श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः
इस लेख में, हम पेरिय तिरुमोऴि, तिरुक्कुऱुन्ताण्डगम् और तिरुनेडुन्ताण्डगम् के बारे में जानेंगे।
हमने पिछले लेखों में निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण अवधारणाओं को सम्मिलित किया:
- दिव्यप्रबन्ध क्या है?
- प्रत्येक दिव्यप्रबन्ध का लक्ष्य क्या है?
- दिव्यप्रबन्ध कैसे आया?
- दिव्यप्रबन्ध की रक्षा किसने की?
- पत्तु/पधिगम् क्या है? अर्थात् दशक क्या है?
अब हम तिरुमङ्गै आऴ्वार् के कार्यों को देखेंगे|
तिरुमङ्गै आऴ्वार् की कृतियाँ हैं: पेरिय तिरुमोऴि, तिरुक्कुऱुन्ताण्डगम् , तिरुवेऴुक्कूट्रिरुक्कै, सिऱिय तिरुमडल्, पेरिय तिरुमडल्, तिरुनेडुन्ताण्डगम्|
इन तीनों में से पेरिय तिरुमोऴि, तिरुक्कुऱुन्ताण्डगम्,
तिरुनेडुन्ताण्डगम् द्वितीय सहस्रं में आते हैं।
शेष तीन तिरुवेऴुक्कूट्रिरुक्कै, सिऱिय तिरुमडल्, पेरिय तिरुमडल्, इयऱ्-पा यानि तीसरे सहस्रं में आते हैं।
तिरुमङ्गै आऴ्वार् का इतिहास
आऴ्वार् का जन्म तिरुक्कुऱैयालूर (तिरुवाली-तिरुनगरी के निकट) में होता है। वह एम्पेरुमान यानि भगवान् और भागवत विषय के प्रति बिना किसी आसक्ति के बड़े हुए और भौतिकवादी बन गए। उनके पास ज्ञान के साथ-साथ एक दृढ़ शरीर और महान युद्ध कौशल भी था और राजा ने उन्हें अपनी सेना के सेनापति के रूप में नियुक्त किया और शासन करने के लिए एक छोटा सा क्षेत्र अर्थात प्रदेश भी दिया था।
भगवान् ने आऴ्वार् को “मयर्वऱ मदिनलम् “ से अनुग्रहित किया, अर्थात, उन्होंने उन्हें सच्चा ज्ञान और भक्ति दी और अज्ञानता को नष्ट कर दिया। एम्पेरुमान की कृपा (अनुग्रह) से, उन्हें सबसे पहले कुमुदवल्ली नाच्चियार् के माध्यम से भागवत संबंध / संगति कि प्राप्ति हुई। कुमुदवल्ली नाच्चियार् एक देवस्त्री हैं। कुमुदवल्ली नाच्चियार को देखकर और उनकी सुंदरता से बहुत संलग्न होकर, नीलन् (आऴ्वार्) उनसे विवाह करना चाहते हैं। कुमुदवल्ली ने एक प्रतिबंध लगाया कि वह केवल उसी श्रीवैष्णव से विवाह करेंगी जिसने किसी आचार्य से पञ्च संस्कार (सम्प्रदाय में दीक्षा) प्राप्त किया हो। नीलन् तुरन्त् तिरुनऱैयूर् की ओर दौड़ते हैं और तिरुनऱैयूर् नम्बि के सामने जाते हैं और उनसे पंच संस्कार का आशीर्वाद देने के लिए कहते हैं |
फिर वह अपनी सारी संपत्ति का उपयोग करके तदीयाराधनम् (प्रतिदिन श्रीवैष्णव को स्वादिष्ट वैभवशाली प्रसाद खिलाना) करके भगवत कैङ्कर्यम् (सेवा) करना आरंभ कर देते हैं। आऴ्वार् ने अपना तदीयाराधनम् निरन्तर् रखा और अंततः उनकी संपत्ति समाप्त हो गई| इसके बाद वह बड़ी भक्ति के साथ कैंकर्य बनाए रखने का निर्णय लेते हैं, यहाँ तक कि अपने क्षेत्र से जाने वाले धनी लोगों को लूटकर (बलपूर्वक छीन कर) भी।
जैसा कि कहा जाता है कि श्रीमन्नारायण् मानव रूप लेते हैं (आचार्य के रूप में) और शास्त्र की सहायता से संसार में कष्ट भोगने वाले जीवात्मा का उद्धार करते हैं, भगवान नाच्चियार् सहित विवाहित दम्पति के वेश में आऴ्वार् के स्थान की ओर जाने लगते हैं। आऴ्वार्, बड़ी राशि प्राप्त करने के अवसर से उत्साहित होकर, भगवान और उनकी बारात को घेर लेते हैं और उनसे सब कुछ लूट लेते हैं। अंत में, आऴ्वार् भगवान् के चरण कमलों से अँगूठी काट लेते हैं। फिर, आऴ्वार् आभूषण और धन का एक बड़ा गठरी तैयार करते हैं और उसे उठाने की प्रयास करते हैं परन्तु ऐसा करने में असमर्थ होते हैं।
