श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः
दिव्य प्रबन्धम् को अरुळिच्चेयल भी कहा जाता है। प्रबन्धम् का अर्थ है — जो बाँधता है। आऴ्वारों के प्रबन्धम् में इतनी शक्ति होती है कि वे स्वयं भगवान (भगवान) को ही अडियार्गळों (भक्तों) से बाँध सकते हैं। ये प्रबन्धम् भक्तों को भगवद विषय में संलग्न करते हैं और उन्हें भगवान से जोड़ते हैं, इसीलिए इन्हें प्रबन्धम् कहा जाता है। दिव्य प्रबन्धम् संसारिक भौतिक दोषों से अलिप्त है — यह हमें निर्मल और पवित्र दिव्यता में स्थिर करने में सहायक होता है।
यद्यपि वेद शास्त्र का एक अखंड अंग है, फिर भी वेदव्यास ने इसे लोगों की सुविधा और समझ के लिए चार भागों में विभक्त किया — ताकि साधारण जन भी इसका पालन कर सकें और आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ सकें।
वेदव्यास ने वेदों को चार भागों में विभाजित किया: ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, और अथर्ववेद।
इसी प्रकार श्रीमन्नाथमुनि (नाथमुनिगळ) ने दिव्य प्रबन्धम् को भी चार भागों में विभाजित किया- मुदल आयिरम् (प्रथम सहस्र), इरण्डाम् आयिरम् (द्वितीय सहस्र), इयऱ्-पा/ मून्ऱाम् आयिरम् (तृतीय सहस्र), नान्ङ्गाम् आयिरम् (चतुर्थ सहस्र)।
दिव्य प्रबन्धम् के चार भागों का विवरण:
- प्रथम सहस्र- श्रीमन्नाथमुनि ने इसमें निम्नलिखित आऴ्वारों के प्रबन्ध रखे: श्रीविष्णुचित्त स्वामी (पेरियाऴ्वार्), गोदा देवी (आण्डाळ् नाच्चियार्), कुलशेखर आऴ्वार् , भक्ताङ्घ्रिरेणु स्वामी (तोण्डरडिप्पोडि आऴ्वार्), श्रीयोगीवाहन् स्वामी (तिरुप्पाण आऴ्वार्), मधुरकवि आऴ्वार्, महीसार योगी (तिरुमऴिसै आऴ्वार्) (तिरुच्चन्द विरुत्तम्)
- द्वितीय सहस्र – इस भाग में श्रीमन्नाथमुनि ने रखा: पेरिय तिरुमोऴि, तिरुक्कुरुन्दाण्डकम्, तिरुनेडुन्ताण्डकम्
- तृतीय सहस्र- इसमें उन्होंने इयऱ्-पा — अर्थात् गद्य शैली में रचित प्रबन्ध को स्थान दिया।
सामान्यतया इयऱ्-पा के पाशुरम् में राग या ताल नहीं होता है| तमिऴ् साहित्य में तीन प्रमुख भाग होते हैं |
- इयल – (संस्कृत में गद्य) — इसका अर्थ है कोई गीत नहीं, यह गद्य रूप में होता है।
- इसै – जिसे संगीतबद्ध किया जा सकता है, अर्थात इसमें राग और ताल होता है।
- नाटकम् – नाटक या नाट्य रूप, जिसमें संवाद, अभिनय और दृश्य-विधान समाविष्ट होता है।
- चतुर्थ सहस्र- इस भाग में श्रीमन्नाथमुनि ने देश की अमूल्य रचना तिरुवाय्मोऴि को स्थान दिया।
दिव्य प्रबन्धम् हमारे श्रीवैष्णव संप्रदाय का हृदय स्पंदन जैसे माना जाता है। नम्माऴ्वार् (श्रीशठकोप स्वामी) को सभी आऴ्वारों में श्रेष्ठ और नेता माना गया है।
उनकी रचनाओं को चारों वेदों, उपनिषदों, इतिहासों और पुराणों के समतुल्य माना जाता है ।
- तिरुविरुत्तम् – १०० श्लोक – ऋग्वेद के समतुल्य
- तिरुवासिरियम् – ७ श्लोक – यजुर्वेद के समतुल्य
- पेरिय तिरुवन्दादि – ८७ श्लोक – अथर्ववेद के समतुल्य
