- जो कहते हैं कि जब प्रेम सीमा लाँघ जाए तो स्त्री-पुरुष दोनों ही मडल कर सकते हैं- यहाँ पिराट्टि (स्त्रीभाव में आऴ्वार्) मडल करती हैं।
वास्तव में मडल का आचरण करने के स्थान पर वह मडल करने का संकल्प ही क्यों प्रकट करती है और उसे टालती क्यों है? क्योंकि परकाल नायकि को (क) मडल में प्रवृत्त होने के कारणों की सूची प्रस्तुत करनी है, (ख) अपने सम्बन्धियों को इस आचरण के लिए सहमत करना है, (ग) यह सुनिश्चित करना है कि उतावलेपन में महान कल्याणगुणों वाले भगवान को कहीं क्षति न पहुँचा दे, और (घ) उनके आने के लिए समय देना है।
मडल सामान्यतः पुरुष ही करते हैं। परन्तु सिऱिय तिरुमडल् और पॆरिय तिरुमडल् दोनों स्त्रीभाव में रचित हैं। यह लौकिक प्रेम नहीं है, बल्कि यह भक्ति की उच्चतर अवस्था है। सभी आत्माएँ स्त्रियाँ हैं और भगवान ही एकमात्र पुरुष हैं। और ये मडल उच्च रूप की भक्ति हैं।
तिरुमङ्गै आऴ्वार् वास्तव में मडल नहीं करते। वे केवल कहते हैं कि वे मडल करेंगे। क्योंकि वे अत्यन्त कोमल हृदय के हैं, वे भगवान को पुकारते हैं और पूछते हैं- “क्या आप आकर मुझे अपने साथ ले जाएँगे?” वे भगवान से आने की प्रार्थना करते हैं।
तनियन्:
मुळ्ळिचॆऴुमलरॊ(र्) तारान् मुळैमदियम्
कोळ्ळिकॆन्नुळ्ळम् कोदियामॆ – वळ्ळल्
तिरुवाळन् सीर्क्कलियन् कार्क्कलियै वॆट्टि
मरुवाळन् तन्दान् मडल्
यह तनियन् पिळ्ळै तिरुनऱैयूर् अरैयर् ने रचा। इस तनियन् पर टीका पिळ्ळै लॊकम् जीयर् ने लिखी।
तनियन् की प्रस्तावना
इस तनियन् की प्रस्तावना के दो अर्थ बताए गए हैं।
व्याख्या १
यह तब है जब प्रथम पद को “मुळ्ळि चॆऴु मलरॊर् तारान्” माना जाए। पाँच तत्त्व हैं जिन्हें सम्मिलित रूप से “शब्दादि विषय” कहा जाता है। ये पाँच हैं- शब्द = ध्वनि, स्पर्श, रूप, रस = स्वाद, गन्ध | ये पाँच ही मनुष्य के हृदय को वश में करने वाले प्रमुख कारण हैं। पिळ्ळै तिरुनऱैयूर् अरैयर् ने तिरुमङ्गै आऴ्वार् की स्तुति की है, जिन्होंने सिऱिय तिरुमडल् की रचना की। इस सिऱिय तिरुमडल् की सहायता से, पिळ्ळै तिरुनऱैयूर् अरैयर् कहते हैं कि तिरुमङ्गै आऴ्वार् के चरणकमलों की सेवा में लगे हुए भक्त, उन दुष्ट वासनाओं पर विजय प्राप्त कर सकते हैं जो “शब्दादि विषयों” से उत्पन्न होती हैं। फलतः वे अपना मन और हृदय केवल श्रीमन नारायण की ओर एकाग्र कर सकते हैं। इस व्याख्या के अनुसार, सार यह है कि सिऱिय तिरुमडल् नामक प्रबन्ध भक्तों के लिए आधारभूत आहार/सहारा बनता है, जो अन्यथा श्रीमन नारायण से विरह-पीड़ा के कारण स्वयं को नष्ट कर बैठते।
व्याख्या २
यह तब है जब प्रथम पद को “मुळ्ळि चॆऴु मलरॊ तारान्” माना जाए। तिरुमङ्गै आऴ्वार् के ऐसे भक्त हैं जो अपने प्रिय आऴ्वार् से अलग रहकर जी नहीं सकते। तिरुमङ्गै आऴ्वार् ने सिऱिय तिरुमडल् की रचना की ताकि ऐसे भक्त अपने को संभाल सकें और “शब्दादि विषय” द्वारा नियंत्रित लौकिक सुखों में न पड़ें। तिरुमङ्गै आऴ्वार् स्वयं “मुळ्ळि” पुष्पों की माला धारण करते थे। परन्तु उन्होंने अपने भक्तों को “मुळ्ळि” की माला नहीं दी। उन्होंने तो उन्हें और भी विलक्षण वस्तु दी- अर्थात श्लोकों की माला, जो और कुछ नहीं बल्कि सिऱिय तिरुमडल् है।
सिऱिय तिरुमडल् और पॆरिय तिरुमडल् का मुख्य भेद यह है कि सिऱिय तिरुमडल् में तिरुमङ्गै आऴ्वार् स्त्रीभाव में हैं। उन्होंने मडल करने की धमकी दी, परन्तु भगवान नहीं आए। इसलिए पॆरिय तिरुमडल् में आऴ्वार् ने सोचा- “कृष्ण तो लज्जा रहित है। तो आओ, मैं मडल करूँ, अर्चावतार रूप पर। मैं रो रहा हूँ, तड़प रहा हूँ, कदाचित वे आएँ।” यहाँ उद्देश्य भगवत् अनुभव है, मोक्ष नहीं।
सिऱिय तिरुमडल् और पॆरिय तिरुमडल् दोनों में ही उन्होंने भगवान की महिमा तथा समस्त दिव्यदेशों की महिमा का निरूपण किया, किन्तु साथ ही यह प्रश्न किया- “क्या प्रयोजन है, यदि मैंने इतने बार पुकारने के बाद भी वे मेरे पास नहीं आए?”
आऴ्वार् को भगवान के प्रति गहन विरह भाव है। यह विरह वे तीन भावरूपों में प्रकट करते हैं-
१) ताय् पाशुरम् (माता का भाव) – भगवान ही उपाय हैं; केवल वे ही आकर स्वीकार करें और हम प्रतीक्षा करें।
२) तलै मगऴ् पाशुरम् (नायिका का भाव) – चाहे जैसे भी हो, भगवान तक पहुँचना ही लक्ष्य है।
३) तोऴि पाशुरम् (सखी का भाव) – आत्मा और भगवान्, पेरुमाळ् और पिराट्टि का सम्बन्ध प्रकट करना।
इस प्रकार हमने तीन ग्रन्थों की भूमिका देखी- तिरुवॆऴुकूट्रिरुक्कै, सिऱिय तिरुमडल् और पॆरिय तिरुमडल्।
अडियेन् जानकी रामानुज दासी
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