वह वर (भगवान्) की ओर देखते (जाँचते) हैं और उनसे कहते हैं कि “आपने कुछ मंत्र पढ़ा है, जो मुझे इसे उठाने से रोक रहा है।” भगवान (भगवान्) इस बात को स्वीकारते हैं कि एक मंत्र है और कहते हैं कि यदि आऴ्वार् इसे सुनना चाहें तो वे उसे इन्हें बता सकते हैं। आऴ्वार् अपनी तलवार दिखाते हैं और कहते हैं कि वे इसे तुरंत सुनना चाहते हैं। भगवान ने आऴ्वार् को तिरुमंत्र बताया जो सुनने में बहुत ही आनन्ददायक है, जो प्राप्त किये जाने वाले अन्तिम लक्ष्य को स्थापित करता है, जो सभी वेदों का सार है, जो इस दुःखों से भरे संसार से उद्धार कर सके, जो वाचक को उनकी खोज (अन्वेषण) पर आधारित ऐश्वर्य (इस संसार में सुख), कैवल्यम् (स्वयं का आनंद लेना) या भगवत कैंङ्कर्य का आशीर्वाद दे सकता है।
भगवान से तिरुमंत्र सुनने के बाद, वे आऴ्वार् को श्रीमहालक्ष्मी के साथ अपना दिव्य रूप दिखाते हैं जो दया की साक्षात मूर्ति हैं, दिव्य गरुड़ आऴ्वार् पर विराजमान हैं जिनका शरीर सुन्दर स्वर्ण के समान चमकता है। वे अपनी निर्हेतुक कृपा से आऴ्वार् को दिव्य दोषरहित ज्ञान का आशीर्वाद भी देते हैं, और आऴ्वार् का रूपांतरण होता है तथा वे अपना जीवन कैंकर्य (स्वैच्छिक और प्रेमपूर्ण सेवा) के लिए समर्पित करना प्रारंभ कर देते हैं।
आऴ्वार् ने भगवान् के आशीर्वाद को समझते हुए, श्रीमहालक्ष्मी तायार् (जननी) के पुरुषकार को समझते हुए भगवान के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित होकर, हमें ६ प्रबंधों से अनुग्रहित किया – पेरिय तिरुमोऴि, तिरुक्कुऱुन्ताण्डगम् , तिरुवेऴुक्कूट्रिरुक्कै, सिऱिय तिरुमडल्, पेरिय तिरुमडल्, तिरुनेडुन्ताण्डगम्, जिन्हें नम्माऴ्वार् के चार दिव्य प्रबंधों के लिए ६ अंग (सहायक विषय) माना जाता है। भगवान अंततः आऴ्वार् को अपने शिष्यों के साथ विभिन्न दिव्य देश में जाने और विभिन्न दिव्य देश अर्चावतार् भगवान के लिए मङ्गलासासनम् (सभी मंगलमय हों) करने का आदेश देते हैं और परमपदम् की ओर प्रस्थान करते हैं।
आऴ्वार् ने भारत देश के कोने-कोने का भ्रमण किया तथा अनेक दिव्य देशों (८० से अधिक) का भ्रमण किया तथा वहाँ भगवान की महिमा का प्रचार किया। वह भी, उन्होंने केवल ४० से अधिक दिव्य देशों का गायन किया है, जिन्हें किसी अन्य आऴ्वार् ने नहीं गाया – इस प्रकार उन्होंने उन दिव्य देशों को हमारे समक्ष प्रकट किया है। पेरिय तिरुमोऴि में, परमपदधाम का अनुभव भगवान द्वारा दिया जाता है, जब आऴ्वार् इन दिव्य देशों का गायन करते हैं तथा महिमा प्रदान करते हैं।
पेरिय तिरुमोऴि तनियन् (स्तुति)
कलयामि कलि ध्वम्सं कविं लाेक दिवाकरम्
यस्यगोभि: प्रकाशाभिर् आविद्यं निहतं तम:
सरल अनुवाद
मैं कवि परकाल का ध्यान कर रहा हूँ, जो संसार के लिए सूर्य हैं, जो कलयुग के दोषों को नष्ट करते हैं, जिसके प्रकाश किरणे अंधेरे की ओर ले जाने वाली अज्ञानता को दूर करती है।
कुछ और तनियन् (स्तुति) हैं जिन्हें सम्मिलित किया जाएगा जब हम पेरिय तिरुमोऴि और आऴ्वार् के अन्य कार्यों को विस्तार से सीखेंगे।
वह भगवान् से बहुत अधिक संलग्न थे और भगवान भी उनसे बहुत अधिक आसक्त (संलग्न) थे।
मामुनिगळ् ने तिरुमङ्गै आऴ्वार् को एक सुंदर समर्पण किया, तिरुमङ्गै आऴ्वार् पर उनकी दिव्य शरीर की दिव्य सुन्दरता का निर्माण करके।
तिरुमङ्गै आऴ्वार् की कृतियाँ:
पेरिय तिरुमोऴि:
इन छह प्रबंधों में से, पेरिय तिरुमोऴि पहला है। इस सुन्दर प्रबन्धम् में, तिरुमंगै आऴ्वार् विभिन्न दिव्य देशों का पूर्ण आनन्द लेते हैं, जहाँ भगवान् उपस्थित रहते हैं।
यह सुप्रसिद्ध है कि आऴ्वार् ने अपने पासुरम् में जिन दिव्य देशों का उल्लेख किया है, उन सभी स्थानों पर स्वयं जाकर यात्रा की तथा वहाँ उपस्थित दिव्य देशों और भगवान् (भगवान) को मङ्गलासासन किया। वे प्रकृति, पशु, झील, वृक्षों की सुंदरता का भी आनंद लेते हैं तथा अपने प्रबंधों में उनका वर्णन भी करते हैं।
इन आऴ्वार् ने इससे पहले आत्मा (स्वयं) को धूप में और शरीर को छाया में रखा था। आत्मा को सूर्य के प्रकाश में रखने का अर्थ है “आरंभ में भगवद् विषय में संलग्न न होना”; शरीर को छाया में रखने का अर्थ है “अनादि काल से ही सांसारिक (विश्व-व्यापी) सुखों में आसक्त रहना, और सदा शरीर की संरक्षण में बन्धे रहना|” भगवत् विषय ही वास्तविक छाया (शरण) है।
भगवान ने देखा, “आऴ्वार् ऐसी किसी भी बात से आश्वस्त नहीं होते जिसे उनकी अपनी आँखों से नहीं देखा जा सकता और इसलिए यह निर्णय लेता है कि ‘यदि मैं सांसारिक सुखों की तरह स्वयं को उसकी आँखों के सामने प्रस्तुत करूँ, तो वह मुझे अस्वीकार नहीं कर सकता’ और उगन्धरुळिन निलङ्गळ् (दिव्यदेशम् [दिव्य निवास] जो भगवान को प्रिय हैं) पहुँचते हैं , आऴ्वार् को स्वीकार किया, अपने सभी रूप/स्वभाव को आऴ्वार् के समक्ष प्रकट किया, आऴ्वार् को आनंद दिया ताकि आऴ्वार् उनके वियोग में जीवित न रह सकें, आऴ्वार् को इस लोक में रहते हुए भी परमपदम् के निवासियों के समान बनाया, और अंततः परमपदम् तक पहुँचने में भी उनकी सहायता की – इन सभी का विवरण इन प्रबन्धों में दिया गया है।
भगवान अपनी दिव्य सुन्दरता आऴ्वार् को दिखाते हैं और उन्हें मंत्रमुग्ध (सम्मोहित) कर देते हैं।
पेरिय तिरुमोऴि के पहले पधिगम्, ‘वाडिनेन् वाडि’ में, आऴ्वार् तिरुमन्त्रम् की महिमा पर प्रकाश डालते हैं। तिरुमन्त्रम् बद्रिकाश्रम में प्रकट हुआ । तिरुमन्त्रम् इस बात पर प्रकाश डालता है कि हम अपने रक्षक नहीं हैं, हम भगवान के सेवक हैं। हम इस महत्वपूर्ण सत्य को दिव्यदेशम् के अर्चा विग्रह को नमन करके समझ (अवबोधनम्) सकते हैं और दिव्य प्रबंधम् इस अर्थ पर प्रकाश डालती हैं।
सर्वप्रथम, भगवान् आऴ्वार् का भौतिक विषयों से सम्बन्ध देखकर, उन्हें इस स्थिति से उत्थान का उपाय अन्वेषण करते हुए, विचार किया – “हम उसे शास्त्रम् दिखाकर नहीं पा सकते, क्योंकि वह अन्य विषयों में रुचि रखता है, इसलिए हमें अपनी सुंदरता (सौंदर्य) दिखाकर उसे प्राप्त करना चाहिए” – उन्होंने (भगवान्) उन विषयाें में उसके रुचि को ही माध्यम माना और उसे अपनी सुन्दरता दिखाई, तब भगवान उन्हें परमपदम् का अनुभव देते हैं जब आऴ्वार् सभी दिव्य देशों में भगवान् से मिलने जाते है।
यह देखकर, आऴ्वार्, ‘वाडिनेन् वाडी’ से प्रारंभ होकर (पेरिय तिरुमोऴि – प्रथम शतकम् ) के द्वारा ‘ओरु नाळ् सुऱम’ (पेरिय तिरुमोऴि – १० वा शतकम्), भगवान के दिव्य निवास में लीन हो गए, उन्हें आत्मसमर्पण करने योग्य मानते हुए, साधन (उपाय) के रूप में, तथा आनंद लेने योग्य के रूप में भी।
आऴ्वार् को हर समय दिव्य धाम में स्थित देखकर, भगवान् ने विचार किया – “परमपदम् आने में उनकी रुचि कैसे होगी यदि वह इन दिव्य देशों में मेरी सुन्दरता का इतना आनंद ले रहा है? मुझे आऴ्वार् को विशेष निवासस्थान (धाम) पर ले जाना चाहिए जहाँ यह अनुभव उसके लिए निरंतर बना (जारी) रहेगा; इसलिए हमें सबसे पहले उसे इस भौतिक संसार की क्रूरता (निर्दयता) दिखानी चाहिए”, इस प्रकार, वे भौतिक जगत के दोष दिखा रहे हैं।