- तिरुवाय्मोऴि – ११०२ श्लोक – सामवेद के समतुल्य
जिस प्रकार वेदों के छह अंग या सहायक ग्रंथ होते हैं, उसी प्रकार तिरुमङ्गै आऴ्वार् की रचनाएँ नम्माऴ्वार की चार रचनाओं के छह अंग मानी जाती हैं। वेद के छह अंग इस प्रकार हैं: १. शिक्षा – उच्चारण या शब्दों का सही उच्चार, २. व्याकरण – भाषा और व्याकरण, ३. छन्दस् – काव्य छंद, ४. निरुक्तम् – शब्दों की व्युत्पत्ति और अर्थ, ५. ज्योतिषम् – ग्रह-नक्षत्रों का अध्ययन, ६. कल्पम् – वैदिक अनुष्ठानों, यज्ञों और कर्मकांडों की विधि का शास्त्र
नम्माऴ्वार् की रचनाएँ मूल मानी जाती हैं, और अन्य सभी प्रबन्धों को उनके अंग (सहायक ग्रंथ) के रूप में माना जाता है।
दिव्य प्रबन्धम् का उद्देश्य यह है कि हम एम्पेरुमान (भगवान) के लिए मंगलाशासन करें। जितना अधिक हम आऴ्वारों की रचनाओं का जप और कीर्तन करते हैं, उतना अधिक हम भगवान के लिए मंगलाशासनम् कर रहे हैं।
पोन्नडिक्काल् जीयर् (प्रथम तोताद्री जीयर्) अपने तिरुप्पावै स्वापदेश में कहते हैं कि प्रतिदिन तिरुप्पावै का पाठ करने से हम गुरु परंपरा और द्वय महा मंत्र की महिमा करते हैं तथा साथ ही मंगलाशासन भी करते हैं।
अरुळिच्चेयल्/दिव्यप्रबंधम् का समस्त उद्देश्य ही अर्चावतार अनुभव के लिए है। इस बात को आचार्य हृदयम् चूर्णिकै ७० में अऴगिय मणवाळप् पेरुमाळ् नायनार् (आचार्य श्री रम्यजामातृ देव) ने स्पष्ट रूप से बताया है। इस चूर्णिकै में नायनार् प्रमाण (साक्ष्य) और प्रमेय (जिसका साक्ष्य दिया गया है) के आधार पर एक अनुक्रमणिका प्रस्तुत करते हैं, जो वेद-वेद्य न्यायम् के सिद्धांत पर आधारित है (यह न्याय यह कहता है कि वेदम् ने श्रीरामायण के रूप में अवतार लिया ताकि वह भगवान को दर्शा सके, जिन्होंने श्रीराम के रूप में अवतार लिया)।
- वेदम् – भगवान के परत्वम् (परमपद नाथ) की बात करता है।
- श्री पाञ्चरात्रम् – व्यूह रूप में स्थित भगवान का वर्णन करता है।
- मनु स्मृति आदि ग्रंथ – अंतर्यामी भगवान के विषय में बताते हैं।
- श्रीरामायण और महाभारत – विभवावतारों जैसे श्रीराम और कृष्ण की महिमा का वर्णन करते हैं।
- अरुळिच्चेयल् (जिसे द्राविड वेदं या तमिऴ वेदं भी कहते हैं अर्थात दिव्यप्रबंधम्) – अर्चावतार भगवान की विशेष महिमा का वर्णन करता है।
भगवान ने लीला विभूति से कुछ जीवात्माओं को स्वयं चुना, उन्हें अपने दिव्य रूप और गुणों के दर्शन कराए, उन्हें ऐसा निर्मल ज्ञान प्रदान किया जिससे वे भूत, वर्तमान और भविष्य को देख सकें, और उन्हें आऴ्वार् बनाया। “आऴ्वार्” का शाब्दिक अर्थ है — जो भगवद् विषयों में पूर्णतः निमग्न हो गया ।
इयऱ्-पा को भगवान के उत्सव विग्रह की शोभायात्रा के समय पाठ किया जाता है।
इयऱ्-पा
तमिऴ साहित्य में तीन प्रमुख श्रेणियाँ होती हैं: इयल, इसै, और नाटकम्।
- इयल – इसे सामान्यतः संगीत के साथ नहीं गाया जाता और यह किसी राग या ताल में नहीं होता।