यह देखकर आऴ्वार् अत्यन्त भयभीत हो गये, और ‘माट्रमुळ’ [पेरिय तिरुमोऴि – ११.८] में, उन्होंने भगवान को यह कहते हुए पुकारा ‘इरु पाडु ऎरि कॊळ्ळियिन् उळ् ऎऱुम्बे पोल्’ [पेरिय तिरुमोऴि – ११.८.४] (आग के दो छोर के बीच जकड़कर कष्ट सहती हुई चींटी की भाँति) और ‘आट्रङ्गरै वाऴ् मरम् पोल्’ [पेरिय तिरुमोऴि – ११.८.१] (नदी के किनारे लगे पेड़ के जैसे मैं भी सदा इस बात से भयभीत रहता हूँ कि भविष्य में क्या होगा) और ‘पाम्बॊडॊरु कूरैयिले पयिन्ऱाऱ् पोल्’ [पेरिय तिरुमोऴि – ११.८.३] (एक ही छत के नीचे साँप के साथ रहना और उसके साथ संबंध रखने जैसा), और अपने डर के बारे में उदाहरण के रूप में ऐसी कई परिस्थितियाँ दिखाए।
ऐसा कहा जाता है कि जब कोई कोषेय वस्त्र में धन प्राप्त करता है, तो इसे विशेष माना जाता है और आनंद होता है। उसी तरह भगवान अपने गुण, स्वरूप, रूप, विभूति – यह सब तिरुमन्त्रम् में दिखाते हैं। तिरुमंत्रम् कोषेय वस्त्र के समान है, जो भगवान के स्वरूप, रूप, विभूति और गुणों को अपने में रखता है। भगवान इसे आऴ्वार् को दिखाते हैं।
आऴ्वार् ने अर्चावतार का आनंद लिया, दिव्य देश के अनुभव का भी आनंद लिया, वे अनुभव का इतना आनंद ले रहे थे कि उन्हें संसार और परमपद में कोई अंतर नहीं लगा, परंतु भगवान आऴ्वार् को यह अनुभूति कराने के लिए कि यह एक स्थायी स्थान नहीं है जिसकी हमें इच्छा करनी चाहिए, संसार के भय को दर्शाते हैं।
तिरुक्कुऱुन्ताण्डगम्
भगवान सोचते हैं कि यदि आऴ्वार् भयभीत हैं और संसार के भय से पीड़ित हैं, तो वे कोई भी पाशुरम् प्रस्तुत नहीं कर सकेंगे। वह चाहते हैं कि आऴ्वार् दिव्य देश कैङ्कर्यम् (सेवा) में संलग्न हों, इसलिए भगवान आऴ्वार् को गुणानुभवम् (गुण का अनुभवम्) देते हैं।
जिस प्रकार एक अत्यंत प्यासा व्यक्ति पानी में कूद जाता है, अपने ऊपर पानी डाल लेता है, आदि, उसी प्रकार आऴ्वार् ने अपने मुख से भगवान का गुणगान करके, अपने शिरस से उन्हें दण्डवत करके, अपने मन से उनके विषय में चिन्तन करके अपने आपको जीवित रखने का विचार किया और इस प्रकार तिरुक्कुऱुन्ताण्डगम में भगवान के चरणों में शरणागत हो गये।
प्रथम पाशुरम् में आऴ्वार् कहते हैं:
निदियिनैप् पवळत् तूणै * नॆऱिमैयाल् निनैय वल्लार् *
कदियिनैक् कंजन् माळक् * कण्डु मुन् अण्डम् आळुम् **
मदियिनै मालै वाऴ्त्ति * वणङ्गि ऎन् मनत्तु वन्द *
विदियिनैक् कण्डु कॊण्ड * तॊण्डनेन् विडुगिलेने
भगवान उस धन के समान हैं जो कठिन समय में हमारी सहायता करता है; वह उस मूँगे के समान है जिसे हर कोई चाहता है; वह सबको पकड़े रखने वाले स्तम्भ के समान हैं; वह गंतव्य हैं जहाँ भक्तजन पहुँचते हैं, वह समस्त लोकों का स्वामी हैं, वह सदैव भक्तों का स्मरण करते हैं और उनसे प्रेम करते हैं। वह आये और मेरे हृदय में एक सुन्दर स्थान पर विराजमान हो गए हैं। अपनी आँखों से देख पानेवाले व्यक्ति होने के नाते, मेरे पास कोई अन्य आश्रय नहीं है, मैं उसे कभी नहीं छोडूँगा।
पाशुरम् (पद) १९ में
पिण्डियार् मण्डै एन्दिप * पिऱर् मनै तिरिदन्दु उण्णुम् *
मुण्डियान् साबम् तीर्त्त * ऒरुवन् ऊर् ** उलगम् एत्तुम्
कण्डियूर् अरङ्गम् मॆय्यम् * कच्चि पेर् मल्लै ऎन्ऱु मण्डिनार् *
उय्यल् अल्लाल् * मट्रैयार्क्कु उय्यलामे?
आऴ्वार् कहते हैं, जो लोग इस विचार और कार्य के साथ जीते हैं कि भगवान ही सर्वस्व हैं, उन्हें उज्जीवन मिलेगा।
अंतिम पाशुरम् (पद) में:
**वानवर् तङ्गळ् कोणुम् * मलर् मिसै अयनुम् * नाळुम्
तेमलर् तूवि एत्तुम् * सेवडिच् चॆङ्गण् मालै **
मानवेल् कलियन् सॊन्न * वण् तमिऴ् मालै नालैन्दुम्
* ऊनमदिन्ऱि वल्लार् * ऒळि विसुम्बाळ्वर् तामे**
कलियन् तिरुमङ्गै आऴ्वार् कहते हैं कि जो कोई तिरुक्कुऱुन्दाण्डगम् के इन २० पासुरम् का भगवान से किसी भी उपकार की अपेक्षा रहित पाठ कर पाते हैं, और केवल शरणागति के भाव से गा पाते हैं, वे वैकुंठ धाम प्राप्त करेंगे। ये पद भगवान के गुणों को गौरवान्वित करते हैं।
तिरुनेडुन्ताण्डगम्
तिरुमङ्गै आऴ्वार् पहले शरीर पर ध्यान केंद्रित कर रहे थे और सांसारिक जीवन में थे। भगवान की कृपा से उनका रूपान्तरण हो गया। तिरुमङ्गै आऴ्वार् ने सबसे पहले पेरिय तिरुमोऴि की रचना की; उन्होंने भगवान् से प्रार्थना के साथ समाप्त किया कि देह संबंध (आत्मा का शरीर के साथ संबंध) से छुटकारा पाने में सहायता करें। चूँकि भगवान् ने आऴ्वार् को स्वयं दर्शन नहीं दिया क्योंकि वे चाहते थे कि आऴ्वार् को उनके दर्शन के लिए और अधिक (भूख) लालसा हो, अपने दूसरे प्रबंधम् तिरुक्कुऱुन्ताण्डगम् में आऴ्वार् इस विलम्ब को सहन नहीं कर पा रहे थे, जैसे कि एक अत्यधिक प्यासा व्यक्ति न केवल पानी पीता है किंतु उसमें डूब जाता है और स्वयं पर पानी छिड़काता है, आऴ्वार् ने भगवान् के बारे में न केवल बात की, दंडवत होकर उनका चिंतन करके गाया, और स्वयं को बनाए रखने का प्रयास किया, जहाँ भगवान ने आऴ्वार् को अपने भव्य गुणों को दर्शाया।
जब एक प्यासा व्यक्ति थोड़ा सा पानी पीता है, तो वह और अधिक पीने की इच्छा अनुभव करेगा। आऴ्वार् ने भी भगवान के लिए बहुत अधिक प्यास अनुभव किया, और इसलिए अपने तीसरे प्रबंध तिरुवेऴुक्कूट्रिरुक्कै में, उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया तिरुक्कुडंदै आरावामुधन् को बड़ी लालसा (इच्छा) के साथ। इसलिए यह शरणागति प्रबंधम् है।
तिरुवेऴुक्कूट्रिरुक्कै अनन्तरम्, तिरुमङ्गै आऴ्वार् ने दो तिरुमडल् प्रबंधों की रचना की (पवित्र स्तोत्र जो नायिका के प्रति नायक (नायिका का प्रियतम) के प्रेम से संबंधित हैं।) – सिऱिय तिरुमडल् जो कृष्ण से संबंधित है और पेरिय तिरुमडल् जो तिरुनऱैयूर् नम्बि से संबंधित विषय से व्यवहारित है (तिरुनऱैयूर् (एक दिव्य देशम् या दिव्य धाम, कुम्भकोणम् के पास है।) मडलूर्दल् शब्द नायिका द्वारा प्रदर्शित साहस को संदर्भित करता है (या नायक), जो, यह जानने के बाद कि नायक (या नायिका) उसके प्रेम का प्रतिसाद नहीं दे रहा है, उसे पूरी जग के सामने लज्जित करती है, ताकि संसार के लोग उसे अपने साथ मिलाने में सहायता करे। तिरुमङ्गै आऴ्वार्, जो एक महिला की भावनात्मक् स्थिति को प्राप्त करते हैं, इन दो मडलाें में ऐसा साहस प्रकट करते हैं।
इसके बाद भी भगवान नहीं आते हैं, तो अंततः वे तिरुनेडुन्ताण्डगम् का पाठ करते हैं और फिर भगवान तक पहुँचते हैं। तिरुनेडुन्ताण्डगम् में ३० पाशुरम् हैं। इसे ३ भागों में विभाजित किया गया है।