- इसै – इसै राग और ताल के साथ गाया जाता है। मुदल आयिरम, इरंडाम आयिरम और तिरुवायमोझि (नांगाम आयिरम) इसै पाः के अंतर्गत आते हैं। इन 3000 प्रबंधों के लिए विशेष राग और ताल निर्धारित किए गए हैं।
- नाटकम् – इसका अर्थ है नाटक या नाट्यरूप।
इयऱ्-पा तीसरी सहस्रिका (1000 पाशुरमों का समूह) है। इयऱ्-पा खंड में निम्नलिखित प्रबंध सम्मिलित हैं:
- मुदल् तिरुवन्दादि – पोय्गै आऴ्वार्
- इरण्डाम् तिरुवन्दादि – भूदत्ताऴ्वार्
- मून्ऱाम् तिरुवन्दादि – पेयाऴ्वार्
- नान्मुगन् तिरुवन्दादि – तिरुमऴिसै आऴ्वार्
- तिरुविरुत्तम् – नम्माऴ्वार्
- तिरुवासिरियम् – नम्माऴ्वार्
- पेरिय तिरुवंदादि – नम्माऴ्वार्
- तिरुवेऴुकूट्रिरुक्कै – तिरुमङ्गै आऴ्वार्
- सिरिय तिरुमडल् – तिरुमङ्गै आऴ्वार्
- पेरिय तिरुमडल् – तिरुमङ्गै आऴ्वार्
- रामानुज नूट्रन्दादि – तिरुवरङ्गत्तु अमुदनार्
मुदल् आयिरम् में तिरुप्पल्लाण्डु को प्रारम्भ में गाया जाता है, किन्तु पहला प्रबन्धम् जो रचा गया था वह पोय्गै आऴ्वार् का मुदल तिरुवंदादि था।
पेरियवाच्चान् पिळ्ळै अपने व्याख्यान में यह प्रमुख रूप से बताते हैं कि प्रत्येक आऴ्वार् का ध्यान भगवान के विभिन्न प्रकार के अवतारों/स्वरूपों पर केन्द्रित होता है। वे इसका सार इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं:
- शुकाचार्य और मुदल आऴ्वार् (पोय्गैयार, भूतत्तार, पेयार) — परत्वम् (परमपद नाथ के स्वरूप) में निमग्न हैं।
- सनकादि ऋषि (सनक, सनातन, सनंदन, सनत्कुमार) और तिरुमऴिसै पिरान — अंतर्यामित्वम् में निमग्न हैं।
- वाल्मीकि और कुलशेखर आऴ्वार् — रामावतार में निमग्न हैं।
- पराशर ऋषि, वेदव्यास ऋषि, नम्माऴ्वार, पेरियाऴ्वार और आण्डाळ् — कृष्णावतार में निमग्न हैं।
- नारद ऋषि, तोण्डरडिप्पोडि आऴ्वार् और तिरुप्पाण आऴ्वार् — श्रीरंगनाथ में निमग्न हैं।
- शौनक ऋषि और तिरुमङ्गै आऴ्वार् — सभी अर्चावतारों में निमग्न हैं।
यद्यपि प्रत्येक आऴ्वार् का ध्यान अलग-अलग स्वरूपों पर केन्द्रित है, फिर भी वे सभी अपने पाशुरों में मंगलाशासन के माध्यम से अर्चावतार का सामूहिक रूप से आनंद लेते हैं।
मुदल आऴ्वार्
पोय्गै आऴ्वार् का जन्म तिरुवेःक्का यथोक्तकारी मंदिर के पास एक सरोवर में हुआ था। भूदत्ताऴ्वार का जन्म तिरुक्कडल्मल्लै स्थलशयन पेरुमाळ मंदिर के पास एक सरोवर में हुआ था। पेयाऴ्वार का जन्म तिरुमयिलै केशव पेरुमाळ मंदिर के पास एक कुएँ में हुआ था।
तीनों आऴ्वारों को सामान्यतः एक साथ महिमा दी जाती है, इसके पीछे निम्नलिखित कारण होते हैं।
- वे तीनों एक के बाद एक दिन पर जन्म हुए थे — पहले पोय्गै आऴ्वार्, फिर भूदत्ताऴ्वार्, और फिर पेयाऴ्वार् | उनका जन्म द्वापर युग के अंत और कलियुग के आरंभ के संधिकाल (युग संधि) में हुआ था।
- वे सभी अयोनिज थे — अर्थात् वे किसी मानव माता से जन्मे नहीं थे। वे सब भगवान के दिव्य अनुग्रह से पुष्पों से प्रकट हुए।
- वे जन्म से ही भगवान के प्रति अनुरक्त थे — उन्हें भगवान का पूर्ण और दिव्य आशीर्वाद था और वे अपने सम्पूर्ण जीवन भगवद्-अनुभव में ही जी रहे थे।