शुक महर्षि और मुदल आऴ्वारों (सारो योगी, भूत योगी और महताह्वय योगी) जैसे संत, भगवान के परत्वम् अर्थात सर्वश्रेष्ठता (सर्वोच्चता) में डूबे रहते थे। सनक और तिरुमऴिसैप् पिरान् (भक्तिसार योगी) जैसे लोग उनके अन्तर आत्मा (हमारे आत्मा के भीतर उपस्थित) स्वरूप में डूबे (धुली ) रहते थे; पराशर, पाराशर्य (व्यास) और नम्माऴ्वार् (श्री शठकोप स्वामी), पेरियाऴ्वार् (श्री विष्णुचित्त स्वामी) , आण्डाळ् (गोदा देवी) जैसे लोग कृष्णावतारम् (अवतार्) में मग्न थे; नारद् और तोण्डरडिप्पोडी आऴ्वार् (भक्ताङ्घ्रिरेणु स्वामी), तिरुप्पानाऴ्वार् (योगी वाहन स्वामी) जैसे लोग डूबे रहे कोयिल (श्रीरंगम् मंदिर) में (यह अन्य लोगों के साथ सम्मिलित है जो उनकी सर्वोच्चता को दर्शाते हैं क्योंकि भगवान की स्थिति स्वयं ही बनी थी, और चूंकि यह निवास हर दूसरे निवास के लिए मूल है); श्री शौनक भगवान् और तिरुमङ्गै आऴ्वार् अर्चावतारम् में मंत्रमुग्ध रहे (भगवान अर्चना विग्रह का रूप- भगवान के सुलभता (सौलभ्य) गुण का परम स्वरूप)।
तिरुनेडुन्ताण्डगम् की महानता
भट्टर् के जीवन की एक विशेषता यह है कि वह तिरुनारायणपुरम् गए थे ताकि वे चर्चा कर सकें और नन्जियर् को हमारे सम्प्रदाय में ला सकें। यह श्री रामानुजाचार्य का दिव्य आदेश था कि नन्जियर्, जिन्हें पहले माधवाचार्य के नाम से जाना जाता था, को सुधारा जाना चाहिए। भट्टर् तिरुनारायणपुरम् तक जाते हैं। माधवाचार्यर्, भट्टर् के बारे में सुनकर, यह तुरन्त समझ जाते हैं और भट्टर् के साथ वाद-विवाद में संलग्न हो जाते हैं। भट्टर् भगवान के परत्वम् को स्थापित करने के लिए तिरुनेडुन्ताण्डगम् का उपयोग करते हैं और उसके बाद शास्त्र से सभी अर्थ प्रस्तुत करते हैं। माधवाचार्यर् भट्टर् के चरण कमलों में हार मानकर गिर जाते हैं और उन्हें आचार्य स्वीकार करते हैं। भट्टर् पेरिय पेरुमाळ् के पास जाते हैं और वे उनके सामने पूरी घटना सुनाते हैं। पेरिय पेरुमाळ्, बहुत प्रसन्न होकर, भट्टर् को तिरुनेडुन्ताण्डगम् का पाठ करने का आदेश देते हैं और उसके बाद इसे एक प्रथा बना दिया जाता है। श्रीरङ्गम् में -अध्ययन् उत्सव का प्रारम्भ् तिरुनेडुन्ताण्डगम् के पाठ से होता है।
तिरुनेडुन्ताण्डगम् के प्रथम ३ श्लोकों में, आऴ्वार् समस्त शास्त्रम् का सार समझाते हैं।
भगवान अन्तर्यामी हैं, वे स्रोत हैं, सृष्टिकर्ता हैं, जीविका प्रदान करते हैं, बन्धन से मुक्त करने के लिए संहारक (विनाशक) हैं, और ये ३ श्लोक भगवान का परत्वम् दर्शाते हैं।
अन्य सभी श्लोक प्रथम ३ श्लोकों का विस्तृत व्याख्यान् हैं।
- पहले १० पासुरम् में, आऴ्वार् स्वयं के रूप में गाते हैं, अर्थात् तिरुमङ्गै आऴ्वार् के रूप में।
- अगले १०, अर्थात् ११-२०, परकालनायकी तायार् (नायिका की माता का भाव) के रूप में गाते हैं– तिरुत् तायार् (नायिका की माता) के शब्द्।
- अगले १० में, २१-२८, आऴ्वार् परकाल नायिका के भावम् में गाते हैं। वे भगवान् के साथ अपने वियोग का वर्णन करते हैं और उसे अपने सखियों को बताते हैं – यह पिराट्टि (श्रीमहालक्ष्मी) के शब्द् हैं।