- अपने जीवन के एक समय में वे एक-दूसरे से मिले, और उसके बाद से वे साथ ही रहने लगे और विभिन्न दिव्य देशों/क्षेत्रों की यात्रा एक साथ करने लगे। इन्हें “ओडित् तिरियुम् योगिगऴ्” भी कहा जाता है — अर्थात् वो योगी जो निरंतर तीर्थयात्रा ही करते हैं।
तीनों आऴ्वारों अलग-अलग स्थानों में जन्मे थे और वे अपने-अपने स्थान पर परमात्मा (एम्पेरुमान) के आनंद में डूबे हुए थे। किंतु भगवान को, जो अपने अडियारों (भक्तों) को ही अपना जीवन मानते हैं (जैसे गीता में कहा गया है – “ज्ञानी तु आत्मैव मे मतम्”), उन तीनों को एक साथ देखने की इच्छा हुई। इसलिए उन्होंने एक दिव्य योजना बनाई और रात के समय तीनों को तिरुक्कोवलूर ले आए।
भारी वर्षा हो रही थी, और एक-एक करके तीनों वहाँ पहुँचे — एक छोटी सी कुटिया थी जहाँ एक व्यक्ति लेट सकता था, दो बैठ सकते थे और तीन खड़े हो सकते थे। सबसे पहले पोय्गै आऴ्वार् पहुँचे और वे वहाँ लेट सके। फिर भूदत्ताऴ्वार् आए, तब दोनों बैठ गए। अंत में पेयाऴ्वार् पहुँचे, और तब तीनों खड़े हो गए।
जब वे उस कुटिया में पहुँचे, तो वहाँ केवल तीनों के खड़े रहने भर की ही जगह थी। भगवद्-भावना में पूर्णतः लीन होकर, वे एक-दूसरे से परिचय पूछने लगे।
सामान्यतः इस भौतिक संसार में हर कोई अपना व्यक्तिगत स्थान चाहता है। लेकिन इन तीनों मुदल आऴ्वार्ों की इस घटना से यह स्पष्ट होता है कि वे एक-दूसरे को स्थान देने और एकसाथ रहने में प्रसन्न थे। उनका ध्यान शरीर पर नहीं, आत्मा पर केंद्रित था। वे केवल भगवद्-विषय में मग्न थे और शारीरिक असुविधा की ओर उनका कोई ध्यान नहीं था।
भगवान ने सोचा, “क्या सुंदर सत्संग है! इन्हें यहाँ लाने का मेरा उद्देश्य ही यही था कि मैं इन भक्तों के साथ रह सकूँ।” ऐसा सोचकर वे श्रीदेवी तायार (श्री महालक्ष्मी) के साथ उस पवित्र सत्संग में पहुँच गए। जब वे तीनों भक्तगण अपने दिव्य अनुभव का वर्णन कर रहे थे, तभी अचानक अंधेरे उस झोंपड़े में भगवान श्रीमहाविष्णु, श्रीमहालक्ष्मी के साथ प्रकट हो गए।
अब यह जानने की इच्छा हुई कि कौन आया है…
मुदल् तिरुवन्दादि
पोय्गै आऴ्वार् ने पृथ्वी को दीपक बनाकर, समुद्र को तेल बनाकर, और सूर्य को ज्योति बनाकर उस स्थान को प्रकाशित किया ।
**वैयम् तगळिया * वार्कडले नॆय्याग*
वॆय्य कदिरोन् विळक्काग ** सॆय्य
सुडराऴियान् अडिक्के * सूट्टिनेन सॊल् मालै
इडराऴि नीङ्गुगवे ऎन्ऱु
वह इन सुंदर शब्दों से भगवान को अलंकृत करते हैं। जब हम भगवान का स्मरण करते हैं तो दुख का सागर लुप्त हो जाता है।
ज्ञान प्रदान करने वाले प्रमाण तीन प्रकार के होते हैं।
- प्रत्यक्ष – इन्द्रियों द्वारा सीधे अनुभव किया गया ज्ञान ।
- अनुमान – तर्क या निष्कर्ष से प्राप्त ज्ञान ।
- शब्द – वेद – जो कुछ वेदों में दिया गया है, वही परम प्रमाण और अंतिम सत्य है।
प्रत्यक्ष – यह वह ज्ञान है जो हम अपनी इन्द्रियों से सीधे पाते हैं – देखने या सुनने से। परंतु प्रत्यक्ष प्रमाण की सीमाएँ भी हैं, क्योंकि हमारी इन्द्रियाँ अपूर्ण हैं। उदाहरण- हम प्रतिदिन सूरज को देखते हैं और हमें वह एक छोटे से गोलाकार चक्र जैसा दिखाई देता है। परंतु वास्तविकता में सूर्य अत्यन्त विशाल है, ग्रहों से भी बहुत बड़ा है |
अनुमान – यह वह ज्ञान है जो अनुभव और तर्क पर आधारित होता है, प्रत्यक्ष नहीं। उदाहरण- खाना पकाते समय हम देखते हैं कि आग और धुआँ साथ-साथ रहते हैं। यदि हम किसी पहाड़ पर धुआँ देखते हैं, तो हम अनुमान लगाते हैं कि वहाँ आग अवश्य होगी। यह ज्ञान प्रत्यक्ष नहीं, बल्कि निष्कर्ष पर आधारित है।
शब्द- यह प्रमाण वाणी या वचनों से प्राप्त होता है। इसमें वेद सर्वोच्च प्रमाण माने जाते हैं। वेद सदैव विद्यमान हैं। वेदों का ज्ञान सबसे प्रामाणिक माना गया है।
पोय्गै आऴ्वार् ने इस प्रथम पासुर में अनुमान का उपयोग किया। हम इस सुंदर संसार को देखते हैं; यह स्वयं उत्पन्न नहीं हुआ होगा, अवश्य किसी ने इसे बनाया होगा। किसीके द्वारा बनाए जाने से ही पृथ्वी, सागर, सूर्य और सूर्य से निकलती किरणें हैं। यह देखकर उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि कोई सृष्टिकर्ता है जो यह सब रच रहा है। इस प्रकार यहाँ उन्होंने अनुमान प्रमाण का प्रयोग किया।
अब एक प्रश्न आ सकता है कि अनुमान की सीमाएँ होती हैं, जिसके लिए नम्पिळ्ळै (कलिवैरि दास स्वामी) अपनी व्याख्या में बताते हैं कि – “श्रुति के अनुकूल रहने वाले अनुमान को स्वीकार किया जा सकता है।” जिसका अर्थ है कि जो शास्त्र के अनुरूप और सहायक हो, उसे मान सक्ते हैं।
वेद कहते हैं कि भगवान ही सृष्टि करते हैं और केवल भगवान की सृष्टि के कारण ही यह संसार विद्यमान है। पोय्गै आऴवार् ने अपने प्रथम पासुर में अनुमान के माध्यम से इसे दृढ़ किया और इसीलिए यह स्वीकार लायक है।
मुदल् तिरुवन्दादि के १५ वा पासुर में
मुदलावार् मूवरे* अम् मूवरुळ्ळुम्
मुदलावान्* मूरी नीर् वण्णन्**- मुदलाय्
नल्लान् अरुळ् अल्लाल्* नामनीर् वैयगत्तु*
पल्लार् अरुळुम् पऴुदु
यह पाशुर भगवान की सर्वोच्चता को स्थापित करता है।
ब्रह्मा, विष्णु और शिव – ये तीनों प्रमुख देवताएँ हैं। इन तीनों में से जो विशाल सागर के समान वर्ण वाले हैं, वही सबका कारण हैं। उनकी कृपा के अतिरिक्त, जो हमें वास्तव में चाहिए, अन्य देवताओं की कृपा का कोई उपयोग नहीं है क्योंकि वे मोक्ष प्रदान नहीं कर सकते। यही इस पाशुर में भगवान की सर्वोच्चता को सिद्ध करता है।
पासुर ५३ में
सॆन्ऱाल् कुडैयाम् इरुन्दाल् सिङ्गासनमाम्
निन्ऱाल् मरवडियाम् नीळ् कडलुळ् – ऎन्ऱुम्
पुणैयाम् मणिविळक्काम्* पूम् पट्टाम् पुल्गुम्
अणैयाम्* तिरुमाऱ्-कु अरवु
श्रीमहालक्ष्मी (पिराट्टि) के साथ रहने वाले भगवान के लिए, आदिशेष (तिरुवनन्ताऴ्वान्) बाहर जाने पर छत्र बन जाते हैं, बैठने पर सिंहासन बन जाते हैं, खड़े होने पर उनके दिव्य पादुकाएँ बन जाते हैं, शयन करने पर वह विशाल समुद्र में उनकी शय्या/नाव बन जाते हैं, वह शुभ दीपक बन जाते हैं, सुंदर दिव्य वस्त्र बन जाते हैं, और वे तकिए के समान बन जाते हैं जिन्हें भगवान आलिंगन करते हैं।