- अंत में, अंतिम २ पासुरम् में, २९ और ३०, वे स्वयं के रूप में गाते हैं।
तिरुनेडुन्ताण्डगम् भगवद्गीता के अध्याय १०, श्लोक ९ के समान है।
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥
अर्थ: मुझ पर चित्त लगाए हुए, और मुझ में ही प्राण धारण किए हुए, वे (भक्त) मेरे विषय में एक-दूसरे को सदैव प्रकाशित करते हैं मनोरंजन करते हैं। वे संतुष्ट हैं और वे उल्लासित हैं।
मच्चित्ता का अर्थ है: वे जो अपने विचारों को मुझ पर केंद्रित करते हैं। यहाँ तिरुनेडुन्ताण्डगम् में, पहले १० श्लोकों में, आळ्वार् का मन भगवान के बारे में सोच रहा है।
मदगताप्रणा इसका अर्थ है: ‘उनका जीवन मुझ पर आश्रित है। ऐसा जीवन जो मेरे बिना अस्तित्वहीन हो जाएगा।’ अगले दस श्लोकों में, आऴ्वार् का हृदय भगवान के चरण कमलों तक पहुँच गया। वे भगवान के अतिरिक्त और कुछ भी सोचने में असमर्थ हैं।
बोधयन्तः परस्परम् – भक्तगण् आपस में वार्तालाप कर रहे हैं। वे एक-दूसरे को मेरे विशेषताओं के कारण अपने विभिन्न अनुभवों का आदान-प्रदान करके प्रबुद्ध (ज्ञान) प्रदान करते हैं; आपस में मेरे दिव्य और मनोहर कार्यों से मनोरंजन करते हैं। वे केवल बातचीत से ही संतोष हैं (मेरे बारे में) जो उन्हें संतुष्टि का अनुभव देती है, इस प्रकार इसे पूरा करने के लिए और कुछ नहीं चाहिए। वे उसमें उल्लासित् हैं, दूसरों से (मेरा) श्रवण मात्र, उनमें प्रेम की एक परमानंदमयी (उत्साहपूर्ण) चमक उत्पन्न करता है। यहाँ परकाल नायकी और उसकी सखियाँ परकाल नायकी की मनःस्थिति में जो बातें कर रही हैं उसे उल्लेखित है।
इस प्रकार तिरुनेडुन्ताण्डगम् में, पहले दस पाशुरमों में, स्वयं के वास्तविक स्वरूप को निर्धारित करने के बाद, परमात्मा के वास्तविक स्वरूप, स्वयं के स्वभाव के अनुसार लाभ का निर्धारण करके, उन लाभों को प्राप्त करने में आने वाली बाधाओं का निर्धारित करना, बाधाओं को दूर करने में सहायक साधनों का निर्धारण करना और सिद्धि प्राप्ति को सक्षम बनाता है, तिरुमन्त्रम् (तिरुमन्तिरम्) को वार्तालाप का विषय बनाया – जो इन पांच पहलुओं (अर्थ पञ्चकम्) के बारे में सूचित करता है, उन्हें स्पष्टता मिली और उन्होंने अपना समय उसी के अनुसार बिताया।
मध्य दशक् में – ये पाशुरम् परकाल नायकी की माँ द्वारा अपनी पुत्री के बारे में कहे गए वचनों के रूप में स्थापित किए गए थे – उसकी पुत्री ने केवल मन में भगवान के बारे में सोचकर समय व्यतीत करना नहीं छोड़ा, वह अत्यधिक प्रेम के कारण मूर्छित हो गई, और उसने उन्हें अपनी आँखों से देखने की लालसा (स्पृहा) को पोषित किया, और जैसा उसने अपेक्षित किया था, उन्हें व्यक्तिगत रूप से न देख पाने के कारण वह मूर्छित हो गई। परकाल नायकी की सखियों ने उनके इस तरह मूर्छित होने के बारे में बात की और माँ अपनी पुत्री के बारे में ये शब्द कह रही हैं।