हम इस पाशुर के माध्यम से समझते हैं कि आदिशेष कौन-कौन से कैङ्कर्य (सेवाएँ) भगवान के लिए करते हैं। सभी देवता भगवान के पास लाभ माँगने जाते हैं, परंतु इस पाशुर से हम समझते हैं कि भगवान आदिशेष की सेवाओं का विशेष आनंद लेते हैं, क्योंकि वे सेवाएँ बिना किसी अपेक्षा के, केवल उनके आनंद और संतोष के लिए करते हैं | भगवान प्रेम के साथ की गई हर सेवा को स्वीकार करते हैं।
**ओरडियुम् साडुदैत्त* ऒण् मलर्च् चेवडियुम्*
ईरडियुम् काणलाम् ऎन नॆन्जे !** – ओरडियिल्
तायवनैक् केसवनैत् * तण्डुऴाय् मालै सेर्*
मायवनैये मनत्तु वै
मुदल् तिरुवन्दादि के अंतिम पासुरम में, आऴ्वार् कहते हैं – “हे मन! अपने भीतर उसी प्रभु को धारण करो, जो अद्भुत कार्य करता है, जिसने अपने चरणों से ब्रह्माण्ड की सीमा तय की, जिसने असुर केशी का वध किया… तुम उन दिव्य चरणों को देख सकोगे – जिन्होंने इस संसार को नापा और शकटासुर राक्षस को लात मारा।” इस पासुर के माध्यम से हम समझते हैं कि भगवान ही साध्य (लक्ष्य) और साधन (मार्ग) दोनों हैं।
भगवान लीला विभूति और नित्य विभूति दोनों के स्वामी हैं। इस पर-ज्ञान (श्रेष्ठ ज्ञान) की महत्व मुदल् तिरुवन्दादि में विशेष रूप से प्रकट की गई है।
इरण्डाम् तिरुवन्दादि
इरण्डाम् तिरुवन्दादि के पहले पाशुर में
अन्बे तगळिया * आर्वमे नॆय्याग *
इन्बुरुगु सिन्दै इडु तिरिया ** – नन्बुरुगि
ज्ञानच् चुडर् विळक्कु एट्रिनेन् * नारणर्क्कु *
ज्ञानत् तमिऴ् पुरिन्द नान्
आऴ्वार् स्नेह से उत्पन्न दासत्व का उल्लेख कर रहे हैं, जब वे भगवान् के गुणों का चिंतन करते हैं और यह स्वीकारते हैं कि वही परम लक्ष्य हैं जिन्हें प्राप्त करना है। मैं अपने आपको प्रभु की सेवा में अर्पित करता हूँ, इस गीत के माध्यम से जो ज्ञान का आशीर्वाद देता है—जहाँ प्रेम दीपक है, आत्मीय लगाव घी है और ज्ञान उसकी बाती है। भक्ति और प्रेम के द्वारा वे भगवान् की महिमा का गान कर रहे हैं। भक्ति ही उच्च स्तर का ज्ञान है। इरण्डाम् तिरुवन्दादि में परभक्ति की विशेष रूप से व्याख्या की गई है।
इरण्डाम् तिरुवन्दादि के २१ वा पाशुर मे
तामुळरे * तम् उळ्ळम् उळ्ळुळदे * तामरैयिन्
पूवुळदे * एत्तुम् पॊऴुदण्डे ** – वामन्
तिरुमरुवु * ताळ् मरुवु सॆन्नियरे * सॆव्वे
अरुनरगम् सेर्वदु अरिदु
यहाँ आऴ्वार् कह रहे हैं कि, भगवान की आराधना करने के लिए हमारे पास शरीर और इन्द्रियाँ हैं, हमारे पास मन है, हमारे पास अर्पित करने के लिए कमल का फूल है, उनकी महिमा गाने के लिए समय है, हमारे पास वामन मूर्ति हैं जिनके दिव्य चरण हमारे सिर पर विराजमान हैं, हमारे पास अपना सिर है जिसे हम उन्हें समर्पित कर सकते हैं। तो फिर हम क्यों भगवान की महिमा का गान नहीं कर रहे हैं? यह तो आश्चर्य की बात है!!
इरण्डाम् तिरुवन्दादि के अन्तिम १०० वा पाशुर मे
माले ! नॆडियोने ! कण्णने! * विण्णवर्क्कु
मेला ! * वियन् तुऴाय्क् कण्णियने! ** – मेनाळ्
विळविन्काय् * कन्ऱिनाल् वीऴ्त्तवने ! * ऎन्ऱन्
अळवन्ऱाल् यानुडैय अन्बु
आऴ्वार् कह रहे हैं –
“हे अपने भक्तों पर स्नेह करने वाले! हे अपरिमेय, जिनकी कोई सीमा नहीं बताई जा सकती! हे नित्यसूरियों के स्वामी! हे तुलसीमाला धारण करने वाले! हे कृष्ण रूप में अवतरित होने वाले! आपके प्रति मेरा जो स्नेह है, वह अब अत्यधिक बढ़ चुका है।”
मून्ऱाम् तिरुवन्दादि
पेयाऴ्वार् को वह दीप का दर्शन हुआ, जिसे पोय्गै आऴ्वार् और भूदत्ताऴ्वार् ने प्रज्वलित किया था।
मून्ऱाम् तिरुवन्दादि के पहले पाशुर मे
तिरुक्कण्डेन् * पॊन्मेनि कण्डॆन् * तिगऴुम्
अरुक्कन् अणि निरमुम् कण्डेन् **– सॆरुक्किळरुम्
पॊन्नाऴि कण्डेन् * पुरिसङ्गम् कैक् कण्डेन् *
ऎन्नाऴि वण्णन् पाल् इन्ऱु
यहाँ, आऴ्वार् इस बात का कीर्तन करते हैं कि भगवान् और तायार् (श्री महालक्ष्मी) ने अपना दिव्य स्वरूप आऴ्वार् को प्रकट किया। यह प्रबन्धम् अत्यंत सुंदर है, क्योंकि इसके प्रथम और अंतिम पाशुर दोनों में तिरु (लक्ष्मी) का उल्लेख मिलता है। पाशुर २ में, आऴ्वार् कहते हैं कि …
इन्ऱे कऴल् कण्डेन् * एऴ् पिऱप्पुम् यान् अऱुत्तेन् *
पॊन तोय वरै मार्बिल् पून्दुऴाय् ** – अन्ऱु
तिरुक्कण्डु कॊण्ड * तिरुमाले !* उन्नै
मरुक्कण्डु कॊण्डु ऎन मनम्
यहाँ, वे भगवान के दिव्य चरणकमलों का गुणगान करते हैं।
१६ वा पाशुर में
वन्दु उदैत्त वॆण् तिरैगळ्* सॆम्बवळ वॆण मुत्तम्*
अन्दि विळक्कुम् अणि विळक्काम्** – ऎन्दै
ऒरुवल्लित् तामरैयाळ् * ऒन्ऱिय सीर् मार्वन्*
तिरुवल्लिक्केणियान् सेन्ऱु**
यहाँ, आऴ्वार् तिरुवल्लिक्केणी में भगवान की महिमा का गान कर रहे हैं।
५७ वा पाशुर में
पॊलिन्दु इरुण्ड कार् वानिल् * मिन्ने पोल तोन्ऱि
मलिन्दु तिरुविरुन्द मार्वन्* – पोलिन्द
गरुडन् मेल् कण्ड * करियान् कऴले*
तॆरुळ् तन्मेल् कन्डाय् तॆळि।**
इस पाशुर में, वे गरुड़ सेवै का महिमा गा रहे हैं और गरुड़ाऴ्वार पर आरूढ़ हुए भगवान की महिमा का गुणगान करते हैं। वेद पुरुष स्वयं भगवान हैं, और गरुड़ाऴ्वार उनकी परत्व (सर्वोच्चता) का महिमामंडन करते हैं।
मून्ऱाम् तिरुवन्दादि के अंतिम पाशुर में यह कहा गया है।
सार्वु नमक्कॆन्ऱुम् चक्करत्तान्* तण् तुऴाय्त्
तार्वाऴ्* वरैमार्वन् तान् मुयङ्गुम्** – कारार्न्द
वान् अमरुम् मिन् इमैक्कुम्* वन् तामरै नॆडुङ्गण्*
तेनमरुम् पूमेल् तिरु
पेरिय पिराट्टि हमारी शरण हैं। वह प्रभु, जो अपने हृदय में पेरिय पिराट्टि को धारण करते हैं, वही हमारी शरणस्थली हैं। इसी कारण आऴ्वार् ने आरम्भ और अंत दोनों स्थानों पर तायार का स्मरण किया।
नान्मुगन तिरुवन्दादि
जहाँ प्रारम्भिक आऴ्वारों (मुदल आऴ्वारों) ने यह स्थापित किया कि केवल भगवान ही वह परम पुरुष हैं जिन्हें अनुभव करना और जिनमें आनन्द लेना है, वहीं तिरुमऴिसै आऴ्वार् उस प्रक्रिया में बाधक ‘घास-पात’ (अवरोधों) को हटाते हैं | भगवान का अनुभव करने में सबसे बड़ा अवरोध क्या है? अन्य देवताओं की उपासना, भगवान् का अनुभव प्राप्त करने में वह मुख्य अवरोध बन जाती है जिसे जड़ से उखाड़ना आवश्यक है। इस दिव्य प्रबन्ध नान्मुगन् तिरुवन्दादि में, आऴ्वार् संसारियों को यह समझाते हैं कि जिन अन्य देवताओं को वे ईश्वर मानते हैं, वे भी वास्तव में भगवान द्वारा ही नियंत्रित होते हैं। वह बताते हैं कि केवल श्रीमन्नारायण ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के एकमात्र अधिपति एवं नियन्ता हैं।
नान्मुगन तिरुवन्दादि की तनियन् कहती है-
नारायणन् पडैत्तान् नान्मुगनै * नान्मुगनुक्कु
एरार सिवन् पिरन्दान् ऎन्नुम् सॊल् ** – सीरार्
मॊऴि सॆप्पि वाऴलाम् नॆन्जमे! * मॊय् पू
मऴिसैप् पिरान अडिये वाऴ्त्तु
नारायण ने ब्रह्मा की सृष्टि की और इस ब्रह्मा से शिव का जन्म हुआ। हमें यह सुन्दर पाशुर देने वाले, पुष्प–उद्यान नगरी मऴिसै में जन्मे महान तिरुमऴिसै आऴ्वार् हैं।
३५ वा पाशुर में
ताळाल् उलगम् * अळन्द असैवे कोल्?