तीसरे दशक में – उसकी सखी ने उसकी यह दशा देखकर उसे शांत करने की इच्छा की, और इसलिए उसने उससे पूछा कि क्या हुआ, और क्योंकि यह परकाल नायकी के साथ जो कुछ हुआ था उसकी कहानी के बारे में था, उसने स्वयं को बनाए रखा और अपनी सखी से इसके बारे में बात की; क्योंकि कोई प्रश्न या उत्तर नहीं थे, विरह से उनका दुख उभर आया; वह दूत भेजने में लग गईं। उसके पश्चात जब वह नहीं आए, प्रेम-कलहः के कारण क्रोध अपने चरम पर पहुँच गया। अगर यह समय के साथ विस्तृत होता जैसे नम्माऴ्वार् के साथ हुआ, हो सकता है वे आकर स्वयं को प्रकट करते। तिरुमङ्गै आऴ्वार् की कोमलता के कारण, उसने क्रोध का परित्याग किया और पहले की तरह निराशा की अवस्था पुनः आ गई। इस अवस्था में भी वह तभी स्वयं को बनाए रखेगी जब भगवान आकर स्वयं को प्रकट करेंगे। चूंकि ऐसा नहीं हुआ, नम्माऴ्वार् के लिए जो परम्-भक्ति उत्पन्न हुई थी “मुनिये नाण्मुगने (तिरुवाइमोऴि – १०.१०)” में, वह इस समय तिरुमङ्गै आऴ्वार् के लिए जन्म हुआ; तो, उन्होंने व्यक्त किया अपनी अनन्य गतित्वम् (उसके सिवा कोई अन्य आश्रय (शरण) न होना), और उन्होंने अपने दोषों को व्यक्त किया,और इस प्रकार उनमें कोई अच्छा कर्म न होने के कारण, इस पाशुरम् (पद्य) में, आऴ्वार् विलाप करते हैं, “हे प्रेम करने वाले! आप इस अवस्था में भी प्रकट नहीं हो रहे हैं!”
२९वें पाशुरम् (पद्य) में आऴ्वार् कहते हैं:
अन्ऱायर कुलमगळुक्कु अरैयन् तन्नै *
अलै कडलैक् कडैनदडैत्त अम्मान तन्नै *
कुन्ऱाध वलि अरक्कर् कोनै माळक् *
कॊडुञ्जिलै वाय्च् चरम् तुरन्दु कुलम् कळैन्दु वॆन्ऱानै **
कुन्ऱेडुत्त तोळिनानै * विरितिरै नीर् विण्णगरम् मरुवि नाळुम् निन्ऱानै * तण् कुडन्दैक् किडन्द मालै *
नॆडियानै अडिनायेन् निनैन्दिट्टेने
आऴ्वार् तिरुक्कुडन्दै भगवान से प्रार्थना करते हैं, और कहते हैं, “मैं आपसे अलग नहीं हो सकता, कृपया मेरा हित करें।”
तीसवाँ (३०) श्लोक में:
मिन्नुमा मऴै तवऴुम् मेगवण्णा!*
विण्णवर् तम् पॆरुमानै! अरुळाय् ऎन्ऱु*
अन्नमाय् मुनिवरोडु अमरर् एत्त*
अरुमऱैयै वॆळिप्पडुत्त अम्मान् तन्नै**
मन्नुमा मणिमाड मन्ङ्गै वेन्दन्*
मानवेल् परगालन् कलियन् सॊन्न*
पन्निय नूल् तमिऴ् मालै वल्लार्* तॊल्लैप् पऴविनैयै मुदलरिय वल्लार् तामे
तिरुमङ्गै आऴ्वार् इस प्रबंधम में भगवान को एक महान इच्छा के साथ पुकारते हैं, और फिर, श्रीवैकुंठम् प्राप्त करके अपनी संतुष्टि के बारे में बात करते हुए निष्कर्ष निकालते हैं, जैसे कि ‘अवावट्रु वीडु पॆट्रु’ [तिरुवाइमोऴि – १०.११.११]’ में कहा गया है।
तिरुमङ्गै आऴ्वार् के पेरिय तिरुमोऴि, तिरुक्कुऱुन्ताण्डगम् और तिरुनेडुन्ताण्डगम् की व्याख्या यहीं समाप्त होती है।
अडियेन् गीता रामानुज दासी
आधार: https://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2023/11/simple-guide-to-dhivyaprabandham-part-4/
संगृहीत- https://divyaprabandham.koyil.org
प्रमेय (लक्ष्य) – https://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – https://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – https://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org