वाळा किडन्दरुळुम् वाय् तिऱवान् ** – नीळोदम्
वन्दलैक्कुम् मामयिलै * मावल्लीकेणियान् *
अय्न्दलै वाय् नागत्तणै*
यहाँ तिरुवल्लिकेणि के भगवान का गुणगान किया गया है। वे जो आदिशेष पर विराजमान हैं – क्योंकि आपने जगत का परिमाण किया, क्या आप अब विश्राम कर रहे हैं? क्या आपने महान तिरुमयिलै में, जहाँ लहरें आकर आपके विश्राम-स्थान को स्पर्श करती हैं, उस दिव्य तिरुवल्लिकेणि में निवास ग्रहण कर लिया है?
४३ वा पाशुर में
मङ्गुल् तोय् सेन्नि * वड वेङ्गडत्तानै
कङ्गुल् पुगुन्दार्गळ् काप्पणिवान्** – तिङ्गळ्
सडै एऱ वैत्तानुम् * तामरै मेलानुम् *
कुडै एऱत् ताङ्गुवित्तुक् कोण्डु**
जब देवता सत्त्व-भाव में रहते हैं, तब वे सभी भगवान् का गुणगान करते हैं और मंगलाशासन अर्पित करते हैं। भगवान् की सेवा (कैंकर्य) के लिए जो भी उपयुक्त साधन-सामग्री होती है, उसे लेकर सब देवता मिलकर परमेश्वर के लिए मंगलाशासन करते हैं।
६८ वा पाशुर में
तिऱम्बेनमिन् कण्डीर् तिरुवडि तन् नामम्
मऱन्दुम पुऱम् तॊऴा मान्दर – इऱैन्जियुम्
सादुवराय्प्* पोमिन्गळ् एन्ऱान् * नमनुम् तन्
तूदुवरैक् कूविच् चॆविक्कु
तीन आऴ्वारों ने एम्परुमान् के परत्वम् (सर्वश्रेष्ठत्व) का गुणगान किया। तिरुमऴिसै आऴ्वार् ने विशेष रूप से यह स्पष्ट किया कि केवल एम्परुमान् की ही उपासना करनी चाहिए, अन्य किसी देवता की नहीं। यहाँ यम-किन्कर संवाद को प्रस्तुत किया गया है। यम अपने दूतों से कहते हैं कि वे श्रीवैष्णवों के पास न जाएँ।
श्रीवैष्णव एम्परुमान के चरणों को भले ही कभी भूल जाएँ, लेकिन वे कभी अन्य देवताओं की पूजा नहीं करेंगे।
९६ वा पाशुर में
इनियऱिन्देन्* ईसऱ्-क्कुम् नान्मुगऱ्-क्कुम् दॆय्वम्*
इनियऱिन्देन् ऎम्पॆरुमान्! उन्नै ** – इनियऱिन्देन्
कारणन् नी कट्रवै नी * कऱ्-पवै नी * नऱ्-करिसै
नाराणन् नी नन्गऱिन्देन् नान्
हे मेरे प्रभु! मैंने दृढ़ता से जान लिया है कि आप ब्रह्मा और रुद्र के भी स्वामी हैं। मैं आपकी मूल स्वभाव को समझता हूँ — आप ही सबका कारण हैं, जो पहले सीखा गया है वह भी आप ही हैं, और जो भविष्य में सीखा जाएगा वह भी आप ही हैं। आप ही सबका रक्षक हैं, आप ही मेरे नारायण हैं।
इसी के साथ, हमने संक्षेप में मुदल, इरण्डाम्, मून्ऱाम् और नान्मुगन् तिरुवन्दादि का परिचय देख लिया।
अडियेन् जानकी रामानुज दासी
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